“चाय तो पी लूंगा प्रभा, लेकिन जो कड़वाहट तुम इस घर की हवा में घोल रही हो, उसका क्या करूं?” हरिशंकर जी ने सीधे प्रभा जी की आंखों में देखते हुए कहा।
प्रभा जी का चेहरा तमतमा उठा। उन्हें अपने पति का यह अंदाज बिल्कुल पसंद नहीं आया, खासकर बहू के सामने। उन्होंने तुनककर कहा, “मैं क्या कड़वाहट घोल रही हूं? घर की बड़ी हूं, बहू को दो बातें सिखाना क्या गुनाह है? मैं तो बस यही कह रही थी कि हमने भी इसी उम्र में सब कुछ सीखा था, कोई मायके से सीखकर नहीं आता। पर सीखने की ललक भी तो होनी चाहिए। हमारे समय में सास की एक आंख के इशारे पर हम समझ जाते थे कि क्या करना है। और इसे देखो, छह महीने हो गए, दाल में सही तड़का तक लगाना नहीं आया!”
सुबह की पहली किरण अभी खिड़की की झिर्रियों से छनकर रसोई के संगमरमर पर उतरी ही थी कि स्टील के डिब्बे के जोर से टकराने की आवाज पूरे घर में गूंज गई। आवाज के साथ ही एक तीखी आवाज भी हवा में तैर गई, “अरे भगवान! यह जीरा है या राई, इतनी भी समझ नहीं? तीस साल की उम्र हो गई, एक मल्टीनेशनल कंपनी में अफसर बनी घूमती है, पर रसोई में आते ही जैसे हाथ-पांव फूल जाते हैं! हमारे जमाने में अगर ससुराल में ऐसी चूक हो जाती, तो महीनों मुंह दिखाने लायक नहीं बचते।”
प्रभा जी की आवाज में एक अजीब सी तल्खी और खुद को श्रेष्ठ साबित करने का पुराना दंभ साफ झलक रहा था। उनके सामने सिर झुकाए खड़ी थी अनन्या। कॉर्पोरेट दफ्तर में अपनी टीम को बिना किसी घबराहट के संभालने वाली अनन्या इस वक्त रसोई के एक छोटे से कोने में सिमटी हुई सी महसूस कर रही थी। उसकी उंगलियां कुर्ती के पल्लू को बेचैनी से मरोड़ रही थीं। अभी शादी को छह महीने ही तो हुए थे। सुबह छह बजे उठकर पूरे घर की चाय, नाश्ता और फिर टिफिन तैयार करके आठ बजे की मेट्रो पकड़ना उसकी दिनचर्या बन चुका था। वह जी-जान से हर रिश्ते और हर जिम्मेदारी को निभाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन प्रभा जी की हर बात की शुरुआत और अंत केवल एक ही वाक्य पर होता—”हमारे जमाने में…”
“मां जी, माफ कीजिएगा, दोनों डिब्बे एक जैसे थे तो धोखे से हाथ लग गया। मैं अभी इसे साफ करके दूसरा छौंक लगा देती हूं,” अनन्या ने बेहद धीमी और संयमित आवाज में कहा। वह जानती थी कि बहस करने से घर का माहौल और बिगड़ेगा।
“हां-हां, यही तो आता है—सॉरी बोल देना और फिर वही गलती दोहराना! अरे, गृहस्थी चलाना किसी कॉरपोरेट की पीपीटी बनाने जितना आसान नहीं होता। जब मैं ब्याह कर इस शहर, प्रयागराज आई थी, तो परिवार में बीस लोग थे। सुबह चार बजे से रात के ग्यारह बजे तक एक पैर पर खड़ी रहती थी, पर कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया। और आजकल की लड़कियां? दो रोटी सेंकनी पड़ जाए तो माथे पर बल पड़ जाते हैं। सलीका तो जैसे मायके में सिखाया ही नहीं गया!” प्रभा जी ने तवे को गैस पर पटकते हुए बात को मायके तक खींच दिया।
