आँचल की ममता

 मयंक ने अपनी बहन को देखा और उसके गले लगकर छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो पड़े, “नीरजा… देख ना क्या हो गया। तेरी भाभी ने आँखें नहीं खोली हैं कल से। डॉक्टर कह रहे हैं कि अगले चौबीस घंटे बहुत नाज़ुक हैं। अगर उसे कुछ हो गया तो मैं कैसे ज़िंदा रहूँगा? उसने अपनी पूरी ज़िंदगी हम सबके लिए लुटा दी, कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा। भगवान इतना निर्दयी कैसे हो सकता है?”

 नीरजा तवे पर रोटियाँ सेंकने की तैयारी में थी। हाथ पर लगा सूखा आटा और चकले-बेलन की आवाज़ के बीच अचानक दरवाज़े की घंटी ज़ोर से बजी। नीरजा थोड़ी हैरान हुई क्योंकि उसके पति आलोक के दफ़्तर से लौटने का यह सामान्य समय नहीं था। वह अक्सर रात आठ बजे से पहले घर नहीं आते थे। हाथों को पल्लू से हल्का सा पोंछते हुए नीरजा ने लपककर दरवाज़ा खोला। सामने आलोक को थके और परेशान चेहरे के साथ खड़े देखकर उसके पाँव ठिठक गए। उनके माथे पर पसीने की बूँदें छलक रही थीं और आँखों में एक अजीब सी बेचैनी तैर रही थी।

“आप इस समय? सब खैरियत तो है ना? तबीयत तो ठीक है आपकी?” नीरजा ने घबराकर पूछा।

आलोक ने अंदर कदम रखा, अपने जूते उतारे और गंभीर आवाज़ में बोले, “नीरजा, पहले रसोई से एक गिलास ठंडा पानी लाओ और ज़रा मेरे पास बैठो।”

नीरजा के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने जल्दी से नल के नीचे हाथ धोए, एक स्टील के गिलास में पानी भरकर आलोक को दिया। आलोक ने एक ही साँस में आधा गिलास पानी पिया और फिर नीरजा का हाथ थामते हुए बोले, “नीरजा, हिम्मत रखना। शाम करीब साढ़े चार बजे तुम्हारे मायके से तुम्हारे बड़े भाई मयंक का फोन आया था। आज दोपहर को बाज़ार जाते वक्त तुम्हारी बड़ी भाभी वंदना की गाड़ी का एक बड़ा एक्सीडेंट हो गया है। उन्हें जबलपुर के मेट्रो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। सिर और छाती में गंभीर चोटें आई हैं और हालत बहुत नाज़ुक है। मयंक पूरी तरह टूट चुके हैं। हमें कल सुबह की पहली ट्रेन से किसी भी हाल में जबलपुर निकलना होगा।”

आलोक की बात सुनते ही नीरजा के कानों में सन्नाटा छा गया। लगा जैसे ज़मीन खिसक गई हो। उसकी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। “भाभी… मेरी वंदना भाभी?” उसके मुँह से केवल इतना ही निकला और आँखें आंसुओं से डबडबा गईं।

आलोक ने उसके कंधे पर हाथ रखकर सहारा दिया, “नीरजा, खुद को संभालो। इस वक्त मयंक भैया को तुम्हारी ज़रूरत है। रोने से काम नहीं चलेगा। तुम घर का काम निपटाकर बैग तैयार कर लो, मैं तब तक अपने ऑफिस के कुछ ज़रूरी ईमेल भेज देता हूँ और छुट्टियों की अर्ज़ी डाल देता हूँ।”

आलोक अपने कमरे में चले गए, पर नीरजा की देह जैसे पत्थर हो चुकी थी। किसी तरह उसने रसोई का चूल्हा बुझाया, बर्तनों को समेटा और भारी कदमों से बेडरूम की तरफ बढ़ी। सफर के लिए कपड़े सूटकेस में रखते-रखते उसकी आँखें लगातार बह रही थीं। जब रात के बारह बजे घर में सन्नाटा छा गया और आलोक सो गए, तो नीरजा बिस्तर पर करवटें बदलते हुए अतीत की उन गलियों में खो गई, जहाँ उसकी भाभी की यादें महक रही थीं।

नीरजा की आँखों के सामने सात साल पुराना वह मंज़र जीवंत हो उठा, जब वंदना भाभी पहली बार दुल्हन बनकर उस घर में आई थीं। लाल रेशमी जोड़े में लिपटी, पैरों में लाल महावर और छम-छम बजती पायल की रुनझुन के साथ जब भाभी ने घर की दहलीज़ पर रखे चावल के कलश को अपने दाहिने पाँव से हल्का सा ठोकर मारकर अंदर कदम रखा था, तो पूरा घर रोशनी से नहा उठा था। गेहुंआ रंग, चेहरे पर बच्चों जैसी निश्चल मुस्कान, बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें और घुटनों तक लहराती घनी वेणी। जो कोई भी उन्हें देखता, बस देखता ही रह जाता था। पूरे मोहल्ले में चर्चा थी कि मयंक भैया के लिए साक्षात अन्नपूर्णा और लक्ष्मी घर आई हैं।

