एहसास के धागे

मेघा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह गुस्से से तमतमाती हुई समीर के पास गई। “समीर! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई पापा से यह सब कहने की? तुम्हें पता नहीं है कि उन्हें अस्थमा है? वो यहाँ हमारे घर काम करने आए हैं क्या? कार साफ करने के लिए कॉलोनी में लड़के आते हैं, और राशन तुम खुद भी ला सकते थे या ऑनलाइन मंगवा सकते थे। पापा हमारे मेहमान हैं, तुम उनसे मजदूरी करवा रहे हो?”

समीर ने बहुत ही शांति से अपनी लैपटॉप स्क्रीन से नजर हटाई और मेघा की आंखों में देखते हुए कहा, “पापा सारा दिन खाली ही तो रहते हैं मेघा। अगर थोड़ा बहुत काम कर भी देंगे, तो इसमें हर्ज ही क्या है? घर के काम में मदद करना मजदूरी थोड़ी होती है।”

महानगर की भागदौड़ भरी जिंदगी में मेघा और समीर का जीवन किसी मशीन की तरह चल रहा था। दोनों एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते थे और उनका पांच साल का बेटा, आरव, दिन भर डे-केयर में रहता था। घर के कामों के लिए कुक और मेड रखे हुए थे, लेकिन सुकून का जैसे अकाल पड़ा हुआ था। ऐसे में जब मेघा को पता चला कि उसके माता-पिता (सुमित्रा जी और रमेश बाबू) एक महीने के लिए उनके पास मुंबई आ रहे हैं, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। शादी के तीन साल बाद वे पहली बार इतने लंबे समय के लिए उसके पास आ रहे थे। मेघा ने हफ्तों पहले से ही तैयारियां शुरू कर दी थीं। गेस्ट रूम को सजाया गया, नई चादरें बिछाई गईं और घर के कोने-कोने को चमका दिया गया। मेघा हर किसी से चहक-चहक कर बता रही थी कि उसके मम्मी-पापा आ रहे हैं।

जिस दिन सुमित्रा जी और रमेश बाबू घर पहुंचे, मेघा ने उन्हें दरवाजे पर ही गले लगा लिया। घर में जैसे एक नई जान आ गई थी। सुमित्रा जी, जो अपनी बेटी को इतने दिनों बाद देख रही थीं, उसकी कमजोर होती सेहत और आंखों के नीचे के काले घेरों को देखकर चिंतित हो गईं। उन्होंने आते ही घर की कमान अपने हाथों में ले ली। मेघा ने भी एक बड़ा फैसला लेते हुए अपनी खाना बनाने वाली कुक को एक महीने की छुट्टी दे दी। उसका तर्क था कि “मम्मी के हाथ के खाने का स्वाद दुनिया के किसी फाइव-स्टार होटल में नहीं मिल सकता, और मम्मी भी तो हमें अपने हाथ से खिलाना चाहती हैं।”

शुरुआती कुछ दिन बहुत खुशनुमा बीते। सुमित्रा जी सुबह जल्दी उठकर सबके लिए नाश्ता बनातीं, समीर और मेघा के लिए टिफिन पैक करतीं और फिर दिन भर आरव के साथ खेलतीं। आरव भी अपनी नानी के साथ बहुत खुश था। रमेश बाबू शाम को आरव को पार्क ले जाते और घर के छोटे-मोटे सामान ले आते। मेघा जब ऑफिस से लौटती, तो उसे गरमा-गरम चाय और नाश्ता तैयार मिलता। उसे लगता जैसे वह वापस अपने बचपन में लौट आई हो, जहाँ उसे किसी बात की फिक्र नहीं करनी पड़ती थी।

लेकिन समीर, जो स्वभाव से बहुत शांत और विचारशील था, कुछ और ही देख रहा था। उसने नोटिस किया कि सुमित्रा जी अक्सर काम करते-करते अपनी कमर पर हाथ रखकर गहरी सांस लेती थीं। कई बार रात को जब सब सो जाते, तो वह चुपचाप दर्द निवारक बाम लगाती थीं। उनकी उम्र साठ के पार थी और गठिया की वजह से उन्हें लंबे समय तक खड़े रहने में तकलीफ होती थी। एक रात समीर ने मेघा से कहा, “मेघा, मुझे लगता है हमें कुक को वापस बुला लेना चाहिए। मम्मी जी दिन भर किचन में लगी रहती हैं, उनकी उम्र हो गई है, उन्हें आराम की जरूरत है।”

मेघा ने लापरवाही से जवाब दिया, “अरे समीर, तुम भी ना! मम्मी को मेरे और आरव के लिए काम करना बहुत पसंद है। वो इसी में तो खुश रहती हैं। तुम्हें पता है उन्होंने कल मेरे लिए खास गाजर का हलवा बनाया था? उन्हें कोई थकान नहीं होती, वो हमारे साथ एन्जॉय कर रही हैं।”

