सिंदूर का शौर्य – निधि गुप्ता

नंदिनी की आँखों में खुशी के आंसू थे जब उसने पहली बार मेजर सिद्धार्थ को अपने जीवनसाथी के रूप में देखा था। सेना की जैतून के रंग वाली (ऑलिव ग्रीन) वर्दी में सजे सिद्धार्थ किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहे थे। नंदिनी हमेशा से एक फौजी की पत्नी बनने का सपना देखती थी। उसे … Read more

वात्सल्य के रेशमी धागे

विवाह की तैयारियों के बीच घर में चारों ओर रिश्तेदारों की चहल-पहल थी। फूलों की महक और शहनाई की धीमी धुनों के बीच एक कमरे में कुछ अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। रिया अपने सूटकेस में कपड़े रखते हुए बार-बार रुक जाती थी। उसके चेहरे पर शादी की खुशी से ज्यादा एक अनजानी सी … Read more

“ममता की कोई सौतेली छाँव नहीं होती” – नेहा पटेल

बाहर झमाझम बारिश हो रही थी और आठ साल का शौर्य अपनी ड्राइंग बुक में कुछ रंग भर रहा था। कमरे में एक अजीब सी खामोशी थी, जिसे सिर्फ खिड़की से टकराती बारिश की बूंदें ही तोड़ रही थीं। पलंग पर बैठी देवकी जी, जो शौर्य की नानी थीं, अपनी चश्मे के पीछे से उस … Read more

आँसुओं का पश्चाताप – सीमा श्रीवास्तव

“नाटक मत कीजिए भैया!” नंदिनी की आवाज़ अचानक तेज़ हो गई। “पिताजी का यह मकान करोड़ों का है। आपने मुझे एक मामूली सी शादी देकर घर से विदा कर दिया और पूरी जायदाद पर कुंडली मारकर बैठ गए। विकास का बिज़नेस डूब रहा है और उन्हें पैसों की सख्त ज़रूरत है। मुझे इस घर में … Read more

“रिश्तों की मीठी शरारत” – आरती देवी

दिवाली बीते अभी कुछ ही दिन हुए थे और आज भाई दूज का पावन पर्व था। शहर के एक शांत और हरे-भरे मोहल्ले में स्थित सुमित्रा देवी के घर में सुबह से ही एक अलग तरह की रौनक बिखरी हुई थी। घर के आंगन में गेंदे के फूलों और आम के पत्तों की बंदनवार महक … Read more

बहू को आराम क्यों नहीं…..!! – अमिता कुचया

बहू, 20 लोगों के लिए पूरियां तुम्हें ही तलनी होंगी… और हाँ, जल्दी करना! मेहमान आते ही होंगे।” मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाई। वो अभी तीन दिन पहले ही ट्रेन से आई थी। रास्ते भर लेटी-लेटी आई थी, क्योंकि उसका अभी-अभी ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टर ने साफ कहा था – “कम से कम एक महीना … Read more

नियति का रंग – बालेश्वर गुप्ता

“देखो मनीष, कुसुम मेरी बहू है, पर जब वह वंश बढ़ाने में सक्षम नही है, मुझे पोता नही दे सकती, मां ही नही बन सकती तो कुछ तो सोचना पड़ेगा ना। वह घर मे रहे मुझे आपत्ति नही, पर तुझे दूसरा ब्याह करना ही पड़ेगा। समझ रहा है ना तू?” मनीष की आँखों में दर्द … Read more

“कर्म का हिसाब” – प्रतिभा भारद्वाज ’प्रभा’

“अब क्या हुआ, अब क्यों रो रहे हो आप… निकाल लीजिए अपने बेटे के सभी अंग और बेच दीजिए अच्छी कीमतों पर…आप तो बहुत होशियार सर्जन हैं… कोई तकलीफ भी नहीं होगी आपको…” अपने 10 वर्षीय बेटे के शव पर विलाप करती मधु चीख-चीखकर अपने पति डॉ. मयंक से कह रही थी। वह शब्द नहीं … Read more

मुझे माफ़ कर दो – करुणा मलिक

“दीदी, चल पड़ी हो क्या?”“हाँ भाभी, ट्रेन चल पड़ी है।”“सीट तो ठीक मिल गई? बच्चों के साथ कोई परेशानी तो नहीं होगी? जीजाजी भी आ जाते तो अच्छा रहता।” “नहीं-नहीं भाभी, कोई दिक्कत नहीं। आराम से पहुँच जाएँगे… चलिए रखती हूँ। मिलने पर बात करेंगे।” “ठीक है। जल्दी से आ जाइए।” फोन रखते ही विभा … Read more

 आत्मसम्मान सर्वोपरि  –  कविता भड़ाना

सुबह से चाय के इंतजार में बैठे “रामदयाल जी” आज खुद को बेहद लाचार सा महसूस कर रहे हैं। बरामदे की वही कुर्सी, वही मेज, वही चाय का प्याला—जो कभी बिना बोले उनके सामने आ जाया करता था—आज जैसे उनसे रूठ गया हो। घड़ी की टिक-टिक तेज़ लग रही थी और समय का हर पल … Read more

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