“अरे भाग्यवान, जरा इधर तो देखो!” रमेश जी ने सूटकेस को तखत पर रखते हुए बड़े उत्साह से कहा, “ये देखो, मैंने हमारे पुराने बक्से से यह सूटकेस निकाल लिया है। आज सुबह ही बैंक गया था तो रास्ते में ट्रेवल एजेंट के दफ्तर से होकर आया हूँ। नैनीताल और अल्मोड़ा का पाँच दिन का बड़ा सुंदर टूर पैकेज है। मौसम भी बहुत सुहाना है। आकाश का प्रमोशन हो गया है और उसकी नौकरी भी पक्की है, अब तो कोई बड़ी अड़चन भी नहीं। चलो, दोनों मिलकर दो-चार दिन पहाड़ों की ठंडी हवा खा आते हैं। जिंदगी भर बस फाइलें और दफ्तर के रजिस्टर ही पलटे, अब जब रिटायर हो चुका हूँ तो कुछ दिन सुकून से तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ।”
अन्नपूर्णा ने छीलते हुए मटर के दाने कटोरी में डाले और फिर रमेश जी को ऐसे देखा मानो उन्होंने कोई बचकानी मांग रख दी हो। उनके चेहरे पर वही जानी-पहचानी गंभीर मुस्कान तैर गई जो वो पिछले पैंतीस सालों से किसी भी नई फरमाइश के सामने लाती रही थीं।
“आप भी ना, उम्र के इस पड़ाव पर आकर बच्चों जैसी बातें करने लगते हैं!” अन्नपूर्णा ने पल्लू ठीक करते हुए धीमी आवाज में कहा, “अभी तो बड़े बेटे आकाश का नया-नया काम जमा है। छोटी बेटी मीनाक्षी का एम.कॉम का आखिरी साल चल रहा है। अगले साल उसकी शादी करनी है। समाज में नाक का सवाल होता है। एक बेटी की विदाई कोई खेल थोड़े ही है। पाई-पाई जोड़कर रखनी पड़ती है। आप मुझे जो पेंशन के पैसे और घर खर्च देते हैं, मैं उन्हें अलमारी के लॉकर में सहेज कर रख रही हूँ ताकि बेटी की शादी में किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। बस मीनाक्षी के हाथ पीले हो जाने दीजिए, विदाई की रस्में पूरी हो जाएँ, फिर मैं बिल्कुल फुरसत में हो जाऊँगी। फिर आप जहाँ कहेंगे, मैं आपके साथ खुशी-खुशी चल पड़ूँगी।”
रमेश जी के चेहरे पर छाई खुशी का रंग पल भर में फीका पड़ गया। उन्होंने एक भारी सांस ली और तखत पर बैठते हुए बोले, “अन्नपूर्णा, तुम्हारी यही ‘कल’ वाली बात मुझे भीतर तक डरा देती है। जब हमारी शादी हुई थी, तब तुमने कहा था कि छोटे देवर की पढ़ाई पूरी हो जाए, फिर घूमेंगे। देवर की नौकरी लगी, तो तुमने कहा सास-ससुर बूढ़े हैं, उन्हें अकेला छोड़कर तीर्थ भी नहीं जा सकते। फिर बच्चे हुए, तो उनकी स्कूल की फीस, बोर्ड की परीक्षा, कॉलेज का दाखिला और नौकरी की चिंता। बड़े बेटे की शादी हो गई, घर में इतनी समझदार बहू आ गई, फिर भी तुम्हारा यह ‘कल’ कभी आज नहीं बन पाया। तुम हर पल केवल भविष्य की चिंता में आज के सुख का गला घोंट देती हो। जो पैसे मैं तुम्हें तुम्हारी खुशी के लिए, नई साड़ियों और गहनों के लिए देता हूँ, तुम उन्हें जमा करती रहती हो। कभी सोचा है कि अगर उस ‘कल’ के आने से पहले ही मेरी सांसों की डोर टूट गई, तो क्या करोगी? फिर तिजोरी में रखे उन पैसों को देखकर रोओगी और सोचोगी कि काश उस दिन पति के साथ चार कदम चल ली होती!”
