वो बंधन सिर्फ कच्चे धागों का नहीं है – डॉ आभा माहेश्वरी

रक्षाबंधन का त्योहार आने वाला था। पूरे गाँव में उत्साह का माहौल था। बाजार रंग-बिरंगी राखियों से सजा हुआ था। हर बहन अपने भाई के लिए सबसे सुंदर राखी चुन रही थी। लेकिन गाँव के किनारे रहने वाली बारह वर्ष की अनन्या के चेहरे पर उदासी थी। उसका बड़ा भाई अर्जुन पिछले दो वर्षों से … Read more

आख़िरी मौका

“तू इतनी सुंदर, इतनी पढ़ी-लिखी है। वह तो तेरे पैरों की धूल के बराबर भी नहीं है।” “तुझे यह सब सहने की कोई ज़रूरत नहीं है। अपना सामान बांध और घर आ जा। हम बैठे हैं न तेरी देखभाल के लिए।” दीनानाथ जी हमेशा काव्या को समझाते थे। “बेटा, घर ऐसे नहीं बसते। थोड़ा धैर्य … Read more

 निश्छल प्रेम

पीहू धीरे-धीरे कदमों से भीड़ को चीरती हुई सिद्धार्थ के पास पहुंची। उसने सिद्धार्थ के कुर्ते का कोना खींचते हुए मासूमियत से पूछा, “पापा, दादू फर्श पर क्यों सो रहे हैं? उन्हें वहां ठंड लग जाएगी। और आप सब लोग रो क्यों रहे हो? क्या दादू कहीं जा रहे हैं?” सिद्धार्थ ने अपनी आंसुओं से … Read more

पश्चाताप के आंसू

आज जब उन्होंने यह सब सुना तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने फोन कौशल्या जी के हाथ से छीन लिया और कॉल काट दिया। रघुनाथ जी गुस्से से कांप रहे थे। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई अपनी ही बहू के चरित्र पर इस तरह कीचड़ उछालने की? और वो भी उस औरत के … Read more

जीवन-मंत्र

“हमेशा खुश रहना बिटिया, और इन चूड़ियों की तरह हमेशा खनकती रहना,” उसने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था। लेकिन मेरी किस्मत की चूड़ियां शायद बहुत कच्चे कांच की बनी थीं। मेरी शादी का सपना एक महीने के भीतर ही चकनाचूर हो गया। मेरा पति, राघव, जिसके साथ मैंने एक नई दुनिया बसाने … Read more

दुनिया की सबसे बड़ी दौलत

“अम्मा, यह क्या है?” मैंने पूछा। “तीस हजार हैं… रोहन की फीस के लिए। तुझे क्या लगा, तू मुझे कुछ नहीं बताएगा तो मुझे पता नहीं चलेगा? तेरी शक्ल देखकर मैं तेरा पूरा हाल पढ़ लेती हूँ। जब तू पैदा भी नहीं हुआ था, तब से जानती हूँ तुझे।” माँ की आवाज़ भर्रा गई थी। … Read more

रिश्तों में कड़वाहट

माधवी बुआ की बात खत्म होते ही पूरा कमरा जैसे एक गहरे चिंतन में डूब गया। जिन औरतों ने जिंदगी भर खुद को एक संदूक बनाए रखा था और अपने अंदर अनगिनत दर्द और ताने छुपाए रखे थे, आज उन्हें अहसास हो रहा था कि माधवी बुआ कितने बड़े जीवन सत्य को कितनी आसानी से … Read more

तरक्की की अंधी दौड़

सिद्धार्थ के हाथ से सूटकेस छूट कर ज़मीन पर गिर पड़ा। वह लिफ़ाफ़ा और चूड़ियाँ सीने से लगाए, घुटनों के बल वहीं ज़मीन पर बैठ गया और अपने पिता के पैरों पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा। आज उसे अपनी पढ़ाई, अपनी नौकरी और अपनी हैसियत, अपने उस कमज़ोर पिता के फटे हुए कुर्ते … Read more

रिश्तों की नई बुनियाद

समीर ने आँखों ही आँखों में रजत को इशारा किया कि लड़की बहुत अच्छी है। माँ का चेहरा भी खुशी से दमक रहा था। अंजलि के पिता ने भी रिश्ते के लिए अपनी रजामंदी दे दी। लौटते वक्त कार में सब बहुत खुश थे। रजत खिड़की के बाहर देख रहा था। उसे महसूस हो रहा … Read more

प्यार और वो एहसास

“आप इतने बदल कैसे गए? मेरा मतलब है… मैंने कभी सोचा नहीं था कि आप मेरा इतना खयाल रखेंगे। मुझे तो लगता था कि आपको कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि मैं हूं या नहीं।” विवान के हाथ पल भर के लिए रुक गए। उसने गहरी सांस ली और सुमेधा की आंखों में देखते हुए … Read more

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