समीर ने उसे समझाने की कोशिश की, “प्यार अपनी जगह है मेघा, लेकिन शरीर की भी एक क्षमता होती है। वो यहाँ मेहमान बनकर आई हैं या हमारी जिम्मेदारियां उठाने?” पर मेघा ने उसकी बात अनसुनी कर दी और करवट लेकर सो गई।

दिन बीतते गए और सुमित्रा जी का काम बढ़ता गया। मेघा ने अपनी सहूलियत को अपना अधिकार मान लिया था। अब वह वीकेंड पर भी घर का कोई काम नहीं करती थी। एक दिन उसने अपनी ऑफिस की टीम के दस लोगों को घर पर डिनर के लिए आमंत्रित कर लिया। उसका उत्साह चरम पर था। उसने सुमित्रा जी को एक लंबी चौड़ी लिस्ट थमा दी—पनीर टिक्का, दाल मखनी, दम आलू, पुलाव, रायता और रसमलाई। सुमित्रा जी ने बिना कोई शिकायत किए हामी भर दी।

डिनर पार्टी वाले दिन सुमित्रा जी सुबह से ही रसोई में जुटी हुई थीं। दोपहर तक उनकी कमर का दर्द इतना बढ़ गया कि उन्हें एक कुर्सी पर बैठकर सब्जियां काटनी पड़ीं। समीर को यह सब देखकर बहुत बुरा लग रहा था। उसने सुमित्रा जी से कहा भी कि वह बाहर से खाना मंगवा लेता है, लेकिन उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि मेघा को बुरा लगेगा और बाहर का खाना सेहत के लिए अच्छा नहीं होता।

शाम के पांच बज चुके थे। मेघा अभी भी आराम से सोफे पर बैठकर अपने फोन में ऑफिस की कोई रिपोर्ट चेक कर रही थी। समीर ने देखा कि रमेश बाबू भी अपने कमरे में आराम कर रहे हैं। तभी समीर के दिमाग में एक विचार आया। वह रमेश बाबू के कमरे में गया और बोला, “पापा, क्या आप मेरी एक मदद कर सकते हैं? मेरी कार बहुत गंदी हो रही है और कल सुबह मुझे एक जरूरी मीटिंग में जाना है। क्या आप प्लीज नीचे पार्किंग में जाकर उसे अच्छे से धो देंगे? और हां, लौटते हुए चौराहे वाली दुकान से बीस किलो आटे की बोरी और कुछ भारी राशन का सामान भी लेते आइएगा।”

रमेश बाबू, जो दिल के बहुत सीधे थे, तुरंत उठ खड़े हुए। “हां बेटा, क्यों नहीं। मैं अभी जाता हूँ।” उन्होंने अपनी चप्पलें पहनीं और नीचे जाने लगे।

मेघा की नजर उन पर पड़ी। उसने देखा कि उसके पिता, जिन्हें अस्थमा की शिकायत थी और जो ज्यादा वजन नहीं उठा सकते थे, हाथ में बाल्टी और कपड़ा लिए जा रहे हैं।

“पापा! आप यह बाल्टी लेकर कहाँ जा रहे हैं?” मेघा ने चौंककर पूछा।

रमेश बाबू ने सहजता से कहा, “बेटा, समीर की गाड़ी साफ करनी है, और फिर थोड़ा राशन का सामान लाना है। मैं बस वही करने जा रहा हूँ।”

मेघा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह गुस्से से तमतमाती हुई समीर के पास गई। “समीर! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई पापा से यह सब कहने की? तुम्हें पता नहीं है कि उन्हें अस्थमा है? वो यहाँ हमारे घर काम करने आए हैं क्या? कार साफ करने के लिए कॉलोनी में लड़के आते हैं, और राशन तुम खुद भी ला सकते थे या ऑनलाइन मंगवा सकते थे। पापा हमारे मेहमान हैं, तुम उनसे मजदूरी करवा रहे हो?”

समीर ने बहुत ही शांति से अपनी लैपटॉप स्क्रीन से नजर हटाई और मेघा की आंखों में देखते हुए कहा, “पापा सारा दिन खाली ही तो रहते हैं मेघा। अगर थोड़ा बहुत काम कर भी देंगे, तो इसमें हर्ज ही क्या है? घर के काम में मदद करना मजदूरी थोड़ी होती है।”

मेघा गुस्से से चीखी, “यह कैसा बेतुका तर्क है? वो बुज़ुर्ग हैं! उन्हें आराम की जरूरत है। वो यहाँ हमसे मिलने और रिलैक्स करने आए हैं, हमारी जिम्मेदारियों का बोझ उठाने नहीं!”

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। समीर अपनी जगह से उठा और मेघा के बिल्कुल सामने आकर खड़ा हो गया। उसकी आंखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी निराशा थी।

“अच्छा मेघा?” समीर ने धीमी लेकिन चुभती हुई आवाज में कहा, “पापा मेहमान हैं और उन्हें आराम की जरूरत है, यह बात तुम्हें बहुत अच्छे से समझ आ रही है। लेकिन पिछले बीस दिनों से जो औरत उस तपती हुई रसोई में पसीने से लथपथ होकर खड़ी है, क्या वो मशीन है? क्या मम्मी जी बुज़ुर्ग नहीं हैं? क्या उनके घुटनों और कमर में दर्द नहीं होता?”