रमेश जी की इस बात ने अन्नपूर्णा के दिल को छू तो लिया, पर उनकी पारंपरिक सोच ने तुरंत इस डर पर पर्दा डाल दिया। उन्होंने तुरंत हाथ आगे बढ़ाकर पति के होंठों पर उंगली रख दी और सिहरते हुए बोलीं, “हे भगवान! सुबह-सुबह यह कैसी अशुभ बातें मुंह से निकाल रहे हैं? भगवान ना करे ऐसा कभी हो। मेरी भी उम्र आपको लग जाए। मैं भला आपके साथ जाने से इनकार कब कर रही हूँ? बस थोड़ा सा धीरज और धर लीजिए। साल-डेढ़ साल की तो बात है। सब काम कायदे से निपट जाएँगे तो मन पर कोई बोझ नहीं रहेगा। फिर आराम से घूमेंगे, बिना किसी फिक्र के।”
रमेश जी ने कोई जवाब नहीं दिया। वे चुपचाप उठे, सूटकेस को कोने में सरका दिया और अखबार उठाकर पढ़ने का नाटक करने लगे। उनकी खामोशी में एक गहरी उदासी छिपी थी, जिसे अन्नपूर्णा अपनी ममता और जिम्मेदारियों के चश्मे से नहीं देख पा रही थीं।
रसोई के दरवाजे पर खड़ी बहू राधिका ने यह पूरी बातचीत अपनी आँखों से देखी और कानों से सुनी थी। उसके हाथ में चाय की ट्रे थी, पर उसके कदम वहीं जम गए थे। सास-ससुर का यह संवाद सीधे जाकर उसके दिल के उस जख्म पर लगा था जो अभी पूरी तरह भरा भी नहीं था। राधिका की आँखों के सामने अपनी माँ कल्याणी और दिवंगत पिता देवेश जी का चेहरा घूम गया।
राधिका के मायके का माहौल भी कुछ ऐसा ही था। उसके पिता एक सीधे-सादे स्कूल शिक्षक थे और माँ कल्याणी त्याग की साक्षात मूरत। कल्याणी जी का भी पूरा जीवन रसोई, चूल्हे-चौके और बचत की डायरी के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ था। देवेश जी जब भी गर्मियों की छुट्टियों में कहीं बाहर जाने का प्रस्ताव रखते, कल्याणी जी यही कहतीं—”अरे सुनिए, अभी बेटी की शादी करनी है, बेटे की इंजीनियरिंग पूरी करानी है। फिजूलखर्ची करके क्या मिलेगा? बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ, फिर दोनों प्राणी जहाँ चाहेंगे घूम आएँगे।”
देवेश जी हमेशा मुस्कुराकर टाल देते थे। उन्होंने मेहनत करके अपनी पाई-पाई जोड़ी और राधिका की शादी बड़े ही अरमानों के साथ आकाश से कर दी। शादी के कुछ ही हफ्तों बाद जब पूरा परिवार खुशियों में डूबा हुआ था, तब देवेश जी ने एक दिन शाम की चाय पीते हुए कल्याणी जी से कहा था, “देखा कल्याणी, बेटी अपने घर चली गई। अब बस एक-दो साल में बेटे की नौकरी लग जाएगी। इस बार हम दोनों दक्षिण भारत के मंदिरों के दर्शन करने चलेंगे। अब तो बहाना मत बनाना।”
पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। उस बातचीत के ठीक पंद्रह दिन बाद, एक सामान्य सुबह देवेश जी सैर से लौटे, सीने में हल्का सा दर्द हुआ और अस्पताल पहुँचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया। वह दिन राधिका और उसकी माँ के जीवन पर वज्रपात बनकर टूटा था। पिता के जाने के बाद कल्याणी जी पूरी तरह टूट चुकी थीं। घर की अलमारी में वह छोटी सी पोटली अब भी वैसी ही रखी थी, जिसमें देवेश जी के दिए हुए पैसे इस उम्मीद में जमा किए गए थे कि ‘फुर्सत’ मिलने पर दोनों साथ घूमेंगे। अब कल्याणी जी घंटों उस पोटली और पति की तस्वीर को देखकर फूट-फूट कर रोया करती थीं। वे बार-बार अपने सीने पर हाथ मारकर कहतीं, “काश! मैंने उनकी बात मान ली होती। काश मैंने उन पैसों से उनकी पसंद की चाय किसी पहाड़ी ढाबे पर पी ली होती। जिम्मेदारियाँ तो कभी नहीं रुकीं, बेटा भी कमाने लगा, पर जिसके साथ जीने का सपना देखा था, वही हाथ छुड़ाकर चला गया।”
राधिका ने अपनी आँखों के कोरों में आए आंसुओं को पल्लू से पोंछा। उसने गहरी सांस ली और मन ही मन एक दृढ़ निश्चय किया। वह अपनी सास को उस अंधेरे कुएं में गिरते हुए नहीं देख सकती थी जहाँ उसकी अपनी माँ आज भी अकेलेपन और पश्चाताप की आग में जल रही थी।
राधिका सधे कदमों से बैठक में आई। उसने चाय की प्याली ससुर जी की मेज पर रखी और दूसरी प्याली अपनी सास अन्नपूर्णा के हाथ में थमा दी। अन्नपूर्णा ने बहू को देखा और प्यार से मुस्कुरा दीं, “जीती रहो बहू! आज चाय में अदरक की खुशबू बहुत अच्छी आ रही है।”
राधिका वहीं कालीन पर सास के घुटनों के पास बैठ गई। उसने अन्नपूर्णा के दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया। उसके चेहरे की गंभीरता देखकर अन्नपूर्णा चौंक गईं, “क्या हुआ राधिका? तबीयत तो ठीक है ना तुम्हारी? कुछ परेशान लग रही हो?”
