बंद दरवाज़े का फ़रिश्ता

बुज़ुर्ग की आवाज़ में न कोई दर्द था, न शिकायत, बल्कि एक असीम कृतज्ञता थी। वे बोले, “पूरे दो साल मैं बिस्तर पर पड़ा रहा बिटिया। करवट बदलने के लिए भी अपनी धर्मपत्नी और बच्चों का मोहताज था। जब एक स्वाभिमानी इंसान खुद के मलमूत्र तक के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है ना, तो वह तिल-तिल कर मरता है। मैं हर रात रो-रोकर उस ऊपर वाले से मौत की भीख मांगता था। मैं कहता था कि हे प्रभु, ऐसी लाचार ज़िंदगी से तो मुझे उठा ले, मैं अपने ही परिवार पर बोझ बन गया हूं।”

 नेहा तवे पर रोटी सेंकते हुए बार-बार कलाई पर बंधी घड़ी देख रही थी। गैस की आंच तेज़ थी, सब्ज़ी की छौंक का धुआं चिमनी से बाहर निकलने से पहले पूरे किचन में फैल रहा था और ड्राइंग रूम से उसके पति मयंक की आवाज़ आ रही थी, “नेहा, मेरी नीली वाली टाई कहां है? आज बोर्ड मीटिंग है और तुम जानती हो कि आज मेरा समय पर पहुंचना कितना ज़रूरी है!”

“अलमारी के बाएं दराज़ में रखी है मयंक, ज़रा ध्यान से देखो!” नेहा ने थोड़ा चीखते हुए जवाब दिया। उसी वक़्त ग्यारह साल का बेटा आरव स्कूल की आधी-अधूरी ड्रेस पहने जूते हाथ में लिए रसोई के दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ, “मम्मी, मेरा साइंस प्रोजेक्ट का चार्ट पेपर नहीं मिल रहा… बस छूट जाएगी मेरी!”

नेहा के माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। वह खुद शहर के एक प्रतिष्ठित बैंक में सीनियर क्लर्क थी और आज तिमाही ऑडिट का पहला दिन था। ब्रांच मैनेजर ने कल शाम ही सख़्ती से कह दिया था कि सवा नौ बजे के बाद किसी की भी हाज़िरी नहीं लगेगी। घर की यह रोज़-रोज़ की भागदौड़, ज़िम्मेदारियों का बोझ और वक़्त की तंगी कभी-कभी इंसान को भीतर से चिड़चिड़ा और संवेदनहीन बना देती है। नेहा को लग रहा था कि दुनिया का सारा तनाव, सारी परेशानियां और सारे दायित्व अकेले उसी के कंधों पर लद गए हैं। उसे इस भागती-दौड़ती ज़िंदगी पर बेइंतहा झुंझलाहट हो रही थी।

तभी मुख्य दरवाज़े पर कॉल बेल बजी—’ट्रिन-ट्रिन’।

एक बार, फिर दूसरी बार।

“अरे अब इस वक़्त कौन आ गया!” नेहा ने हाथ में पकड़ा चिमटा गैस स्टोव के किनारे पटका और बुदबुदाते हुए दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। उसके चेहरे पर साफ़ नाराज़गी तैर रही थी। उसका इरादा था कि जो कोई भी बेवक्त आया होगा, उसे दो टूक सुनाकर रवाना कर देगी।

दरवाज़ा झटका देकर खुला। सामने एक क़रीब साठ-पैंसठ साल के बुज़ुर्ग खड़े थे। साधारण सी मटमैले रंग की सूती कमीज़, घुटनों के पास से थोड़ी मुड़ी हुई पुरानी पैंट और पैरों में घिसी हुई चमड़े की चप्पलें। उनके एक कंधे पर ख़ाकी रंग का भारी थैला टंगा था और दूसरे हाथ में नीले गत्ते की जिल्द वाली रसीद बुक और एक साधारण बॉलपेन था। उनके चेहरे पर अनगिनत झुर्रियां थीं, जो उम्र से ज़्यादा संघर्ष की गवाह लग रही थीं, लेकिन उन आंखों में एक बेहद गहरी, शांत और निर्मल चमक थी।

