रिश्तों की धूप-छांव  

 मिहिर थोड़ा रुका, उसने माँ के हाथ को अपने गाल से लगाया और आगे बोला, “और रही बात सौम्या की, माँ… तो सौम्या तो मेरी आत्मा है, मेरी अर्धांगिनी है। उसके साथ तो मुझे अपना पूरा जीवन बिताना है। अगर मैं पहले आपके पास आ गया, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मेरा प्यार उसके लिए कम है। बल्कि सच तो यह है कि जो बेटा अपनी माँ का सम्मान नहीं कर सकता, जिसने उसे जन्म दिया, वह अपनी पत्नी को क्या सच्चा प्रेम और सम्मान देगा? 

जयपुर शहर के एक शांत और हरे-भरे मोहल्ले में स्थित ‘सद्भाव’ नाम का वह दो मंजिला मकान आज सुबह से ही एक ख़ास इंतज़ार में पलकें बिछाए बैठा था। सूरज की पहली किरण के साथ ही रसोई से उठती बर्तनों की खनक और ताज़ा इलायची वाली चाय की खुशबू पूरे घर में तैर रही थी। यह घर था मिहिर का, जो एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर कार्यरत था। काम के सिलसिले में उसे अक्सर देश-विदेश के लंबे दौरों पर जाना पड़ता था। इस बार भी वह पूरे अठारह दिनों के बाद बेंगलुरु के थका देने वाले तकनीकी प्रोजेक्ट को पूरा करके घर लौट रहा था।

मिहिर का विवाह अभी मात्र आठ महीने पहले ही सौम्या से हुआ था। सौम्या अपने माता-पिता की इकलौती और बेहद लाड़ली बेटी थी। खूबसूरत, चंचल, भावनाओं में बह जाने वाली और मिहिर पर अपना संपूर्ण अधिकार मानने वाली। उसके भीतर छल-कपट नहीं था, लेकिन लाड़-प्यार में पले होने के कारण उसमें थोड़ी नासमझी और असुरक्षा की भावना ज़रूर थी। उसे लगता था कि मिहिर के जीवन का केंद्र केवल और केवल वही होनी चाहिए। दूसरी ओर, घर के एक कमरे में मिहिर की वृद्ध माँ, सुमित्रा देवी रहती थीं। जिन्होंने अपने पति के असमय देहांत के बाद सिलाई-कढ़ाई करके और दिन-रात एक करके मिहिर को इस काबिल बनाया था कि वह आज समाज में सिर उठाकर जी सके। सुमित्रा देवी स्वभाव से बेहद सरल, कम बोलने वाली और बेटे-बहू के संसार में कभी दखल न देने वाली महिला थीं। उनके घुटनों में गठिया का पुराना दर्द था, जिसके कारण वे बहुत धीमे-धीमे चलती थीं और अधिकतर समय अपने कमरे में ही पूजा-पाठ या धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हुए बिताती थीं।

सुबह के करीब नौ बजे घर के मुख्य द्वार पर टैक्सी आकर रुकी। दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनते ही सौम्या, जो सुबह छह बजे से सज-धजकर हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहने आईने के सामने खड़ी थी, खुशी से चहक उठी। उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। अठारह दिन का लंबा विरह उसके लिए किसी सजा से कम नहीं था। वह दौड़कर मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ी। मिहिर भारी ट्रॉली बैग और लैपटॉप बैग लिए थके कदमों से भीतर दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुई थी और आँखों में रातों के सफर की गहरी थकान साफ झलक रही थी।

सौम्या के होंठों पर एक प्यारी सी मुस्कान खिली ही थी कि मिहिर ने सामने हॉल में आते ही अपना सामान एक तरफ रखा और सौम्या की तरफ केवल एक हल्की सी मुस्कान उछालते हुए सीधे बाईं ओर बने अपनी माँ के कमरे की ओर कदम बढ़ा दिए। वह दरवाज़ा धकेलते हुए अंदर गया और झुककर अपनी माँ के चरण स्पर्श किए।

“माँ! प्रणाम। कैसी हो आप? आपकी तबीयत कैसी है अब?” मिहिर ने बड़ी आत्मीयता से माँ के कमजोर हाथों को अपने हाथों में थामते हुए पूछा।

सुमित्रा देवी की आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “जीते रहो मेरे लाल। तू आ गया, मेरी तो आधी बीमारी वैसे ही दूर हो गई। चेहरा कितना उतर गया है तेरा! कुछ खाता-पीता भी था या बस काम ही करता रहता था?”