राधिका ने धीरे से सिर हिलाया और बहुत ही मार्मिक, सधी हुई आवाज में कहना शुरू किया, “मम्मी जी, आज मुझे कुछ कहने की इजाजत दीजिए। अभी-अभी जो बातें आप और पापा जी कर रहे थे, मैंने सब सुनीं। मुझे अचानक अपने मायके की और अपने स्वर्गीय पापा की बहुत याद आ गई।”
अन्नपूर्णा ने चौंककर पूछा, “तुम्हारे पापा की? क्यों बेटा, क्या बात हुई?”
“मम्मी जी, मेरी माँ भी बिल्कुल आपकी ही तरह सोचती थीं,” राधिका का गला भर आया, “मेरे पापा जब भी कहते कि कल्याणी चलो कहीं बाहर घूम आते हैं, चार दिन जिंदगी के सुकून से जी लेते हैं, तो मेरी माँ हमेशा यही कहती थीं कि पहले राधिका की शादी हो जाए, फिर उसके भाई की पढ़ाई पूरी हो जाए, फिर घूमेंगे। पापा जितने भी पैसे माँ को देते, माँ यही सोचकर जमा करती रहीं कि जब सब जिम्मेदारियाँ खत्म हो जाएँगी, तब दोनों साथ बैठकर इन पैसों से खुशियाँ खरीदेंगे।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। रमेश जी ने भी अखबार नीचे रख दिया और बहू की ओर देखने लगे।
राधिका ने आगे कहा, “पापा ने मेरी शादी तो धूमधाम से कर दी मम्मी जी, लेकिन भाई की नौकरी और शादी देखने से पहले ही… एक दिन अचानक दिल का दौरा पड़ने से वे हमें छोड़कर चले गए। उस दिन के बाद से मेरी माँ की दुनिया उजड़ गई। आज मेरे भाई की नौकरी भी लग गई है, घर में पैसे की भी कोई कमी नहीं है, लेकिन मेरी माँ उस खाली घर में केवल पापा की तस्वीर के सामने बैठकर रोती हैं। वे हमेशा कहती हैं कि ‘पैसा तो बच गया, पर जिसके साथ खुशियाँ मनानी थीं, वही इंसान चला गया।’ अब अगर हम उन्हें किसी बड़े से बड़े तीर्थ या हिल स्टेशन पर ले जाने की ज़िद भी करते हैं, तो वे हाथ जोड़ लेती हैं। कहती हैं कि जब तुम्हारे पापा ही नहीं हैं, तो इन आँखों से दुनिया की खूबसूरती देखकर क्या करूँगी? मम्मी जी, खुशियों को स्थगित मत कीजिए। जिम्मेदारियाँ तो जीवन का वो समंदर हैं जिसकी लहरें कभी शांत नहीं होतीं। एक खत्म होगी, तो दूसरी खड़ी हो जाएगी।”
राधिका की आँखों से आंसू टपक कर अन्नपूर्णा के हाथों पर गिर पड़े। उसने अपनी सास की आँखों में देखते हुए विनती भरे स्वर में कहा, “मम्मी जी, मीनाक्षी मेरी भी तो ननद है, मेरी छोटी बहन जैसी है। उसकी पढ़ाई, उसकी शादी और घर की रसोई… क्या इन सब का बोझ संभालने के लिए मैं अभी इतनी काबिल नहीं हुई? क्या आप मुझ पर इतना भरोसा नहीं कर सकतीं कि चार दिन आप घर की चिंता मुझ पर छोड़कर जा सकें? मैं नहीं चाहती कि कल को मेरी माँ की तरह आपको भी कभी यह कहना पड़े कि ‘काश, मैंने उस दिन उनकी बात मान ली होती।’ पापा जी सही कह रहे हैं, उम्र और वक्त किसी का इंतजार नहीं करते। खुशियों का कोई मुकम्मल मुहूर्त नहीं होता, जो पल साथ है, वही सबसे बड़ा त्योहार है।”
राधिका के एक-एक शब्द ने अन्नपूर्णा के दिल पर हथौड़े की तरह वार किया। सालों से उनके भीतर जमी पारंपरिक सोच की बर्फ पल भर में पिघल गई। उन्होंने महसूस किया कि कैसे वे एक काल्पनिक ‘भविष्य’ के चक्कर में अपने जीवित ‘वर्तमान’ की अनदेखी कर रही थीं। उन्होंने सिर उठाकर अपने पति रमेश जी को देखा। उनके सफेद होते बाल, झुर्रियों भरा चेहरा और आँखों में तैरती वही उम्मीद, जो शायद धीरे-धीरे बुझने की कगार पर थी।