नेहा के चेहरे के तने हुए तेवर देखकर भी उस बुज़ुर्ग के चेहरे पर शिकन तक न आई। उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़कर बेहद धीमे और आदरपूर्ण स्वर में कहा, “नमस्ते बिटिया। ईश्वर आपको और आपके परिवार को हमेशा सुखी रखे।”

“जी कहिए? क्या बात है? मुझे दफ़्तर के लिए बहुत देर हो रही है, जो कहना है जल्दी कहिए,” नेहा ने दरवाज़े के हैंडल को मज़बूती से थामे हुए रूखेपन से कहा।

बुज़ुर्ग ने अपने हाथ में थमी रसीद बुक को थोड़ा आगे बढ़ाया और बड़ी विनम्रता से बोले, “बिटिया, हम पुरुलिया रोड पर बने ‘स्नेह छाया’ कुष्ठ एवं निराश्रित पुनर्वास आश्रम से आए हैं। वहां कुछ ऐसे बुज़ुर्ग और बेसहारा लोग रहते हैं जिनका इस दुनिया में कोई अपना नहीं है। इस महीने आश्रम में राशन और दवाइयों की भारी किल्लत हो गई है। अगर आपके सामर्थ्य अनुसार कुछ सहायता मिल जाती…”

नेहा का पारा चढ़ गया। उसने मन ही मन सोचा कि सुबह-सुबह काम पर निकलने के वक़्त ही इन चंदा मांगने वालों को आना होता है। आजकल शहर में कितने ढोंगी और फ़रेबी घूमते हैं, जो रसीद बुक छपवाकर लोगों की भावनाओं से खेलते हैं। न कोई पहचान, न कोई प्रमाण। उसका पहला मन हुआ कि दरवाज़ा मुंह पर बंद कर दे। लेकिन फिर लगा कि बहस करने में पांच मिनट और बर्बाद होंगे, इससे बेहतर है कि कुछ पैसे देकर बला टाली जाए।

उसने अपने पर्स से बिना सोचे-समझे पचास रुपये का एक मुड़ा-तुड़ा नोट निकाला और बुज़ुर्ग की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, “लीजिए, बस इतना ही है मेरे पास। अब आप जा सकते हैं।”

वह पचास का नोट किसी दान की भावना से नहीं, बल्कि एक झंझट से पीछा छुड़ाने के लिए फेंका गया तिनका था। नेहा को लगा कि वह नोट देखकर बुज़ुर्ग या तो और पैसे की मांग करेंगे या फिर मुंह बनाकर चले जाएंगे। लेकिन जो हुआ, उसने नेहा को भीतर तक चौंका दिया।

उस बुज़ुर्ग ने उस पचास रुपये के नोट को दोनों हाथों से ऐसे थामा जैसे किसी भूखे को अमृत मिल गया हो। उन्होंने उस नोट को अपनी आंखों से लगाया, फिर अपने माथे से छुआया। उनके चेहरे पर जो तृप्ति और संतोष की आभा उभरी, वह किसी करोड़पति के चेहरे पर भी नहीं दिख सकती थी।

“बहुत-बहुत धन्यवाद बिटिया। भगवान आपके भंडार भरे रखे। बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है,” बुज़ुर्ग ने मुस्कुराते हुए रसीद बुक का पन्ना पलटा और पेन निकालते हुए बोले, “ज़रा अपना शुभ नाम और यह राशि इसमें लिख दीजिए, ताकि हमारे रजिस्टर में हिसाब साफ़ रहे।”

नेहा ने अविश्वास से उन्हें देखा। इतनी छोटी सी रक़म के लिए कोई रसीद काटता है? उसे लगा कि यह औपचारिकता महज़ दिखावा है। उसने चिढ़ते हुए रसीद बुक अपने हाथ में ली और झटके से अपना नाम और ’50/-‘ लिखकर हस्ताक्षर कर दिए। रसीद लौटाते हुए उसके मन का संशय ज़ुबान पर आ ही गया।

“बाबा, आजकल शहर में बहुत से लोग अनाथालयों और आश्रमों के नाम पर फ़र्ज़ी रसीदें लेकर घूमते हैं। मुझे क्या पता कि आपका यह ‘स्नेह छाया’ सच में है भी या आप यूं ही घर-घर जाकर अपनी जेब भर रहे हैं? आपके पास कोई सरकारी पहचान पत्र है?”

