कलंकिनी या जीवन दायिनी – शिव कुमारी शुक्ला

दीप्ति सात साल की मासूम बच्ची हतप्रभ खडी थी।उसे समझ में नहीं आ रहा था कि एकाएक उसके घर में लोगों का आना-जाना क्यों शुरू हो गया। मम्मी पापा अभी कुछ समय पहले ही घर से गये थे कुछ काम करने के लिए उसे मैड के पास छोड़ कर। फिर ये पड़ोसी अंकल घबराए से क्यों आए हैं।

मैड से क्या कह कर गए कि वह भी एकदम चुप है। कुछ ही समय बाद एम्बुलेंस की शांत वातावरण को चीरती तेज आवाज आई और उसके घर के सामने आकर रुकी और उसमें से उसके मम्मी पापा के मृत शरीर उतार कर फ्लैट की लॉवी में रख दिए।वह घबराकर रोने लगी।मैड से पूछने लगी आंटी मेरे मम्मी-पापा को क्या हो गया।वह रोने लगी और उसे अपनी गोद में भींच लिया।

उनकी कार को पिछे से तेज गति से आते ट्रक ने जोरदार टक्कर मारी थी थी जिससे घटना स्थल पर ही उनकी मृत्यु हो गई।पडौसी अंकल ही सब सम्हाल रहे थे।उसे भी वे अपने घर ले गए। दूसरे दिन चाचा चाची, नाना-नानी मौसी-मौसा,बुआ-फूफा एवं अन्य रिश्तेदार भी आ गये और उनका अंतिम संस्कार भी हो गया। बारहवें तक सब रुके और सारा क्रिया कर्म पूरा हो गया इस बीच दीप्ति सदमे से उबर नहीं पा रही थी।

वह बार-बार चाची से लिपट जाती और पूछती चाची मेरे मम्मी-पापा को क्या हो गया वे कहां चले गए। सबकुछ इतना अप्रत्याशित अचानक हुआ था कि मासूम बच्ची सदमे में चली गई।वह गुमसुम हो गई।न खाती न रोती न बोलती बस टुकुर-टुकुर सबको देखती रहती।

सभी रिश्तेदार धीरे -धीरे चले गए।रह गये मौसी मौसा, नाना-नानी,बुआ -फूफा।अब समस्या थी कि दीप्ति को कौन ले जाए। तभी चाचा-चाची ने आगे बढ़कर उसे अपने साथ रखने की इच्छा व्यक्त की।उनका कहना था कि वह उनसे ज्यादा हिली मिली है, बच्चों के साथ भी रही है।वह उनके बड़े भाई की आखिरी निशानी है अतः इसे हम ही रखेंगे।

उसे ले जाने के लिए उनकी दूरगामी सोच थी उसकी पढ़ाई छुड़ाकर घर के कामों में मदद मिलेगी और संपत्ति पर कब्जा करने में भी आसानी हो जायेगी। अतः सबको दिखाते हुए बड़े ही लाड़-प्यार से उसे ले गए।

अब वहां पहुंचते ही शुरू हुई उसकी अग्नि परीक्षा।घर पहुंचते दो-चार दिन तो उसे सामान्य रखा फिर धीरे -धीरे चाची ने उससे काम करवाना शुरू किया। उसे डांटती, बात बात पर थप्पड़ मारना तो आम बात थी।अब उसे नए नाम से नवाजा जाने लगा -कुल कलंकिनी।

चाची बात बात पर उसे कहतीं कलंकिनी,अभागिन, अपने मां बाप को तो का गई अब क्या हमें भी खाएगी। कुल का सत्यानाश करेगी,कुल को कलंकित करेगी। वह मासूम इन सब बातों का मतलब भी नहीं समझती।वह चाची का मुंह देखती क्या कह रहीं हैं  चाची। पहले तो उसे प्यार करतीं थीं अब क्यों हर समय मारतीं डांटती हैं । अपने चचेरे 

