सिल्क की साड़ी – परमा दत्त झा

आज रामदयाल काफी दिनों के बाद खुलकर हंसा था।कारण बहू और पोती खुशी से भरी थी।

बाबा मामा की शादी होने वाली है -वह खुशी से चहक रही थी।

अच्छा कब?-यह भी प्रतिप्रश्न किया।

अगले महीने,हल्दी,मेंहदी और सारी चीजें इसी बनारस में होगी।

लड़की बनारस की है -बहू सारी बात खुशी से बता रही थी।

यह चटाई पर बैठा चाय पीता हुआ बात कर रहा था। अनायास ही सिल्क साड़ी की बात कही।”बाबूजी दुल्हन को सिल्क साड़ी आप खरीदकर देंगे।”

जरूर बहू ,आप तैयारी करनी शुरू कर दो।-यह बोला और लेट गया।यह लेटते ही खो गया अतीत की याद में।

आज से दस साल पहले शादी में बनारस से सिवान ये लोग गये थे , पांडेय कालोनी में अपना मकान था और इसके तीनों बेटे, बहुएं,सात पोते पोतियां पत्नी सहित पूरे पच्चीस लोग बुलेरो कार से गये थे।तीन बुलेरो में सभी सवार थे। अचानक की पानी और बिजली गिरी। फिर तो आठ गैस सिलेंडर तीनों गाड़ी में रखा था और फटा,पलभर में सब राख।इसकी पूरी कहानी (परिवार)खत्म।बस यही बहू माला और उसकी पांच साल की बेटी टुन्नी बची।ये लोग पहले गांव पहुंचे थे वहीं यह साड़ी लेकर एक दिन बाद जानेवाला था।

हे दीनानाथ यह क्या?तुरंत यह भागा गया और तुरंत में सारे काम सल्टाया। खुशी मातम में बदल गया।उस दिन से पलंग पर सोना ,मीट मछली खाना सब बंद।

अब यह क्या करें? संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में नौकरी करता था।पांच साल नौकरी बची थी मगर इस घटना ने हिम्मत तोड़ दिया।

आज यह आराम से काम करता था वहीं सिल्क साड़ी का कारोबार भी करने लगा।बहूं और पोती में दुनिया सिमट गयी।धीरे धीरे सब सामान्य हो गया और यह आराम से काम करने लगा।

आज दस साल बाद फिर यह शादी।घटना की पुनरावृत्ति न हो -हे भगवान,सब संभालना।उधर समधि जी भी चहकते हुए फोन किए -सिल्क की पूरे बीस साड़ियां चाहिए,अलग अलग विधियों के लिए अलग-अलग।

अब यह आराम से साड़ियों की जुगाड में लगा।दो शादियां हैं,कम से कम चालीस सिल्क साड़ी लगेगी। इसमें कम से कम बीस हजार का फायदा होगा।ऊपर से एहसान भी। अतः यह आराम से सब काम करने लगा।

बहूं एक सबसे सुंदर सिल्क साड़ी तुम्हारे लिए छांटी है।शादी के दिन पहनना।-यह एक चार हजार की साड़ी देते बोला।

वह खुशी से झूम उठी।पोती भी खुशी से भरी थी। दूसरी ओर यह समधि को एडवांस करने के लिए बोल दिया।

इस प्रकार टूटा घर को जोड़ने में “सिल्क साड़ी”का योगदान सबसे ज्यादा है।तभी तो लोग इससे ही साड़ी लेते हैं वहीं यह इसी धंधे से आराम से जी रहा है।

#सिल्क की साड़ी 

#रचना मौलिक और स्वरचित है इसे मात्र यही प्रेषित कर रहा हूं।

#रचनाकार-परमा दत्त झा, भोपाल।

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