नेहा के तीखे और अविश्वास भरे सवाल किसी भी स्वाभिमानी इंसान को आहत कर सकते थे। लेकिन वह बुज़ुर्ग तनिक भी विचलित नहीं हुए। उनके चेहरे की शांत मुस्कान वैसी ही बनी रही, जैसे किसी अबोध बच्चे की नादानी पर कोई दादाजी मुस्कुराते हैं।

उन्होंने अपने कुर्ते की जेब से एक लैमिनेट किया हुआ पुराना पहचान पत्र निकाला, जिस पर उनकी तस्वीर, आश्रम का रजिस्ट्रेशन नंबर और आश्रम के संचालक का मुहर-दस्तख़त था। उन्होंने वह कार्ड नेहा की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, “बिटिया, आपका शक करना बिल्कुल लाज़िमी है। आज का ज़माना ही ऐसा है कि जहां छल ज़्यादा और सच्चाई कम दिखती है। यह देखिए पहचान पत्र, और यह आश्रम का स्थायी पता है। जब भी आपको कभी फ़ुरसत मिले, अपने परिवार के साथ ज़रूर आइएगा। वहां के बुज़ुर्गों को देखकर आपको तसल्ली हो जाएगी कि आपका यह पसीना किसी नेक काम में ही लगा है।”

नेहा ने कार्ड देखा। सब कुछ प्रामाणिक था। उसके मन में थोड़ी सी शर्मिंदगी की लहर उठी, लेकिन दफ़्तर की जल्दी के कारण उसने बात ख़त्म करनी चाही।

बुज़ुर्ग ने कार्ड वापस जेब में रखा और बड़े आत्मीय स्वर में बोले, “बिटिया, ज़िंदगी में मैंने एक गहरी बात सीखी है। इस संसार में मूल रूप से तीन ही तरह के किरदार होते हैं। एक होता है ‘मांगने वाला’ यानी याचक, जैसे कि इस वक़्त मैं आपके दरवाज़े पर खड़ा हूं। दूसरा होता है ‘देने वाला’ यानी दाता, जैसे कि इस वक़्त आप अपने घर की चौखट पर खड़ी हैं। और तीसरा इन दोनों के ऊपर बैठा ‘वह विधाता’ है, जो हम दोनों को देख रहा होता है और हमारे भीतर की नीयत को तौलता रहता है।”

वह बुज़ुर्ग एक पल के लिए रुके। उन्होंने अपने थैले को कंधे पर थोड़ा ठीक किया और एक गहरी सांस लेकर कहने लगे, “आज आप मुझे दो पैरों पर खड़ा देखकर सोच रही होंगी कि यह भला-चंगा आदमी सुबह-सुबह चंदा क्यों मांग रहा है? कोई मेहनत-मज़दूरी क्यों नहीं करता? लेकिन बिटिया, आज से ठीक चार साल पहले मैं ऐसा नहीं था। मैं एक प्राइवेट फ़ैक्ट्री में फ़ोरमैन था। एक दिन अचानक काम करते हुए मुझे ब्रेन स्ट्रोक हुआ और शरीर के पूरे दाहिने हिस्से को लकवा मार गया। मेरा दायां हाथ बेजान हो गया, दायां पैर एक बेजान लकड़ी की तरह घिसटने लगा और मेरी आवाज़ चली गई।”

नेहा स्तब्ध होकर सुनने लगी। घर के अंदर से मयंक की आवाज़ आनी बंद हो चुकी थी, आरव भी दरवाज़े के पास आकर खड़ा हो गया था। पूरा वातावरण जैसे अचानक थम सा गया था।

