उजालों का आँगन

 अमृता वहीं स्तब्ध खड़ी रह गई। उसे अपनी सास से ऐसी बेरुखी की उम्मीद नहीं थी। उसका दिल टूट गया। वह अपने कमरे में आई, बिस्तर पर गिर पड़ी और तकिए में मुँह छिपाकर सिसक-सिसक कर रोने लगी। उसे लगा कि भले ही ससुराल वाले कितने भी अच्छे हों, लेकिन आखिर में एक बहू के मायके का दर्द उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। उसकी माँ अकेले उस सूने आँगन में दीया जलाएंगी और वह यहाँ सजी-धजी महफ़िल में झूठी मुस्कान बिखेरती रहेगी। यह सोचकर ही उसका दम घुटने लगा।

अमृता की शादी को अभी मुश्किल से चार महीने ही बीते थे। पुणे के एक संभ्रांत और खुले विचारों वाले परिवार में उसकी शादी हुई थी। पति अनिमेष आईटी सेक्टर में प्रोजेक्ट मैनेजर था—शांत, समझदार और अमृता की हर छोटी-बड़ी भावना का ख्याल रखने वाला। सास देवयानी जी और ससुर श्रीकांत जी का व्यवहार भी अमृता के साथ कभी किसी पराई लड़की जैसा नहीं रहा। घर में हर काम अमृता से पूछकर होता था और उसकी हर पसंद-नापसंद का पूरा ध्यान रखा जाता था। कुल मिलाकर अमृता एक ऐसे परिवार का हिस्सा बनी थी, जहाँ बहू को बेटी का दर्जा देने की बातें केवल कही नहीं जाती थीं, बल्कि निभाई भी जाती थीं।

लेकिन जैसे-जैसे कार्तिक का महीना शुरू हुआ और बाज़ारों में दीयों, कंदीलों और मिठाइयों की दुकानें सजने लगीं, अमृता के चेहरे की स्वाभाविक हँसी कहीं खोने लगी थी। दीवाली का पावन पर्व सिर पर था। यह शादी के बाद अमृता की पहली दीवाली थी। परंपरा और सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार नई बहू की पहली दीवाली ससुराल में बेहद धूमधाम से मनाई जानी तय हुई थी। घर में रंग-रोगन चल रहा था, नए परदे टांगे जा रहे थे और रिश्तेदारों के आने-जाने की सूचियाँ तैयार हो रही थीं।

सब कुछ सामान्य और उल्लासपूर्ण था, सिवाय अमृता के मन के। उसका मन बार-बार 150 किलोमीटर दूर नासिक में स्थित अपने पुराने घर की ओर भाग रहा था। उस घर में उसकी माँ सरला जी अकेली थीं। पूरा बड़ा घर, पुराना आँगन और तुलसी का चौरा—सब कुछ खाली पड़ा था।

अमृता के पिता का देहांत तो बहुत साल पहले ही हो गया था, जब अमृता स्कूल में पढ़ती थी। उस समय परिवार की सारी जिम्मेदारी अमृता के बड़े भाई मलय ने अपने कंधों पर उठा ली थी। मलय, जो उम्र में अमृता से केवल चार साल बड़ा था, लेकिन गंभीरता और जिम्मेदारी में किसी परिपक्व अभिभावक की तरह था। मलय हँसमुख था, ऊर्जा से भरा हुआ और पूरे मोहल्ले का चहेता। घर में अगर कोई उदास बैठ जाए, तो मलय जब तक उसके चेहरे पर मुस्कान न ले आए, उसे चैन नहीं मिलता था।

इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद जब मलय की एक मल्टीनेशनल कंपनी में बहुत अच्छी नौकरी लगी थी, तो घर में उत्सव जैसा माहौल था। उस दिन की याद आज भी अमृता की आँखों में ताज़ा थी। अपनी पहली तनख्वाह मिलते ही मलय घर आया था और उसने माँ के पैर छूकर सारा लिफाफा उनके हाथ में रख दिया था।

मलय ने चहकते हुए कहा था, “माँ, आज रसोई बंद! आज हम सब बाहर चलेंगे। तुम्हारे लिए एक सुंदर कांजीवरम साड़ी लेनी है और इस छोटी महारानी अमृता के लिए वो झुमके, जिसके लिए यह पिछले छह महीने से रो रही थी।”

माँ ने भावुक होकर कहा था, “बेटा, पहले पैसे बचाना सीख। अभी तो तेरी शुरुआत है।”

