माफ करने वाले का दिल बहुत बड़ा होता है – पूजा शर्मा

अभी रमन को दिल्ली आये एक महीना ही हुआ था। पिछले दो साल से रमन लन्दन में रह रहा था और दिल्ली की एक मल्टी नेशन कम्पनी में कुछ दिन पहले ही उसकी जॉइनिंग हुई थी। सब कुछ नए सिरे से शुरू करने की कोशिश थी—नई नौकरी, नया शहर, नया फ्लैट और नई दिनचर्या। उसने … Read more

“नियति क्या ना कराए” – हेमलता गुप्ता

  आज जो मैं कहानी आपको बताने जा रही हूं, वह एक ऐसी मासूम लड़की की है, जो कारावास में उम्र कैद की सजा काट रही है! जेलर के पद पर मेरी पोस्टिंग कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र की महिला कारावास एवं पुनर्वास केंद्र में हुई थी! मेरे सेवाकाल पूर्ण होने में अभी 4 वर्ष शेष थे! … Read more

क्या अकेली माँ कन्यादान नहीं कर सकती – रश्मि प्रकाश

सुहानी बेटा देख ये साड़ियां कैसी है? कहती हुई उसकी मॉं ने चार पांच साड़ियां उसके सामने फैला दी। एक-एक साड़ी को हाथ से सहलाते हुए मां की आंखों में उम्मीद भी थी और थकान भी। शादी घर में थी, कामों की लिस्ट खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी—कभी हलवाई को फोन, कभी … Read more

ये तेरा घर ये मेरा घर – अंजना ठाकुर

मां राहुल दस दिनों के लिए काम के सिलसिले मै बाहर जा रहे है तो मैं रहने के लिए आ रही हूं—मीनू की आवाज में मायके जाने की अलग ही खुशी थी। फोन पर उसकी हँसी सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे वह अभी से अपने बचपन वाले आँगन में दौड़ रही हो। कभी-कभी लड़की … Read more

अधूरा खत – एम. पी. सिंह

कुलदीप सिंह अपने गावं का जाना माना ट्रैक्टर कारीगर था ओर ठीक ठाक कमा लेता था, पर अपनी पत्नी बाला की बीमारी के कारण आर्थिक तंगी से परेशान था. कुलदीप का बेटा करतार सिंह पढ़ने में कुछ ख़ास नहीं था. 10वी तक पढ़ने के बाद अपने पिता के साथ काम करने लगा. करतार कुछ साल … Read more

रिश्तों की जंजीर – मंजू ओमर

रिया के घर आज एक अलग ही रौनक थी। सुबह से ही राधा जी बार-बार रसोई में जाकर चाय के कप सजातीं, कभी पर्दे ठीक करतीं, कभी रिया की साड़ी पर नजर डालकर कहतीं—“बेटा, पल्लू ठीक कर ले… बस थोड़ा-सा।” महेश जी भी आज असामान्य रूप से शांत थे, मगर उनके चेहरे पर जो उम्मीद … Read more

“ज़लील”

रसोई घर में रोटी बेलती सारिका की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। आटे में नमक जितना घुल जाता है, उतना ही उसका दर्द भी अब उसके भीतर घुल चुका था। बाहर ड्राइंग रूम में हँसी-ठिठोली का शोर था, और भीतर रसोई में उसके सिसकियों का सन्नाटा। उसे लग रहा था जैसे वह अकेली … Read more

आस्तीन के साँप – सरोज माहेश्वरी

दिवाकर का घर शहर की एक शांत कॉलोनी में था। बाहर से देखने पर वह बिल्कुल सामान्य मध्यमवर्गीय घर लगता—दरवाज़े पर तुलसी का गमला, आँगन में छोटी-सी रंगोली, और भीतर दीवारों पर भगवान की तस्वीरें। घर में अनुशासन भी था और संस्कार भी। सास-ससुर उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ घर की शांति ही … Read more

झूठा शक रिश्तों की जड़ें हिला देता है

दिनेश जी के ऑफिस से लौटने का समय था। घड़ी की सुइयाँ शाम के करीब पहुँच रही थीं, पर जानकी जी के घर में सुबह से ही जैसे तूफ़ान उठा हुआ था। रसोई से लेकर बच्चों के कमरे तक, हर जगह एक अजीब-सी बेचैनी फैली हुई थी। घर के वातावरण में वह गर्माहट नहीं थी … Read more

 “करवाचौथ का तोहफा” – संगीता अग्रवाल

करवाचौथ बिल्कुल नजदीक आ गया था। आयशा कितने दिनों से शॉपिंग कर रही थी उस शुभ दिन के लिए। उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी—जैसे त्योहार उसके लिए सिर्फ परंपरा नहीं, एक खास मौका हो, जिसमें वह खुद को सबसे अलग, सबसे खूबसूरत, सबसे खास महसूस करना चाहती हो। वह एक दुकान से … Read more

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