मनोरमा देवी ने कांपते हाथों से पल्लवी का हाथ पकड़ लिया और रुंधे हुए गले से बोलीं, “डॉक्टर को नहीं, मुझे अपने भगवान से माफी मांगनी है। मैंने कभी तुझे बेटी नहीं समझा, हमेशा तुझमें बुराई ही ढूंढी। लोग सही कहते हैं, जब आंखों पर गलतफहमी की पट्टी बंधी हो, तो हीरा भी पत्थर नजर आता है। तूने तो इस घर को अपना मान लिया था, पर हमने ही तुझे कभी नहीं अपनाया। मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची।”
उज्जैन शहर की पुरानी और संकरी गलियों के बीच बसा पंडित केदारनाथ का पुश्तैनी मकान हमेशा से अपनी परंपराओं और उसूलों के लिए जाना जाता था। उस घर के आंगन में तुलसी का बिरवा भी जैसे अपनी मर्यादा में रहकर महकता था। इसी घर में नई बहू बनकर आई थी पल्लवी। पल्लवी स्वभाव से बहुत ही शांत, समझदार और रिश्तों को सहेज कर चलने वाली लड़की थी। उसका पति, सार्थक, शहर के एक कॉलेज में प्रोफेसर था और घर का छोटा बेटा था। पल्लवी जब इस घर में आई, तो उसने अपनी आँखों में एक ही सपना सजाया था—कि वह इस घर को अपना बनाएगी और सबके दिलों में जगह बनाएगी। लेकिन असल जिंदगी की कहानियां उपन्यासों जैसी नहीं होतीं, जहाँ हर अच्छाई का फल तुरंत मिल जाता है। कभी-कभी आपकी अच्छाई ही आपकी सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है।
घर में पल्लवी की जेठानी थी, मालती। मालती स्वभाव से थोड़ी चंचल और बातों को अपने हिसाब से मोड़ने में माहिर थी। उसकी सास, मनोरमा देवी, एक सख्त मिजाज की महिला थीं, जो घर के हर फैसले खुद लेती थीं। पल्लवी का दिन सुबह पांच बजे शुरू होता। वह घर की साफ-सफाई से लेकर सबके लिए नाश्ता बनाने तक का काम बिना किसी शिकायत के करती। लेकिन मालती को पल्लवी की यह फुर्ती और काम के प्रति लगन खटकने लगी थी। उसे लगने लगा था कि पल्लवी यह सब सिर्फ सास की नजरों में महान बनने के लिए कर रही है। मालती ने धीरे-धीरे मनोरमा देवी के कान भरने शुरू कर दिए।
एक दिन पल्लवी ने ससुर जी के लिए बिना चीनी और कम तेल का दलिया बनाया, क्योंकि डॉक्टर ने उन्हें भारी खाना खाने से मना किया था। जब मनोरमा देवी ने देखा कि पल्लवी ने उन्हें सादा दलिया दिया है और बाकी सबके लिए पराठे बनाए हैं, तो इससे पहले कि पल्लवी कुछ कह पाती, मालती ने तंज कसते हुए कहा, “मां जी, देख रही हैं नई बहू का कमाल? ससुर जी के खाने में अभी से कटौती शुरू कर दी। पराठे बनाने में कितनी मेहनत लगती है, इसलिए उन्हें बस उबला हुआ दलिया थमा दिया।”
पल्लवी ने सफाई देनी चाही, “मां जी, बाबूजी का कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है, डॉक्टर ने…” लेकिन मनोरमा देवी ने उसकी एक न सुनी। उन्होंने गुस्से में कहा, “हमारे घर में बड़ों को बीमार समझकर किनारे नहीं किया जाता। तुम अपने मायके के नियम यहां मत चलाओ।” पल्लवी की आंखें छलक आईं। उसने बाबूजी की सेहत के लिए जो कदम उठाया था, उसे कंजूसी और कामचोरी का नाम दे दिया गया।
यह तो सिर्फ शुरुआत थी। घर में होने वाली हर छोटी-बड़ी बात का दोष पल्लवी के सिर मढ़ा जाने लगा। अगर वह किसी दिन थककर थोड़ी देर सो जाती, तो उसे आलसी कहा जाता। अगर वह घर खर्च में से कुछ पैसे बचाकर गुल्लक में डालती, तो मालती ताना मारती कि बहू घर के पैसे चुराकर अपने मायके भेजने की फिराक में है। पल्लवी के लिए सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि सार्थक भी अपनी मां और भाभी की बातों में आकर उस पर शक करने लगा था। सार्थक को लगता कि शायद पल्लवी ही खुद को इस घर के माहौल में ढाल नहीं पा रही है।
एक दिन पल्लवी अपने कमरे में बैठी रो रही थी। उसे बचपन में पढ़ी हुई रामायण और महाभारत की बातें याद आ रही थीं। उसने सोचा, “जब मंथरा की नजर में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बुरे हो सकते हैं, जिन्होंने कभी किसी का बुरा नहीं सोचा, और जब गांधारी की नजर में श्री कृष्ण एक छलिया और विलेन हो सकते हैं, तो मैं तो फिर भी एक साधारण सी इंसान हूँ।” इस विचार ने पल्लवी को एक अजीब सी शांति दी। उसने तय किया कि वह अपनी सफाई पेश नहीं करेगी। वह वह काम करेगी जो सही है, चाहे कोई उसे समझे या न समझे। जब लोग भगवान के इरादों पर शक कर सकते हैं, तो इंसानों की क्या बिसात!
