सीरत का गहना

रश्मि जी ने मीरा के खून से सने माथे को चूम लिया। “मेरी दीदी मेरे लिए मेरी माँ के समान हैं। अगर आज तू अपने महँगे कपड़ों और इस दिखावे की परवाह करती, जैसे बाकी भीड़ कर रही थी, तो आज मैं अपनी माँ जैसी बहन को खो देती। तूने आज सिर्फ मेरी दीदी की जान नहीं बचाई, बल्कि मेरी आँखों पर पड़ी उस पट्टी को भी खोल दिया है जो मुझे असली इंसान को पहचानने नहीं दे रही थी।”

मीरा, अपनी अलमारी से एक सादा सा सूती सूट निकालते हुए बोली, “माँ, आप मुझे जबरदस्ती क्यों बदल देना चाहती हैं? मैं जैसी हूँ, क्या वैसी अच्छी नहीं हूँ?”

कमरे के दरवाज़े पर खड़ी उसकी माँ, सुमित्रा जी ने माथे पर चिंता की लकीरें खींचते हुए कहा, “बेटा, तू अच्छी है, बहुत अच्छी है। लेकिन यह बात मैं जानती हूँ, तेरा पिता जानता है। दुनिया वालों को तो पहले सूरत ही नज़र आती है ना! तुझे पता है न कि तेरी होने वाली सास, मिसेज रश्मि सिंघानिया, शहर की कितनी बड़ी सोशलाइट हैं? उनके उठने-बैठने का ढंग, उनके कपड़े… सब कुछ एकदम हाई-क्लास होता है। कल जब वो शगुन लेकर आईं थी, तो उन्होंने दबी ज़बान में कह ही दिया था कि ‘मीरा बच्ची तो बहुत प्यारी है, लेकिन हमारे परिवार के रुतबे के हिसाब से इसे थोड़ा मॉडर्न और प्रेजेंटेबल होना पड़ेगा।'”

“माँ, लेकिन नमन ने तो मुझे इसी रूप में पसंद किया है ना? वो तो मेरे सीधे-सादे स्वभाव और मेरे विचारों से प्रभावित था। उसने तो कभी नहीं कहा कि मुझे किसी मॉडल की तरह दिखना चाहिए,” मीरा ने आईने के सामने अपने बालों की चोटी बनाते हुए कहा।

सुमित्रा जी ने आगे बढ़कर मीरा के हाथ से कंघी ले ली और उसे समझाते हुए बोलीं, “नमन बहुत अच्छा लड़का है मीरा, उसकी सोच बहुत सुलझी हुई है। लेकिन शादी के बाद तुझे अपनी सास के साथ भी तो रहना है। उनके समाज में उठना-बैठना है। अगर वो तेरी सादगी को तेरा पिछड़ापन मान बैठीं, तो तेरी पूरी ज़िंदगी तानों के बीच गुज़रेगी। मैं एक माँ हूँ, अपनी बच्ची का घर बसने से पहले उसे किसी भी तरह की परेशानी में पड़ते नहीं देख सकती। मेरी खातिर, बस आज मेरे साथ उस बड़े वाले डिज़ाइनर सलोन में चल। मैंने वहाँ बात कर ली है। वो तुझे एक ऐसा नया लुक देंगे कि तेरी सास देखती रह जाएंगी। शादी में बस दस दिन बचे हैं, मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहती।”

तभी मीरा के पिता, रामनाथ जी कमरे में दाखिल हुए। उन्होंने सुमित्रा जी की बातें सुन ली थीं। उन्होंने मीरा के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “सुमित्रा, तुम बेकार में बच्ची पर दबाव डाल रही हो। सुंदरता महंगे कपड़ों या मेकअप से नहीं, बल्कि इंसान के कर्मों और उसके दिल से होती है। मीरा का दिल सोने का है, और नमन ने इसी सोने को पहचाना है।”

“आप रहने दीजिए जी,” सुमित्रा जी थोड़ा झल्लाते हुए बोलीं, “आप आदम ज़माने की बातें करते हैं। आज के समय में जो दिखता है, वही बिकता है। अगर कल को इसकी सास ने इसे किसी पार्टी में साथ ले जाने से मना कर दिया यह सोचकर कि यह उनके रुतबे से मेल नहीं खाती, तो क्या आप इसका दर्द बाँट पाएंगे? मीरा, तू चुपचाप तैयार हो और मेरे साथ चल।”

पिता ने बेबसी से मीरा की ओर देखा और आँखों ही आँखों में उसे माँ की बात मान लेने का इशारा किया, ताकि घर में बेवजह की बहस न हो। पिता का मन रखने के लिए मीरा ने भारी मन से हामी भर दी।

