परवरिश 

“मैं आज यहाँ आपसे पैसे मांगने या आपको ब्लैकमेल करने नहीं आई हूँ,” श्रुति ने खड़े होते हुए अपना झोला कंधे पर लटकाया। “मैं यहाँ एक माँ को आगाह करने आई थी। अभी भी वक्त है मिसेज शेरगिल, अपने बेटे को संभाल लीजिए। उसे इंसान बनना सिखाइए। क्योंकि अगर अगली बार उसने मेरी या किसी भी लड़की की तरफ आंख उठाकर देखने की जुर्रत की, तो मैं आपके पास नहीं आऊंगी। मैं सीधा वह करूंगी जो मुझे करना चाहिए। और यकीन मानिए, पैसे और पावर का गुरूर पालने वाले आप जैसे लोगों के बिगड़े हुए शहज़ादों की अक्ल ठिकाने लगाना हम जैसी आम लड़कियों को बहुत अच्छी तरह से आता है। अपना और अपने बेटे का ख्याल रखिएगा।”

शहर की सबसे ऊंची और आलीशान व्यावसायिक इमारत की पच्चीसवीं मंजिल पर स्थित ‘शेरगिल एंड एसोसिएट्स’ का दफ्तर अपनी भव्यता से किसी को भी डरा सकता था। सुजाता शेरगिल, जो शहर की एक जानी-मानी बिजनेस टायकून और रियल एस्टेट की बेताज बादशाह थीं, अपनी विशाल कांच की मेज के पीछे बैठी कुछ ज़रूरी दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर कर रही थीं। उनके चेहरे पर हमेशा एक ऐसी कठोरता और व्यस्तता तैरती रहती थी, जो सामने वाले को यह बताने के लिए काफी थी कि उनके पास बर्बाद करने के लिए एक सेकंड भी नहीं है। तभी उनके केबिन का इंटरकॉम बजा। उनकी पर्सनल सेक्रेटरी ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ बताया, “मैम, बाहर एक लड़की आपसे मिलने की जिद कर रही है। उसका कहना है कि उसके पास कोई अपॉइंटमेंट नहीं है, लेकिन जो बात वह आपसे करना चाहती है, वह आपके किसी भी करोड़ों के प्रोजेक्ट से ज्यादा महत्वपूर्ण है।” सुजाता ने अपनी भौंहें सिकोड़ीं। आमतौर पर वह ऐसे बिना बुलाए मेहमानों से नहीं मिलती थीं, लेकिन उस लड़की के संदेश में एक अजीब सा दुस्साहस था जिसने सुजाता का ध्यान खींच लिया। उन्होंने ठंडे स्वर में कहा, “उसे अंदर भेजो, लेकिन मैं उसे सिर्फ दो मिनट दूंगी।”

कुछ ही पलों बाद केबिन का भारी कांच का दरवाजा खुला और एक साधारण सूती सूट पहने हुए लड़की अंदर दाखिल हुई। उसके कंधे पर एक झोला था और पैरों में सामान्य सी सैंडल। लेकिन उसके चेहरे पर न तो उस भव्य ऑफिस का कोई खौफ था और न ही सुजाता शेरगिल जैसी बड़ी हस्ती के सामने खड़े होने की कोई घबराहट। उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति और दृढ़ संकल्प था। उसका नाम श्रुति था। श्रुति एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती थी और शहर के एक सरकारी कॉलेज से अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही थी। सुजाता ने अपने चश्मे के ऊपर से उसे घूरते हुए देखा और बिना किसी औपचारिकता के सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा, “बैठो। मुझे बताया गया है कि तुम्हारे पास मेरे किसी प्रोजेक्ट से ज्यादा जरूरी बात है। तुम्हारा समय शुरू हो चुका है, जल्दी बताओ कि तुम क्या चाहती हो? चंदा, नौकरी या कोई सिफारिश?”