घर में सब कुछ बहुत सुंदर चल रहा था। माँ, जो बरसों से बीमार रहती थीं, बहू के आने से बेहद खुश थीं। वे कहती थीं कि अब उनकी गृहस्थी का जिम्मा एक सुलझी हुई बेटी के हाथ में आ गया है। मगर नियति के क्रूर फैसले कौन टाल सकता है! नियति का खेल बड़ा ही अजीब और निर्मम होता है। भाई के ब्याह को मुश्किल से ढाई महीने ही बीते थे कि एक रात माँ सोईं और फिर अगली सुबह कभी नहीं जागीं। दिल का एक ज़ोरदार दौरा पड़ा और माँ हमेशा के लिए अपनी आँखें मूँद गईं।

माँ के जाने के बाद घर पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। तेरह दिनों तक तो नाते-रिश्तेदार, सगे-संबंधी और पड़ोसी आते-जाते रहे, इसलिए दिन कैसे कटे पता ही नहीं चला। पर जैसे ही तेरहवीं बीती और रिश्तेदार अपने-अपने घरों को लौट गए, घर में पसरा वह सन्नाटा नीरजा को निगलने लगा। नीरजा उस वक्त मुश्किल से उन्नीस साल की थी, कॉलेज में पढ़ती थी। माँ के चले जाने से उसका संसार उजड़ चुका था। वह दिन-रात कोने में बैठकर सिसकती रहती, खाना-पीना छोड़ दिया था।

ऐसे नाज़ुक और भयानक दौर में वंदना भाभी ने जो किया, वह कोई देवी ही कर सकती थी। नई-नवेली दुल्हन, जिसके हाथों की मेहंदी का रंग अभी फीका भी नहीं पड़ा था, जिसके मन में अपने पति के साथ एकांत और प्रेम के अनगिनत सपने सजे थे, उसने अपने सारे अरमान एक तरफ रख दिए। मयंक भैया से बात करके भाभी रात को अपना कमरा छोड़कर नीरजा के छोटे से कमरे में आ जाती थीं। पूरी-पूरी रात वे नीरजा को अपने सीने से चिपकाए रखती थीं। जब नीरजा रोते-रोते हिचकियाँ लेने लगती, तो भाभी उसके बालों में अपनी उंगलियाँ फेरतीं, उसकी पीठ थपथपातीं और लोरी की तरह धीमे स्वर में कहतीं, “पगली, क्यों रोती है? माँ कहीं नहीं गईं, वे तेरे ही पास हैं। और जब तक तेरी यह भाभी ज़िंदा है, तू खुद को अनाथ मत समझना। मैं तेरी माँ भी बनूँगी और तेरी सहेली भी।”

उस समय नीरजा इतनी समझदार नहीं थी कि यह समझ पाती कि किसी नई-नवेली दुल्हन के लिए अपने पति के प्रेम भरे पलों को छोड़कर ननद के आँसू पोंछने के लिए जागना कितना बड़ा त्याग होता है। भाभी ने अपनी गृहस्थी के शुरुआती सबसे हसीन महीने नीरजा के टूटे हुए मन को जोड़ने में लगा दिए। सुबह चार बजे उठकर पूरे घर की ज़िम्मेदारी संभालना, नीरजा के लिए नाश्ता और कॉलेज का टिफिन बनाना, मयंक भैया का हौसला बढ़ाना और शाम को नीरजा के साथ बैठकर उसकी पढ़ाई में मदद करना—भाभी ने खुद को पूरी तरह इस परिवार में होम कर दिया था।

जब नीरजा की शादी आलोक से तय हुई, तो भाभी ने अपनी शादी के कई अनछुए गहने नीरजा के बक्से में रख दिए थे। जब मयंक भैया ने टोकना चाहा था, तो भाभी ने डांटते हुए कहा था, “खबरदार जो एक शब्द भी बोला! नीरजा मेरी सिर्फ ननद नहीं, मेरी पहली औलाद जैसी है। मेरी बेटी विदा हो रही है, मैं कोई कमी नहीं रहने दूँगी।” विदाई के समय जब नीरजा कार में बैठकर रो रही थी, तो भाभी ने खिड़की से उसका हाथ पकड़कर हँसते हुए कहा था, “पगली, ससुराल जा रही है, रोना बंद कर। कभी कोई तकलीफ हो तो बस अपनी भाभी को याद करना, मैं सब ठीक कर दूँगी।”

