ममता का रंग’ – प्रतिभा भारद्वाज ‘प्रभा’

“मेरी मां बुआ के यहां शादी में नहीं जाएंगी….”वसुधा के कुछ कहने से पहले वसुधा की बेटी सौम्या ने जैसे ही कहा तो सब अवाक रह गए। “बेटा….” “मां प्लीज…, इस बार आप कुछ भी कहने से मुझे मत रोको….वैसे भी आज तक आप मुझे ही चुप करवाती आई हो और किसी से आप कुछ … Read more

रिश्ते अधिकार से नहीं करुणा से निभाते हैं – सीमा सिंघी 

आज मालती जी ने अपनी बहू सुमति को बार-बार अलमारी खोलकर कुछ ढूंढते हुए देखकर रूखे स्वर में बोल पड़ी। बहू आज तुम यह सुबह से अलमारी खोल कर बार-बार क्या ढूंढ रही हो। तुमने ऐसा कौन सा खजाना रख दिया था। जिसे तुम्हें इतनी ढूंढने की जरूरत पड़ गई है। जरा मैं भी तो … Read more

कच्चे धागे के पक्के रिश्ते – डॉ हरदीप कौर

रवि के पिता जी और छवि के पिता जी साथ काम करते थे। दोनों एक ही दफ्तर में थे, एक ही छत के नीचे रोज़मर्रा की भागदौड़, फाइलों की गंध, चाय के छोटे-छोटे ब्रेक और दिन के अंत में घर लौटते समय का अपनापन—इन सबने उन्हें सिर्फ सहकर्मी नहीं, परिवार जैसा बना दिया था। रवि … Read more

भूल अपना समझने की  – अंजना ठाकुर 

विनोद जी ने बहुत दौलत कमाई थी। मेहनत, लगन और अपने तेज़ दिमाग से उन्होंने अपना कारोबार गाँव-शहर तक फैला दिया था। लोगों की नज़र में विनोद जी की ज़िंदगी किसी राजा से कम नहीं थी—बड़ा सा घर, प्रतिष्ठा, नौकर-चाकर, और चारों तरफ़ नाम। पर उनके दिल के किसी कोने में एक मलाल हमेशा चुभता … Read more

अधूरे रिश्ते – किरण फुलवारी

ट्रेन में बैठी ख्याति के मन में कई सारे विचार चल रहे थे। खिड़की के बाहर पीछे छूटते खेत, दूर भागती बिजली की तारें और स्टेशन के छोटे-छोटे बोर्ड—सब जैसे उसके भीतर उठते तूफान के सामने फीके पड़ गए थे। रक्षाबंधन के एक दिन पहले ही वह अपने पीहर आई थी, बड़े भाई के बुलाने … Read more

रिश्तो के भी रंग – संजय सिंह

मधु और माधव का भरा पूरा परिवार था ।परिवार में चार बेटे ,चार बहुएं  मौजूद थी। बड़े बेटे राजू की दो बेटियां थी । उससे छोटे बेटे मनीष का एक बेटा था । तीसरे नंबर वाले बेटे के आगे दो बेटियां थी । सबसे छोटे बेटे को एक बेटी और एक बेटा था ।परिवार में … Read more

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