श्रुति कुर्सी पर आराम से बैठी। उसने सुजाता की आँखों में सीधे देखते हुए एक गहरी सांस ली और अत्यंत शांत, किंतु स्पष्ट स्वर में कहा, “इन तीनों में से कुछ भी नहीं, मिसेज शेरगिल। मैं यहाँ आपसे कुछ माँगने नहीं, बल्कि आपको कुछ लौटाने आई हूँ—वह सच, जिसे शायद आपके आस-पास के चापलूस लोग आप तक पहुँचने नहीं देते।”

सुजाता के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। “अच्छा? तो तुम कोई समाज सुधारक हो? देखो लड़की, मेरे पास इन फालतू के भाषणों के लिए समय नहीं है। अगर काम की बात नहीं करनी है तो तुम जा सकती हो।”

श्रुति अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिली। उसने कहा, “काम की ही बात है मैम। बात यह है कि मैं और मेरी छोटी बहन रोज़ सुबह कॉलेज जाने के लिए बस स्टैंड तक पैदल जाते हैं। पिछले कुछ हफ्तों से एक महंगी लाल रंग की स्पोर्ट्स कार रोज़ हमारा रास्ता रोकती है। उसमें कुछ आवारा और बिगड़े हुए लड़के बैठे होते हैं। शुरुआत में उन्होंने सिर्फ हॉर्न बजाकर परेशान किया, फिर भद्दे गाने बजाए और अब उनकी हिम्मत इतनी बढ़ गई है कि वे हमारे चरित्र और हमारे कपड़ों को लेकर बेहद घिनौनी और अश्लील टिप्पणियां करने लगे हैं। कल तो उन्होंने हमारी बस के पीछे अपनी गाड़ी लगाकर रास्ता रोकने की कोशिश भी की।”

यह सुनकर सुजाता का धैर्य जवाब देने लगा। उन्होंने तल्ख लहजे में मेज पर हाथ मारते हुए कहा, “तो इसमें मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकती हूँ? क्या मैं इस शहर की पुलिस कमिश्नर हूँ? अगर तुम्हें सड़क पर कोई परेशान करता है, तो यह तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की समस्या है। जाओ जाकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराओ। तुम मेरे ऑफिस में आकर मेरा समय क्यों बर्बाद कर रही हो? क्या तुम्हें लगता है कि मैं कोई महिला हेल्पलाइन चलाती हूँ?”

सुजाता की इस उग्र प्रतिक्रिया के बाद भी श्रुति के चेहरे की शांति भंग नहीं हुई। बल्कि, अब उसकी आँखों में एक निडरता की चमक आ गई थी। वह हल्का सा मुस्कुराई और बोली, “समस्या मेरी नहीं है, मिसेज शेरगिल। समस्या पूरी तरह से आपकी है। और रही बात लड़कों के परिवार वालों की, तो उनका इस मामले से बहुत गहरा वास्ता है।”

सुजाता अब सचमुच चकरा गई। “क्या बकवास कर रही हो तुम? मेरे पास पहेलियां बुझाने का वक्त नहीं है। सीधे-सीधे बताओ तुम्हारा मतलब क्या है?”

श्रुति ने अपनी कुर्सी थोड़ी आगे की और सुजाता की आँखों में आँखें डालकर अपनी बात को वजन देते हुए कहा, “मेरा मतलब यह है, मैम, कि उस लाल स्पोर्ट्स कार को चलाने वाला और उन आवारा लड़कों का नेतृत्व करने वाला कोई और नहीं, बल्कि आपका अपना सगा बेटा, कबीर शेरगिल है।”

पूरे केबिन में जैसे सन्नाटा छा गया। सुजाता के चेहरे का रंग उड़ गया, फिर अगले ही पल उनके भीतर का अहंकार जाग उठा। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे बेटे पर ऐसा घिनौना इल्ज़ाम लगाने की? जानती हो मैं कौन हूँ? मैं चाहूँ तो तुम्हें और तुम्हारे पूरे परिवार को एक पल में बर्बाद कर सकती हूँ! तुम जैसी लड़कियाँ जो छोटे घरों से आती हैं, अमीर घरों के लड़कों को फंसाने और पैसे ऐंठने के लिए यही सब नाटक करती हैं। गेट आउट! इससे पहले कि मैं सिक्योरिटी को बुलाकर तुम्हें धक्के मरवाकर बाहर निकालूं, यहाँ से चली जाओ।”