मायके का नाम सुनते ही अनन्या के भीतर कुछ टूटा। उसकी आंखों के कोरों में आंसू छलक आए। उसने नजरें नीचे कर लीं ताकि उसकी बेबसी मां जी के सामने नुमाइश न बन जाए। वह चुपचाप प्लेटफार्म की सफाई करने लगी।
रसोई के बाहर बने बड़े से आंगन में, तुलसी के चौरे के पास बैठे हरिशंकर जी यह सब कुछ बहुत ध्यान से सुन रहे थे। चश्मे के ऊपर से अखबार देखते हुए उनके चेहरे की लकीरें गहरी हो गई थीं। हरिशंकर जी शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त एक शांत, गंभीर और बेहद सुलझे हुए इंसान थे। वे पिछले कुछ महीनों से लगातार देख रहे थे कि कैसे उनकी पत्नी प्रभा बात-बात पर नई बहू को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़तीं। उन्हें अपनी कुशलता, अपने बीते दिनों के संघर्ष और अपनी परंपराओं का ऐसा अहंकार हो गया था कि उसके आगे उन्हें किसी और की मेहनत दिखाई ही नहीं देती थी।
हरिशंकर जी ने अखबार को मोड़कर मेज पर रखा और धीमे कदमों से रसोई की चौखट पर आकर खड़े हो गए। प्रभा जी उस वक्त भी बड़बड़ा रही थीं, “हमारे हाथ का बना खाना जो एक बार खा लेता था, उंगलियां चाटता रह जाता था। और यहां देखो, दाल में नमक का भी कोई ठिकाना नहीं…”
“प्रभा!”
हरिशंकर जी की गंभीर और शांत आवाज ने रसोई के उस तनाव भरे सन्नाटे को तोड़ा। आवाज में कोई चीख-पुकार नहीं थी, लेकिन एक ऐसा वजन था जिसने प्रभा जी के हाथों को वहीं रोक दिया।
“अरे, आप जाग गए? बैठिए, मैं चाय भिजवाती हूं,” प्रभा जी ने अपने पल्लू को ठीक करते हुए सामान्य होने का नाटक किया।
“चाय तो पी लूंगा प्रभा, लेकिन जो कड़वाहट तुम इस घर की हवा में घोल रही हो, उसका क्या करूं?” हरिशंकर जी ने सीधे प्रभा जी की आंखों में देखते हुए कहा।
प्रभा जी का चेहरा तमतमा उठा। उन्हें अपने पति का यह अंदाज बिल्कुल पसंद नहीं आया, खासकर बहू के सामने। उन्होंने तुनककर कहा, “मैं क्या कड़वाहट घोल रही हूं? घर की बड़ी हूं, बहू को दो बातें सिखाना क्या गुनाह है? मैं तो बस यही कह रही थी कि हमने भी इसी उम्र में सब कुछ सीखा था, कोई मायके से सीखकर नहीं आता। पर सीखने की ललक भी तो होनी चाहिए। हमारे समय में सास की एक आंख के इशारे पर हम समझ जाते थे कि क्या करना है। और इसे देखो, छह महीने हो गए, दाल में सही तड़का तक लगाना नहीं आया!”
हरिशंकर जी ने एक गहरी सांस ली। वे चौखट पार करके रसोई के अंदर आए। उन्होंने प्यार से अनन्या के सिर पर हाथ रखा, जो आंसुओं को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी। फिर वे प्रभा जी की तरफ मुड़े।
“प्रभा, इंसान को अपने हुनर पर गर्व होना अच्छी बात है, लेकिन जब वही गर्व अहंकार बनकर दूसरों को छोटा दिखाने लगे, तो वह घर को जोड़ने की बजाय तोड़ने लगता है। तुम्हें किस बात का घमंड है? अपनी गृहस्थी संभालने का? अपने सलीके का? या फिर सिर्फ इसलिए कि तुम आज सास के पद पर बैठ चुकी हो?”
