“मम्मा, वो पुराने जूते तो घर की अलमारी में सुरक्षित रखे हैं ना? लेकिन उस दादी के पैर तो अभी जल रहे थे। क्या वो तपती हुई सड़क मेरे पुराने जूतों के आने का इंतज़ार करती? और मम्मा, आप ही तो कहती हो कि भगवान को हमेशा ताजे फूल और सबसे अच्छी चीज़ चढ़ानी चाहिए। जब हम भगवान को बासी या पुरानी चीज़ें नहीं देते, तो फिर किसी ज़रूरतमंद को हमेशा अपनी बची-खुची और पुरानी चीज़ें ही क्यों देते हैं? क्या उन्हें नई चीज़ें पहनने का हक नहीं है? मुझे बस इतना पता है मम्मा, कि उसे उन जूतों की ज़रूरत मुझसे कहीं ज़्यादा और बिल्कुल इसी वक्त थी।”
मई का महीना अपने पूरे शबाब पर था। आसमान से आग बरस रही थी और शहर की डामर वाली सड़कें ऐसी तप रही थीं मानो किसी ने उन्हें भट्टी में डाल दिया हो। दोपहर के इस वक्त जहाँ लू के थपेड़े शरीर को झुलसा रहे थे, वहीं शहर के एक बड़े से वातानुकूलित मॉल में सुमित और रागिनी अपनी दस साल की बेटी मान्या के साथ खरीदारी कर रहे थे। सुमित एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर था और रागिनी एक आदर्श गृहिणी। दोनों अपनी इकलौती बेटी मान्या से बेइंतहा प्यार करते थे और उसकी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश को पलक झपकते ही पूरा करने की कोशिश करते थे।
अगले हफ्ते मान्या के स्कूल में एक बड़ा स्पोर्ट्स इवेंट होने वाला था, जिसमें वह दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही थी। उसी की तैयारियों के सिलसिले में आज वे यहाँ आए थे। मान्या को एक खास ब्रांड के रनिंग शूज चाहिए थे। रागिनी स्वभाव से थोड़ी व्यावहारिक और बचत करने वाली महिला थी। जब शोरूम के सेल्समैन ने उन्हें वे जूते दिखाए और उनका दाम पाँच हज़ार रुपये बताया, तो रागिनी के माथे पर हल्की सी सिलवट पड़ गई। उसने सुमित की तरफ देखा, लेकिन मान्या की आँखों में उन जूतों को देखकर जो चमक थी, उसके आगे माता-पिता की हर हिचकिचाहट दम तोड़ गई। जूते खरीद लिए गए। गुलाबी और सफेद रंग के वे जूते एक खूबसूरत से बॉक्स में पैक कर दिए गए। मान्या ने उस डिब्बे को ऐसे सीने से लगा रखा था मानो उसे दुनिया का सबसे बड़ा खजाना मिल गया हो।
मॉल से बाहर निकलते ही दोपहर की भीषण गर्मी ने उनका स्वागत किया। सुमित ने जल्दी से अपनी कार का एसी चालू किया और तीनों कार में बैठ गए। कार के अंदर की ठंडी हवा ने उन्हें बाहर के उस खौफनाक मौसम से तुरंत राहत दिला दी। घर की तरफ लौटते समय रास्ते में एक बड़ा सा चौराहा पड़ता था, जहाँ अक्सर लंबा ट्रैफिक जाम रहता था। आज भी वहां लाल बत्ती थी और गाड़ियों की लंबी कतार लगी हुई थी। सुमित ने कार रोकी और एफएम रेडियो पर बज रहे गानों की धुन में खो गया। रागिनी अपने मोबाइल में कुछ देखने लगी। मान्या पिछली सीट पर बैठी खिड़की के शीशे से बाहर की दुनिया देख रही थी।
तभी मान्या की नज़र सड़क के किनारे डिवाइडर पर खड़ी एक बूढ़ी औरत पर पड़ी। वह औरत देखने में सत्तर साल के आसपास की लग रही थी। उसके कपड़े मैले और फटे हुए थे और वह तपती धूप में नंगे पैर खड़ी होकर कारों के शीशे खटखटा कर कुछ गुब्बारे बेचने की कोशिश कर रही थी। सड़क का डामर पिघल रहा था और उस बूढ़ी औरत के पैर उस आग जैसी सड़क पर जल रहे थे। वह एक पल के लिए अपना बायां पैर उठाती, फिर उसे नीचे रखकर दायां पैर उठाती। उसकी आँखों में एक अजीब सी लाचारी और चेहरे पर गर्मी की वजह से गहरा दर्द साफ झलक रहा था। आस-पास से गुजरने वाली हर कार का शीशा बंद था और कोई भी उस तपती दोपहर में उस बूढ़ी औरत की तरफ देखने को तैयार नहीं था।
मान्या यह सब बहुत ध्यान से देख रही थी। उसके छोटे से दिमाग में कुछ चल रहा था। उसने अपने बगल में रखे उस चमचमाते हुए जूतों के डिब्बे को देखा और फिर खिड़की के बाहर उस बूढ़ी औरत के जलते हुए पैरों को। बत्ती अभी भी लाल थी और ट्रैफिक खुलने में समय था।
बिना एक भी शब्द कहे, मान्या ने धीरे से कार का दरवाज़ा खोला।
“मान्या! क्या कर रही हो? बाहर इतनी गर्मी है!” रागिनी ने पीछे मुड़कर देखा और घबराकर चिल्लाई। सुमित ने भी ब्रेक पर पैर दबाते हुए पीछे देखा, लेकिन तब तक मान्या कार से बाहर निकल चुकी थी। उसके हाथ में वह जूतों का नया डिब्बा था।