मेघा सन्न रह गई। उसके पास कोई जवाब नहीं था।

समीर आगे बोला, “तुमने अपनी कुक को छुट्टी दे दी क्योंकि तुम्हें ‘मम्मी के हाथ का खाना’ खाना था। आज तुमने अपने दस दोस्तों को दावत पर बुलाया है, और सुबह छह बजे से मम्मी रसोई में खट रही हैं। मैंने उन्हें दर्द से कराहते हुए चुपचाप दवा खाते देखा है। अगर पापा का कार धोना और राशन लाना तुम्हें ‘मजदूरी’ लगता है, तो जो मम्मी पिछले बीस दिन से तुम्हारे और तुम्हारे दोस्तों के लिए कर रही हैं, उसे तुम क्या नाम दोगी? क्या वो यहाँ तुम्हारी बावर्ची बनकर आई हैं?”

मेघा के कानों में समीर के शब्द पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे।

“प्यार और आत्मीयता के नाम पर तुमने अपनी माँ को सिर्फ एक ‘कन्वीनियंस’ (सुविधा) समझ लिया है मेघा। बेटियां ससुराल में अपनी सास की एक छोटी सी बात नहीं सहतीं, लेकिन मायके से आई अपनी ही माँ को बिना तनख्वाह वाली नौकरानी बना देती हैं और उसे ‘माँ का प्यार’ कहकर खुद को तसल्ली दे देती हैं। मेरी माँ होती, तो क्या तुम उनसे दस लोगों का खाना बनवातीं?”

मेघा की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसे अचानक महसूस हुआ कि वह कितनी स्वार्थी हो गई थी। उसने सुमित्रा जी के उस दर्द भरे चेहरे को याद किया जिसे वह पिछले कई दिनों से नजरअंदाज कर रही थी। उसका अहम टूट चुका था और अपनी गलती का एहसास उसे अंदर तक कचोट रहा था।

वह दौड़कर रसोई में गई। सुमित्रा जी गैस के पास खड़ी पूरियाँ तल रही थीं, उनके माथे पर पसीना था और वह बार-बार अपनी कमर को हाथ से सहारा दे रही थीं। मेघा ने जाकर गैस का नॉब बंद कर दिया।

“मम्मी, बस! अब आप कुछ नहीं करेंगी,” मेघा ने रोते हुए अपनी माँ को गले लगा लिया।

सुमित्रा जी घबरा गईं। “क्या हुआ मेरी बच्ची? तू रो क्यों रही है? कोई बात हो गई क्या समीर से? और गैस क्यों बंद कर दी, तेरे दोस्त आने वाले हैं।”

“कोई दोस्त नहीं आएगा मम्मी, और आएगा भी तो मैं बाहर से खाना मंगवा लूंगी। मुझे माफ कर दीजिए मम्मी, मैं कितनी अंधी हो गई थी। आपने मुझे पाल-पोस कर इतना बड़ा किया, और मैं यहाँ आपको आराम देने की बजाय आपसे ही काम करवा रही हूँ।” मेघा सुबक रही थी। उसने सुमित्रा जी को रसोई से बाहर निकाला और उन्हें सोफे पर ले जाकर बैठाया।

समीर दरवाजे पर खड़ा यह सब देख रहा था। उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। मेघा ने समीर की तरफ देखा, उसकी आंखों में क्षमायाचना थी। समीर ने पास आकर मेघा के कंधे पर हाथ रखा और रमेश बाबू से कहा, “सॉरी पापा, कार तो मैंने सुबह ही धुलवा ली थी और राशन भी आ गया है। मैं तो बस मेघा को कुछ समझाना चाहता था।”

रमेश बाबू मुस्कुरा दिए, मानो वे सब समझ गए हों।

उस रात मेघा के दोस्त आए। खाना बाहर से मंगवाया गया। मेघा ने खुद सबको खाना परोसा और सुमित्रा जी को अपनी कुर्सी से उठने तक नहीं दिया। रात को जब सब मेहमान चले गए, तो मेघा खुद एक ट्रे में दो कप स्पेशल मसाला चाय बनाकर सुमित्रा जी और रमेश बाबू के कमरे में ले गई।

उसने चाय का कप अपनी माँ को देते हुए कहा, “मम्मी, कल से हमारी कुक वापस आ रही है। और कल हम सब शाम को मरीन ड्राइव घूमने चलेंगे। अब बचे हुए दिनों में आप सिर्फ अपनी बेटी के साथ वक्त बिताएंगी, किचन के साथ नहीं।”

उस रात मेघा जब सोने गई, तो उसे बहुत हल्की नींद आई। उसे यह समझ आ गया था कि रिश्ते सहूलियत से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की परवाह से चलते हैं।

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