मिहिर वहीं कालीन पर माँ के घुटनों के पास बैठ गया और उनसे उनकी दवाइयों, घुटनों के दर्द और पिछले अठारह दिनों की दिनचर्या के बारे में विस्तार से पूछने लगा। इधर लिविंग रूम में खड़ी सौम्या के चेहरे की मुस्कान पलक झपकते ही गायब हो गई। उसके हाथों में थमा पानी का गिलास कांप गया। उसकी आँखों में उपेक्षा और आहत स्वाभिमान के अंगारे सुलगने लगे। अठारह दिनों का उसका इंतज़ार, उसका सजने-संवरने का उत्साह, उसकी मीठी-मीठी बातें करने की हसरत—सब कुछ एक झटके में चकनाचूर हो गया था।

“अठारह दिन बाद लौटे हैं, और मेरे लिए इनके पास दो पल का समय नहीं है! आते ही सीधे माँ के कमरे में जाकर बैठ गए, जैसे इस घर में मेरी कोई अहमियत ही न हो,” सौम्या ने मन ही मन बुदबुदाते हुए अपने होंठ भींच लिए। उसका कोमल मन ईर्ष्या और क्रोध के भंवर में फंस गया। वह भारी कदमों से अपने बेडरूम में चली गई और धड़ाम से दरवाज़ा बंद कर लिया। उसने पलंग पर गिरकर तकिए में अपना मुंह छुपा लिया और सुबकने लगी।

लगभग आधे घंटे बाद, जब मिहिर माँ को तसल्ली देकर और उनकी दवाइयों का हाल जानकर अपने कमरे की ओर आया, तो उसने दरवाज़ा हल्का सा खुला पाया। कमरे के अंदर का माहौल भारी था। सौम्या खिड़की के पास पीठ किए खड़ी थी। उसके कंधे हल्के-हल्के हिल रहे थे। मिहिर अपनी थकान भूलकर मुस्कुराया। वह जानता था कि उसकी नई-नवेली पत्नी किस बात से आहत हुई है। वह दबे पांव उसके पीछे गया और हौले से उसके कंधों पर हाथ रख दिया।

“सौम्या…” मिहिर ने बड़े लाड़ से पुकारा।

सौम्या ने एक झटके से उसका हाथ झटक दिया और घूमकर अपनी लाल-लाल आँखें उस पर गड़ा दीं। उसके चेहरे पर नाराजगी और उपेक्षा का गहरा दर्द था। तंज कसते हुए वह बोली, “यहाँ क्यों चले आए आप? जाइए न अपनी पूज्य माताजी के पास! रात-दिन उन्हीं के चरणों में बैठे रहिए, सेवा कीजिए। मेरे कमरे का रास्ता तो आप भूल ही गए थे न? अब मेरे पास आने की क्या ज़रूरत है? जाइए, मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी! कभी नहीं!”

मिहिर ने उसकी आँखों में तैरते आंसुओं को देखा। वह क्रोधित नहीं हुआ, बल्कि उसकी इस बचकानी ज़िद, मासूमियत और अनकहे अधिकार-बोध पर उसे एक मीठा सा प्यार आ गया। वह जानता था कि यह नफरत नहीं, बल्कि प्रेम की वह तीव्र प्यास है जो तुरंत तृप्त होना चाहती थी।

मिहिर ने आगे बढ़कर सौम्या की कलाई थाम ली। सौम्या ने छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन मिहिर ने बड़ी नज़ाकत से उसे खींचकर अपने करीब कर लिया और पलंग पर अपने पास बैठा लिया।