लेकिन मलय ने एक न सुनी थी। वह सबको अपनी बाइक और ऑटो में बैठाकर बाज़ार ले गया था। उसने माँ को उनकी पसंद की साड़ी दिलवाई, अमृता को झुमके दिलवाए और घर लौटते वक्त पूरे रास्ते गाता रहा था। माँ उसके विवाह के सपने देखने लगी थीं। रिश्ते भी आने लगे थे। सब कुछ इतना सुंदर और परिपूर्ण लग रहा था कि किसी को अंदेशा भी नहीं था कि विधाता ने उनकी खुशियों के पन्नों पर कोई और ही स्याही फेर रखी है।

नौकरी शुरू होने के ठीक दूसरे महीने मलय अपनी कंपनी के काम से मुंबई जा रहा था। रास्ते में एक तेज रफ्तार ट्रक ने उसकी टैक्सी को टक्कर मार दी। उस भीषण सड़क हादसे में मलय हमेशा के लिए सबको छोड़कर चला गया। उस एक पल ने हँसते-खेलते परिवार की रीढ़ ही तोड़ दी थी। माँ सरला जी तो जैसे पत्थर की मूरत बन गई थीं। अमृता ने अपनी पढ़ाई पूरी की, अपनी सिसकियों को दबाकर माँ का सहारा बनी। फिर अनिमेष का रिश्ता आया। अनिमेष के परिवार को जब इस त्रासदी का पता चला, तो उन्होंने बिना किसी दान-दहेज के अमृता को पूरे मान-सम्मान के साथ अपने घर की लक्ष्मी बनाया।

अब मलय के जाने के बाद यह दूसरी दीवाली थी, लेकिन अमृता के विवाह के बाद माँ की यह बिल्कुल पहली दीवाली थी जब वे उस बड़े से घर में नितांत अकेली थीं।

अमृता जब भी फोन पर माँ से बात करती, माँ बड़े उत्साह से कहतीं, “अमृता बेटा, तुम्हारी पहली दीवाली है। सास-ससुर की सेवा करना, घर को अच्छे से सजाना। मेरी चिंता बिल्कुल मत करना। पड़ोस की काकी हैं न, वे कह रही थीं कि शाम को मेरे पास आकर बैठेंगी।”

लेकिन अमृता अपनी माँ की आवाज के पीछे छिपे उस असीम सन्नाटे और रुंधे हुए गले को बहुत अच्छी तरह पहचानती थी। उसे पता था कि माँ शाम को दीया जलाते वक्त मलय की तस्वीर देखकर फूट-फूट कर रोएंगी और उनके आँसू पोंछने वाला वहाँ कोई नहीं होगा। नासिक से पुणे का सफर मात्र तीन-चार घंटे का था, पर मर्यादाओं और परंपराओं की दीवारें कभी-कभी मीलों से ज्यादा लंबी हो जाती हैं।

दीवाली से चार दिन पहले, दोपहर के समय जब ससुर जी बाज़ार गए थे और अनिमेष ऑफिस में था, अमृता ने हिम्मत जुटाई। देवयानी जी बैठक में बैठकर दीवाली पर रिश्तेदारों को दिए जाने वाले उपहारों की सूची बना रही थीं।

अमृता ने धीरे से जाकर उनके पास एक कप चाय रखी और धीमी आवाज में कहा, “माँ जी… अगर आप कहें तो क्या मैं दो दिनों के लिए नासिक हो आूँ? दीवाली से एक दिन पहले, यानी धनतेरस की शाम तक मैं पक्का वापस आ जाऊँगी।”

देवयानी जी ने चश्मा नाक पर टिकाया और अमृता की तरफ देखा। उनके चेहरे के भाव अचानक गंभीर हो गए। वे बोलीं, “नासिक? इस वक्त? बिल्कुल नहीं अमृता! तुम्हें अंदाजा भी है कि दीवाली पर घर में कितने काम होते हैं? और सबसे बड़ी बात, यह तुम्हारी इस घर में पहली दीवाली है। खानदान के सारे रिश्तेदार लक्ष्मी पूजन के दिन यहाँ आने वाले हैं। अगर बहू ही घर में नहीं होगी, तो लोग क्या कहेंगे? और फिर यह सारी तैयारियाँ, मिठाइयाँ, पकवान… मैं इस उम्र में अकेले कैसे संभालूँगी?”

