नंदिनी के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। उसकी शादी को अभी महज़ छह महीने ही हुए थे और वह अपने पति विवान के साथ इस नए शहर, इस नए घर में आई थी। विवान पेशे से एक सर्जन था और आज अस्पताल में एक बेहद क्रिटिकल इमरजेंसी आ गई थी।
“नंदिनी, मेरी जान, समझने की कोशिश करो। वो मरीज जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। मेरे लिए जाना बहुत जरूरी है।” विवान ने अपना कोट पहनते हुए कहा। उसकी आवाज़ में जल्दबाजी और अपराधबोध दोनों थे।
“मैं समझ रही हूँ विवान, पर आज मौसम इतना खराब है। इस अनजान शहर में, इस बड़ी सी इमारत में मुझे घबराहट होती है। बिजली भी बार-बार जा रही है। क्या आपका जाना इतना ही जरूरी है?” नंदिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू उँगलियों में लपेटते हुए कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सा डर तैर रहा था।
विवान ने आगे बढ़कर नंदिनी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “मुझे पता है तुम घबरा रही हो, और तुम्हें इस तरह अकेले छोड़कर जाने का मेरा बिल्कुल मन नहीं है। लेकिन एक डॉक्टर होने के नाते मेरी कुछ जिम्मेदारियां हैं। तुम अंदर से दरवाजा अच्छे से लॉक कर लेना। मैं कोशिश करूंगा कि सर्जरी खत्म होते ही, चाहे रात के दो ही क्यों न बज जाएं, तुरंत वापस आ जाऊं। हमारी सोसाइटी बहुत सुरक्षित है, नीचे चौबीस घंटे गार्ड रहते हैं। डरो मत मेरी शेरनी।”
नंदिनी ने फीकी सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। विवान ने उसे गले लगाया और अपना बैग उठाकर बाहर निकल गया। दरवाजे के बंद होते ही जो एक भारी सी खामोशी उस फ्लैट में छा गई, वह बाहर गरजते बादलों से भी ज्यादा खौफनाक थी। नंदिनी ने मेन डोर की कुंडी लगाई, सेफ्टी चेन भी लगा दी और वापस आकर सोफे पर सिकुड़ कर बैठ गई। उसने टीवी ऑन किया ताकि घर में कुछ आवाज़ रहे और उसका ध्यान बंटे।
बाहर तूफान का जोर बढ़ता जा रहा था। हवाओं के सायं-सायं करने की आवाज़ें पंद्रहवीं मंजिल पर कुछ ज्यादा ही तेज सुनाई देती थीं। नंदिनी का मन बार-बार अपने मायके, अपने पिता बाबूजी की तरफ जा रहा था। बाबूजी से उसका लगाव हमेशा से बहुत गहरा था। बचपन में जब भी ऐसे बादल गरजते थे, तो वह दौड़कर बाबूजी के सीने से लग जाती थी और बाबूजी अपनी पुरानी शॉल में उसे लपेट कर कहते थे, “जब तक तुम्हारे बाबूजी यहाँ हैं, दुनिया का कोई तूफान मेरी गुड़िया का कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
रात के ग्यारह बज चुके थे। टीवी पर चल रहा कार्यक्रम भी अब नंदिनी को बोर करने लगा था। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। तभी अचानक बिजली चली गई। पूरा फ्लैट घुप अंधेरे में डूब गया। केवल बाहर चमकने वाली बिजली की रोशनी पल भर के लिए कमरे को डरावने साये में बदल देती थी। नंदिनी का दिल जोरों से धड़कने लगा। उसने मोबाइल का फ्लैशलाइट जलाया और खुद को सोफे के कोने में समेट लिया।
तभी, उस सन्नाटे को चीरती हुई दरवाजे पर एक दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
नंदिनी के शरीर में जैसे सिहरन दौड़ गई। इतनी रात गए? ऐसे तूफान में? कौन हो सकता है? विवान इतनी जल्दी तो नहीं आ सकते, उन्होंने तो कहा था कि सर्जरी में कई घंटे लगेंगे। गार्ड भी बिना इंटरकॉम पर बात किए किसी को ऊपर नहीं आने देते, और इंटरकॉम तो बिजली जाने की वजह से बंद था।
दस्तक फिर हुई। इस बार थोड़ी तेज।
“क… कौन है?” नंदिनी ने अपनी कांपती आवाज़ में पूछा। दरवाजे के करीब जाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी।
“बिटिया… मैं हूँ… दरवाजा खोल।”
वह आवाज़ सुनते ही नंदिनी के पैर वहीं जम गए। वह आवाज़, वह ठेठ अपनापन… यह तो बाबूजी की आवाज़ थी! लेकिन बाबूजी यहाँ कैसे? वो तो बनारस में हैं। और अगर वो आ रहे होते तो उन्होंने पहले बताया क्यों नहीं?