भाई -बहन को स्कूल जाते देख वह भी जिद करती स्कूल जाने के लिए।

तुझे स्कूल भेजेंगे तो घर का काम कौन करेगा चाची उसे घुड़कतीं।

उसकी जिद पर चाचा ने उसे एक सरकारी स्कूल में भर्ती करवा दिया जहां चाची उसे आधे दिन भी नहीं जाने देती किसी न किसी बहाने से रोक लेतीं। जब वह घर पर पढ़ना चहती तब भी काम के बहाने उठा देतीं। चाची काम करवाने के बाद भी उसे खाना नहीं देतीं। खाना मांगने पर झिडकतीं,मरतीं।उसे अपने मम्मी पापा की बहुत याद आती। अक्सर गुमसुम बैठकर सोचती मम्मी-पापा आप कहां चले गए। पापा आपकी परी बहुत दुखी हैं।वह उनकी तस्वीर देखकर रोती और पूछती क्या मैंने आपको मारा है । ये कुल कलंकिनी क्या होता है। पापा मैंने क्या किया है। मम्मी, चाची मुझे ऐसा क्यों बोलतीं हैं। कभी कभी तो रोते-रोते फर्श पर ऐसे ही भूखी सो जाती। 

चाची अपने बच्चों को अच्छी -अच्छी चीजें खिलातीं तो वह भी हसरत भरी निगाहों से देखती और कभी मांगती मुझे भी दो न चाची।

चल कुलनाशनी ,डायन मां -बाप को खाकर पेट नहीं भरा जो तुझे खाने को चाहिए। 

जिस बच्ची को मम्मी -पापा ने कभी फूल से भी न छुआ हो,जिसकी एक आवाज पर मनचाही वस्तु उसके हाथ में होती थी वही आज भूखी रहती,पिटती, उसकी किस्मत का सितारा अस्त हो चुका था।

ऐसे ही दो साल बीत गए। तभी एक दिन उनके घर चाची की सहेली नंदनी उनसे मिलने आई।वे तीन-चार दिन रुकीं।बच्ची का दुख उनसे देखा नहीं गया। उन्होंने चाची को समझाया बच्ची का इस सब में क्या दोष है। उसके साथ इतना कठोर व्यवहार मत करो उसके पढ़ने लिखने के दिन हैं उसे पढ़ाओ।

चाची बोलीं यह कलंकिनी तो बोझ है हमारे ऊपर।लोकलाज से ले तो आए पर क्या इसे बैठाकर खिलाऊंगी काम तो करना ही पड़ेगा, और पढ़कर क्या करेगी इसे तो घर का काम ही करना है। कोई इसका दूसरा ठिकाना भी नहीं है जहां इसे भेज दूं यह तो हमारी ही छाती पर मूंग दलेगी।

कुछ सोच कर नंदनी बोली यदि तुम इससे इतनी ही परेशान हो तो इसे मुझे दे दो। मेरे बच्चे नहीं हैं इसे ही अपनी बच्ची समझ पाल लूंगी।

चाचा-चाची आपस में बात कर उसे भेजने को सहमत हो  गए किन्तु वे उसके नाम संपत्ति को नहीं देना चाहते थे सो उनके सामने शर्त रखी कि इस कलंकिनी कोआप ले जाएं किन्तु इसके बालिग होने पर इसके नाम की संपत्ति हमारे नाम करनी होगी। उनके  मन में लालच संपत्ति को लेकर था सोचा ऐसा हो जाए तो आफत भी टले और पैसा भी मिल जाए। वह सहर्ष इस बात के लिए तैयार हो गई। मुझे कुछ नहीं चाहिए भगवान का दिया सबकुछ है केवल औलाद के लिए ही तरस रहे हैं वह मिल जाएगी मैं सन्तुष्ट हूं।

दो दिन बाद नंदनी उसे लेकर घर आ गई। उसके पति ने भी उसके फैसले का दिल खोलकर स्वागत किया और उसे अपनी बेटी मान लिया।वह मासूम नहीं जानती थी कि उसके भाग्य का सितारा एक बार फिर चमकने वाला है अब वह डायन,अभागन,कुल कलंकिनी न होकर वापस दीप्ति कहलाने वाली है। इतने दिनों में वह अपना नाम भी भूल गई थी।नए माहौल में सहमी रहती सोचती अब गाली मिलेगी,मार पड़ेगी किन्तु यह क्या। यहां तो उसे फिर उसी तरह रखा जाने लगा जैसे मम्मी रखतीं थीं। उसके लिए अच्छा खाना बनता,नये कपड़े आए अच्छे स्कूल में प्रवेश कराया और उसकी जिंदगी की बगीया एक बार फिर महक उठी।

