सामान्य समझ – तरन्नुम तन्हा

नई नई शादी होकर घर में आई थी मैं। ‘एम ए बी एड है बहू मेरी’, मेरे ससुर साहब तो सबसे मेरी तारीफ़ करते, लेकिन घर में मेरी सासुमाँ हर समय बुराई ही करतीं, ‘इसे ये नहीं आता, इसे वो नहीं आता’। ससुर जी चुप रह जाते, और मैं खुद को समझाती, ‘अगली बार और … Read more

रेनकोट- विनय कुमार मिश्रा

“मम्मी! मेरा रेनकोट देखा है क्या आपने?” “पता नहीं बेटा.. वैसे भी तू तो कल रेनकोट में भी थोड़ा भीग गया था, वो फट गया है कहीं से” “हाँ माँ फट तो गया है पर फिर भी उससे बहुत सेफ रहता हूँ। अच्छा ये रोहन कहाँ है?” “अब समझी, वही शायद तेरा रेनकोट पहनकर तेरी … Read more

अभिनेत्री – नीरजा कृष्णा

अपनी वैनिटी वैन में मेकअप करवा रही सुनैना मंद मंद मुस्कुरा रही थी। वहीं शूटिंग कर रहे सुपरस्टार रवि भूषण  और वो दोनों आज डेट पर जा रहे थे। वो बहुत खुश थी…देश के सबसे बड़े सुपरस्टार का दिल उस पर आ गया था और वो उससे शादी करना चाह रहे थे। इसके लिए वो … Read more

भाभी का घर – नीरजा कृष्णा

भैया भाभी ने बहुत मेहनत और अरमानों सें छोटा सा बंगला बनवाया है… बाबूजी और अम्मा तो तरसते ही रह गए… बहुत इच्छा थी बेटे बहू के प्यारे से नीड़ को देखने की…वो चाह कर भी उनकी इच्छा पूरी नही कर पाए…उन दोनों की बीमारी… छोटी बहन के विवाह की जिम्मेदारी… अपने  दो बेटे और … Read more

दिल की व्यथा – डा. मधु आंधीवाल

कल तक खूब रंगो की बहार थी । आज फिर वही सन्नाटा । सब अपने फ्लैटों में बन्द । रेखा सोच रही थी । वह अपने गांव की होली का त्यौहार एक हफ्ता पहले और एक हफ्ता बाद तक बच्चों की तो लाटरी निकल आती थी पर इन बड़े शहरों में त्यौहार कम मनते हैं … Read more

माएके का ज़ख्म – अनुपमा

मां बार बार फोन कर रही थी इतने सालों से देखा नही तुझे मालती और बच्चों को , आ जा इस बार फिर पता नही मुलाकात हो या न हो । मालती हां मां आती हूं जल्दी ही ये कह कर फोन रख देती थी ।  ये सिलसिला पिछले दस सालों से चल रहा था … Read more

मैं हूँ न – प्रीति आनंद अस्थाना

***** “अरे तुमने रामेश्वर बाबू के बारे में सुना? बेचारे बहुत परेशान हैं आजकल!” रामेश्वर बाबू? ये नाम तो पुष्कर को  जाना-पहचाना लग रहा था। वही तो नहीं जिन्होंने आज से दस वर्ष पहले उसकी मदद की थी? पूरी कहानी तैर-सी गई आँखों के सामने! उसका इंटरव्यू था दिल्ली में, उसके लिए उसे कुछ सर्टिफिकेट्स … Read more

मन के भाव –  माता प्रसाद दुबे

विधा- संस्मरण – पांच वर्ष पहले की बात है। मैं अपने कार्य से हफ़्ते में दो बार लखनऊ से कानपुर तक सफर करता था। सुबह जाकर शाम को वापस लोकल ट्रेन से आता था।   एक दिन ट्रेन लेट थी। मैं लखनऊ के मानक नगर स्टेशन पर बेंच पर बैठा ट्रेन का इंतजार कर रहा … Read more

मायका -पिंकी नारंग

कब आ रही है हमारी बिटिया रानी? इस बार आओ तो कुछ ज्यादा दिन के लिए आना |यूँ पल मे आना पल मे जाना नही भाता हमें, सुषमा फ़ोन पर बेटी से दुलार करते हुए कह रही थी |      ठीक है माँ ज्यादा दिन की छुट्टी ले कर आउंगी वैसे कभी माँ का मन … Read more

बचपन की चोरी – अंजु पी केशव

 अब बचपन की चोरी को चोरी कहना भी कहाँ तक उचित है भई…. शरारत कहिए,, मुसीबत कहिए, गनीमत कहिए पर चोरी तो मत कहिए। अब कौन सा संविधान की मर्यादा भंग कर दी जो पेड़ से दो-एक अमरूद तोड़ लिए या पेड़ से गिरी हुई अमिया बटोर ली। रहे रास्त कभी किसी के बगीचे के … Read more

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