इंतजार खत्म नहीं होता – गीता वाधवानी 

गंगा दशहरा होने के कारण, रेलवे स्टेशन पर गंगा स्नान करने जाने वालों की अत्यधिक भीड़ और हलचल थी।       दिल्ली से हरिद्वार जाने वाली रेलगाड़ी में तिल धरने की भी जगह ना थी। ऐसे में जैसे तैसे जतन करके श्याम अपनी पत्नी राधा और 8 वर्षीय बेटी नीलम और 3 वर्षीय बेटे गोलू के साथ … Read more

“अकेलापन” – अनु अग्रवाल

हरि बेटा….तेरी माँ की तबियत बहुत खराब है…….थोड़ा समय निकालकर…….. “मैं कोई डॉक्टर थोड़े ही हूँ….आप दवा दे दो माँ को ठीक हो जायेंगीं”- हरि….. रमाशंकर जी की बात बीच में ही काटकर बोल पड़ा। “हर बीमारी का इलाज सिर्फ दवा नहीं होती बेटा….. अकेलापन खा चला है उसे…..कैसी तड़प रही है तुम सबसे मिलने … Read more

पराये हुए अपने – कमलेश राणा

वो शाम बहुत अजीब सी बेचैनी से भरी थी। कोई किसी से न बात कर रहा था, न ही नजरें मिला रहा था या यूँ कहें कि बात करने के लिए कुछ था ही नहीं। वैशाली की रिपोर्ट का सभी व्यग्र हो कर इंतज़ार कर रहे थे।  कुछ दिनों से वैशाली को चाहे जब चक्कर … Read more

!! भरोसा !!  – मृदुला कुश्वावाहा

“अरे! काजल बिटिया, आज कहाँ जा रही हो? अब तो नौकरी छोड़ दी हो ना?” काजल पीछे मुड़कर- “हाँ पापा, आज मैं अपने बकाये पेमेंट का हिसाब करने जा रही हूँ।” – “ठीक है बेटी जाओ, अपना हिसाब करके आओ और हाँ, ज्यादा उलझने की जरूरत नहीं है। तुम्हें मोबाइल शॉप के मालिक बेइज्जत करके … Read more

कौन अपना, कौन पराया!” –  रूचिका राणा

 “देखा! मयूरविहार वाले जीजा जी का फोन अभी तक नहीं आया।” श्रीमान जी ने अपने मोबाइल की स्क्रीन को ऊपर नीचे स्क्रॉल करते हुए कहा।      “आप से कब बात हुई थी उनकी….?”    “मैंने ही किया था उस दिन हॉस्पिटल से, जिस दिन डिस्चार्ज होने वाला था।”       “तो इसमें हैरानी वाली कौन सी बात है… जब … Read more

धोखा नहीं अपनापन था  –  तृप्ति शर्मा

तीन बहनों में सबसे छोटा था मयंक बड़ी मन्नतो के बाद हुआ था। खूब लाड और प्यार से पाला मां बाबा ने ।सबका लाडला, घर का चिराग जिसके खिलखिलाने पर पूरा घर खिलखिलाता था जिसके रोने पर पूरा घर बिलख पड़ता।      बेटियां रोशनी थी तो मयंक उजियारा।मां बाबा कहते ,”अब घर पूरा हो गया “।अच्छा … Read more

एकादशी में महालक्ष्मी की वापसी – शुभ्रा बनर्जी 

अनुज के साथ पहली बार जब दिल्ली आई थी मैं,आंखों से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।एक भरे पूरे संयुक्त परिवार में पली बढ़ी मैं,कैसे अकेले एक नए शहर में रहूंगी?कौन ध्यान रखेगा मेरा?ताऊजी,ताजी,चाचा,चाची,बुआ,दादा दादी सबकी लाड़ली थी मैं।सबके लाड़ प्यार ने मुझे नकचढ़ी बना दिया था,ऐसा मम्मी का आरोप था मुझ … Read more

‘ स्वार्थी नहीं बनना है ‘ –  विभा गुप्ता

 ‘ये क्या! जेठानी जी ने फिर से केवल अपने लिए ही चाय बनाई है।अरे,मेरे लिए ना सही,कम से कम बाबूजी के लिए तो बना देती।माँजी थीं,तब की बात और थी, लेकिन अब वे नहीं है तो क्या वे इतना भी नहीं कर सकतीं हैं।’ बुदबुदाते हुए मैं अपने लिए और बाबूजी के लिए बिना चीनी … Read more

प्यारी बहना – कांता नेगी 

सोनिया शेखर और सुमन की लाडली और सुधीर और सुनील की प्यारी बहना थी।तीनो भाई बहन एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे।छोटी छोटी बातों पर लड़ना झगड़ना,एक दूसरे की चीजे छीनना ये तो लगा ही रहता था।जब कभी सोनिया भाईयों की शिकायत मम्मी पापा से करते तो वे सोनिया का ही पक्ष लेते और … Read more

“अब टोको ना कोई रोको ना” – कुमुद मोहन

“क्या ऊंट की तरह हुड़दंगी सी कूदती रहती हो!धीरे चला करो”दादी जब-तब आठ साल की सुमी को टोकती रहतीं,और सुमी के उठते कदम दादी के टोकने के साथ एक पल में रूक जाते। थोड़ी बड़ी हुई तो माँ ने टोका ताड़ सी लंबी हो रही हो स्कर्ट मत पहना करो,खुली टांगें अच्छी नहीं लगती, ढक … Read more

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