वह सोचती यह सब दिखावा है।थोड़े दिन बाद चाचा-चाची की तरह ये लोग भी उसे मारेंगे, काम करवायेंगे पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने एक दिन प्यार से गोद में बैठा कर समझाया कि अब वे ही उसके 

मम्मी -पापा हैं सो वह उन्हें मम्मी पापा ही कहा करे। धीरे धीरे उसके मन-मस्तिष्क से भय कम होने लगा और वह सहज होने लगी।

भाग्य ने पलटा खाया।वह कुशाग्रबुद्धि थी एक सफल कैंसर स्पेशलिस्ट बन गई और टाटा मेमोरियल में काम करने लगी। एक दिन वार्ड का राऊण्ड लेते वक्त बैड नम्बर सात पर लेटी पेशेन्ट पर उसकी नज़र ठहर गई गौर से देखने पर वह उसे अपनी चाची लगी तभी चाचा भी अंदर आए काफी दुखी और चिन्तित लग रहे थे।वह उसे नहीं पहचान पाए क्योंकि उसे घर से निकालने के बाद कभी उससे मिले ही नहीं हां सिर्फ उसकी संपत्ति जरुर अपने नाम करा ली थी। थोड़ी देर तो वह असमंजस में रही क्या करूं। फिर वह चाचा से बोली चाचा आपने पहचाना नहीं मैं दीप्ति हूं वही कुल कलंकिनी।

चाचा फटी आंखों से उसे पहचानने की कोशिश करते रहे फिर आंखें नीची कर लीं बेटा कैसे पहचानूं कभी तुमसे दोबारा मिलने की, देखने की कोशिश ही नहीं की।

चाचा कब से चाची की यह हालत है। नेहा और दीपेश कहां हैं। बेटा नेहा का मन पढ़ाई में नहीं लगा तो उसकी शादी कर दी वह अपने घर है और दीपेश गलत संगत में पड़ गया तो ग़लत काम करने लगा अभी जेल में सजा काट रहा है।जो हमने तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार किया था हमारे कर्मों की सजा हमें मिल रही है। जिसे तुम्हारी चाची ने कुल कलंकिनी बनाया था वहीं कुल का नाम रोशन कर रही है। इतना कहकर वह फफक फफक कर रो पड़े। हमें माफ कर देना बेटा हमने बहुत अमानवीय व्यवहार तुम्हारे साथ किया था। तभी चाची ने आंखें खोलीं वे भी उसे पहचान नहीं पाईं। तभी चाचा बोले पहचाना जिसे तुमने कुलकंलकनी,कुल नाशिनी, डायन जैसे नामों से नवाजा था वही कुल को रोशन कर रही है डाक्टर बनकर हमारी दीप्ति।

बरबस चाची की आंखें बरस पड़ीं और हाथ जोड़कर माफी मांगने लगीं। मैं आज तुम्हारे साथ किए अन्याय के दुष्कर्मों का फल ही भोग रही हूं बेटा हो सके तो माफ़ कर देना।

नहीं चाची आप बड़ी हैं हाथ न जोड़ें आशीर्वाद दें। मैं यहीं हूं सब सम्हाल लूंगी चिन्ता न करें।आप ठीक हो जांएगी।

उसने फ़ौरन उनको प्राइवेट रुम में शिफ्ट करवया,सारी रिपोर्ट्स देखीं और अपने हिसाब से इलाज शुरू किया।

आज एक कुल कलंकिनी, देवदूत बनकर जीवन दायिनी के रूप में चाचा -चाची के समक्ष खड़ी थी।

शिव कुमारी शुक्ला 

जोधपुर राजस्थान 

स्व रचित, मौलिक एवं अप्रकाशित 

    बिषय***   कुल कलंकिनी

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