मिहिर ने बेहद कोमल स्वर में कहा, “अरे मेरी नाराज़ सरकार! अब आ तो गया हूँ अपनी प्यारी पत्नी के पास। ज़रा देखो तो मेरी तरफ, कितना थक गया हूँ। अठारह दिनों में एक रात भी चैन से नहीं सो पाया, सिर्फ इसलिए कि जल्दी से काम खत्म करके तुम्हारे पास लौट सकूँ। अब जब मैं आ गया हूँ, तो क्या अपने इस थके-हारे पति को थोड़ा प्यार नहीं करोगी? ज़रा बैठो, दो मीठे बोल बोलो, मेरा हालचाल पूछो। और अगर तुम ऐसे ही रूठी रहोगी, मुंह फुलाए रखोगी, तो मैं सच कह रहा हूँ—सामान तो अभी पैक ही है, अगली फ्लाइट पकड़कर फिर से किसी नए टूर पर निकल जाऊँगा और महीनों तक नहीं आऊँगा!”

मिहिर की यह बात सुनते ही सौम्या का सारा बनावटी गुस्सा रेत के महल की तरह ढह गया। उसका दिल सिहर उठा। विरह की कल्पना मात्र से उसकी रूह कांप गई। उसकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली।

“ना… ना… भगवान के लिए ऐसा कभी मत कहिएगा!” सौम्या ने घबराकर मिहिर के सीने पर अपना सिर रख दिया और दोनों हाथों से उसकी कमीज़ को कसकर पकड़ लिया, जैसे वह उसे जाने से रोक रही हो। सुबकते हुए वह बोली, “मैं आपके बिना एक पल भी नहीं जी सकती, मर ही जाऊँगी मैं! कभी दूर जाने की बात मुंह से मत निकालिएगा।”

सौम्या के इस निष्कपट और भावुक समर्पण को देखकर मिहिर का दिल भर आया। उसने अपनी बाहें सौम्या के इर्द-गिर्द कस दीं और उसके सिर को चूम लिया। उसने महसूस किया कि सौम्या का प्यार कितना गहरा है, बस उसे रिश्तों की सही समझ और संतुलन की ज़रूरत है।

कुछ देर तक कमरे में केवल उन दोनों की सांसों की आवाज़ गूंजती रही। मिहिर ने हौले से सौम्या के आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छा बाबा, अब रोना बंद करो। देखो, तुम्हारे पतिदेव का सफर की वजह से सिर फटा जा रहा है। अगर अपनी इन जादू भरी उंगलियों से एक कप कड़क अदरक वाली चाय बनाकर पिला दो, तो सारी थकान एक पल में काफूर हो जाए।”

सौम्या ने अपनी भीगी पलकों को उठाया और हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। वह उठकर रसोई की ओर चल दी। मिहिर ने राहत की सांस ली, अपने जूते उतारे, हाथ-मुंह धोया और फिर धीरे से कमरे से बाहर निकलकर दोबारा अपनी माँ के कमरे में जाकर बैठ गया। वह माँ के पैर दबाने लगा ताकि उन्हें थोड़ा आराम मिल सके।

रसोई में चाय की पत्ती उबल रही थी, लेकिन सौम्या के भीतर विचारों का एक नया बवंडर उठ खड़ा हुआ था। जब उसने देखा कि मिहिर फिर से माँ के कमरे में जाकर बैठ गया है, तो उसकी पुरानी कड़वाहट फिर से सिर उठाने लगी। “आखिर यह क्या बात हुई? अभी मुझसे इतना प्यार जताया और फिर माँ के पास चले गए? क्या मेरा अपना कोई वजूद नहीं है? क्या शादी के बाद भी एक पति का पहला ध्यान उसकी पत्नी पर नहीं होना चाहिए?” यह सोचकर उसने चाय का कप एक ट्रे में रखा और भारी मन से माँ के कमरे की ओर बढ़ी।

