बरगद की ठंडी छाँव

मेघा की आँखों से झर-झर आँसू बह निकले। उसने बाबूजी के झुर्रियों भरे हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और सिसकते हुए बोली, “मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी! मैं अंधी हो गई थी। अपनी गृहस्थी और नौकरी के घमंड में मुझे कभी आपकी कीमत समझ ही नहीं आई। आप इस घर के वो बरगद हैं जिसकी ठंडी छाँव में हम सब सुरक्षित थे, और मैं नादान उसी बरगद की जड़ों को अपनी कड़वी बातों से काट रही थी। उस रात मेरी वजह से आपकी जान पर बन आई… मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी, वरना मुझे कभी चैन नहीं मिलेगा। यह देखिए, मैं आपके लिए अदरक वाली चाय और खाखरा लाई हूँ, जैसे अम्मा देती थीं। आज से आपको कभी खाली पेट चाय नहीं पीनी पड़ेगी।”

“बहू! अरी ओ मेघा बहू! ज़रा एक प्याली अदरक वाली चाय मिल जाती तो मैं मंदिर होकर पार्क की तरफ निकल जाता। सुबह की हवा से घुटनों का दर्द थोड़ा कम रहता है।”

इंदौर की उस शांत सुबह में जब घड़ी की सुइयाँ साढ़े पाँच बजा रही थीं, ससुर जी श्रीकांत जी की यह आवाज़ मेघा के कानों में किसी हथौड़े की चोट जैसी लगी। मेघा ने खीझकर अपने चेहरे पर तकिया रख लिया और अपने पति कुणाल के कंधे को ज़ोर से हिलाया।

“कुणाल! सुनो न, अपने बाबूजी को समझाते क्यों नहीं? एक तो रात भर ऑफिस की फाइलों का बोझ, ऊपर से घर का सारा काम… इंसान सुबह के दो घंटे चैन से सो भी नहीं सकता। बूढ़े हो गए हैं तो क्या पूरी दुनिया की नींद हराम कर देंगे? सुबह होते ही इन्हें चाय की तलब लग जाती है।” मेघा ने दांत पीसते हुए कहा।

कुणाल ने अधखुली आँखों से घड़ी देखी और फिर कंबल सिर तक तानते हुए बोला, “यार मेघा, क्यों सुबह-सुबह मूड खराब करती हो? उठकर बना दो न एक कप चाय। माँ के जाने के बाद से बाबूजी वैसे भी कितने अकेले हो गए हैं। अब मैं तो उठकर बनाने से रहा, तुम ही देख लो, मुझे अभी एक घंटा और सोना है।” इतना कहकर कुणाल ने करवट बदली और खर्राटे भरने लगा।

मेघा को अपने पति की इस बेरुखी पर और भी गुस्सा आया। यही तो कुणाल की आदत थी—बाबूजी की सेवा और सम्मान के सारे उपदेश मेघा के हिस्से आते थे, और जब खुद हाथ बंटाने की बारी आती तो वह कंबल ओढ़कर सो जाता था। मेघा पैर पटकती हुई बिस्तर से उठी, बाल समेटते हुए रसोई में गई और पतीली को ज़ोर से गैस के चूल्हे पर पटका। बर्तनों की खड़खड़ाहट इस बात का सीधा ऐलान थी कि बहू को सुबह-सुबह उठना बिल्कुल रास नहीं आया है।

बाहर बरामदे में बेंत की कुर्सी पर बैठे सत्तर वर्षीय श्रीकांत जी ने रसोई से आती बर्तनों की आवाज़ सुनी तो एक गहरी ठंडी सांस भरकर रह गए। उन्होंने अपनी कलाई घड़ी देखी और फिर दीवार पर टंगी अपनी स्वर्गीय पत्नी शारदा की तस्वीर की ओर देखा। तस्वीर पर चढ़ी सूखे फूलों की माला जैसे उनके अपने सूनेपन की गवाही दे रही थी।

श्रीकांत जी की आँखों के कोने नम हो गए। उन्हें वो दिन याद आ गए जब शारदा ज़िंदा थीं। सुबह पाँच बजते ही शारदा खुद उठ जातीं, नहा-धोकर तुलसी में जल चढ़ातीं और फिर श्रीकांत जी के सिरहाने आकर धीरे से उनके बालों में हाथ फेरतीं। उनके हाथ में भाप उठती हुई इलायची और अदरक वाली चाय की प्याली होती थी, और साथ में एक कटोरी में दो मठरी या गाय के घी में सिका हुआ खाखरा। शारदा हमेशा कहती थीं, “देखो जी, खाली पेट चाय कभी मत पीना। उम्र बढ़ रही है, तेज़ाब बनेगा तो पूरे दिन सीने में जलन रहेगी।” तब श्रीकांत जी हँसकर कह देते, “तुम जब तक साथ हो शारदा, मुझे कोई बीमारी छू भी नहीं सकती।”

