रिश्तेदारों ने खूब ताने दिए कि “दीनानाथ ने अपनी बेटियों को सिर पर चढ़ा रखा है।” लेकिन बापू टस से मस नहीं हुए। समय का पहिया घूमता रहा। दीदी ने अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर ली और सिविल सर्विसेज़ की तैयारी शुरू कर दी। मैं भी कॉलेज पहुँच चुकी थी। लेकिन ज़िंदगी कभी भी एक सी नहीं रहती। एक मनहूस शाम बापू को दुकान पर ही लकवे का एक भयंकर अटैक आया।
रात का सन्नाटा गहरा रहा था, और खिड़की से आती ठंडी हवा मेरे भीतर चल रहे विचारों के बवंडर को और तेज़ कर रही थी। आज नींद मेरी आँखों से कोसों दूर थी। यादों का कारवां मुझे मेरे बचपन की उन गलियों में ले गया, जहाँ से मेरी और मेरी बड़ी बहन मेधा की कहानी शुरू हुई थी।
हमारा एक छोटा सा घर था, जिसके बाहरी हिस्से में पिताजी की एक छोटी सी किताबों और स्टेशनरी की दुकान थी। पिताजी, जिन्हें हम बापू कहते थे, दिन भर उसी दुकान में किताबों के बीच घिरे रहते। घर का खर्च चलाने के लिए माँ शाम को मोहल्ले के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थीं। हमारे पास दौलत भले ही कम थी, लेकिन प्यार और संस्कारों की कोई कमी नहीं थी। बापू ने कभी हमें यह महसूस नहीं होने दिया कि हम लड़कियाँ हैं तो हमारी अहमियत किसी बेटे से कम है। हालांकि, समाज के ठेकेदार और कुछ रिश्तेदार अक्सर अपनी ‘हमदर्दी’ जताने आ जाते थे। अक्सर सुनने को मिलता, “दीनानाथ जी, बेटियाँ तो पराया धन होती हैं। कल को इनकी शादी हो जाएगी तो इस दुकान और आपके बुढ़ापे का क्या होगा? एक बेटा तो होना ही चाहिए था।”
बापू हमेशा अपनी शांत मुस्कान के साथ जवाब देते, “मेरी बेटियाँ ही मेरा अभिमान हैं। ये पराया धन नहीं, मेरी पूंजी हैं। देखना, एक दिन यही मेरे बुढ़ापे की सबसे मजबूत लाठी बनेंगी।” बापू का यह विश्वास हमारे लिए किसी वरदान से कम नहीं था। हम दोनों बहनें मन लगाकर पढ़ती थीं। मेधा दीदी मुझसे तीन साल बड़ी थीं। वह जितनी सुंदर थीं, स्वभाव से उतनी ही सौम्य और गंभीर थीं। उनका गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श और हमेशा किताबों में डूबे रहना माँ को अक्सर यह कहने पर मजबूर कर देता, “पता नहीं किस घर की किस्मत संवारेगी मेरी ये चांद सी बिटिया।” वहीं मैं थोड़ी चुलबुली और शरारती थी।
जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में आई, तब मेधा दीदी ने कॉलेज के प्रथम वर्ष में कदम रखा था। यहाँ से हमारी ज़िंदगी ने एक नया मोड़ लिया। दीदी की सुंदरता और सादगी के चर्चे मोहल्ले से निकलकर दूर-दूर तक पहुँचने लगे थे। एक दिन हमारे दूर के एक रिश्तेदार दीदी के लिए एक बहुत अमीर घर का रिश्ता लेकर आए। लड़के वालों की सिर्फ एक शर्त थी—लड़की कॉलेज छोड़ दे और तुरंत शादी कर ले। माँ थोड़ी असमंजस में थीं क्योंकि घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि हम कोई बड़ा सपना देख सकें और ऐसा रईस रिश्ता बार-बार नहीं आता। लेकिन बापू ने उस रिश्ते को सिरे से नकार दिया। “मेरी बेटी कोई वस्तु नहीं जिसे मैं चंद पैसों के लिए अनपढ़ रखकर विदा कर दूँ। वह पढ़ेगी और अपने पैरों पर खड़ी होगी।”
रिश्तेदारों ने खूब ताने दिए कि “दीनानाथ ने अपनी बेटियों को सिर पर चढ़ा रखा है।” लेकिन बापू टस से मस नहीं हुए। समय का पहिया घूमता रहा। दीदी ने अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर ली और सिविल सर्विसेज़ की तैयारी शुरू कर दी। मैं भी कॉलेज पहुँच चुकी थी। लेकिन ज़िंदगी कभी भी एक सी नहीं रहती। एक मनहूस शाम बापू को दुकान पर ही लकवे का एक भयंकर अटैक आया। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया। बापू बच तो गए, लेकिन उनका आधा शरीर कमज़ोर पड़ गया। दुकान बंद हो गई और घर में पैसों का भारी संकट आ खड़ा हुआ।
उस वक्त वही ताने मारने वाले रिश्तेदार फिर आ गए। “कहा था ना, बेटा होता तो आज बाप की दुकान संभालता और इलाज कराता। अब ये दोनों लड़कियाँ क्या करेंगी?”