“आप यह क्या कह रहे हैं? मैंने अपनी पूरी जवानी इस घर को सींचने में लगा दी, और आज आप मुझे ही घमंडी कह रहे हैं?” प्रभा जी की आवाज में नाराजगी और हैरानी दोनों थी।
“हां प्रभा, मैं वही कह रहा हूं जो सच है और जिसे तुम अपने अहंकार के पर्दे के पीछे देखना नहीं चाहतीं,” हरिशंकर जी ने अत्यंत शांत भाव से कहा, “तुम बार-बार कहती हो कि तुमने बहुत कम उम्र में सब सीख लिया था। लेकिन क्या तुम भूल गईं कि जब तुम शादी होकर इस घर में आई थीं, तो तुम्हें चूल्हा जलाना तक नहीं आता था? पहले ही हफ्ते तुमने खीर में चीनी की जगह पिसा हुआ नमक डाल दिया था। याद है बाबूजी और अम्मा जी के सामने क्या हुआ था?”
प्रभा जी का चेहरा फक पड़ गया। पुरानी यादें जैसे एक झटके में उनके सामने तैर गईं।
हरिशंकर जी आगे बोले, “उस दिन अम्मा जी ने तुम्हारी बेइज्जती नहीं की थी। उन्होंने हंसकर वह कटोरी किनारे रख दी थी और कहा था, ‘कोई बात नहीं बहू, पहली रसोई में शगुन का थोड़ा फेर हो गया, अब मिलकर दोबारा बनाते हैं।’ अम्मा जी ने तुम्हें डांटकर या नीचा दिखाकर नहीं सिखाया, बल्कि अपनी बेटी बनाकर, तुम्हारा हाथ पकड़कर सिखाया था। अगर उस दिन अम्मा जी ने तुम्हारे मायके को कोसा होता, तुम्हारी परवरिश पर सवाल उठाए होते, तो क्या तुम आज इस घर को अपना समझ पातीं?”
प्रभा जी के पास कोई जवाब नहीं था। उनकी नजरें पहली बार फर्श की ओर झुक गईं।
“और तुम कहती हो कि अनन्या को अक्ल नहीं है?” हरिशंकर जी की आवाज में अब एक पिता का गर्व था, “यह बच्ची सुबह उठकर हमारे लिए नाश्ता बनाती है, फिर दिनभर दफ्तर में बैठकर अपनी बुद्धि और मेहनत से सैकड़ों जिम्मेदारियां निभाती है। वह अपने काम में इतनी काबिल है कि बड़े-बड़े अधिकारी उसकी राय का सम्मान करते हैं। लेकिन उसने कभी अपने उस पद, अपनी उस डिग्री या अपनी कमाई का घमंड इस घर में दिखाया? शाम को थककर लौटने के बाद भी वह सबसे पहले तुम्हारे घुटनों में तेल लगाने बैठती है। क्या तुमने कभी उसकी उस ममता, उस सम्मान को देखा? नहीं, तुम्हें सिर्फ डिब्बों में रखा जीरा और राई दिखाई दिया!”
अनन्या की आंखों से आंसू बहकर गालों पर आ गए। वह धीरे से पीछे हटी और रसोई के दरवाजे की ओट में खड़ी हो गई। उसने कभी नहीं सोचा था कि जिस घर में वह खुद को पराया और कमतर महसूस कर रही थी, वहीं कोई उसके मौन संघर्ष को इतनी गहराई से समझ रहा होगा। ससुर के रूप में उसे सचमुच अपने पिता का अक्स दिखाई दे रहा था।
हरिशंकर जी ने प्रभा जी के कंधे पर हाथ रखा और बेहद आत्मीयता से बोले, “प्रभा, संबंध अधिकार से नहीं, आत्मीयता से चलते हैं। तुम सास हो, इस घर की नींव हो। अगर तुम ही चौखट बनकर राह रोक लोगी, तो यह नई पौध कैसे फलेगी-फूलेगी? बहू कोई तराशी हुई मूरत बनकर नहीं आती कि हर सांचे में पहली बार में ही फिट बैठ जाए। उसे वक्त दो, उसे अपनापन दो। अगर तुम उसे प्यार से सिखाओगी, तो वह खुशी-खुशी सीखेगी। लेकिन अगर तुम हर बात पर उसे यह अहसास कराओगी कि वह कुछ नहीं जानती, तो तुम एक अच्छी बहू तो शायद बना लो, लेकिन एक बेटी हमेशा के लिए खो दोगी। और याद रखना प्रभा, अगर तुम उसका साथ नहीं दोगी, तो मैं उसके पीछे हमेशा एक पिता बनकर खड़ा रहूंगा। इस घर की चौखट पर किसी के आत्मसम्मान को ठेस नहीं पहुंचेगी।”