लेकिन तीन साल पहले शारदा उन्हें इस भरी दुनिया में अकेला छोड़कर चली गईं। आज हालत यह थी कि मठरी या बिस्किट तो दूर की बात, यह फीकी, बेमन से बनाई गई खाली चाय भी उन्हें किसी एहसान की तरह मिलती थी।

मेघा ने आकर सेंटर टेबल पर चाय का कप ज़ोर से रखा। कप से थोड़ी सी चाय छलककर तश्तरी में गिर गई। मेघा ने एक शब्द भी नहीं कहा और मुँह फुलाए वापस अपने कमरे में चली गई। श्रीकांत जी ने चुपचाप वह चाय उठाई, फूँक मारकर पी और अपनी छड़ी उठाकर घर से बाहर निकल गए। चलते-चलते उनके सीने में एक अजीब सी कसक उठ रही थी। उन्हें लग रहा था जैसे वह इस घर के मालिक नहीं, बल्कि एक ऐसे बिन बुलाए मेहमान हैं जिसके जाने का इंतज़ार हर कोई कर रहा है।

करीब सात बजे जब श्रीकांत जी वापस लौटे, तो उनके एक हाथ में दूध के पैकेट और ताज़ा धनिया-मिर्च की थैली थी, और दूसरे हाथ में उनके पोते चिंटू की मनपसंद जलेबियाँ। आते ही उन्होंने रसोई के दरवाज़े पर खड़े होकर धीमे स्वर में कहा, “बहू, ये दूध और धनिया ले आया हूँ। सब्ज़ी वाले के पास आज ताज़ी लौकी भी थी, वो भी ले ली है।”

मेघा उस वक्त चिंटू का टिफिन पैक कर रही थी और दूसरी तरफ प्रेशर कुकर की सीटी बज रही थी। उसने पसीना पोंछते हुए रूखेपन से कहा, “हाँ तो वहीं स्लैब पर रख दीजिए न। और देखिए बाबूजी, घड़ी में सवा सात बज गए हैं। चिंटू अभी तक नहाकर तैयार नहीं हुआ है। ज़रा उसे तैयार कर दीजिए और साढ़े सात बजे चौराहे पर जाकर स्कूल वैन में बैठा आइएगा। मुझे भी नौ बजे तक स्कूल पहुँचना होता है, मेरे पास दस हाथ नहीं हैं।”

श्रीकांत जी के घुटनों में आज सुबह से ही मीठा-मीठा दर्द हो रहा था, लेकिन उन्होंने उफ तक नहीं की। चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान लाकर बोले, “तुम चिंता मत करो बहू, मैं अभी अपने लाडले को तैयार करके वैन में बैठा आता हूँ।”

वह तुरंत चिंटू के कमरे में गए, उसे प्यार से दुलार कर कपड़े पहनाए, उसके जूते के फीते बांधे, उसका भारी बस्ता अपने झुके हुए कंधों पर टांगा और उसकी उंगली पकड़कर चौराहे की ओर चल दिए।

इधर कुणाल नहा-धोकर डाइनिंग टेबल पर आ बैठा। मेघा ने उसके सामने गरमा-गरम पराठे और दही परोसा। कुणाल ने पहला निवाला तोड़ते हुए कहा, “वैसे मेघा, मानना पड़ेगा, बाबूजी के होने से हमें कितनी सहूलियत रहती है न? सुबह का दूध-सब्ज़ी लाना, चिंटू को वैन तक छोड़ना और दोपहर को वापस लाना, बिजली-पानी के बिल जमा करना, घर के छोटे-मोटे रिपेयर के काम करवाना… सब वही संभाल लेते हैं। वरना हम दोनों की नौकरी के चक्कर में तो घर का कबाड़ा ही हो जाता।”