वह जैसे ही कमरे के दरवाज़े के पास पहुँची, अंदर से आ रही मिहिर और उसकी माँ की बातचीत की आवाज़ ने उसके कदमों को वहीं रोक दिया। परदे की ओट से उसने देखा कि मिहिर अपनी माँ के घुटनों पर तेल की मालिश कर रहा था और सुमित्रा देवी बड़े वात्सल्य से अपने बेटे का सिर सहला रही थीं।

सुमित्रा देवी कह रही थीं, “मिहिर बेटा, तू रहने दे। तू सफर से आया है, बहुत थका होगा। जाकर थोड़ा आराम कर ले। और सुन, तू सीधे मेरे कमरे में क्यों चला आया? पहले तुझे सौम्या के पास जाना चाहिए था। बेचारी बच्ची पिछले अठारह दिनों से तेरी राह देख रही थी। एक औरत के लिए उसके पति का इंतज़ार कितना कठिन होता है, यह मैं समझती हूँ बेटा। मैं तो बूढ़ी हो गई हूँ, मेरी जिंदगी तो कट गई, लेकिन सौम्या का तो सारा संसार ही तुझसे शुरू होता है।”

मिहिर ने जो जवाब दिया, उसने दरवाज़े के बाहर खड़ी सौम्या की आत्मा को भीतर तक झकझोर कर रख दिया।

मिहिर ने शांत और गंभीर स्वर में कहा, “माँ, आप नहीं समझोगी। जब मैं अठारह दिन घर से दूर होटल के किसी ठंडे कमरे में अकेला बैठा रहता था, तो मुझे दो ही चेहरे सबसे ज्यादा याद आते थे—एक आपका और दूसरा सौम्या का। माँ, बचपन में जब बाबूजी हमें छोड़कर चले गए थे, तब आपने अपनी सारी खुशियाँ, अपनी सारी इच्छाएं मारकर मुझे पढ़ाया-लिखाया। आप खुद भूखी सो जाती थीं लेकिन मुझे कभी भूखा नहीं रहने दिया। जब मैं बाहर रहता हूँ, तो मेरे मन में हमेशा यह डर लगा रहता है कि मेरी माँ बूढ़ी है, बीमार है, न जाने किस हाल में होगी। घर लौटते ही जब मैं आपकी सांसें सुन लेता हूँ, आपके चरण छू लेता हूँ, तो मुझे तसल्ली हो जाती है कि मेरा भगवान सुरक्षित है।”

मिहिर थोड़ा रुका, उसने माँ के हाथ को अपने गाल से लगाया और आगे बोला, “और रही बात सौम्या की, माँ… तो सौम्या तो मेरी आत्मा है, मेरी अर्धांगिनी है। उसके साथ तो मुझे अपना पूरा जीवन बिताना है। अगर मैं पहले आपके पास आ गया, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मेरा प्यार उसके लिए कम है। बल्कि सच तो यह है कि जो बेटा अपनी माँ का सम्मान नहीं कर सकता, जिसने उसे जन्म दिया, वह अपनी पत्नी को क्या सच्चा प्रेम और सम्मान देगा? मैं चाहता हूँ कि सौम्या यह समझे कि प्यार बांटने से कम नहीं होता, बल्कि बढ़ता है। मैं अपनी माँ को खोकर कभी एक अच्छा पति नहीं बन सकता, और सौम्या को दुखी रखकर कभी एक अच्छा बेटा नहीं कहला सकता। मुझे दोनों चाहिए माँ, मेरा संसार आप दोनों से मिलकर ही पूरा होता है।”

कमरे के बाहर खड़ी सौम्या की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसके हाथ में रखी चाय की ट्रे हल्की सी कांपी। मिहिर के एक-एक शब्द उसके अंतःकरण में उतरते चले गए। उसकी संकीर्ण सोच पर जैसे किसी ने आईना रख दिया था। उसे अपनी उस सोच पर घिन आने लगी, जहाँ वह एक माँ और बेटे के पवित्र, निःस्वार्थ रिश्ते को अपनी ईर्ष्या की तराजू में तौल रही थी।