वह दौड़कर उस बूढ़ी औरत के पास गई। औरत ने घबराकर बच्ची को देखा, उसे लगा शायद बच्ची गुब्बारे खरीदना चाहती है। लेकिन मान्या ने बिना कुछ कहे, वह डिब्बा उस बूढ़ी औरत के हाथों में थमा दिया और बोली, “दादी, सड़क बहुत गरम है, आपके पैर जल रहे हैं। आप ये पहन लो।”
बूढ़ी औरत की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। उसने कांपते हाथों से डिब्बा खोला और उसमें रखे उन मखमली और खूबसूरत जूतों को देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह कुछ बोल पाती, उससे पहले ही मान्या वापस दौड़कर कार में आ बैठी। उसी वक्त ट्रैफिक सिग्नल हरा हो गया और पीछे से आ रही गाड़ियों के हॉर्न बजने लगे। सुमित को मजबूरी में कार आगे बढ़ानी पड़ी।
कार के अंदर अब एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था, जिसे रागिनी के गुस्से भरे स्वर ने तोड़ा।
“यह क्या पागलपन था मान्या?” रागिनी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। “तुम्हें पता है वे जूते कितने महंगे थे? पूरे पाँच हज़ार रुपये के! और तुमने वो एक सड़क पर गुब्बारे बेचने वाली को दे दिए? वह उन जूतों का क्या करेगी? कल जाकर किसी कबाड़ी को बेच देगी! अगर तुम्हें उसे जूते देने ही थे, तो मुझे बताती। घर में तुम्हारे तीन-चार जोड़ी पुराने जूते पड़े हैं जो अब तुम्हें छोटे आते हैं। हम घर जाकर वो पुराने जूते लाकर उसे दे देते। एकदम नए, ब्रांडेड जूते देने की क्या जरूरत थी?”
सुमित ने भी रागिनी की बात में हामी भरते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारी मम्मी सही कह रही हैं। मदद करना अच्छी बात है, लेकिन हमें थोड़ा सोच-समझकर काम करना चाहिए। तुमने अपने स्कूल के कॉम्पिटिशन के लिए इतनी जिद करके वो जूते लिए थे, और ऐसे ही किसी अनजान को दे दिए? पुराने जूते देने से भी तो उसका काम चल जाता।”
माता-पिता की डांट सुनकर मान्या बिल्कुल नहीं घबराई। उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी। उसने अपनी माँ की तरफ देखा और बहुत ही शांत स्वर में बोली,
“मम्मा, वो पुराने जूते तो घर की अलमारी में सुरक्षित रखे हैं ना? लेकिन उस दादी के पैर तो अभी जल रहे थे। क्या वो तपती हुई सड़क मेरे पुराने जूतों के आने का इंतज़ार करती? और मम्मा, आप ही तो कहती हो कि भगवान को हमेशा ताजे फूल और सबसे अच्छी चीज़ चढ़ानी चाहिए। जब हम भगवान को बासी या पुरानी चीज़ें नहीं देते, तो फिर किसी ज़रूरतमंद को हमेशा अपनी बची-खुची और पुरानी चीज़ें ही क्यों देते हैं? क्या उन्हें नई चीज़ें पहनने का हक नहीं है? मुझे बस इतना पता है मम्मा, कि उसे उन जूतों की ज़रूरत मुझसे कहीं ज़्यादा और बिल्कुल इसी वक्त थी।”
मान्या के इन शब्दों ने कार के अंदर जैसे एक गहरा मौन ला दिया। सुमित और रागिनी के पास अपनी दस साल की बच्ची के इस सीधे और सच्चे सवाल का कोई जवाब नहीं था। रागिनी को अपनी ही बातों पर शर्मिंदगी महसूस होने लगी। हम बड़े लोग, जिन्हें लगता है कि हम दुनियादारी समझ गए हैं, असल में कितने स्वार्थी हो जाते हैं। हम दान भी यह सोचकर करते हैं कि हमारी कौन सी चीज़ अब हमारे काम की नहीं रही। हम अपना कबाड़ दूसरों को देकर खुद को महान समझने की भूल करते हैं।
सुमित ने रियर व्यू मिरर (पीछे देखने वाले शीशे) से अपनी बेटी को देखा, जो अब फिर से खिड़की के बाहर देख रही थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो। सुमित की आँखें भर आईं। उसने महसूस किया कि आज उसकी बेटी ने उसे जीवन का वो फलसफा सिखा दिया है, जो दुनिया का कोई भी धर्मग्रंथ नहीं सिखा पाया। ज़रूरत का कोई कल नहीं होता, वह आज और अभी होती है।
कार घर के दरवाजे पर रुकी। रागिनी ने पीछे मुड़कर अपनी बेटी को गले से लगा लिया और उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। मान्या ने अपनी माँ के आँसू पोछते हुए मुस्कुराकर कहा, “मम्मा, मेरे पुराने जूतों से भी मैं दौड़ सकती हूँ, लेकिन वो दादी उन जलते पैरों से चल भी नहीं पा रही थी।”
उस दिन के बाद से सुमित और रागिनी के जीवन को देखने का नज़रिया पूरी तरह से बदल गया। उन्होंने समझ लिया था कि इंसानियत का असली पैमाना यह नहीं है कि हम क्या देते हैं, बल्कि यह है कि हम किस नीयत से देते हैं।
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