अमृता की आँखें भर आईं। उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, “माँ जी, मैं आपके काम में पूरा हाथ बँटाकर जाऊँगी और धनतेरस को लौटकर बाकी सारा काम भी संभाल लूँगी। बस दो दिन… आपको तो पता ही है कि भैया के जाने के बाद माँ कितनी…”

अमृता की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि देवयानी जी ने अपनी डायरी बंद की, सोफे से उठीं और बिना कुछ बोले सीधे अपने कमरे में चली गईं और दरवाजा बंद कर लिया।

अमृता वहीं स्तब्ध खड़ी रह गई। उसे अपनी सास से ऐसी बेरुखी की उम्मीद नहीं थी। उसका दिल टूट गया। वह अपने कमरे में आई, बिस्तर पर गिर पड़ी और तकिए में मुँह छिपाकर सिसक-सिसक कर रोने लगी। उसे लगा कि भले ही ससुराल वाले कितने भी अच्छे हों, लेकिन आखिर में एक बहू के मायके का दर्द उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। उसकी माँ अकेले उस सूने आँगन में दीया जलाएंगी और वह यहाँ सजी-धजी महफ़िल में झूठी मुस्कान बिखेरती रहेगी। यह सोचकर ही उसका दम घुटने लगा।

शाम को अनिमेष ऑफिस से लौटा, तो उसने अमृता की सूजी हुई आँखें देख लीं। उसने पूछा, “क्या हुआ अमृता? तबीयत ठीक नहीं है क्या?”

अमृता ने बात टालते हुए कहा, “नहीं, बस सिर में थोड़ा दर्द था।” वह अनिमेष से सास की शिकायत करके घर का माहौल खराब नहीं करना चाहती थी।

अगली सुबह धनतेरस का दिन था। अमृता सुबह जल्दी उठी। उसने अपनी सारी उदासी को दिल के किसी कोने में दफन कर दिया और एक अच्छी बहू की तरह घर के कामों में जुट गई। उसने पूरे घर में झाड़ू-पोंछा किया, मुख्य द्वार पर सुंदर रंगोली बनाई और नाश्ता तैयार करके डाइनिंग टेबल पर लगा दिया। उसका चेहरा एकदम भावशून्य था।

तभी देवयानी जी अपने कमरे से बाहर आईं। उनके हाथ में एक बड़ा सा बैग था। पीछे-पीछे श्रीकांत जी भी तैयार होकर आ रहे थे और उनके हाथों में भी दो बड़े सूटकेस थे।

अमृता ने हैरान होकर देखा। उसने सोचा शायद किसी दूर के रिश्तेदार के यहाँ जाना हो।

देवयानी जी ने अमृता के पास आकर सख्त आवाज में कहा, “अमृता, तुम अभी तक तैयार नहीं हुईं? मैंने कल रात ही अनिमेष से कह दिया था कि वह आज ऑफिस से छुट्टी ले ले।”

अमृता सहम गई, “तैयार? पर माँ जी, कहाँ जाना है?”

तभी अनिमेष अपने कमरे से जींस और टीशर्ट पहने, गाड़ी की चाबी घुमाते हुए बाहर निकला। उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी।

देवयानी जी ने आगे बढ़कर अमृता के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उनकी सख्त आवाज अचानक वात्सल्य से भर गई। वे बोलीं, “कहाँ जाना है? नासिक जाना है! जहाँ हमारी समधन जी अकेली बैठी अपनी बेटी और दामाद का इंतजार कर रही होंगी।”

अमृता अवाक रह गई। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

“माँ जी… आप… आप सच कह रही हैं?” अमृता की आवाज कांपने लगी।

देवयानी जी मुस्कुराईं और उन्होंने अमृता के गालों पर हाथ फेरते हुए कहा, “पगली, तूने क्या सोचा था कि तेरी यह माँ इतनी निष्ठुर है? उस दिन जब तूने मुझसे नासिक जाने की बात कही, तो मुझे लगा कि तू अकेले जाकर क्या करेगी? दो दिन बाद तुझे फिर यहाँ वापस आना पड़ेगा और दीवाली की रात तेरी माँ फिर अकेली रह जाएगी। जब तू इस घर की बेटी है, तो तेरी माँ क्या सिर्फ तेरी माँ हैं? क्या वे हमारी कुछ नहीं लगतीं?”

