हमारे दिए गए संस्कार जाया नहीं गए –  सविता गोयल

अरूण जी बार बार बरामदे का चक्कर लगा रहे थे ।  उन्हें इस तरह बेचैन देखकर उनकी बहू मीता पूछ बैठी , “क्या बात है पापाजी? आपको कुछ चाहिए क्या?” “नहीं…. बहू… वो … मैं बस यूं ही ….  वैसे तनुज नहीं आया अभी तक आफिस से”   बात घुमाते हुए अरूण जी बोले । … Read more

बुढ़ापा किसी का सगा नहीं होता – अनु अग्रवाल

“अब कान लगाए दरवाजे पर ही खड़े रहोगे या बत्ती बन्द करके सोओगे भी”- मीनाक्षी ने तीखे स्वर में कहा। “बाबूजी के खाँसने की आवाज़ बहुत देर से आ रही है….लगता है तबियत ज्यादा खराब हो रही है…….ज़रा देखकर आता हूँ” बस इतना ही कहना था रामानुज जी का…कि मीनाक्षी बिफर पड़ी…….देखकर क्या आते हो….ऐसा … Read more

संस्कार हमारी थाती – कुमुद चतुर्वेदी

कुहू और पिहू दोनों बहनें रोज स्कूल से शाम चार बजे तक लौटती थीं।फिर एक घंटे में नाश्ता,दूध,फल खाकर पाँच बजे तक ट्यूशन पढ़ने चली जातीं।वहाँ से छैः बजे वापिस आकर थोड़ा टी.वी.या बीतचीत में समय निकल जाता और रात को खाना खाकर पढ़तीं थीं।दस बजे सोने का समय था।सुबह फिर पाँच बजे उठना और … Read more

तुम्हारी मॉं के संस्कार..!! – भाविनी केतन उपाध्याय 

कृष्णकांत जी पलंग पर लेटे-लेटे सोच रहे हैं और उनकी आंखों से अश्रु बह रहे हैं, नन्हा पांच साल का उनका पोता भौतिक जो पास में बैठकर खिलौने से खेल रहा है। उसने अपने दादाजी को रोते देख अपनी मा सुनिता को पुकारा, “मां देखो ना दादाजी रो रहे हैं।” सुनिता जो रसोईघर में कृष्णकांत … Read more

अधूरी तलाश – नीरजा कृष्णा

“हमारे मोहित को तो मीना कुमारी  ही चाहिए। उसे और कुछ नहीं चाहिए। बस उसकी भावी पत्नी पढ़ी लिखी, समझदार और मीना कुमारी  जैसी सुंदर होनी चाहिए।” मदनमोहन जी बड़ी शान से अपने योग्य पुत्र का बखान कर रहे थे। वे लोग श्यामसुंदर जी की बेटी निशि को देखने आए हुए थे। तभी मोहित की … Read more

मैं क्यों चुप रही? – विभा गुप्ता

 कभी-कभी सबकुछ जानते हुए भी हम चुप रह जाते हैं।अपनी चुप्पी को कभी परंपरा तो कभी संस्कार का नाम दे देते हैं और फिर बाद में पछताते हैं कि काशः हम बोल दिये होते।           छोटा- सा मेरा परिवार था।दादी,पापा,माँ, दीदी और मैं।पापा की आमदनी में हम सभी बहुत खुश थें।दादी के नाम की थोड़ी ज़मीन … Read more

खाली लिफ़ाफ़ा – सुधा शर्मा

“कहाँ  खो गए आप?”पूछा सुमि ने।’ क्या कहता उससे?उसके अलावा कहीं मन लगता है  क्या?’ पहली बार चाची के घर मेरी कविताएँ सुनने आई थी, तब देखा था मैंने उसे।तब ही मेरे मन को भा गई थी वह।न जाने कितनी गहराई थी उसकी आँखों में कि मै डूबता चला गया ।सहमी सी, सकुचाई सी, ‘सादगी … Read more

संस्कारो का दहेज – मंगला श्रीवास्तव

      सुबह के पाचँ बजे थे। अम्माजी  उठ चुकी थी । चाहे कितनी ठंड हो या गर्मी वह इसी समय उठ जाती है रोज।कमरे से बाहर आकर उन्होंने अपनी छोटी बहू को आवाज दी नीरा ओ नीरा मेरी चाय बन गयी क्या ,जी मांजी  कहकर नीरा ने जल्दी से चाय लाकर टेबल पर रख दी । … Read more

संस्कार – सुधा शर्मा 

निशा रास्ते भर सोचते हुये आ रही थी सुशीला जी ‘ पता नहीं इस लड़की ने क्या गजब किया जो माला जी ने कह दिया कि निशा की बहुत शिकायतें इकट्ठी हो गई है जब भी समय और सुविधा हो तो आने का प्रयास कीजियेगा।    शहर में ही शादी की थी उन्होंने बेटी की ।वैसे … Read more

शर्म पहनावें मे नही चरित्रहीन होने में है!! – मनीषा भरतीया

 रीमा देख आज हम सब सब ने मिलने का प्रोग्राम बनाया है।, तुम्हें भी आना ही पड़ेगा। हर बार तू टाल जाती है लेकिन इस बार मैं तेरी एक नहीं सुनूंगी। अरे भई अब तो हम सब सहेलियां बहू वाली हो गए हैं।, सास बन चुके हैं। अगर अब अपनी जिंदगी नहीं जिएंगे तो कब … Read more

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