सविता जी की उम्र अब सत्तर के करीब हो चुकी थी।शरीर तो कमजोर हुआ था,पर इच्छाशक्ति और भी मजबूत हो रही थी।पति अरिहंत जी उम्र में उनसे पांच-छह साल बड़े थे।एक बेटे और दो बेटियों का परिवार था उनका।बच्चों की शादी करवा कर चिंता मुक्त हो चुके थे दोनों।बेटियां तो अपने ससुराल में रह रहीं थीं,
और बेटे-बहू के पास रह रहे थे सविता जी और अरिहंत जी।गरिमा(बहू)जब से उनके बेटे गौरव से शादी कर इस घर में आई, सास को मां और ससुर को पिता ही माना था।गरिमा की खूब पटती थी अपनी सास से।वो थीं हीं अद्वितीय सास।गरिमा की गरिमा को उन्होंने कभी कम नहीं होने दिया।बेटे और बहू के बीच ना कभी आईं, और ना ही ससुर जी को आने दिया।बेटा तो खिसिया ही जाते थे कभी-कभी।
सारा दिन घर में पड़े रहना गरिमा के लिए असह्य हो रहा था।शादी से पहले ही गौरव ने स्कूल की नौकरी में रिजाइन करवा दिया था।अब यहां ससुराल में पड़े-पड़े बस खाना, टी वी देखना और सोना।
गरिमा के बुझे चेहरे को देखकर एक दिन सविता जी ने पूछा ही लिया”घर की याद आती है क्या,या भाई बहनों से मिलने का मन करता है तुम्हारा?अपने मन की बात बेझिझक मुझे बताया करो बहू,नहीं तो समाधान कैसे निकलेगा?मुझे पता है,अपना परिवार छोड़कर दूसरे परिवार में आकर सामंजस्य स्थापित करने में बहुत सी मुश्किलें आती हैं।तुम्हारे मन में जो भी चल रहा है बताओ मुझे।मैं तुम्हारी हर समस्या का समाधान कर सकती हूं।बताओ ना बहू।”
एक सास के मुंह से यह सब सुनना किसी चमत्कार से कम नहीं था गरिमा के लिए।सहमते हुए उसने बता दिया कि वह स्कूल में नौकरी करना चाहती है।या तो घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने।सविता जी ने आस -पड़ोस के लोगों से कहा”मेरी बहू बहुत होशियार है।शादी के पहले नौकरी करती थी।शादी होते ही गौरव छुड़वा दिया नौकरी।घर पर ही ट्यूशन पढ़ा सकती है।जो भी आना चाहे,आकर मिले मेरी बहू से।”
गरिमा तो अवाक रह गई जब कुछ ही दिनों में बारह बच्चे पढ़ने आ गए।मां की तरफ अचरज से देखा तो उन्होंने सपाट कह दिया” ये लो, तुम्हारे लिए तुम्हारा उपहार है।खूब मन लगाकर पढ़ाना इन बच्चों को, ताकि हर लड़की अपने पैर पर खड़ी हो सके।बस मेरा मान मत टूटने देना।”तब तक बच्चे नहीं हुए थे।गरिमा सुबह दो बैच और शाम को दो बैच पढ़ाती थी।पति गौरव को तो भनक भी लगने दी थी मां ने।साल भर में बच्चों की संख्या बढ़ गई तेजी से।अब सासू मां ने पीछे के कमरे में कुछ डेस्क -बेंच रखवा दिए।एक ब्लैक बोर्ड भी मंगवा लिया।अब गरिमा को ज़िंदगी जीने की वजह मिल गई थी।
एक दिन चाय ना मिलने पर ससुर जी ने चिल्ला कर मां से झगड़ा शुरु कर दिया पहली बार-” बस दोनों सुबह से उठते ही व्यस्त हो जाते हो।हमारे खाने पीने की व्यवस्था का कौन करेगा।?मैं तो हद मानता हूं तुम्हारी।अपने सपनों को पूरा करने की इच्छा अब जिद बन गई है ।तुम्हें तब काम करने को नहीं मिला, इसलिए बहू को हमारे खिलाफ भिड़ाने की साजिश है तुम्हारी।”
गरिमा ने मां की तरफ देखा ,तो वह कुछ समय के लिए तो चुप थी।थोड़ी देर बाद पति और बेटे को बुलाकर कहा”,एक लड़की जो किसी और परिवार से आती है।आंखों में ना जाने कितने सपने और मन में कितने शौक लिए।क्या ससुराल में आकर पत्नी का वह सपना,वह शौक अर्थ हीन हो जाता है?अब उसे उसके मन की करने की कोई आजादी नहीं?क्या हम अपने घर में बहू नहीं,बंधुआ मजदूर लेकर आते हैं,जो सिर्फ वही करें,जिससे दूसरों को खुशी हो।उसकी खुशी के बारे में कौन सोचने वाला है?गरिमा एक होनहार बच्ची है।बचपन से अव्वल रही है पढ़ने में।शादी से पहले भी अपना परिवार भी इसी ने चलाया।पापा के गुजर जाने के बाद से यही तो अपने भाई-बहनों की देखभाल करती थी।जब इसे पढ़ाना इतना पसंद है,तो क्या हर्ज है आप लोगों को।”
