भरोसा – नेहा जैन

बरसात की हल्की बूंदें शहर की ऊंची इमारतों पर गिर रही थीं। रात के करीब ग्यारह बजे थे, लेकिन “सिटी केयर हॉस्पिटल” की चौथी मंजिल पर हलचल अभी भी जारी थी।

कमरा नंबर 407 के बाहर एक आदमी बेचैनी से टहल रहा था। उसकी आंखों में डर था… और माथे पर पसीना।

वो बार-बार डॉक्टर से सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहा था—

“मेरी बेटी ठीक तो हो जाएगी ना?”

कुछ साल पहले तक यही आदमी अपनी बेटी से ठीक से बात तक नहीं करता था।

उसका नाम था राघव मेहता—शहर का बड़ा बिल्डर। करोड़ों की कंपनी, बड़ी गाड़ियां, नाम, रुतबा… सबकुछ था उसके पास। बस एक चीज़ नहीं थी—अपनी बेटी अनुष्का के लिए समय।

राघव का मानना था कि जिंदगी सिर्फ सफल लोगों को याद रखती है। और उसकी नजर में सफलता का मतलब था—पैसा, ताकत और बिजनेस।

लेकिन अनुष्का अलग थी।

उसे कैमरे पसंद थे।

वो लोगों की तस्वीरें नहीं… उनकी जिंदगी कैद करती थी।

सड़क किनारे बैठा मोची… बारिश में भीगती बच्ची… स्टेशन पर सोता परिवार… उसके कैमरे में शहर का वो हिस्सा कैद होता था जिसे लोग देखकर भी नजरअंदाज कर देते थे।

राघव को ये सब “फालतू” लगता था।

“फोटोग्राफी से घर नहीं चलता,”

वो अक्सर कहता।

अनुष्का हर बार चुप हो जाती। क्योंकि उसे पता था—कुछ रिश्तों में बहस जीतकर भी इंसान हार जाता है।

एक दिन उसने नेशनल डॉक्यूमेंट्री कॉन्टेस्ट जीता। उसका बनाया वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया। देशभर में उसकी तारीफ होने लगी।

लेकिन उसी शाम घर में जश्न नहीं हुआ।

राघव ने सिर्फ इतना पूछा—

“इससे कमाई कितनी हुई?”

उस दिन पहली बार अनुष्का को लगा… शायद कुछ लोग आपको कभी समझ ही नहीं पाते।

फिर एक दिन वो अचानक घर छोड़कर चली गई।

कोई ड्रामा नहीं हुआ।

कोई चिट्ठी नहीं छोड़ी।

बस उसका कमरा खाली था… और मेज पर रखा कैमरा गायब।

सरला, यानी उसकी मां, रोती रही। लेकिन राघव का अहंकार उससे भी बड़ा था।

उसने गुस्से में कहा—

“जाना है तो जाए। दो दिन में खुद वापस आ जाएगी।”

लेकिन दो दिन… दो महीने में बदल गए।

फिर एक साल में।

अनुष्का वापस नहीं आई।

कभी-कभी उसकी तस्वीरें किसी मैगजीन में दिख जातीं। कभी किसी इंटरनेशनल प्रोजेक्ट में उसका नाम सुनाई देता। लेकिन उसने कभी घर फोन नहीं किया।

राघव भी कभी झुका नहीं।

फिर एक रात सबकुछ बदल गया।

टीवी पर अचानक एक न्यूज फ्लैश चली—

“सीरिया बॉर्डर पर भारतीय फोटो-जर्नलिस्ट घायल।”

स्क्रीन पर खून से सना चेहरा दिखा।

सरला चीख पड़ी—

“अनुष्का!”

राघव के हाथ से रिमोट गिर गया।

उसे पहली बार एहसास हुआ… उसने अपनी बेटी को सिर्फ खोया नहीं था… कभी समझा ही नहीं था।

अगले ही दिन वो दिल्ली पहुंच गया, जहां अनुष्का को एयरलिफ्ट करके लाया गया था।

ऑपरेशन चल रहा था।

डॉक्टर ने बताया—

“गोली कंधे के पास लगी है। खतरे से बाहर आने में वक्त लगेगा।”

राघव पूरी रात अस्पताल के बाहर बैठा रहा।

उसे याद आने लगा—

पांच साल की अनुष्का… जो उसके ऑफिस में रंग भरती थी।

बारह साल की अनुष्का… जो हर फैमिली फंक्शन में कैमरा लेकर घूमती रहती थी।

और सत्रह साल की वही लड़की… जिसने एक दिन कहा था—

“पापा, दुनिया सिर्फ इमारतों से नहीं बनती… कहानियों से भी बनती है।”

तब उसने हंस दिया था।

आज वही बात उसके सीने में हथौड़े की तरह लग रही थी।

सुबह चार बजे ICU का दरवाजा खुला।

डॉक्टर बाहर आए—

“अब खतरा टल गया है।”

राघव अंदर गया।

अनुष्का बेहोश थी। चेहरे पर चोटें थीं। हाथों में पट्टियां बंधी थीं।

उसके सिरहाने एक बैग रखा था। शायद युद्ध क्षेत्र से आया सामान।

राघव ने धीरे से बैग खोला।

अंदर कैमरा था।

उसने कैमरा ऑन किया।

स्क्रीन पर तस्वीरें आने लगीं—

एक बच्चा जो मलबे में अपनी मां को ढूंढ़ रहा था।

एक लड़की जो टूटे स्कूल में बैठकर पढ़ रही थी।

एक बूढ़ा आदमी जो युद्ध के बीच अपनी पत्नी को खाना खिला रहा था।

हर तस्वीर चीख रही थी।

लेकिन आखिरी फोटो देखकर राघव रुक गया।

वो उसकी अपनी तस्वीर थी।

घर के ड्राइंग रूम में बैठा हुआ… लैपटॉप पर काम करता हुआ… और सामने छोटी अनुष्का उसे देख रही थी।

उस फोटो के नीचे सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

“जिस इंसान का ध्यान पूरी दुनिया पर था… वो बस अपनी बेटी को नहीं देख पाया।”

राघव वहीं कुर्सी पर बैठ गया।

उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे।

पहली बार बिना हार-जीत सोचे… बिना अहंकार के… वो सिर्फ एक पिता था।

कुछ दिनों बाद अनुष्का को होश आया।

कमरे में सन्नाटा था।

राघव धीरे से उसके पास आया।

“अनुष्का…”

वो चुप रही।

राघव ने कांपती आवाज में कहा—

“तुम सही थीं। मैं पूरी जिंदगी इमारतें बनाता रहा… लेकिन अपना घर नहीं बना पाया।”

अनुष्का की आंखें भर आईं।

राघव ने आगे कहा—

“अगर… अगर अभी भी देर नहीं हुई… तो क्या मैं तुम्हारी जिंदगी में दोबारा जगह बना सकता हूं?”

कमरे में कुछ सेकंड खामोशी रही।

फिर अनुष्का ने अपना कमजोर हाथ आगे बढ़ा दिया।

राघव ने तुरंत उसे पकड़ लिया… जैसे कोई इंसान सालों बाद अपना सबसे जरूरी रिश्ता वापस पा लेता है।

उस दिन अस्पताल के उस छोटे-से कमरे में कोई महान भाषण नहीं हुआ।

बस एक पिता ने पहली बार अपनी बेटी को देखा था।

सचमुच देखा था।

नेहा जैन

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