बाबूजी की बापसी – मनीषा भरतिया 

रामलाल जी अपनी धर्म पत्नी के साथ नैनीताल के एक छोटे से कस्बे में रहते थे। शादी को 5 साल होने को आए, लेकिन उन्हें कोई औलाद नहीं हुई। इस वजह से वह और उनकी धर्मपत्नी सविता बहुत चिंतित और परेशान रहते थे। घर में धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी……क्योंकि रामलाल जी की सरकारी … Read more

इंतजार कैसा – ऋतु गर्ग

 सूखे पड़े गमलों को रीता झांक झांक कर देख रही थी।  क्या हो गया है सभी पौधे सूख कैसे गए???  क्या वक्त की मार ने इन्हें भी सुखा दिया था?  यह तो बहुत हरे-भरे दिखते थे कभी एक पीला पत्ता भी कभी गलती से भी दिखाई नहीं देता था। ओर ओर नानी को क्या हो … Read more

“वक्त का तराज़ू ” – कविता भड़ाना

“प्रिया की जब आंखें खुली तो उसने खुद को अस्पताल के बेड पर पाया। उसके हाथ को थामे पास बैठे सुधांशु को देख प्रिया के होंठ फड़फड़ाए और धीरे से बोली “पानी”.. सुधांशु ने प्रिया को पानी पिलाया और डाक्टर को बुलाने चला गया। प्रिया की आंखों के सामने पिछली रात की घटना चलचित्र की … Read more

वक्त वक्त की बात  – आरती झा आद्या

पार्वती कल तुम्हें भी मेरी रिटायरमेंट पार्टी के लिए ऑफिस चलना है….अधिकारी सुरेंद्र श्रीवास्तव ने कहा। मुझे क्यों…पार्वती ने आश्चर्य से सुरेंद्र की ओर देखा। ऑफिस कर्मचारियों की इच्छा है तो मुझे हां करना पड़ा…बहुत ही दुःखी होते हुए सुरेंद्र ने कहा। ओह तभी.. पार्वती कहती है लेकिन सुरेंद्र बिना कोई ध्यान दिए चाय के … Read more

अंजाम – पृथ्वीराज

निलेश को आज ट्यूशन क्लास आने में कुछ देर हो गई थी, क्लास तो शुरू हो चुकी थी, पर वो अच्छा स्टूडेंट था इसलिए Sir ने उसे कुछ नहीं कहा.. वो अंदर आ कर बैठ गया.. पर आज बहुत परेशान लग रहा था.. आंखे भी लाल थी.. शायद रात भर जाग कर रोया था, क्लास … Read more

प्रतियोगिता  – अंतरा 

रेणु जी एक डिग्री कालेज की प्रिन्सिपल हैं। आज डिग्री कालेज में प्रतियोगिता है। हर साल रेणु जी प्रतियोगिता रखती है जो कि हर बार ही कुछ अलग होती है। इस साल भी किसी को नहीं पता कि प्रतियोगिता में क्या होने वाला है। मैदान बच्चों और अध्यापकों से खचाखच भरा हुआ है। रेणु जी … Read more

चांद बालियां* – अर्चना नाकरा

मीनू ..’अपनी दादी के संदूक को अजायबघर कहती थी’ कोई भी  ऐसी चीज नहीं थी जो दादी के बड़े से संदूक में ना हो ! और दादी ..उस पर बड़ा सा मोटा सा ताला लगा कर रखती थी ‘ताला भी अस्सी साल पुराना था’ दादी की मां ने.. दादी को दिया था मीनू अक्सर उस … Read more

लापता – पुष्पा जोशी

अब तुम्हारी इस मार का और तुम्हारी भद्दी गालियों का कोई असर नहीं होता मुझपर। हरसू तुम्हारी हर पल यही मंशा रहती है,कि मैं कुछ कहूं और तुम दुगनी रफ्तार से मुझ पर वार करो, लातों के और शब्द बाणों के,मगर मैं ऐसा नहीं करूंगी । मैं पहले तुम्हें रोकती थी, तुम पर कुछ विश्वास … Read more

स्लम डॉग्स – रवीन्द्र कान्त त्यागी

एक चमचमाती सफ़ेद वॉल्वो बस गाँव के कच्चे रास्ते पर हिचकोले खाती हुई बरगद के पेड़ के नीचे आकर ठहर गई। जोहड़ में नगधड़ंग नहाते बच्चे, सिर पर घास का गट्ठर लादकर खेत से लौटती घसियारनें, बैलों का पगहा थामकर थके हारे धूल में अटे हरवाहे और हुक्का गुड्गुड़ाते झुर्रीदार मूछों वाले बुजुर्ग जिज्ञासू निगाहें … Read more

रंग भरिये अपने ख़्वाबों में… – संगीता त्रिपाठी 

“क्या माँ, आप ठीक से इंग्लिश भी नहीं बोल पाती हैं। पता हैं, आज आपके गलत इंग्लिश बोलने को लेकर मेरा कितना मजाक उड़ा।”स्कूल से लौटी नन्ही मीनल ने माँ से शिकायत की। बेटी की नजरों में अपनी अवहेलना देख मीता थोड़ा उदास हो गई।उसकी पढ़ाई -लिखाई हिंदी मीडियम से हुई। बच्चों को इंग्लिश मीडियम … Read more

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