लेकिन श्रुति उठी नहीं। वह उसी निडरता के साथ बैठी रही। उसने अपने बैग से एक पेन ड्राइव निकाली और उसे सुजाता की मेज पर रख दिया। “सिक्योरिटी बुलाने की ज़रूरत नहीं है मिसेज शेरगिल। मैं खुद चली जाऊंगी। लेकिन जाने से पहले मेरी पूरी बात सुन लीजिए। इस पेन ड्राइव में आपके लाडले बेटे की उन सभी हरकतों की वीडियो रिकॉर्डिंग है, जो वह पिछले पंद्रह दिनों से सड़क पर कर रहा है। मेरी जगह कोई और लड़की होती, तो वह अब तक पुलिस स्टेशन में बैठी होती और आपका बेटा सलाखों के पीछे। मीडिया वालों के लिए तो यह एक बहुत बड़ी और मसालेदार खबर होती—’मशहूर बिजनेस वूमन सुजाता शेरगिल का बेटा छेड़खानी के आरोप में गिरफ्तार’।”

सुजाता की नज़रें उस पेन ड्राइव पर टिक गईं। उनके होंठ सूखने लगे थे। उनका आत्मविश्वास अब डगमगा रहा था।

श्रुति ने अपनी बात जारी रखी, “मैं सीधे पुलिस के पास जा सकती थी। लेकिन मुझे पता है कि जब पुलिस केस होता है, तो आप जैसे रसूखदार और तथाकथित ‘सभ्य’ समाज के लोग अपने पैसे और पावर का इस्तेमाल करके हम जैसी लड़कियों के चरित्र पर ही कीचड़ उछालना शुरू कर देते हैं। आप अदालत में यह साबित करने की कोशिश करते कि गलती मेरे ही कपड़ों या मेरे ही आचरण में थी। आप लोग पैसा कमाने में सुबह से लेकर आधी रात तक इतने अंधे हो जाते हैं कि आपके पास यह देखने की फुर्सत ही नहीं होती कि आपका बच्चा किस दिशा में जा रहा है। आपने कबीर को करोड़ों की गाड़ी दे दी, क्रेडिट कार्ड दे दिया, लेकिन तमीज़ और महिलाओं का सम्मान करना सिखाना भूल गईं।”

सुजाता निशब्द थीं। वह समझ नहीं पा रही थीं कि इस आम सी लड़की के तीखे वार का क्या जवाब दें। उनका सारा घमंड, सारा रुतबा, इस वक्त श्रुति के आत्मविश्वास के सामने बौना लग रहा था।

“मैं आज यहाँ आपसे पैसे मांगने या आपको ब्लैकमेल करने नहीं आई हूँ,” श्रुति ने खड़े होते हुए अपना झोला कंधे पर लटकाया। “मैं यहाँ एक माँ को आगाह करने आई थी। अभी भी वक्त है मिसेज शेरगिल, अपने बेटे को संभाल लीजिए। उसे इंसान बनना सिखाइए। क्योंकि अगर अगली बार उसने मेरी या किसी भी लड़की की तरफ आंख उठाकर देखने की जुर्रत की, तो मैं आपके पास नहीं आऊंगी। मैं सीधा वह करूंगी जो मुझे करना चाहिए। और यकीन मानिए, पैसे और पावर का गुरूर पालने वाले आप जैसे लोगों के बिगड़े हुए शहज़ादों की अक्ल ठिकाने लगाना हम जैसी आम लड़कियों को बहुत अच्छी तरह से आता है। अपना और अपने बेटे का ख्याल रखिएगा।”

इतना कहकर श्रुति मुड़ी और बिना एक बार भी पीछे देखे उस आलीशान केबिन से बाहर निकल गई। सुजाता शेरगिल अपनी कुर्सी पर जड़वत बैठी रह गईं। उनके सामने मेज पर रखी वह छोटी सी पेन ड्राइव उनके करोड़ों के साम्राज्य से ज्यादा भारी लग रही थी। आज एक मामूली सी लड़की ने उनके तमाम (अहंकार) को तोड़कर उन्हें मातृत्व और परवरिश का ऐसा कड़वा आइना दिखाया था, जिसमें उन्हें अपनी सबसे बड़ी हार साफ-साफ नज़र आ रही थी।

क्या आपको लगता है कि श्रुति का सुजाता शेरगिल के ऑफिस में जाकर उन्हें चेतावनी देने का फैसला सही था, या उसे सीधे पुलिस स्टेशन जाकर कबीर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवानी चाहिए थी? क्या रसूखदार लोगों को उनकी गलतियों का आइना दिखाना इतना आसान होता है? अपनी राय और विचार हमें कमेंट सेक्शन में ज़रूर बताएं।

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लेखिका : नमिता शुक्ला

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