रेशम के धागे – रवीन्द्र कान्त त्यागी
“ग्रेवाल साहब से मिलना है” केबिन के बाहर से किसी नारी का स्वर सुनाई दिया। “ग्रेवाल साहब तो… अब यहाँ दीक्षित सर देखते हैं।“ रिसेप्सनिस्ट ने उत्तर दिया। एक दंपति ने मेरे केबिन में प्रवेश किया। कुछ पल तो एक फाइल में उलझा रहा। फिर गर्दन उठाई तो सामने हमारे कौलेज की सब से चर्चित … Read more