श्रीकांत जी ने हँसते हुए कहा, “हाँ बहू! तुम्हारी सास ने परसों शाम को ही फरमान सुना दिया था कि इस बार की दीवाली नासिक वाले घर में मनेगी। हमने सारे रिश्तेदारों को वहीं बुलाने का न्योता दे दिया है जो रास्ते में पड़ते हैं और बाकी सबसे कह दिया है कि भाईदूज पर पुणे में मिलेंगे। कल पूरा दिन तुम्हारी सास बाज़ार में तुम्हारी माँ के लिए साड़ियाँ, मिठाइयाँ और उपहार खरीदने में ही व्यस्त थीं। इसलिए उस दिन बात बीच में छोड़कर चली गई थीं ताकि तुम्हें सरप्राइज दे सकें।”

अमृता की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे, लेकिन इस बार वे आँसू बेबसी के नहीं, बल्कि असीम कृतज्ञता और आनंद के थे। वह दौड़कर देवयानी जी के गले से लग गई।

देवयानी जी ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, “रोती क्यों है बच्ची? जिस घर का बेटा चला गया हो, क्या उस घर में कभी रोशनी नहीं होनी चाहिए? मलय सिर्फ तुम्हारा भाई नहीं था, वह एक ऐसा बेटा था जिस पर किसी भी माँ को गर्व हो। अगर आज वह होता, तो क्या दीवाली ऐसे सूनी रहने देता? इस बार हम सब मिलकर उस घर के हर कोने में दीये जलाएँगे। तुम्हारी माँ का आँगन अब कभी सूना नहीं रहेगा।”

अनिमेष ने हँसते हुए कहा, “अगर सास-बहू का यह भावुक मिलन पूरा हो गया हो, तो महारानी जी, जल्दी से अपना बैग पैक कर लीजिए। नासिक का रास्ता हमारा इंतजार कर रहा है।”

अमृता ने पंद्रह मिनट में अपना सामान समेटा और सब गाड़ी में बैठ गए। पूरे रास्ते अमृता की धड़कनें तेज थीं। गाड़ी जैसे-जैसे नासिक की सीमाओं में प्रवेश कर रही थी, अमृता का मन किसी पक्षी की तरह उड़ने लगा था।

दोपहर के करीब जब गाड़ी उनके पुराने पुश्तैनी मकान के सामने रुकी, तो बाहर का दृश्य देखकर अमृता का गला भर आया। घर का मुख्य दरवाजा आधा खुला था। आँगन में सूखे पत्ते बिखरे थे और माँ बरामदे में एक पुरानी कुर्सी पर बैठी चश्मा लगाए मलय के पुराने अलबम को निहार रही थीं। उनके चेहरे पर वही गहरा सन्नाटा था जिससे अमृता डरती थी।

गाड़ी का हॉर्न सुनकर सरला जी ने चौंक कर नज़रें उठाईं।

जब उन्होंने देखा कि गाड़ी से पहले अनिमेष उतरा, फिर समधी-समधन जी उतरे और पीछे से अमृता दौड़ती हुई आई, तो सरला जी की आँखों पर जैसे पर्दा सा गिर गया। उन्हें लगा कि वे कोई सपना देख रही हैं।

“माँ!” अमृता ने जाकर माँ को कसकर पकड़ लिया।

सरला जी की आँखें भर आईं। वे हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुईं, अपना पल्लू ठीक किया और कांपते कदमों से आगे बढ़ीं। “अरे समधन जी… आप लोग? यहाँ? कोई खबर भी नहीं की… घर की हालत देखिए, मैंने तो कुछ तैयारी भी नहीं की…”

देवयानी जी ने आगे बढ़कर सरला जी को दोनों बाहों में भर लिया। उन्होंने कहा, “कैसी तैयारी बहन जी? क्या अपने ही घर आने के लिए भी कोई खबर की जाती है? इस बार हमारी बेटी की पहली दीवाली है, और हमने तय किया कि लक्ष्मी का पूजन उसी आँगन में होगा जहाँ से यह साक्षात लक्ष्मी हमारे घर आई है।”

सरला जी की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। महीनों से उनके सीने में जो दुख का पहाड़ जमा था, वह देवयानी जी के एक आलिंगन से पिघल कर बह गया।