समय अपनी गति से बीतता रहा। घर में पल्लवी की छवि एक ऐसी बहू की बन गई थी जो हमेशा अपने मन की करती है और जिसे बड़ों का लिहाज नहीं है। वह अब चुपचाप अपना काम करती और किसी की बातों का जवाब नहीं देती। उसकी खामोशी को भी लोगों ने उसका अहंकार मान लिया।
फिर एक ऐसा समय आया जिसने इस परिवार की नींव हिलाकर रख दी। देश में अचानक एक महामारी का प्रकोप फैला और लॉकडाउन लग गया। सार्थक के बड़े भाई, जो एक छोटी सी फैक्ट्री चलाते थे, उनका काम पूरी तरह ठप्प हो गया। घर में पैसों की तंगी शुरू हो गई। बात सिर्फ पैसों तक नहीं रुकी। एक रात मनोरमा देवी को अचानक सीने में तेज दर्द हुआ और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उनका हार्ट अटैक इतना गंभीर था कि डॉक्टरों ने तुरंत बाईपास सर्जरी करने की सलाह दी।
इस मुश्किल घड़ी में घर के सभी लोग जैसे बिखर गए। मालती, जो हमेशा सबसे आगे बढ़कर बातें बनाती थी, अस्पताल के चक्कर काटने और रात-रात भर जागने से कतराने लगी। उसने अपनी छोटी बेटी का बहाना बनाकर अस्पताल में रुकने से साफ मना कर दिया। सार्थक और उसके बड़े भाई पैसों का इंतजाम करने के लिए दर-दर भटक रहे थे, लेकिन लॉकडाउन के कारण कोई भी रिश्तेदार मदद करने की स्थिति में नहीं था।
ऐसे समय में पल्लवी आगे आई। उसने बिना किसी शोर-शराबे के अस्पताल की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। वह दिन-रात मनोरमा देवी के बिस्तर के पास बैठी रहती। उनकी दवाइयों का समय, उनके स्पंज की जिम्मेदारी, उनके मन को ढांढस बंधाना—सब कुछ पल्लवी अकेले कर रही थी। अस्पताल के उस ठंडे और उदास वार्ड में, पल्लवी मनोरमा देवी के लिए एक साये की तरह डटी रही।
उधर, सार्थक और उसके बड़े भाई 5 लाख रुपये का इंतजाम नहीं कर पा रहे थे। जब डॉक्टर ने कहा कि अगर शाम तक पैसे जमा नहीं हुए तो सर्जरी टालनी पड़ेगी, तो पूरा परिवार अस्पताल के बाहर बैठकर रोने लगा। तब पल्लवी ने अपना एक पुराना सा बैग खोला और उसमें से एक पोटली निकालकर सार्थक के हाथों में रख दी। सार्थक ने पोटली खोली तो उसमें सोने के कुछ पुराने गहने और ढेर सारे पैसे थे।
सार्थक ने हैरानी से पूछा, “पल्लवी, यह सब?”