यह सुनते ही मेघा के तन-बदन में आग लग गई। वह हाथ में बेलन लिए रसोई से बाहर आई और तमक कर बोली, “हाँ-हाँ, क्यों नहीं! तुम्हारे बाबूजी ही तो इस घर को चला रहे हैं, मैं तो जैसे यहाँ पलंग तोड़ती हूँ! अरे, ज़रा सा धनिया-दूध क्या ले आए और बच्चे को चार कदम दूर वैन में क्या छोड़ आए, तुम तो ऐसे गिनवा रहे हो जैसे उन्होंने कोई पहाड़ उठा लिया हो! ये नहीं दिखता कि उनके पीछे मुझे कितनी खटनी करनी पड़ती है? बुढ़ापे में भी चार वक्त गरम और ताज़ा खाना चाहिए। परहेज़ का अलग बनाओ, बिना मिर्च का अलग निकालो, दिन में चार बार चाय दो, उनके कपड़े धोओ, कमरा साफ़ करो! खुद कभी रसोई में आकर एक गिलास पानी भी गर्म करना पड़े न कुणाल, तो तुम्हारी अक्ल ठिकाने आ जाए। बस ज़ुबान चलाना आता है तुम्हें!”

कुणाल ने देखा कि माहौल बिगड़ रहा है, तो उसने बात को टालने के अंदाज़ में कहा, “अरे बाबा, मैं तो बस ऐसे ही कह रहा था। और वैसे भी बाबूजी कौन सा हम पर बोझ हैं? हर महीने अपनी पेंशन से घर के राशन के पैसे तुम्हारे हाथ पर रखते तो हैं। अब तुम जैसी सुघड़ और मेहनती पत्नी पाकर अगर मैं थोड़ा आराम कर लेता हूँ तो इसमें बुरा क्या है?” कुणाल ने हँसते हुए मेघा के गाल पर चुटकी काटी, अपना लैपटॉप बैग उठाया और ऑफिस के लिए निकल गया।

मेघा वहीं खड़ी कुढ़ती रही। कुछ ही देर में श्रीकांत जी चिंटू को वैन में बैठाकर लौटे। धूप थोड़ी तेज़ हो गई थी और चलने की वजह से उनकी सांस फूल रही थी। उन्होंने तौलिए से माथे का पसीना पोंछा और डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठते हुए बोले, “बहू, अब ज़रा मुझे भी नाश्ता दे दो। सुबह की चाय के बाद से कुछ खाया नहीं है, अब तो पेट में चूहे कूद रहे हैं और शुगर की दवाई भी लेनी है।”

मेघा अपने पर्स में अपनी गाड़ी की चाबियाँ और कॉपियाँ ठूंस रही थी। उसने बिना श्रीकांत जी की तरफ देखे बेहद रूखे स्वर में कहा, “वहाँ किचन में गैस पर कैसरोल रखा है, उसमें दो परांठे पड़े हैं और फ्रिज में दही है। खुद निकालकर खा लीजिए। मेरी स्कूल की बस छूट जाएगी तो प्रिंसिपल मैडम की बातें सुननी पड़ेंगी, आप लोगों को तो किसी के समय की कोई कद्र है नहीं।”

इतना कहकर मेघा तेजी से अपनी स्कूटी की चाबी उठाकर मुख्य दरवाज़े की तरफ बढ़ी। तभी श्रीकांत जी को कुछ ध्यान आया और उन्होंने पीछे से आवाज़ लगाई, “अरी बहू, सुन तो! ज़रा अपने कमरे की बालकनी का दरवाज़ा बंद कर दिया है न? और आज का टिफिन तो रख लिया न तूने?”

मेघा के कदम वहीं थम गए। उसने पलटकर ऐसी खा जाने वाली नज़रों से श्रीकांत जी को देखा कि बुज़ुर्ग के होंठों के शब्द वहीं सूख गए।

“बाबूजी! आपको हज़ार बार समझाया है कि जब कोई घर से बाहर काम पर जा रहा हो तो पीछे से टोका मत कीजिए! अपशकुन होता है, पूरा दिन खराब जाता है! पर पता नहीं आपकी इस पुरानी खोपड़ी में मेरी कोई बात क्यों नहीं घुसती! जीना मुहाल कर रखा है इस घर में!” मेघा ने लगभग चिल्लाते हुए कहा।

