मां का अकेलापन – गीता वाधवानी

 “मम्मी, मैं चलती हूं कैब आ गई है।”   मम्मी( राधा देवी) ने कहा-” नैनसी, सुन तो बेटा, फिर कब आएगी, अबकी बार तो बहुत दिनों बाद आई है। इसी शहर में अपना ट्रांसफर क्यों नहीं करवा लेती। अब मैं और अकेली नहीं रह सकती। मेरा बिल्कुल मन नहीं लगता तेरे बिन। देख लेना किसी दिन … Read more

खामोशी और झंकार: एक अनकहे अहसास की कहानी

रात के करीब आठ बज रहे थे। बाहर बारिश की हल्की फुहारें गिर रही थीं और बालकनी में बैठी अंजलि अपनी पड़ोसन विशाखा के साथ ठहाके लगाकर हंस रही थी। उनकी हंसी की आवाज़ बेडरूम तक आ रही थी, जहाँ समीर अपने लैपटॉप पर ऑफिस का कुछ ज़रूरी काम निपटाने की कोशिश कर रहा था। … Read more

बेड़ियों की उड़ान

“ये आप क्या कह रहे हैं? अवनि अभी अपनी मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करना चाहती है, उसका सपना एक सिविल सर्विस ऑफिसर बनने का है।” “अरे तो मैं कहाँ मना कर रहा हूँ। शादी के बाद अपने ससुराल में बैठकर जितनी मर्जी किताबें पढ़ ले। तुम अपना ये फालतू का ज्ञान देना बंद करो और … Read more

रिश्तों की असली वसीयत

शहनाई की गूंज और गेंदे के फूलों की महक से पूरा घर महक रहा था। घर के आंगन में शामियाना लगा हुआ था और मेहमानों की चहल-पहल से एक उत्सव का माहौल बना हुआ था। आज कावेरी जी की इकलौती बेटी शिखा की हल्दी की रस्म थी। कावेरी जी अपने माथे का पसीना पोंछते हुए … Read more

दौलत का भ्रम

दीपावली का समय था और पूरे घर में रौनक छाई हुई थी। घर की बड़ी बहू निर्मला हमेशा की तरह रसोई से लेकर मेहमानों के स्वागत तक की सारी जिम्मेदारियां चुपचाप निभा रही थी। वहीं छोटी बहू, राखी, अपने महंगे रेशमी कपड़ों और भारी गहनों से लदी, बस सोफे पर बैठकर अपनी बेटी तान्या के … Read more

जिंदगी की धूप और छाँव

 रेस्टोरेंट के एक कोने वाली टेबल पर दो लोग आमने-सामने बैठे थे। मेज पर रखी चाय से उठती भाप उन दोनों के बीच पसरी खामोशी को और भी गहरा कर रही थी। माधव, जिसकी उम्र पैंतीस के पार हो चुकी थी, अपनी चाय के कप को दोनों हाथों से पकड़े हुए कुछ सोच रहा था। … Read more

घर ईंटों से नहीं, दिलों से बनता है – शशि नरूला

एक गाँव में नीलम नाम की एक लड़की रहती थी। उसके पिता बढ़ई थे और माँ सिलाई का काम करती थीं। उनका घर बहुत छोटा था। घर में केवल दो कमरे थे और सुविधाएँ भी बहुत कम थीं। लेकिन उस घर में प्रेम, सम्मान और अपनापन इतना था कि वहाँ आने वाला हर व्यक्ति खुश … Read more

रिश्तो की कीमत – एम पी सिंह ‘मोहि”

नीलम शादी करके ससुराल पहुची, वो बहुत खुश थी। परिवार में पति और ससुर के अलावा कोई नहीं था। पति आनंद की अच्छा पड़ा लिखा, सरकारी नौकरी मैं था. सब ठीक चल रहा था, ओर जल्दी ही वो पति औऱ ससुर की चहेती बन गई। नीलम से ससुर एक सेवानिवृत सरकारी अधिकारी थे. अच्छी सोसाइटी … Read more

रिश्तों की कीमत – करुणा मलिक

प्रकाश के पापा, मुझे लगता है कि वसीयत लिखकर वकील के पास रखने में ही ठीक रहेगा वरना प्रभात की बहू हमारे मरते ही तुरंत घर- जमीन के दो टुकड़े करवा देगी और औने-पौने दाम में बिकवा कर चलती बनेगी।  हाँ, कह तो तुम ठीक रही हो पर क्या दोनों बेटियाँ अपना हिस्सा लेंगी? वे  … Read more

रिश्तों की कीमत – डाॅ संजु झा

रिश्तों की कीमत व्यक्ति को कब,किस रूप में चुकानी पड़ जाऍं, कोई नहीं बता सकता है? मैं सीमा अपने व्यस्त जीवन में  उलझी हुई आज फिर  काॅलेज के लिए लेट हो गई।काॅलेज में गाड़ी से उतरते हुए मैं जल्दी -जल्दी अपने क्लास रूम की ओर बढ़ रही थी,तभी मेरी नजर अचानक से एक लड़की पर … Read more

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