उसे अचानक याद आया कि जब वह बीमार पड़ती थी, तो कैसे उसकी अपनी माँ रात-रात भर उसके सिरहाने बैठी रहती थी। यदि कल को उसका अपना कोई बेटा हो, और वह बड़ा होकर अपनी पत्नी के आ जाने पर अपनी माँ को भूल जाए, तो उसके दिल पर क्या बीतेगी? सुमित्रा देवी ने तो कभी मिहिर पर अपना हक जताने की कोशिश नहीं की थी, बल्कि वे तो हमेशा सौम्या के सुख की चिंता करती थीं। यह तो वह खुद थी, जो अपने ही पति को उसकी जड़ों से अलग करने की नादान कोशिश कर रही थी।

सौम्या ने अपने बहते आंसुओं को पोंछा। उसके चेहरे का तनाव अब एक गहरी समझदारी, आदर और पश्चाताप में बदल चुका था। उसने अपने चेहरे पर एक सहज, मीठी मुस्कान बिखेरी और कमरे का परदा हटाते हुए अंदर प्रवेश किया।

“लीजिए माँ जी, आपकी और मिहिर की गरमा-गरम चाय,” सौम्या ने बेहद मधुर स्वर में कहा।

सुमित्रा देवी ने मुस्कुराकर देखा, “अरे बहू, तूने क्यों तकलीफ की? मिहिर से कहती, वह बना लाता।”

“नहीं माँ जी, मिहिर बहुत थक गए हैं। और वैसे भी, आपके लिए चाय बनाने में मुझे कैसी तकलीफ?” कहते हुए सौम्या ने पहले चाय का कप आदरपूर्वक सुमित्रा देवी के हाथों में थमाया, और फिर झुककर श्रद्धा से अपनी सास के पैर छुए।

सुमित्रा देवी चौंक पड़ीं और फिर भावविभोर होकर उन्होंने सौम्या के सिर पर हाथ रख दिया, “सदा सुहागन रहो मेरी बच्ची! भगवान तुम दोनों की जोड़ी हमेशा सलामत रखे।”

मिहिर ने हैरान होकर सौम्या की ओर देखा। सौम्या की आँखों में अब वह शिकायत, वह गुस्सा या वह रूखापन कहीं नहीं था। उसकी आँखों में एक नई चमक थी—सम्मान और परिपक्वता की चमक।

सौम्या ने दूसरा कप मिहिर की ओर बढ़ाया और अपनी नटखट मुस्कान के साथ धीरे से कहा, “लीजिए जनाब, आपकी कड़क चाय। और हाँ, माँ जी के घुटनों में मालिश आज आप नहीं, मैं करूँगी। आप जाकर गर्म पानी से नहा लीजिए, तब तक मैं आप दोनों के लिए नाश्ता तैयार करती हूँ।”

मिहिर ने चाय का कप पकड़ा और सौम्या की आँखों में झांका। दोनों की नज़रें मिलीं, और बिना एक भी शब्द कहे, मिहिर समझ गया कि सौम्या ने सब कुछ सुन लिया है और समझ भी लिया है। मिहिर के होठों पर एक गहरी, सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसके मन का सारा बोझ, सारी थकान पल भर में गायब हो गई।

उस छोटे से कमरे में चाय की चुस्कियों के साथ अब केवल प्यार, सम्मान और अपनत्व की सुगंध फैली थी। सौम्या को समझ आ गया था कि प्रेम किसी को बांधने या बाँटने का नाम नहीं है, बल्कि प्रेम तो सबको साथ लेकर चलने का एक सुंदर अहसास है। जिस घर में माँ का आशीर्वाद और पत्नी का विश्वास एक साथ बहते हैं, वही घर वास्तव में स्वर्ग बनता है।

एक पुरुष जब बाहर से घर लौटता है, तो वह केवल एक पति नहीं होता, वह किसी का बेटा और किसी का भाई भी होता है। क्या एक स्त्री का अपने पति के परिवार को अपना समझना और उस प्रेम का सम्मान करना वाकई इतना कठिन है? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ साझा करें।

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