फिर भी वह बड़बड़ाती हुई अपने कमरे की बालकनी चेक करने गई। जैसे ही उसने बालकनी में कदम रखा, उसकी नज़र गैस चूल्हे की तरफ गई जो रसोई की खिड़की से साफ दिख रहा था। मेघा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जल्दीबाज़ी में वह दूध का भगोना धीमी आंच पर रखकर भूल गई थी और साथ ही बालकनी में सूख रहे उसके रेशमी कपड़े तेज़ हवा से उड़कर नीचे कीचड़ में गिरने ही वाले थे। उसने दौड़कर गैस बंद की और कपड़े समेटे। एक पल के लिए उसके मन में आया कि अगर बाबूजी ने पीछे से टोका न होता और वह लौटकर अंदर न आती, तो आज दूध जलने के साथ-साथ रसोई में कोई बड़ा हादसा भी हो सकता था।

मन के किसी कोने में उसने बाबूजी का शुक्र अदा किया, लेकिन उसके अहंकार और रोज़मर्रा की थकान से उपजे चिड़चिड़ेपन ने उस एहसास को तुरंत दबा दिया। मेघा स्वभाव से कोई कुलटा या बुरी औरत नहीं थी, बस दफ्तर और घर की दोहरी चक्की में पिसते-पिसते वह भीतर से इतनी थक चुकी थी कि उसे अपना गुस्सा निकालने के लिए घर का सबसे कमज़ोर और शांत कोना—यानी बाबूजी—ही नज़र आता था। कुणाल तो उसकी सुनता नहीं था, इसलिए सारी भड़ास उस बेबस बुज़ुर्ग पर निकल जाती थी।

दिन ऐसे ही बीत रहे थे। श्रीकांत जी की चुप्पी गहरी होती जा रही थी और मेघा की व्यस्तता भी।

फिर आया रविवार का वह दिन, जब मेघा और कुणाल की शादी की दसवीं सालगिरह थी। सुबह से ही घर में जश्न का माहौल था। मेघा ने अपने स्कूल की सहेलियों और कुणाल ने अपने ऑफिस के दोस्तों को शाम की पार्टी के लिए बुलाया था। पूरे घर को रंग-बिरंगी लाइटों और गुब्बारों से सजाया गया था। शाम होते ही मेहमान आने शुरू हो गए। बाहर के बड़े रेस्तरां से नूडल्स, मंचूरियन, पिज़्ज़ा, कोल्ड ड्रिंक्स और तरह-तरह के मसालेदार स्नैक्स मँगवाए गए थे।

घर के ड्राइंग रूम में तेज़ संगीत बज रहा था, हँसी-ठहाके गूंज रहे थे। श्रीकांत जी ने भी अपने सबसे अच्छे धुले हुए कुर्ते-पायजामे पहने थे और एक कोने में सोफे पर बैठकर अपने बेटे-बहू की खुशियाँ देख रहे थे। जब खाने की बारी आई, तो मेघा ने मेहमानों को परोसना शुरू किया। श्रीकांत जी को डॉक्टर ने मैदा, तला-भुना और ज़्यादा मिर्च-मसाला खाने से सख्त मना किया था। उन्हें उम्मीद थी कि बहू ने उनके लिए रसोई में दो सादी रोटियाँ या कम से कम थोड़ा सा दलिया ज़रूर बना दिया होगा।

रात के नौ बज गए, फिर दस बज गए। मेहमान खा-पीकर जाने लगे। श्रीकांत जी को तेज़ भूख लग रही थी। उन्होंने हिम्मत करके रसोई में झाँका, जहाँ मेघा जूठे बर्तन सिंक में डाल रही थी।

“बहू…” श्रीकांत जी ने बहुत धीमे से कहा, “मेरे लिए कुछ सादा खाना बना है क्या? मुझे रात की इंसुलिन और बीपी की गोली लेनी है।”

मेघा जो पहले ही पार्टी की थकान से चूर थी, यह सुनकर भड़क उठी। उसने हाथ का स्पंज सिंक में पटकते हुए दबी लेकिन बेहद तीखी आवाज़ में कहा, “बाबूजी, आप में थोड़ी भी समझ है या नहीं? सुबह से मैं यहाँ मशीन की तरह खट रही हूँ! बीस लोगों की पार्टी निपटाई है मैंने, कमर टूट गई है मेरी! और आपको अभी भी अपनी गरम रोटी और दलिया की पड़ी है? बाहर टेबल पर इतना सारा चाइनीज़ और पिज़्ज़ा बचा रखा है, उसमें से थोड़ा बहुत खा लीजिए, आज एक दिन परहेज़ नहीं करेंगे तो कुछ बिगड़ नहीं जाएगा! अब मुझसे दुबारा चूल्हा नहीं जलेगा!”