कुछ ही देर बाद, मीरा और सुमित्रा जी शहर के सबसे महंगे और आलीशान सलोन में बैठे थे। वहाँ की चकाचौंध मीरा की आँखों को चुभ रही थी। सलोन की हेड स्टाइलिस्ट ने मीरा को ऊपर से नीचे तक देखा और सुमित्रा जी को आश्वासन दिया, “आप फिक्र मत कीजिए आंटी जी, जब यह यहाँ से निकलेंगी तो कोई पहचान नहीं पाएगा कि यह वही सिंपल सी लड़की है। हम इनका पूरा मेकओवर करेंगे।”

अगले तीन घंटे मीरा के लिए किसी सज़ा से कम नहीं थे। उसके बालों को काटा गया, कलर किया गया, चेहरे पर कई तरह के महंगे उत्पाद लगाए गए, और उसे एक बेहद महंगा, भारी और तड़क-भड़क वाला डिज़ाइनर गाउन पहनाया गया। साथ में ऊँची हील्स वाले सैंडल भी पहनाए गए जिनमें मीरा का चलना दूभर हो रहा था। जब वह आईने के सामने खड़ी हुई, तो उसे लगा जैसे वह कोई और ही है। एक सजी-धजी प्लास्टिक की गुड़िया, जिसके चेहरे पर भावनाओं की जगह मेकअप की मोटी परत चढ़ी थी।

सुमित्रा जी उसे देखकर खुशी से फूली नहीं समा रही थीं। “नज़र न लगे मेरी बच्ची को! अब देखना, रश्मि जी कैसे देखती रह जाएंगी। तू बिल्कुल किसी हीरोइन जैसी लग रही है।”

सलोन से निकलकर दोनों ने घर जाने के लिए एक कैब की। मीरा को उस भारी गाउन और हाई हील्स में कैब के अंदर बैठने में ही बहुत परेशानी हो रही थी। कैब शहर के मुख्य चौराहे से गुज़र रही थी, तभी अचानक ट्रैफिक धीमा हो गया और गाड़ियाँ रुकने लगीं।

मीरा ने खिड़की से बाहर देखा तो पाया कि सड़क के किनारे एक छोटी सी भीड़ जमा थी। कुछ लोग अपने मोबाइल निकालकर वीडियो बना रहे थे। मीरा ने ध्यान से देखा तो भीड़ के बीचों-बीच एक साठ-पैंसठ साल की बुजुर्ग महिला बेहोश पड़ी थीं। उनके माथे से खून बह रहा था, शायद चक्कर खाकर गिरने की वजह से उन्हें गहरी चोट आई थी।

मीरा की आत्मा सिहर उठी। “भैया, गाड़ी रोकिए!” उसने कैब ड्राइवर से कहा।

सुमित्रा जी घबरा गईं। “क्या कर रही है मीरा? क्यों गाड़ी रुकवा रही है?”

“माँ, बाहर कोई बुजुर्ग महिला बेहोश पड़ी हैं और उनके सिर से खून बह रहा है। लोग तमाशा देख रहे हैं, कोई उनकी मदद नहीं कर रहा है। मुझे जाना होगा,” मीरा ने कैब का दरवाज़ा खोलते हुए कहा।

सुमित्रा जी ने तुरंत मीरा का हाथ पकड़ लिया। “तू पागल हो गई है क्या? एक हफ़्ते बाद तेरी शादी है! देख तूने कितने महँगे कपड़े पहने हैं, तेरा पूरा मेकअप खराब हो जाएगा। और सबसे बड़ी बात, यह पुलिस और अस्पताल का मामला है। हम शरीफ लोग इन पचड़ों में क्यों पड़ें? कोई न कोई उन्हें अस्पताल ले ही जाएगा। तू दरवाज़ा बंद कर, हमें घर जल्दी पहुँचना है।”

मीरा ने अपनी माँ की तरफ एक गहरी और स्थिर नज़रों से देखा और बोली, “माँ… अगर उस सड़क पर आज मेरी नानी पड़ी होतीं, या आप खुद पड़ी होतीं, और लोग वीडियो बना रहे होते, तब भी क्या आप यही चाहतीं कि कोई शरीफ इंसान पुलिस के डर से आगे न आए? क्या इंसानियत से बढ़कर मेरे ये महँगे कपड़े और यह दिखावटी मेकअप है? मुझसे यह सब नहीं देखा जाएगा।”

इतना कहकर मीरा ने झटके से अपनी माँ का हाथ छुड़ाया और कैब से बाहर निकल गई। सुमित्रा जी पीछे से आवाज़ें लगाती रहीं, लेकिन मीरा ने एक न सुनी।