उन चुभते हुए शब्दों ने मेधा दीदी के भीतर जैसे एक आग जला दी। दीदी ने रोने या घबराने के बजाय हालात से लड़ने का फैसला किया। अगले ही दिन दीदी ने बापू की स्टेशनरी की दुकान का शटर खोल दिया। मोहल्ले के लोग हैरान थे कि एक जवान और इतनी सुंदर लड़की दुकान पर बैठ रही है। सुबह दीदी दुकान संभालतीं, दोपहर में मैं कॉलेज से आकर उनकी जगह लेती, और रात भर जागकर दीदी अपनी सिविल सर्विसेज़ की पढ़ाई करतीं। माँ ने अपने ट्यूशन के बच्चों की संख्या बढ़ा दी। हम तीनों औरतों ने मिलकर बापू को इस बात का अहसास ही नहीं होने दिया कि उनका कोई बेटा नहीं है।
तकरीबन दो साल तक यही संघर्ष चलता रहा। बापू अपनी चारपाई से लेटे-लेटे दीदी को दुकान संभालते और रात-रात भर पढ़ते देखते, तो उनकी आँखें भर आतीं। दीदी की मेहनत, उनकी तपस्या और बापू का आशीर्वाद आखिरकार रंग लाया। वह दिन मुझे आज भी याद है जब दीदी का रिज़ल्ट आया था। मेधा दीदी ने राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा में पूरे ज़िले में टॉप किया था और उन्हें डिप्टी कलेक्टर का पद मिला था।
उस दिन हमारे उस छोटे से आंगन में जो खुशी के आँसू बहे थे, उनकी कोई कीमत नहीं लगा सकता। जो रिश्तेदार कल तक ताने देते थे, आज वे मिठाइयों के डिब्बे लेकर सबसे आगे खड़े थे। बापू ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से दीदी के माथे को चूमा था और सिर्फ इतना कहा था, “तूने आज मेरे विश्वास को जीत लिया बेटा, समाज की सोच को हरा दिया।”
आज रात मुझे नींद इसलिए नहीं आ रही क्योंकि कल सुबह मेधा दीदी हमें अपने साथ उस बड़े से सरकारी बंगले में ले जा रही हैं। मैं अपनी पढ़ाई के साथ-साथ एक अच्छी कंपनी में जॉब कर रही हूँ। दीदी ने साफ कह दिया है कि बापू और माँ ताउम्र हमारे साथ ही रहेंगे। कल सुबह जब बापू पूरे गर्व के साथ उस लाल बत्ती वाली गाड़ी में बैठेंगे, तो पूरे मोहल्ले को इस बात का जवाब मिल जाएगा कि बेटियाँ सच में किसी बेटे से कम नहीं होतीं।
क्या आपको भी लगता है कि बेटियों को अगर सही शिक्षा और विश्वास दिया जाए, तो वे किसी भी परिवार का सबसे बड़ा संबल बन सकती हैं? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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