श्रीकांत जी का चेहरा अपमान और दुख से सफ़ेद पड़ गया। वह बिना एक शब्द बोले उल्टे पाँव लौट आए। उन्होंने डाइनिंग टेबल पर रखे नूडल्स के डिब्बे से दो कांटे नूडल्स अपने मुँह में डाले, लेकिन उसमें इतना सिरका और मिर्च थी कि उन्हें तुरंत खांसी आने लगी। उन्होंने पानी पीकर किसी तरह गला तर किया और अपने कमरे में चले गए।

बिस्तर पर लेटते हुए उन्होंने खुद को तसल्ली दी, “कोई बात नहीं श्रीकांत, एक रात भूखा रह लेगा तो कौन सा प्राण निकल जाएंगे? शारदा भी तो हर एकादशी और तीज पर निर्जला उपवास रखती थी। समझ ले आज तेरा भी उपवास है।”

लेकिन उन्हें यह ध्यान ही नहीं रहा कि उनकी उम्र और बीमारी उन्हें खाली पेट भारी दवाइयाँ लेने की इजाज़त नहीं देती। उन्होंने अपनी आदत के मुताबिक घड़ी देखी और खाली पेट ही हाई डोज़ की शुगर और ब्लड प्रेशर की गोलियाँ निगल लीं और बत्ती बुझाकर लेट गए।

उधर कुणाल और मेघा पार्टी के बाद की थकान से बिस्तर पर गिरते ही गहरी नींद में सो गए। चिंटू भी अपने कमरे में सो रहा था।

रात के करीब दो बजे का वक्त था। पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। अचानक श्रीकांत जी की नींद खुली। उन्हें ऐसा लगा जैसे उनका पूरा शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ रहा है और पसीने से उनका कुर्ता भीग चुका है। खाली पेट शुगर की दवाई लेने की वजह से उनका ब्लड शुगर लेवल खतरनाक रूप से नीचे गिर गया था (हाइपोग्लाइसीमिया) और साथ ही खाली पेट में तेज़ गैस बनने से उनके सीने में भयंकर दबाव महसूस हो रहा था।

उन्होंने उठने की कोशिश की, लेकिन उनके हाथ-पैर कांप रहे थे। सिर में इतना तेज़ चक्कर आया कि वह बिस्तर से नीचे फर्श पर गिर पड़े। पास की तिपाई पर रखा पानी का तांबे का लोटा और गिलास ज़ोर की आवाज़ के साथ फर्श पर लुढ़क गए।

“कु… कुणाल… ब… बहू…” श्रीकांत जी ने पूरी ताकत लगाकर पुकारना चाहा, लेकिन उनके गले से सिर्फ एक दबी हुई कराह ही निकल सकी। वह अपने सीने को पकड़कर ठंडे फर्श पर तड़पने लगे। उनकी आँखें छत को घूर रही थीं और सांसें उखड़ने लगी थीं।

बर्तन गिरने की आवाज़ और किसी के कराहने की धीमी आहट सुनकर अचानक मेघा की नींद टूटी। पहले तो उसे लगा कि कोई बिल्ली होगी, लेकिन जब उसने दोबारा कराहने की आवाज़ सुनी तो उसका दिल धक्क से रह गया। वह बदहवास सी उठी और कुणाल को झकझोरते हुए बाबूजी के कमरे की तरफ भागी।

कमरे की लाइट जलाते ही जो मंज़र सामने था, उसे देखकर मेघा की चीख निकल गई। श्रीकांत जी फर्श पर बेसुध पड़े थे, उनके होंठ नीले पड़ रहे थे और शरीर पसीने से तर-बतर था।

“कुणाल! जल्दी आओ! देखो बाबूजी को क्या हो गया!” मेघा दहाड़ मारकर रो पड़ी।

कुणाल दौड़ता हुआ आया। पिता की हालत देखकर उसके हाथ-पाँव फूल गए। दोनों ने मिलकर किसी तरह श्रीकांत जी को उठाया, कार की पिछली सीट पर लिटाया और आधी रात को इंदौर की सुनसान सड़कों पर गाड़ी दौड़ाते हुए पास के सबसे बड़े अस्पताल पहुँचे।

इमरजेंसी वार्ड के लाल बल्ब के नीचे मेघा और कुणाल हाथ जोड़े कांप रहे थे। मेघा के कानों में अपने ही कहे शब्द पिघले सीसे की तरह गूंज रहे थे—“आज एक दिन परहेज़ नहीं करेंगे तो कुछ बिगड़ नहीं जाएगा… मुझसे दुबारा चूल्हा नहीं जलेगा!”