“बाबूजी…?” नंदिनी ने अविश्वास से भर कर दरवाजा खोला।
सामने सचमुच बाबूजी खड़े थे। उनका वही पुराना खादी का कुर्ता, वही चेहरे पर झुर्रियों वाली एक शांत मुस्कान, और कंधों पर वही पुरानी भूरी शॉल जो थोड़ी भीग गई थी।
“बाबूजी! आप?” नंदिनी खुशी, अचरज और राहत के मिले-जुले भाव से लगभग रो पड़ी और उनके गले लग गई। बाबूजी के शरीर की वो जानी-पहचानी खुशबू, जो हमेशा उसे सुकून देती थी, आज भी वैसी ही थी।
“अरे रोती क्यों है पगली? भीतर तो आने दे। देख, बाहर कितना पानी बरस रहा है।” बाबूजी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
“हां, हां, आइए ना।” नंदिनी ने जल्दी से उन्हें अंदर लिया और दरवाजा बंद कर दिया। “लेकिन बाबूजी, आप इतनी रात को? इस तूफान में? और आपने बताया भी नहीं कि आप आ रहे हैं। मैं विवान को स्टेशन भेज देती।”
बाबूजी सोफे पर बैठ गए और मुस्कुरा कर बोले, “अरे, मुझे अचानक मेरी गुड़िया की बहुत याद आने लगी। मन में अजीब सी बेचैनी हो रही थी, लगा जैसे तू बहुत डरी हुई है और तुझे मेरी जरूरत है। बस, फिर रुका नहीं गया। ट्रेन पकड़ी और चला आया। अब जब तेरा बाप आ गया है, तो डरने की कोई बात नहीं। जा, जाकर मेरे लिए अपने हाथ की वो इलायची वाली कड़क चाय बना ला, बड़ी तलब लग रही है।”
नंदिनी का सारा डर जैसे छूमंतर हो गया था। बाबूजी के आने से उस अंधेरे कमरे में भी जैसे एक अजीब सी रोशनी और गर्माहट आ गई थी। “अभी लाई बाबूजी!” वह खुशी से चहकती हुई किचन में गई। गैस जलाकर उसने पानी रखा, चायपत्ती, चीनी और ढेर सारी इलायची कूट कर डाल दी। चाय उबलने की सोंधी महक ने पूरे घर को एक सुकून से भर दिया।
चाय के दो कप लेकर वह वापस लौटी। मोबाइल की हल्की रोशनी में दोनों बाप-बेटी चाय पीने लगे। उस रात दोनों ने बहुत बातें कीं। नंदिनी ने अपने नए घर की, विवान की व्यस्त दिनचर्या की और शहर के अकेलेपन की शिकायतें कीं। बाबूजी बड़ी शांति से उसे सुनते रहे और उसे समझाते रहे।
“देख बिटिया,” बाबूजी ने चाय का खाली कप मेज पर रखते हुए कहा, “जीवन में जब भी बदलाव आते हैं, तो शुरुआत में घबराहट होती है। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना, रिश्ते कभी दूरियों से नहीं टूटते। जो लोग तुमसे सच्चा प्यार करते हैं, वो किसी न किसी रूप में हमेशा तुम्हारे आस-पास रहते हैं। वो तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ते, चाहे वो शरीर से तुम्हारे पास हों या न हों।”
नंदिनी ने बाबूजी की इन गहरी बातों को सुना और उनके कंधे पर सिर रख दिया। “बाबूजी, आप हैं ना मेरे साथ, तो मुझे कोई डर नहीं लगता। आज अगर आप नहीं आते, तो मैं सच में इस तूफान में बहुत डर जाती।”
बाबूजी ने धीरे से उसके बालों में उंगलियां फेरीं। “मैं हमेशा तेरे साथ हूँ बिटिया… हमेशा।”
बातों ही बातों में न जाने कब रात बीत गई और बाहर बारिश थम गई। सुबह की हल्की-हल्की नीली रोशनी खिड़की से अंदर आने लगी थी। बिजली भी अब वापस आ चुकी थी।