भीड़ को चीरते हुए मीरा उस बुजुर्ग महिला के पास पहुँची। महिला की सांसें उखड़ रही थीं और माथे से लगातार खून बह रहा था। मीरा ने बिना एक पल गँवाए, अपने उस हज़ारों रुपये के डिज़ाइनर गाउन के दुपट्टे को फाड़ा और महिला के सिर पर कसकर बाँध दिया ताकि खून बहना रुक जाए। इस जद्दोजहद में मीरा के कपड़ों पर भी खून के दाग लग गए, उसका मेकअप पसीने और धूल से खराब हो गया, और उसके बाल बिखर गए।

“आप लोग बस खड़े होकर तमाशा देख रहे हैं! कोई ऑटो या कैब क्यों नहीं बुलाता?” मीरा ने भीड़ पर चिल्लाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में इतनी दृढ़ता थी कि दो-तीन लोग तुरंत आगे आए और उन्होंने महिला को उठाने में मीरा की मदद की। मीरा ने उन्हें अपनी ही कैब में लिटाया और ड्राइवर को तुरंत पास के बड़े अस्पताल चलने को कहा। सुमित्रा जी अब भी घबराई हुई थीं और पीछे की सीट पर सिकुड़ कर बैठी अपनी बेटी के इस ‘पागलपन’ को कोस रही थीं।

अस्पताल पहुँचते ही इमरजेंसी वार्ड के डॉक्टरों ने महिला को तुरंत आईसीयू में ले लिया। मीरा की पूरी ड्रेस खून से सन चुकी थी और उसके पैरों में हाई हील्स की वजह से छाले पड़ गए थे, इसलिए उसने सैंडल उतार कर एक कोने में रख दिए और नंगे पैर ही अस्पताल के गलियारे में खड़ी रही।

सुमित्रा जी ने सिर पकड़ लिया था। “देख लिया अपना हाल? न कपड़े बचे, न मेकअप। अब पुलिस आएगी तो हजार सवाल पूछेगी। अगर तेरे ससुराल वालों को पता चला कि हम किसी पुलिस केस में फँस गए हैं, तो वो क्या सोचेंगे? तेरी सास तो वैसे ही बहुत सख्त मिज़ाज की हैं, वो तो रिश्ता ही तोड़ देंगी।”

तभी एक पुलिस इंस्पेक्टर वहाँ पहुँचा। “आप दोनों इस महिला को यहाँ लेकर आई हैं? क्या हुआ था?”

मीरा ने शांति से पूरी घटना बता दी। इंस्पेक्टर ने कुछ नोट किया और कहा, “देखिए, यह एक मेडिको-लीगल केस है। जब तक महिला को होश नहीं आ जाता और हम उनका बयान नहीं ले लेते, आप दोनों को यहीं रुकना पड़ेगा।”

सुमित्रा जी का डर अब सच साबित हो रहा था। वह रोने जैसी हो गईं और मीरा को ताने मारने लगीं। मीरा चुपचाप एक बेंच पर बैठी, बस उस अनजान महिला की सलामती की दुआ कर रही थी।

लगभग डेढ़ घंटे बाद, अस्पताल के मुख्य द्वार से कुछ लोग बदहवास हालत में दौड़ते हुए अंदर आए। मीरा की नज़र उन पर पड़ी तो वह हैरान रह गई। वो कोई और नहीं, बल्कि उसका मंगेतर नमन, उसकी होने वाली सास रश्मि सिंघानिया, और ससुर जी थे। तीनों के चेहरे पर खौफ और घबराहट साफ़ झलक रही थी।

सुमित्रा जी ने जैसे ही रश्मि जी को देखा, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “हे भगवान! मेरी बच्ची का घर बसने से पहले ही उजड़ जाएगा। इन्हें ज़रूर पता चल गया है कि हम किसी पुलिस केस में फँसे हैं। अब ये तमाशा करेंगे।” सुमित्रा जी डरते-डरते अपनी जगह से उठीं।

रश्मि जी रोते हुए रिसेप्शन की तरफ भाग रही थीं। तभी पुलिस इंस्पेक्टर उनके पास गया। “मिसेज सिंघानिया? मैंने ही आपको फोन किया था।”

“इंस्पेक्टर साहब! कहाँ हैं मेरी बड़ी दीदी? वो बस स्टैंड से हमारे घर आ रही थीं और रास्ते में उनका फोन बंद हो गया। मुझे बताया गया कि उनका एक्सीडेंट…” रश्मि जी फूट-फूट कर रोने लगीं।