रसोई में एक गहरा सन्नाटा छा गया। सिर्फ चूल्हे पर चढ़ी चाय के खौलने की हल्की आवाज आ रही थी।
प्रभा जी जड़वत खड़ी थीं। हरिशंकर जी के एक-एक शब्द ने उनके भीतर वर्षों से जमे उस झूठे अहंकार को झकझोर कर रख दिया था जिसे वे ‘अनुभव’ का नाम देती आई थीं। उन्हें अचानक अहसास हुआ कि सास बनने की होड़ में वे कब एक संवेदनशील इंसान से एक कठोर आलोचक बन गई थीं। उन्हें अपनी स्वर्गीय सास का चेहरा याद आया, जिन्होंने कभी उन पर ताने नहीं कसे थे, बल्कि हर मोड़ पर उनका हौसला बढ़ाया था।
प्रभा जी धीरे से मुड़ीं। उन्होंने देखा कि दरवाजे के पास खड़ी अनन्या अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछ रही थी। उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बस एक अनकहा दर्द और सहमी हुई उदासी थी।
प्रभा जी के कदम अपने आप अनन्या की तरफ बढ़ गए। उन्होंने आगे बढ़कर अनन्या के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए। अनन्या ने चौंककर नजरें उठाईं।
“मुझे माफ कर दे, बिटिया,” प्रभा जी की भर्राई हुई आवाज निकली। उनकी आंखों में भी पछतावे की नमी थी। “अपने पुराने दिनों की शेखी बघारते-बघारते मैं यह भूल ही गई थी कि पौधे को बड़ा करने के लिए खाद और पानी की जरूरत होती है, धूप की तल्खी की नहीं। तूने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया, मेरा हर हुक्म सिर झुकाकर माना, और मैं मूर्खों की तरह हर बात में तेरी नुक्ताचीनी करती रही। तेरे बाबूजी ने आज मेरी आंखें खोल दीं।”
अनन्या का बांध टूट गया। उसने आगे बढ़कर अपनी सास को गले से लगा लिया। छह महीने का सारा अकेलापन, सारी हिचकिचाहट और सारा डर उस एक आलिंगन में पिघलकर बह गया।
“नहीं मां जी, ऐसा मत कहिए। मैं भी बहुत कुछ सीखना चाहती हूं, बस थोड़ा वक्त चाहिए,” अनन्या ने सिसकते हुए कहा।
प्रभा जी ने स्नेह से उसके आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “वक्त की क्या कमी है बिटिया? अब हम दोनों मिलकर सीखेंगे। आज तू मुझे अपनी वो कंप्यूटर वाली पीपीटी बनाना सिखाना, और मैं तुझे अपने हाथ के बने special भरवां करेले बनाना सिखाऊंगी। मंजूर है?”
रसोई का भारी माहौल एक पल में खिलखिलाहट में बदल गया। बाहर खड़े हरिशंकर जी के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान तैर गई। उन्होंने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि समय रहते अहंकार की दीवार ढह गई और उसकी जगह समझदारी के पुल ने ले ली।
शाम को जब डाइनिंग टेबल पर खाना लगा, तो माहौल बिल्कुल बदला हुआ था। टेबल पर अनन्या की बनाई हुई दाल थी, जिसमें जीरे का ही तड़का लगा था, लेकिन उसका स्वाद आज अलग था—क्योंकि उसमें किसी के डर का नहीं, बल्कि पूरे परिवार के प्यार और सम्मान का स्वाद घुला हुआ था।
अक्सर हमारे घरों में रिश्तों की डोर तानों और अहंकार की वजह से कमजोर पड़ने लगती है। सास अगर मां का दिल और ससुर अगर पिता का संबल बन जाएं, तो किसी भी बेटी के लिए नया घर पराया नहीं रहता।
क्या आपको भी लगता है कि हर परिवार में हरिशंकर जी जैसे एक सुलझे हुए इंसान की जरूरत होती है जो रिश्तों को बिखरने से पहले संभाल ले? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें कमेंट करके जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल