आत्मसम्मान”….. की मौत – विनोद सिन्हा “सुदामा”

जाने क्यूँ उसकी मौत पर मन उदास सा हो गया था मेरा दिल बड़ा भारी भारी सा लग रहा था.. …… जबकि मुझे ज्ञात था..जीवन और मृत्यु विधि का विधान है…शरीर नश्वर है और इसका एक न एक दिन नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाना शाश्वत है..क्योंकि प्रकृति सतत यौवन चाहती है. अपनी सभी अचेतन … Read more

राखी – सपना सी.पी. साहू

दो माह पूर्व ही अवनि ब्याहकर ससुराल आई थी। जाॅब में होने के कारण वह घर गृहस्थी के कार्यो में अधिक अभ्यस्त नहीं थी। इस कारण, सास कान्ता देवी और छोटी ननद महक को उसका मजाक बनाने का अक्सर मौका मिल जाया करता था। अवनि अपनी कमजोरियाँ जानती थी, इसलिए कुछ कह नहीं पाती थी … Read more

क्या सारी जिम्मेदारी आपकी है?  – गीता वाधवानी

सुंदर, सुशील, व्यवहार कुशल सांची का 3 वर्ष पहले अखिल से विवाह हुआ था। अखिल की माताजी मृदुला बहुत सरल और सहयोगी स्वभाव की महिला थी और अखिल के पिता चंद्रप्रकाश अक्खड़, स्वयं को सर्वोच्च और सर्वगुण संपन्न समझने वाले व्यक्ति थे।        सांची तब से देखती आ रही थी कि कैसे उसकी सासू मां सुबह … Read more

अपने पैसों का तोहफा – रश्मि प्रकाश

‘‘क्या इसी दिन के लिए तुम्हें इतना पढ़ाया लिखाया? अरे बेटा जी जिन्दगी में हर चीज हाथ में मिल जाए तो मेहनत के फल का मोल कैसे जानोगे।’’ बड़े प्यार से नेहा  को उसके पापा समझा रहे थे जो अपने पति से नाराज़ हो कर कुछ देर पहले मायके आ गई थी बात बहुत खास … Read more

औरत ही,औरत को नहीं समझ पाती – स्मिता सिंह चौहान

जब देखों दस बार फोन करती हो अपने मायके। बड़े बुजुर्ग कहते है कि जो लड़कियां ससुराल की छोटी छोटी बातें अपने मायके में कहती है उनका घर कभी सुखी नहीं रहता।” जानकी जी ने अपनी बहु बिंदिया को ताना मारते हुए कहा। “माँ के पास कोई नहीं है ना। इसलिए बीच बीच में पूछती … Read more

आत्मसम्मान, एक युद्ध औरत के लिए (भाग – 2 ) – स्मिता सिंह चौहान

सुबह दरवाजे को बन्द करने की जोर की आवाज से सिया की आंख खुली ।घड़ी में टाइम देखा तो वो आफिस के टाइम से काफी लेट हो चुकी थी।फोन पर कुछ मैसेज टाइप करके ,वो टेबल पर फोन रखती हैं ।तभी उसकी नजर एक फोटों पर पढती है, जहां नीरज और वो कितने खुश नजर … Read more

आत्मसम्मान, एक युद्ध औरत के लिए (भाग – 1 ) – स्मिता सिंह चौहान

आज फिर लेट हो गयी तुम। कहाँ थी? तुम्हारा ऑफिस अलग से चलता है क्या? और वो कौन था जो तुम्हें छोड़ने आया था वो भी घर के नीचे।” नीरज फिर से वही राग अलाप रहा था जो अक्सर सिया के लेट हो जाने पर अलापता था। “तुम कब आये? जल्दी आ गये आज शायद। … Read more

औरत हूं , मुश्किलों मैं जीना जानती हूं – अनुपमा 

आदरणीय मां , क्या कह रही हो आप मम्मी , निभाना पड़ेगा ? कर क्या रही थी मैं इतने सालों तक , समाज और बच्चों की खातिर ही तो निभाया सब । फिर भी आप मुझे ही बोल रहे हो । आप कभी नही समझ सकती हो मम्मी , आपने भी तो निभाया ही ,हर … Read more

सरमाया – अंजू निगम

“आई की नहीं अभी तक?” चाची भनभना गई। “अभी तो नहीं।”लेटे लेटे ही शंशाक ने जवाब दिया। ” चाय पत्ती लेने में इतना समय लगता है? एक काम बोलो तो वह भी ढंग से नहीं कर सकती। पता नहीं माँ ने क्या सीखाया है? इतने धीरे हाथ चलते है।” चाची का प्रवचन चालू था। ” … Read more

जब घायल हुआ आत्म सम्मान – सुषमा यादव

इनके नहीं रहने पर मैंने अपने नब्बे वर्षीय श्वसुर जी जिनको मैं, बाबू, बोलती थी,उनको अपने साथ अपने कार्यस्थल शहर ले चलने की तैयारी करने लगी, क्यों कि अब घर में कोई नहीं था, मैं अपने अस्सी वर्षीय पिता जी से मिलने अपने मायके गई,, वो भी अकेले ही थे,भाई भाभी शहर में थे, कुछ … Read more

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