अगले तीन दिनों तक नासिक का वह पुराना, शांत घर खुशियों के कहकहों से गूँज उठा। अनिमेष और अमृता ने मिलकर पूरे घर में रंग-बिरंगी लाइटें लगाईं। श्रीकांत जी ने बाज़ार से गेंदे के फूलों की अनगिनत लड़ियाँ लाकर मुख्य द्वार को सजाया। देवयानी जी और सरला जी ने रसोई का मोर्चा संभाला। दोनों समधनें मिलकर गुझिया, चकली, बेसन के लड्डू और अनरसे बनाने में ऐसी मग्न हुईं कि पुरानी सहेलियों जैसी हँसी पूरे घर में गूँजने लगी।

दीवाली की शाम जब आई, तो पूरा घर दीपों की जगमगाहट से नहा उठा। तुलसी के चौरे पर, मुंडेरों पर, खिड़कियों पर और आँगन के हर कोने में मिट्टी के दीये झिलमिला रहे थे।

पूजा के समय, देवयानी जी ने खुद आगे बढ़कर मलय की तस्वीर के सामने एक बड़ा सा घी का दीया जलाया। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “बेटा मलय, जहाँ भी हो, देखना… तुम्हारा परिवार आज भी मुस्कुरा रहा है। तुम्हारी इस बहन को हमने पलकों पर बिठाकर रखा है और तुम्हारी माँ अब कभी अकेली नहीं रहेंगी।”

सरला जी ने रोते हुए हाथ जोड़े, लेकिन इस बार उनके चेहरे पर शांति और तृप्ति की एक अलौकिक चमक थी। पूजा के बाद अनिमेष ने अपनी सास के पैर छुए और एक लिफाफा उनके हाथ में रख दिया।

सरला जी ने झिझकते हुए कहा, “यह क्या है बेटा?”

अनिमेष ने नम्रता से कहा, “माँ, मलय भाई अपनी पहली तनख्वाह आपके हाथ में रखकर आशीर्वाद लेते थे न? इस दीवाली मुझे कंपनी से जो सालाना बोनस मिला है, वह आपके आशीर्वाद के बिना पूरा नहीं हो सकता था। आज से आपका यह बेटा भी मलय की तरह ही आपकी हर जिम्मेदारी उठाएगा। आपको कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने देगा।”

सरला जी ने अनिमेष के सिर पर हाथ रख दिया और फूट-फूट कर रो पड़ीं। यह रोना किसी घाव का नहीं था, बल्कि उस घाव के पूरी तरह भर जाने का अहसास था।

रात को जब सब आँगन में बैठकर दीयों की लौ को निहार रहे थे, अमृता ने दूर खड़े होकर अपने पूरे परिवार को देखा। एक तरफ उसकी माँ थीं, जिनके चेहरे पर बरसों बाद एक सच्ची, निश्चिंत मुस्कान खिली थी। दूसरी तरफ उसकी सास थीं, जो माँ को अपने हाथों से मिठाई खिला रही थीं। ससुर जी और अनिमेष दीवाली की आतिशबाज़ी देख रहे थे।

अमृता ने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया। उसने सोचा कि समाज में अक्सर सास-बहू के रिश्तों को कड़वाहट और खींचतान का पर्याय मान लिया जाता है। लोग कहते हैं कि बेटियाँ शादी के बाद पराई हो जाती हैं और मायके के रिश्ते पीछे छूट जाते हैं। लेकिन अगर परिवार में समझदारी, संवेदना और सच्चा प्रेम हो, तो ससुराल वाले केवल एक बेटी को ही नहीं अपनाते, बल्कि उस बेटी की जड़ों, उसके दुखों और उसके पूरे संसार को अपना बना लेते हैं।

उस रात नासिक के उस आँगन में केवल मिट्टी के दीये नहीं जल रहे थे, बल्कि वहाँ संवेदना, त्याग, अपनेपन और मानवीय रिश्तों की एक ऐसी अमर ज्योति जल रही थी, जिसे समय की कोई भी आंधी कभी बुझा नहीं सकती थी।

क्या हमारे समाज में हर सास को देवयानी जी की तरह यह समझने की जरूरत नहीं है कि बहू के साथ-साथ उसके अकेले माता-पिता के प्रति भी ससुराल पक्ष की एक मानवीय जिम्मेदारी बनती है? क्या आज भी कई घरों में बेटियाँ शादी के बाद अपने अकेले माता-पिता के लिए चुपचाप आँसू बहाने पर मजबूर नहीं हैं? इस विषय पर आपकी क्या राय है, अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : गीता वाधवानी

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