सविता जी की बात सुनकर पापा और बेटा दोनों चुप हो गए। देखते-देखते साल बीतने लगे।अब गरिमा की नौकरी कॉन्वेंट में लग गई थी।पढ़ाने का जुनून तो था ही मन में,सो नौकरी ईमानदारी से करती रही।सास बच्चों को निःस्वार्थ पालती और संभालती रहीं,और कब बच्चे बड़े हो गए गरिमा को पता ही नही चला।
गरिमा को सास ने ही गुरु ज्ञान दिया था,” देखो बहू जितना भी कमाओगी,सब घर में ही खर्च हो जाएगा।तुम चुपचाप बैंक में एक आर डी कर दो।कुछ भविष्य के लिए भी बचाना पड़ता है।पर हां,ये आर डी करने की बात किसी को बताना नहीं,नहीं तो बच चुके पैसे।अपने जेवर भी अब तक लॉकर में नहीं रखवाया तूने।पुरुषों को सब बात बताने की जरूरत नहीं।समझी।”
गरिमा को हंसी आ गई, सास की बात सुनकर।दुनिया में अधिकांश सास, बहू की चीजें हड़पने, मायके वालों से दुश्मनी करने में लगी पड़ी हैं,और एक यहां मेरी सास।
आर डी करवा दी तो चल पड़ी वह।कुछ पैसे बचने लगे ।एक दिन अचानक गौरव ने गरिमा के स्कूल आकर कुछ पैसे इंतजाम करने को कहा।साथ में यह भी चेताया कि घर पर मां को नहीं बताना है।जल्दी से गौरव ने अत्यंत दुखी होकर कहा”अगर इन पैसों से काम नहीं बना तो क्या तुम मुझे कुछ गहने गिरवी रखने के लिए दोगी।मैं दो -तीन बाद ही लौटा लाऊंगा।पर प्लीज मां को मत बताना।पूरा घर सर पर उठा लेंगीं।
गरिमा पत्नी का फर्ज कैसे भूल सकती थी।जो गौरव को चाहिए था,सब गरिमा ने उसे दे दिया था।गहनों का क्या है,आज नहीं हैं कल आ जाएंगे।
मुश्किल का सामना तो तब हुआ,जब शनिवार को बातों-बातों में मां को बता दी पैसे और गहने गौरव को देने की बात।मां चुपचाप उठीं और अपने कमरे में चली गई।सुबह उठने पर मां की चेहरे की उदासी समझ आ रही थी।गौरव ने भी समझाया मां को” देखो मां,ये गहने मुसीबत के लिए ही तो काम आते हैं।मैं कुछ दिनों में ही वापस ले आऊंगा।तुम चिंता मत करो।”
सविता जी ने गौरव का हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए भगवान जी के मंदिर की तरफ ले गईं।वहां पहुचकर गुल्लक दिखाया उन्होंने और कहा”बेटा , बहुओं , बेटियों और मां की जिंदगी भर की बचत होती हैं ये गुल्लकें।जब कभी परिवार पर मुसीबत टूटती है ना_तो हम इसे झोंक देते हैं अपने परिवार में।गहनों को हांथ नहीं लगाते।गहने लक्ष्मी का स्वरूप होती हैं।तुमने गरिमा के सारे गहने ले लिए, गिरवी रखने बोलकर, पर मुझे पता है, वो गहने अब कभी वापस नहीं आ पाएंगे।”
गौरव मां को मनाता हुआ बोला”ऐसे क्यूं कह रही हो तुम, तुम्हें अपने बेटे पर भरोसा नहीं क्या?” सविता जी ने संयत होकर जवाब दिया”मैं तुझे भी जानती हूं, गर्भ में रखकर सींचा है।पर तुझमें पिता का अंश भी तो है।ठीक इसी तरह मेरे जमाए पैसे और गहने इस घर से जाते रहे, कभी वापस नहीं आए। खर्च कितना भी जरूरी है, औरत को झूठ बोलकर उसे पूरा करना गुनाह है।इस गुनाह की सजा तिल-तिल कर काटनी पड़ती है।यह विश्वासघात है रिश्तों में।जब तुम कुछ सालों तक गहने छुड़ा नहीं पाओगे, तब बेचना पड़ेगा।और तब उन पैसों से वैसे गहने तो आएंगे नहीं।तुम पुरुषों के इस विश्वासघात का दंड सिर्फ तुम्हें नहीं हम स्त्रियों को भी भुगतना पड़ता है।पैसा बहुत खराब चीज है बेटा
तेरे पापा ने मुझे मेरे मांऔर बाबा के मरने की खबर तक नहीं बताई थी,महीनों तक।बहाना क्या दिया,कि पैसे नहीं थे जाने को।अरे जाती नहीं तो कम से कम संस्कार तो कर लेती।यह भूल नहीं अपराध था उनका।सजा मैंने खुद को दी है।तब से अब तक मायके में गई नहीं कभी,किस मुंह से जाऊं बता।और तू भी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।शादी के बाद तुम्हारे पापा ने मेरी सिलाई बंद करवा दी। इसीलिए मैं नहीं चाहती कि तुम्हारी पत्नी के शौक मरे यहां।जैसे तेरे पिता ने मेरा विश्वासघात करके,सदा के लिए पाप का भागी बना दिया,मैं तुझे वैसा अपनी बहू के साथ नहीं होने दूंगी।पीढ़ी दर पीढ़ी यही रवैया चलता रहा ना हमारी नस्ल भी विश्वासघाती ही बनेगी।
शुभ्रा बैनर्जी
साप्ताहिक कहानी-विश्वासघात