बुज़ुर्ग की आवाज़ में न कोई दर्द था, न शिकायत, बल्कि एक असीम कृतज्ञता थी। वे बोले, “पूरे दो साल मैं बिस्तर पर पड़ा रहा बिटिया। करवट बदलने के लिए भी अपनी धर्मपत्नी और बच्चों का मोहताज था। जब एक स्वाभिमानी इंसान खुद के मलमूत्र तक के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है ना, तो वह तिल-तिल कर मरता है। मैं हर रात रो-रोकर उस ऊपर वाले से मौत की भीख मांगता था। मैं कहता था कि हे प्रभु, ऐसी लाचार ज़िंदगी से तो मुझे उठा ले, मैं अपने ही परिवार पर बोझ बन गया हूं।”

बुज़ुर्ग की आंखों के कोरों में नमी चमक उठी, पर होंठों पर वही दिव्य मुस्कान थी।

“लेकिन बिटिया, विधाता की योजना हमारे सोचने से कहीं बड़ी होती है। शायद उसे मेरी मौत मंज़ूर नहीं थी, उसे तो मुझे एक नया जीवन देना था। धीरे-धीरे डॉक्टरों की मेहनत, परिवार की सेवा और उस मालिक की रहमत से चमत्कार होने लगा। मेरी बेजान उंगलियों में हरकत आई। मेरी ज़ुबान खुली और एक दिन मैं अपनी लाठी छोड़कर लड़खड़ाते हुए अपने पैरों पर खड़ा हो गया। जब मैं उस बिस्तर से उठकर पहली बार सूरज की धूप में खड़ा हुआ, तो मेरी रूह कांप गई। मैंने आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर कहा—मालिक, तूने मुझे यह ज़िंदगी दोबारा किसलिए बख़्शी है? अगर तूने मुझे इस नर्क से निकालकर पैरों पर दोबारा खड़ा किया है, तो ज़रूर मेरे ज़िंदा रहने का कोई बड़ा मक़सद होगा।”

“बस उसी दिन मैंने तय किया कि अब यह ज़िंदगी मेरी अपनी नहीं है। जो सांसें उसने मुझे मुफ़्त में बख़्शी हैं, उन्हें मैं दूसरों के आंसुओं को पोंछने में ख़र्च करूंगा। तब से मैं रोज़ सुबह छह बजे निकलता हूं और शाम तक शहर की गलियों में घूम-घूम कर उन लाचारों के लिए मदद जुटाता हूं जिन्हें अपनों ने छोड़ दिया है। बिटिया, जब शाम को आश्रम के चूल्हे में मेरे लाए आटे से रोटियां पकती हैं और वे बुज़ुर्ग दुआएं देते हैं, तो मुझे जो सुकून मिलता है, वह करोड़ों रुपये की दौलत में भी नहीं मिल सकता।”

इतना कहकर उस बुज़ुर्ग ने अपने दोनों हाथ जोड़े, “बिटिया, आपको देर हो रही होगी, मुझे माफ़ करना। आपका बहुत-बहुत आभार।”

वे मुड़े और सीढ़ियां उतरने लगे।

नेहा की नज़रें उनके पैरों पर ठहर गईं। उसने देखा कि उनका दायां पैर अभी भी ज़मीन पर थोड़ा लचक रहा था, वे हर क़दम पर हल्का सा लड़खड़ाते थे, लेकिन उस लड़खड़ाहट में कोई कमज़ोरी नहीं थी; उसमें एक ऐसा संकल्प और गरिमा थी जो पहाड़ों को भी हिला दे। उनके चेहरे पर दोपहर की तेज़ होती धूप के बीच गजब का तेज और असीम संतोष छलक रहा था।

नेहा वहीं चौखट पर जड़वत खड़ी रह गई।

उसके कानों में बुज़ुर्ग के शब्द किसी मंदिर के घंटे की तरह गूंज रहे थे—’एक मांगने वाला, एक देने वाला, और एक ऊपर वाला जो सब देखता है।’

