सोने की मोहर – शुभ्रा बैनर्जी
“मैं अब नहीं रहने वाली यहां।सारा दिन खटती रहती हूं,फिर भी मन नहीं भरता आपके बेटे का।रोज -रोज खाने को लेकर चिक-चिक,हद है।हर बात में तैयार रहता है आपका बेटा लड़ने को।क्या कभी मैंने अपने दायित्वों से मुंह मोड़ा है?कभी भी आप लोगों के साथ बुरा बर्ताव किया है?ससुराल में सब अपनी सास से परेशान … Read more