मेघा दीवार से सिर टिकाकर फूट-फूटकर रोने लगी। उसे लग रहा था कि अगर आज बाबूजी को कुछ हो गया, तो वह ज़िंदगी भर खुद को आईने में नहीं देख पाएगी। वह उनकी हत्यारिन कहलाएगी! उसकी ज़रा सी आलस और ज़ुबान की कड़वाहट ने एक ऐसे इंसान को मौत के मुँह में धकेल दिया था, जिसने कभी उसके आगे ऊँची आवाज़ में बात तक नहीं की थी।

करीब एक घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए। कुणाल लपककर उनके पास गया, “डॉक्टर साहब, मेरे बाबूजी कैसे हैं?”

डॉक्टर ने अपने चेहरे से मास्क हटाते हुए गंभीर स्वर में कहा, “देखिए कुणाल जी, आप लोग उन्हें बिल्कुल आखिरी पल में लेकर आए हैं। अगर पंद्रह मिनट की भी देरी हो जाती, तो वह कोमा में जा सकते थे या उन्हें कार्डियक अरेस्ट आ सकता था। उन्होंने रात को बिना कुछ खाए शुगर की हैवी डोज़ ले ली थी, जिससे उनका शुगर लेवल एकदम क्रैश कर गया और सीवियर गैस्ट्रिक अटैक भी पड़ा। इस उम्र में बुज़ुर्गों को समय पर सादा भोजन और दवाइयों की निगरानी बहुत ज़रूरी होती है। फिलहाल खतरे की बात टल गई है, लेकिन उन्हें कम से कम दस दिन अस्पताल में और उसके बाद एक महीने तक घर पर पूर्ण विश्राम (बेड रेस्ट) करना होगा। वह बिस्तर से उतरकर कोई काम नहीं करेंगे।”

डॉक्टर की बात सुनकर मेघा की जान में जान तो आई, लेकिन अपराध-बोध के बोझ से उसकी गर्दन झुक गई।

अगले दस दिन तक श्रीकांत जी अस्पताल में रहे। कुणाल रात को अस्पताल में रुकता था और मेघा को अकेले घर, बच्चा और स्कूल संभालना पड़ा। लेकिन असली परीक्षा तो तब शुरू हुई जब श्रीकांत जी घर आ गए और डॉक्टर की सख्त हिदायत के मुताबिक उन्हें अपने कमरे से बाहर निकलने और कोई भी काम करने की मनाही हो गई।

अस्पताल से छुट्टी मिलने के दो दिन बाद से ही मेघा की ज़िंदगी का असली तूफान शुरू हुआ।

सुबह साढ़े पाँच बजे कोई चाय मांगने वाला नहीं था, इसलिए मेघा सात बजे तक सोती रह गई। जब आँख खुली तो घर में हड़कंप मच गया। बाहर देखा तो दूध वाला पैकेट दरवाज़े पर डालकर चला गया था, जिसे गली के कुत्ते ने फाड़कर फैला दिया था—क्योंकि पहले बाबूजी सुबह उठकर दूध हाथ में ले लेते थे। घर में चाय बनाने के लिए एक बूंद दूध नहीं था।

मेघा ने कुणाल को उठाया, “कुणाल, उठो न! आज बाबूजी नहीं उठ सकते, ज़रा दौड़कर डेयरी से दूध ले आओ और चिंटू को तैयार कर दो, मैं टिफिन बनाती हूँ।”

कुणाल ने तकिया मुंह पर रखते हुए झल्लाकर कहा, “मेरा दिमाग मत खराब करो मेघा! रात भर मैं अस्पताल के चक्कर काटकर थका हूँ। ब्लैक टी पी लो और चिंटू को आज मैगी बनाकर दे दो। मुझसे सुबह-सुबह ये चक्कर नहीं लगेंगे। एक काम करो, कोई चौबीस घंटे वाली मेड रख लो, पर मुझे चैन से सोने दो!”