नंदिनी ने जम्हाई लेते हुए घड़ी देखी। सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे। “बाबूजी, पूरी रात निकल गई बातों में। आप सफर से आए हैं, थक गए होंगे। आप गेस्ट रूम में जाकर थोड़ी देर लेट जाइए। मैं नहाकर आती हूँ, फिर आपके लिए बढ़िया सा नाश्ता बनाती हूँ।”
“हां बिटिया, अब मुझे सच में एक लंबी नींद की जरूरत है।” बाबूजी उठे और धीमे कदमों से गेस्ट रूम की तरफ चले गए।
नंदिनी अपने कमरे में चली गई और बाथरूम में घुस गई। पानी के नीचे खड़े होकर उसे एक अजीब सी शांति महसूस हो रही थी। बाबूजी का इस तरह अचानक आना किसी चमत्कार से कम नहीं था।
तभी बाहर उसके मोबाइल की रिंगटोन बजी।
नंदिनी ने जल्दी से तौलिया लपेटा और बाहर आकर फोन उठाया। स्क्रीन पर उसके बड़े भाई, रोहित का नाम फ्लैश हो रहा था।
“हेलो भइया! इतनी सुबह-सुबह फोन? सब ठीक तो है?” नंदिनी ने चहकते हुए पूछा, वो अभी बाबूजी के आने का सरप्राइज रोहित को देने ही वाली थी।
दूसरी तरफ से कोई जवाब नहीं आया, सिर्फ रोहित के सिसकने की भारी आवाज़ आ रही थी।
“भइया? क्या हुआ? आप रो क्यों रहे हैं?” नंदिनी के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।
“नंदू…” रोहित की आवाज़ कांप रही थी, “नंदू… बाबूजी नहीं रहे।”
नंदिनी के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई। “क्या बकवास कर रहे हो भइया! बाबूजी तो…”
“कल रात करीब साढ़े ग्यारह बजे उन्हें अचानक सीने में तेज दर्द हुआ,” रोहित रोते हुए बता रहा था, “हम लोग उन्हें तुरंत अस्पताल लेकर भागे, लेकिन रास्ते में ही… डॉक्टर ने कहा कि मैसिव हार्ट अटैक था। वो हमें छोड़कर चले गए नंदू…”
नंदिनी के हाथ से फोन छूटकर फर्श पर गिर गया। उसके कान सुन्न पड़ गए थे और आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। साढ़े ग्यारह बजे? लेकिन बाबूजी तो रात को बारह बजे यहाँ आए थे! पूरी रात उन्होंने उससे बातें कीं, चाय पी।
नंदिनी पागलों की तरह दौड़कर गेस्ट रूम की तरफ भागी।
“बाबूजी!” उसने दरवाजा धक्का देकर खोला।
कमरा बिल्कुल खाली था। बिस्तर पर कोई सिलवट नहीं थी, जैसे कोई वहां लेटा ही न हो। वह दौड़कर पूरे घर में घूमी, “बाबूजी! बाबूजी!” लेकिन घर में उसके अलावा और कोई नहीं था।
वह हांफती हुई वापस लिविंग रूम में आई और वहीं फर्श पर धड़ाम से बैठ गई। उसकी नज़र सामने सेंटर टेबल पर गई। टेबल पर चाय के दो खाली कप रखे थे। और कमरे की हवा में अब भी बाबूजी की उस पुरानी भीगी हुई शॉल की वही चिर-परिचित, सोंधी सी महक तैर रही थी।
दोस्तों, कुछ घटनाएं सचमुच निशब्द कर देती हैं। विज्ञान और तर्क के पास ऐसे सवालों का कोई जवाब नहीं होता कि कोई रूह अपनी देह छोड़ने के बाद भी, अपने किसी अजीज के आंसू पोंछने, उसका डर भगाने कैसे मीलों का सफर तय कर लेती है।
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