अन्नपूर्णा की आँखों से अविरल आंसू बह निकले। उन्होंने झुककर अपनी बहू राधिका को अपने सीने से लगा लिया और उसका माथा चूम लिया। उनका दिल भर आया था।
“तूने मेरी आँखें खोल दीं बहू,” अन्नपूर्णा रुंधे गले से बोलीं, “सच में, जिम्मेदारियों के बोझ तले मैं यह भूल ही गई थी कि जिस इंसान ने अपनी पूरी जवानी हम सबके सपनों को पूरा करने में खपा दी, उसके भी कुछ छोटे-छोटे अरमान होंगे। मैं हमेशा कल के भरोसे आज को टालती रही। अगर आज तूने मुझे यह आईना न दिखाया होता, तो शायद मैं कभी इस सच को समझ ही नहीं पाती।”
अन्नपूर्णा ने अपने आंसू पोंछे और चेहरे पर एक निश्चयी, सुंदर मुस्कान लाते हुए तखत के पास गईं। उन्होंने उस पुराने सूटकेस की धूल को अपने पल्लू से पूरी तरह साफ किया और फिर मुस्कुराते हुए रमेश जी से बोलीं, “सुनिए जी! अब अखबार बंद कीजिए और उस सूटकेस को खोलिए। अपनी बहू की बात मैंने सुन ली है। मैं आपके साथ नैनीताल चलने के लिए तैयार हूँ। और हाँ, मीनाक्षी की शादी की फिक्र अब मैं नहीं करूँगी, जब समय आएगा तो भगवान सब अच्छा ही करेंगे। आप आज ही जाकर दो टिकट बुक करवा लाइए!”
रमेश जी जैसे अवाक रह गए। उन्होंने अपनी पत्नी को देखा, फिर अपनी समझदार बहू को देखा। उनकी आँखों में बरसों बाद एक नई उमंग, एक नई चमक लौट आई थी। ऐसा लगा जैसे उनके चेहरे से दस साल की उम्र अचानक घट गई हो। उनका पूरा चेहरा एक आत्मीय, खिली हुई मुस्कान से भर गया।
“अरे सच कह रही हो अन्नपूर्णा?” रमेश जी ने अपनी लाठी एक तरफ रखते हुए हँसकर पूछा।
“बिल्कुल सच! और सुनिए, पैकिंग मैं खुद करूँगी, आप बस जाकर वो टिकटें पक्की कराइए,” अन्नपूर्णा ने इतराते हुए कहा, तो पूरे कमरे में एक मधुर हंसी गूंज उठी।
उस दिन उस घर की चौखट केवल एक सफर की गवाह नहीं बनी, बल्कि उस पुरानी सोच की विदाई की भी गवाह बनी जो इंसान को वर्तमान में जीने से रोकती है। जिंदगी किसी की मोहताज नहीं होती, और न ही वक्त किसी के लिए रुकता है। हम अक्सर अपने जीवनसाथी को अपनी दुनिया मान तो लेते हैं, पर उसी दुनिया के साथ दो पल तसल्ली से बिताना भूल जाते हैं। घर-गृहस्थी, बच्चे और समाज की जिम्मेदारियाँ निभानी जरूरी हैं, पर उन जिम्मेदारियों के बीच अपने सबसे करीबी हमसफर का हाथ थामकर दो कदम खुशी के चलना उससे भी ज्यादा जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि जिम्मेदारियों की फेहरिस्त तो पूरी हो जाए, लेकिन साथ चलने वाला हमसफर ही रास्ते में छूट जाए और पीछे सिर्फ खाली हाथ और पछतावे के आंसू रह जाएँ।
आपके विचार हमारे लिए अनमोल हैं: क्या आपके आस-पास भी कोई ऐसा है जो परिवार की जिम्मेदारियों के चक्कर में अपनी खुशियों और अपने जीवनसाथी के अरमानों को टालता रहता है? क्या आपको लगता है कि हर औरत को अपनी बहू या बेटी के रूप में ऐसी समझदार सोच की जरूरत है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : बिना शर्मा