मेघा सन्न रह गई। जिस पति के कहने पर वह अपने ससुर को ताने मारती थी, आज जब ज़िम्मेदारी उठाने की बारी आई तो उसने पल्ला झाड़ लिया था।

किसी तरह मेघा ने बिना दूध के ही काम चलाया, भागमभाग में चिंटू को तैयार किया। जब वह खुद साड़ी पहन ही रही थी कि बाहर से स्कूल वैन का हॉर्न बजा और जब तक वह चिंटू का बस्ता लेकर नीचे उतरी, वैन जा चुकी थी। चिंटू रोने लगा। मेघा को अपनी स्कूटी से पहले चिंटू को स्कूल छोड़ने जाना पड़ा और इस चक्कर में वह खुद अपने स्कूल में आधे घंटे लेट पहुँची। प्रिंसिपल ने सबके सामने उसे रजिस्टर में ‘लेट मार्क’ लगाते हुए खरी-खोटी सुनाई।

दोपहर को जब वह स्कूल से छूटी, तो उसे याद आया कि चिंटू को एक बजे वैन से उतारने के लिए घर पर कोई नहीं है, क्योंकि बाबूजी तो बिस्तर से उठ नहीं सकते। वह तेज़ धूप में बदहवास सी स्कूटी भगाती हुई घर पहुँची तो देखा कि सात साल का चिंटू बाहर की सीढ़ियों पर बस्ता रखकर धूप में बैठा रो रहा था और पड़ोसी उसे चुप करा रहे थे।

शाम को जब उसने नल खोला तो पता चला कि पानी की मोटर ही नहीं चलाई गई थी और टंकी खाली हो चुकी है—यह काम भी रोज़ सुबह बाबूजी बिना कहे कर दिया करते थे। घर में न सब्ज़ी थी, न राशन का हिसाब। प्रेस वाले के कपड़े पड़े थे, बिजली का बिल जमा न होने के कारण मैसेज आ रहे थे।

महज़ पाँच दिनों के भीतर मेघा को दिन में तारे नज़र आने लगे। उसका शरीर टूटने लगा और दिमाग चकराने लगा। जिन छोटे-छोटे कामों को वह ‘खाक काम’ कहकर मज़ाक उड़ाती थी, आज वही काम पहाड़ बनकर उसके सिर पर आ गिरे थे। उसे समझ आ रहा था कि श्रीकांत जी घर में कोई बोझ नहीं थे, बल्कि वह इस घर की नींव थे। वह चुपचाप, बिना किसी शिकायत या जतावे के, इस घर के सौ ऐसे अदृश्य काम संभाल रहे थे जिनकी वजह से मेघा और कुणाल की ज़िंदगी इतनी सुकून भरी चल रही थी। और बदले में वह मांगते क्या थे? सुबह की एक प्याली गरम चाय, दो वक्त की सादी रोटी और दो मीठे बोल!

उस शाम जब कुणाल ऑफिस से लौटा और सोफे पर पसरकर टीवी देखने लगा, तो मेघा रसोई में आटा गूंथते-गूंथते रो पड़ी। उसे अपनी कही हर कड़वी बात याद आ रही थी। उसे याद आया कि कैसे सालगिरह की रात उसने बाबूजी को दो रोटियाँ तक बनाकर नहीं दी थीं, जिसकी वजह से वह मरते-मरते बचे।

ईश्वर ने उसे अपनी गलती सुधारने का एक मौका दिया था। अगर उस रात बाबूजी को कुछ हो जाता, तो वह ज़िंदगी भर इस बोझ और ग्लानि के साथ जीती। लेकिन आज उसके बाबूजी ज़िंदा थे, उसी छत के नीचे थे!

मेघा ने अपने आँसू पोंछे। उसने तय कर लिया कि अब वह अपनी थकान का ठीकरा उस बेबस बुज़ुर्ग के सिर पर कभी नहीं फोड़ेगी, और न ही कुणाल को अपनी ज़िम्मेदारियों से भागने देगी।

अगली सुबह घड़ी में जैसे ही साढ़े पाँच बजे, मेघा का अलार्म बजा। वह बिना किसी झल्लाहट के तुरंत उठी। उसने नहा-धोकर रसोई में प्रवेश किया। उसने अदरक और इलायची कूटकर कड़क चाय बनाई और एक प्लेट में दो सिके हुए खाखरे रखे।

वह धीरे से बाबूजी के कमरे में गई। श्रीकांत जी जाग चुके थे और छत को निहार रहे थे। उन्हें सुबह की चाय की तलब तो लग रही थी, लेकिन बहू के डर और अपनी बीमारी के संकोच में वह कुछ बोल नहीं पा रहे थे।

तभी मेघा ने ट्रे उनके पास रखी और झुककर उनके पाँव छू लिए। श्रीकांत जी चौंककर उठकर बैठने लगे, “अरे-अरे बहू, ये क्या कर रही हो? इतनी सुबह क्यों उठ गई?”