“आप शांत हो जाइए,” इंस्पेक्टर ने दिलासा देते हुए कहा। “उन्हें अब खतरे से बाहर घोषित कर दिया गया है। सिर पर गहरी चोट थी, लेकिन सही समय पर खून बहना रोक दिया गया और उन्हें अस्पताल पहुँचा दिया गया। अगर इस बहादुर लड़की ने समय रहते अपनी परवाह किए बिना इनकी मदद न की होती, तो शायद आपकी दीदी को बचाना नामुमकिन हो जाता। सड़क पर तो लोग सिर्फ तमाशा देख रहे थे।”

इंस्पेक्टर ने हाथ बढ़ाकर बेंच पर बैठी मीरा की तरफ इशारा किया।

रश्मि सिंघानिया, नमन और ससुर जी ने मुड़कर उस ओर देखा। वहाँ मीरा खड़ी थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, चेहरा धूल और पसीने से सना था, उसके महँगे गाउन पर खून के बड़े-बड़े दाग थे, और पैरों में जूते तक नहीं थे।

सुमित्रा जी डर के मारे काँप रही थीं कि अब रश्मि जी मीरा की इस हालत पर न जाने क्या कहेंगी।

नमन हैरान रह गया। “मीरा? तुम यहाँ? और तुम्हारी यह हालत?”

तभी आईसीयू से डॉक्टर बाहर आए। “मिसेज सिंघानिया, आपकी बहन को होश आ गया है। उन्होंने बहुत सारा खून खो दिया था, लेकिन जिस कपड़े से उनका सिर बाँधा गया था, उसने उनकी जान बचा ली। आप उनसे मिल सकती हैं।”

रश्मि जी भागकर आईसीयू के अंदर गईं। कुछ ही मिनटों बाद जब वह बाहर आईं, तो उनकी आँखों में आँसुओं का सैलाब था, लेकिन इस बार ये आँसू दुख के नहीं, कृतज्ञता के थे। वह सीधे मीरा के पास आईं।

सुमित्रा जी ने सफाई देने की कोशिश की, “समधन जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। वो मैंने ही इसे सलोन भेजा था ताकि आपकी पसंद के हिसाब से यह तैयार हो सके। पर रास्ते में…”

रश्मि जी ने सुमित्रा जी को हाथ के इशारे से रोक दिया। उन्होंने आगे बढ़कर मीरा के दोनों गंदे, खून से सने हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उनका वह सोशलाइट वाला गुरूर, वह हाई-क्लास वाला रुतबा, सब आंसुओं में बह चुका था।

“मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची,” रश्मि जी का गला रुंधा हुआ था। “मैं कितनी मूर्ख थी जो सुंदरता को केवल महँगे कपड़ों, डिज़ाइनर गहनों और सलोन के मेकअप में ढूँढ रही थी। मैंने तुझे बदलने की कोशिश की, ताकि तू मेरे झूठे समाज के खोखले पैमानों पर खरी उतर सके। लेकिन आज तूने मुझे बता दिया कि असली सुंदरता चेहरे पर नहीं, सीरत में होती है। इंसानियत में होती है।”

रश्मि जी ने मीरा के खून से सने माथे को चूम लिया। “मेरी दीदी मेरे लिए मेरी माँ के समान हैं। अगर आज तू अपने महँगे कपड़ों और इस दिखावे की परवाह करती, जैसे बाकी भीड़ कर रही थी, तो आज मैं अपनी माँ जैसी बहन को खो देती। तूने आज सिर्फ मेरी दीदी की जान नहीं बचाई, बल्कि मेरी आँखों पर पड़ी उस पट्टी को भी खोल दिया है जो मुझे असली इंसान को पहचानने नहीं दे रही थी।”

उन्होंने अपने गले से एक पुश्तैनी हीरे का हार निकाला और मीरा के गले में पहना दिया। “यह मेरी तरफ से मेरी बेटी के लिए। और सुमित्रा जी, खबरदार जो आज के बाद मेरी मीरा को बदलने की कोशिश की। मेरी बहू जैसी है, दुनिया में सबसे खूबसूरत है। मुझे कोई सजी-धजी गुड़िया नहीं, बल्कि यह सोने से भी खरे दिल वाली बेटी चाहिए।”

नमन मुस्कुराते हुए मीरा की तरफ देख रहा था। उसकी आँखों में मीरा के लिए सम्मान और भी बढ़ गया था। सुमित्रा जी की आँखों से भी खुशी के आँसू बह निकले। उन्हें समझ आ गया था कि जिस सीरत के गहने को मीरा ने पहना हुआ है, उसके सामने दुनिया का हर बाहरी निखार फीका है।

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