नेहा ने अपने दोनों हाथों को देखा। वह अपने दो कमरों के फ़्लैट, अपनी गाड़ी, अपनी अच्छी नौकरी, अपने स्वस्थ पति और प्यारे से बच्चे के बावजूद सुबह से सिर्फ़ शिकायतें कर रही थी। वह ज़िंदगी के छोटे-छोटे तनावों को पहाड़ मानकर खुद को दुनिया की सबसे दुखी औरत समझ रही थी। और एक वह इंसान था, जिसने मौत के मुंह से लौटकर, अपनी शारीरिक लाचारी के बावजूद, खुद को पूरी तरह दूसरों के लिए समर्पित कर दिया था।

नेहा की आंखों से पश्चाताप के दो आंसू टपक पड़े। उसने केवल अपना पीछा छुड़ाने के लिए पचास रुपये का एक मामूली नोट दिया था, लेकिन बदले में उस बुज़ुर्ग ने उसे ज़िंदगी जीने का असली दर्शन दे दिया था। उस फटेहाल इंसान ने उसे बिना मांगे ‘दाता’ का सम्मान दे दिया था, जबकि असलियत में भिखारी तो वह खुद थी, जो सब कुछ पाकर भी हर घड़ी असंतुष्ट थी।

“बाबा! ज़रा रुकिए!” नेहा सीढ़ियों की तरफ़ भागी।

बुज़ुर्ग ने पलटकर देखा। नेहा ने अपने पर्स से पांच सौ रुपये का नोट निकाला और कांपते हाथों से बुज़ुर्ग की हथेली पर रख दिया।

“बाबा, यह आश्रम के लिए मेरी तरफ़ से है… और मुझे माफ़ कर दीजिएगा, मैंने आपके प्रति मन में ग़लत भाव रखे,” नेहा का गला रुंध गया था।

बुज़ुर्ग ने वात्सल्य भरी नज़रों से उसके सिर पर हाथ रखा और बोले, “बिटिया, देने वाले का हाथ कभी छोटा नहीं होता और न ही मांगने वाले का दिल कभी मैला होना चाहिए। ईश्वर आपके घर में हमेशा बरकत रखे।”

जब नेहा पलटकर घर के अंदर आई, तो उसका पूरा नज़रिया बदल चुका था। किचन की वही बिखरी हुई थालियां, वही घड़ी की सुइयां और वही दफ़्तर का ऑडिट… सब कुछ वैसा ही था, लेकिन नेहा के भीतर का चिड़चिड़ापन और तनाव कपूर की तरह उड़ चुका था। उसके चेहरे पर एक अपूर्व शांति और मुस्कान थी।

उसने आगे बढ़कर अपने बेटे आरव को गले से लगा लिया और उसका माथा चूमते हुए बोली, “कोई बात नहीं बेटा, चार्ट पेपर मैं अभी अलमारी से निकाल देती हूं। तुम्हारी बस नहीं छूटेगी।” फिर उसने मयंक की तरफ़ देखकर प्यार से कहा, “मयंक, तुम्हारी टाई सोफ़े के पीछे गिर गई थी, यह लो। आज की मीटिंग बहुत अच्छी होगी, तुम चिंता मत करो।”

मयंक ने हैरान होकर अपनी पत्नी को देखा, जो कुछ ही मिनट पहले गुस्से से तमतमा रही थी और अब उसके चेहरे पर गज़ब का ठहराव था।

उस दिन नेहा दफ़्तर के लिए निकली तो उसकी रफ़्तार में हड़बड़ाहट नहीं, बल्कि एक आत्मविश्वास था। उसने समझ लिया था कि ज़िंदगी में शिकायतें करने के लिए हज़ार वजहें हो सकती हैं, लेकिन ऊपर वाले का शुक्रगुज़ार होने के लिए सिर्फ़ एक ही सांस काफ़ी है। देने का सुख पाने के सुख से कहीं अधिक विराट होता है, और ईश्वर कहीं दूर बादलों में नहीं रहता; वह तो किसी लाचार की सेवा में, किसी के आंसुओं को पोंछते हाथों में और दूसरों के लिए धड़कने वाले दिलों में ही वास करता है। बस ज़रूरत है कि हम अपने दिल के बंद दरवाज़ों को खोलकर देखें।

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