मेघा की आँखों से झर-झर आँसू बह निकले। उसने बाबूजी के झुर्रियों भरे हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और सिसकते हुए बोली, “मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी! मैं अंधी हो गई थी। अपनी गृहस्थी और नौकरी के घमंड में मुझे कभी आपकी कीमत समझ ही नहीं आई। आप इस घर के वो बरगद हैं जिसकी ठंडी छाँव में हम सब सुरक्षित थे, और मैं नादान उसी बरगद की जड़ों को अपनी कड़वी बातों से काट रही थी। उस रात मेरी वजह से आपकी जान पर बन आई… मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी, वरना मुझे कभी चैन नहीं मिलेगा। यह देखिए, मैं आपके लिए अदरक वाली चाय और खाखरा लाई हूँ, जैसे अम्मा देती थीं। आज से आपको कभी खाली पेट चाय नहीं पीनी पड़ेगी।”

बहू के मुख से ‘अम्मा’ का नाम और इतना अपनापन सुनकर श्रीकांत जी की बूढ़ी आँखें छलक पड़ीं। उनके भीतर जो महीनों का दर्द और अपमान जमा था, वह उन आँसुओं के साथ बह गया। उन्होंने कांपते हुए हाथों से मेघा के सिर पर हाथ रखा और रुंधे गले से बोले, “रो मत मेरी बच्ची! बुज़ुर्गों का दिल तो समंदर जैसा होता है, उसमें अपनों की गलतियों के लिए कोई जगह नहीं होती। तूने अपनी गलती समझ ली, मेरे लिए तो जैसे मेरी शारदा ही वापस आ गई। जीती रह, सदा सुखी रह।”

चाय की चुस्की लेते हुए आज श्रीकांत जी के चेहरे पर जो संतोष और चमक थी, उसने मेघा के दिल को एक अजीब सी शांति से भर दिया।

इसके बाद मेघा सीधा अपने कमरे में गई जहाँ कुणाल अभी भी कंबल तानकर सो रहा था। मेघा ने एक झटके में उसका कंबल खींच लिया और पंखा बंद कर दिया।

“अरे क्या है यार मेघा! सोने दो न!” कुणाल चिल्लाया।

“बहुत सो लिए कुणाल! अब उठने का वक्त आ गया है,” मेघा ने बेहद सख्त और स्पष्ट लहजे में कहा। “बाबूजी की सेवा और उनके आराम की ज़िम्मेदारी सिर्फ मेरी नहीं, तुम्हारी भी है। आज से सुबह का दूध और सब्ज़ी तुम लाओगे, और चिंटू को तैयार करके स्कूल वैन तक भी तुम ही छोड़ने जाओगे। मैं रसोई और बाबूजी की दवाइयों का ध्यान रखूंगी। जब तक हम दोनों मिलकर ज़िम्मेदारी नहीं उठाएंगे, यह घर सही से नहीं चलेगा। उठो, साढ़े छह बज रहे हैं!”

मेघा के चेहरे का दृढ़ निश्चय देखकर कुणाल समझ गया कि अब बहानेबाज़ी नहीं चलने वाली। वह चुपचाप उठकर बैठ गया।

कुछ ही हफ्तों में श्रीकांत जी पूरी तरह स्वस्थ हो गए। अब उस घर का माहौल ही बदल गया था। सुबह की शुरुआत मेघा की कड़वाहट से नहीं, बल्कि बाबूजी के कमरे से आने वाली भजनों की मधुर आवाज़ और अदरक वाली चाय की महक से होती थी। मेघा ने समझ लिया था कि घर के बुज़ुर्ग कोई बोझ नहीं, बल्कि ईश्वर का जीता-जागता आशीर्वाद होते हैं, जिनके सिर पर हाथ रख देने मात्र से जीवन की बड़ी से बड़ी विपदाएं टल जाती हैं।

दोस्तों, क्या हमारे घरों में भी कई बार काम के बोझ और तनाव में हम अपने बुज़ुर्गों की अनदेखी नहीं कर देते? मेघा को तो अपनी गलती सुधारने का दूसरा मौका मिल गया, लेकिन हर किसी को यह मौका नहीं मिलता। इस कहानी के बारे में आपके क्या विचार हैं? क्या आपने भी कभी अपने घर के बड़े-बुज़ुर्गों के होने की असली कीमत महसूस की है? अपने दिल की बात नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।

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मूल लेखिका : डॉ  संगीता अग्रवाल

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