पल्लवी ने शांत स्वर में कहा, “यह वो गहने हैं जो मेरे बाबूजी ने मेरी शादी में दिए थे, और यह वो पैसे हैं जो मैं पिछले तीन सालों से घर के खर्च में से बचा-बचाकर गुल्लक में डाल रही थी। मालती दीदी को लगता था कि मैं पैसे मायके भेजती हूँ, लेकिन मैंने यह सब इसी घर के बुरे वक्त के लिए जोड़ा था। मां जी की जान से बढ़कर यह सोना नहीं है। इसे गिरवी रख दो या बेच दो, बस मां जी को बचा लो।”
सार्थक की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। आज उसे एहसास हुआ कि जिस पत्नी को उसने हमेशा गलत समझा, वह वास्तव में इस परिवार की सबसे मजबूत ढाल थी। बड़े भाई भी पल्लवी के सामने हाथ जोड़कर खड़े रह गए।
सर्जरी सफल रही। कुछ दिनों बाद मनोरमा देवी को होश आया। जब उन्होंने अपनी आंखें खोलीं, तो देखा कि पल्लवी उनके पैरों के पास सिर रखकर सो रही है। पल्लवी का चेहरा पीला पड़ गया था, आंखों के नीचे काले घेरे आ गए थे, और वह बेहद कमजोर लग रही थी। नर्स ने मनोरमा देवी को बताया, “मां जी, आपकी बहू ने पिछले पांच दिनों से ढंग से खाना नहीं खाया है। यह रात-भर जगकर आपकी मशीनें देखती रहती है। ऐसी बहू किस्मत वालों को मिलती है।”
मनोरमा देवी के कानों में मालती की वो बातें गूंजने लगीं, जिनमें वह पल्लवी को स्वार्थी और कामचोर बताती थी। उन्हें अपनी उस छोटी सोच पर बहुत पछतावा हुआ कि उन्होंने कभी पल्लवी को समझने की कोशिश ही नहीं की। उन्होंने हमेशा दूसरों के चश्मे से पल्लवी को देखा था।
जब पल्लवी की आंख खुली, तो उसने देखा कि मनोरमा देवी उसे ही देख रही हैं और उनकी आंखों से आंसू बह रहे हैं। पल्लवी घबरा गई, “मां जी, क्या हुआ? दर्द हो रहा है क्या? मैं अभी डॉक्टर को बुलाती हूँ।”
मनोरमा देवी ने कांपते हाथों से पल्लवी का हाथ पकड़ लिया और रुंधे हुए गले से बोलीं, “डॉक्टर को नहीं, मुझे अपने भगवान से माफी मांगनी है। मैंने कभी तुझे बेटी नहीं समझा, हमेशा तुझमें बुराई ही ढूंढी। लोग सही कहते हैं, जब आंखों पर गलतफहमी की पट्टी बंधी हो, तो हीरा भी पत्थर नजर आता है। तूने तो इस घर को अपना मान लिया था, पर हमने ही तुझे कभी नहीं अपनाया। मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची।”
पल्लवी की भी आंखें भर आईं। उसने मनोरमा देवी के आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “मां जी, जब मैं छोटी थी तो मेरे पिता जी कहते थे कि अगर आपका मन साफ है, तो किसी को सफाई देने की जरूरत नहीं है। वक्त खुद आपकी गवाही देता है। आप मेरी मां हैं, और मां से कैसी नाराजगी।”
घर लौटने पर माहौल पूरी तरह बदल चुका था। मालती भी अपनी हरकतों पर शर्मिंदा थी। उसने पल्लवी से गले लगकर माफी मांगी। अब उस पुराने घर में गलतफहमियों का धुंध छंट चुका था। केदारनाथ का वह घर अब सही मायनों में एक खुशहाल परिवार बन गया था, जहां हर किसी के दिल में एक-दूसरे के लिए सम्मान था। पल्लवी ने साबित कर दिया था कि सच्चाई और निस्वार्थ प्रेम की रोशनी कितनी भी मद्धम क्यों न हो, एक दिन वह गलतफहमियों के घने अंधेरे को चीर ही देती है। जिस तरह दुनिया ने भले ही भगवान को गलत समझा हो, लेकिन भगवान ने दुनिया पर अपनी कृपा करना नहीं छोड़ा, उसी तरह एक अच्छे इंसान की अच्छाई कभी परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती।
अगर आपकी नीयत साफ है, तो कोई आपको लाख बुरा कहे, उससे आपकी सच्चाई नहीं बदलती। बस धैर्य रखिए और अपना कर्म करते रहिए। सही समय आने पर वही लोग जो आपको खलनायक मानते थे, आपके सामने नतमस्तक होंगे।
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