मैं तुम्हें तुम्हारा हक लौटना चाहता हूँ – संगीता अग्रवाल 

“बिंदिया  तुम यहाँ ” अचानक दीपेश  की आवाज़ सुन बिंदिया  रुक गई. ” हम्म् मैं यहाँ एक पार्लर चलाती हूँ, पर तुम यहाँ कैसे? “ ” मैं ऑफिस के काम से आया था.. पर तुम्हें यहाँ आने की क्या जरूरत पड़ी और पार्लर का काम कब सीखा? “ “जरूरत सब सिखा देती है दीपेश  खैर … Read more

 माँ का फैसला कितना सही कितना गलत   –  पूजा अरोड़ा

जिस दिन ही रागिनी  और मनन  हनीमून से वापस आए उसी दिन सुनीता  ने बेटी रागिनी  और दमाद मनन   को अपने घर शाम को चाय पर बुला लिया| रागिनी  और मनन  बहुत खुश नजर आ रहे थे और आते  भी क्यों नहीं दोनों ने प्रेम विवाह किया था और एक दूसरे को अच्छी सी … Read more

 यह कैसा प्यार है – मनीषा भरतिया 

शादी को लेकर बचपन से ही रश्मि  के मन में कई भ्रांतियां थीं, क्योंकि बचपन से ही उसने अपने मम्मी-पापा के बीच झगड़ा ही देखा| वो जब भी एक दूसरे से बात करते, शुरुआत झगड़े से ही होती थी| छोटी-छोटी बातों पर चिल्लाना, एक दूसरे पर ताना कशी करना, अपने आप को ही सही समझना, … Read more

 शरम नहीं आती ससुराल मे ऐसे कपड़े पहनते हुए – सोनिया कुशवाहा 

सर पर पल्लू जमाए भारी भरकम साड़ी में पंडाल के एक कोने में बैठ मैं मलाई कोफ्ते से नान का लुत्फ उठा रही थी कि तभी सामने से देवरानी आती दिखाई दी, अरे भाभी यहाँ अकेले में क्यूँ बैठी हो चलो थोड़ा चाट खाकर आते हैं! मैंने सिर उठाकर उसको देख कर कहा ना बाबा … Read more

अधूरी – विनय कुमार मिश्रा

माँ को सब बाँझ कहते थे जबतक मैं नहीं हुई थी। मेरे होने के बाद उसे किन्नर की माँ। इससे अच्छा वो बाँझ ही रहती। माँ ने बारह साल मुझे सीने से लगाये रखा। एक माँ के लिए उसका बच्चा सिर्फ बच्चा होता है और कुछ नहीं। पापा हर वक़्त जलील होते जब जब मैं … Read more

सौतेली मां स्वार्थी निकली – सुल्ताना खातून

पंखुड़ी आईसीयू में कितने ही सुइयों के बीच जकड़ी हुई थी, आज बारहवाँ दिन था लेकिन उसके हालत में कोई सुधार नहीं हुआ था, स्क्रीन पर चलते टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं अब सीधी होने को थी, ऐसा लग रहा था पंखुड़ी जीने की कोशिश ही नहीं कर रही थी, वह बीमारी के पहले दिन से बेसुध पड़ी … Read more

“इंतहा स्वार्थ की” – कुमुद मोहन

“देखो बेटा। मैं अब अगले महीने रिटायर होने वाला हूँ। बहुत दिनों से अम्मा के मोतियाबिंद का आपरेशन टाल रहा था कि ऑफिस से छुट्टी पाऊंगा तो आराम से करा दूंगा। हमारा खर्च तो मेरी पेंशन में जैसे तैसे हो जाएगा। मैं ये चाहता हूँ कि तुम भी अब घर के खर्चे में थोड़ा भार … Read more

“जीवन संध्या के दिये” – कुमुद मोहन 

धन तेरस का दिन !शाम का धुंधलका छाने लगा था,कार्तिक मास की कुनकुनी सी ठंड देह को सिहरा रही थी !बीना जी खिडकी के पास बैठी आसमान पर चमकते तारों को देखती अपने ही खयालों में गुम थी कि “कहां हो? की आवाज देते मुकेश जी घर में घुसे! “अरे!अंधेरे में क्यूं बैठी हो ?लाइट … Read more

हम तो उनके बच्चे ही हैं – नीरजा कृष्णा

विमल जी का मन आज ऑफिस में लग ही नही रहा था…वो बार बार घड़ी देख रहे थे…उनके घर  में दीपावली पर घर के सभी सदस्यों के नए कपड़े बनते हैं…सभी लोग नए वस्त्रों को धारण करके ही पूजा पर बैठते हैं। अम्मा कई दिनों से हल्ला कर रही हैं। आज तो उन्होने अनशन तक … Read more

मैं बच्चे पैदा करने की मशीन नहीं बनूँगी – सुल्ताना खातून 

रात को एक बजे अपनी चार वर्षीय, बुखार से तपती बेटी को कंधे पर उठाए, वह तेज़ कदमों से चली जा रही थी, ऐसा लग रहा था मानो वह दौड़ रही हो, और कैसे ना दौड़ती माँ थी, उसके नाज़ुक कंधे अब मजबूत हो चुके थे…1 किलो मीटर पैदल चलना उसके लिए कुछ भी न … Read more

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