और आज वही ममता की मूरत, वही वंदना भाभी ज़िंदगी और मौत के दोराहे पर खड़ी थीं! यह सोचते-सोचते नीरजा का तकिया आंसुओं से पूरी तरह भीग चुका था। उसने रात भर हाथ जोड़कर भगवान से सिर्फ एक ही भीख माँगी कि उसकी भाभी की साँसों को सलामत रखे, चाहे इसके बदले उसकी अपनी उम्र का कोई हिस्सा कट जाए।

सुबह की पहली किरण फूटते ही आलोक और नीरजा स्टेशन के लिए निकले और ट्रेन पकड़कर दोपहर तक जबलपुर पहुँच गए। ऑटो से सीधे मेट्रो हॉस्पिटल की बड़ी इमारत के सामने उतरे। अस्पताल के गलियारे में फिनाइल और दवाइयों की तीखी गंध हवा में तैर रही थी। जैसे ही नीरजा ने आईसीयू के बाहर कदम रखा, सामने का दृश्य देखकर उसका दिल दहल गया।

मयंक भैया दीवार से सिर टिकाए फर्श पर बैठे थे। उनके बाल बिखरे हुए थे, आँखें रोते-रोते सूजकर लाल हो चुकी थीं और कपड़े अस्त-व्यस्त थे। जिस भाई को नीरजा ने हमेशा एक चट्टान की तरह मज़बूत देखा था, वह आज एक तिनके की तरह कांप रहा था।

नीरजा दौड़कर अपने भाई के पास पहुँची और घुटनों के बल बैठ गई, “भैया!”

मयंक ने अपनी बहन को देखा और उसके गले लगकर छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो पड़े, “नीरजा… देख ना क्या हो गया। तेरी भाभी ने आँखें नहीं खोली हैं कल से। डॉक्टर कह रहे हैं कि अगले चौबीस घंटे बहुत नाज़ुक हैं। अगर उसे कुछ हो गया तो मैं कैसे ज़िंदा रहूँगा? उसने अपनी पूरी ज़िंदगी हम सबके लिए लुटा दी, कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा। भगवान इतना निर्दयी कैसे हो सकता है?”

आलोक ने मयंक को सहारा देकर उठाया और ढांढस बँधाया। नीरजा ने आईसीयू के कांच के बड़े दरवाज़े से अंदर झाँका। अंदर का दृश्य देखकर उसकी रूह काँप गई। वही खूबसूरत, हँसमुख भाभी आज अनगिनत नलियों और मशीनों के घेरे में बेसुध पड़ी थीं। सिर पर सफेद पट्टी बँधी थी और मॉनिटर पर उनकी दिल की धड़कनों की धीमी लकीरें ऊपर-नीचे हो रही थीं। नीरजा के पाँव मानो ज़मीन में गड़ गए थे। वह अपनी उस चहकती हुई भाभी को इस हाल में देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।

तभी आईसीयू का भारी दरवाज़ा खुला और मुख्य न्यूरोसर्जन बाहर आए। उनके चेहरे पर संतोष की एक हल्की सी लकीर थी। उन्होंने अपने स्टेथोस्कोप को गले से निकालते हुए मयंक से कहा, “मिस्टर मयंक, आपके लिए एक बहुत अच्छी खबर है। पेशेंट ने हमारी दवाओं पर बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। पिछले एक घंटे में उनकी पल्स और बीपी सामान्य हो गए हैं। अंदरूनी रक्तस्राव रुक चुका है। वे अब खतरे से पूरी तरह बाहर हैं। उन्हें होश आ रहा है और वे किसी ‘नीरजा’ का नाम बहुत धीमी आवाज़ में बार-बार ले रही हैं। आप में से कोई एक व्यक्ति अंदर जाकर उनसे बहुत संक्षेप में मिल सकता है।”

मयंक ने तुरंत नीरजा के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “नीरजा, तू जा। वह कल से बेहोशी में भी सिर्फ तेरा नाम ले रही थी। तू ही उसकी असली ताकत है, जा उससे मिल।”

नीरजा ने अपने कांपते हाथों से अपनी आँखों के आँसू पोंछे, जूते उतारे, सैनिटाइज़र से हाथ साफ किए और भारी कदमों से आईसीयू के भीतर दाखिल हुई। मशीनों की ‘बीप-बीप’ की आवाज़ के बीच वह धीरे-धीरे वंदना भाभी के बेड के पास पहुँची। भाभी का चेहरा पीला पड़ा था, होंठ सूखे हुए थे। नीरजा ने अत्यंत कोमलता से अपना दायाँ हाथ भाभी के ठंडे हाथ पर रख दिया और रुंधे हुए गले से फुसफुसाई, “भाभी… मैं आ गई हूँ।”

उस स्पर्श में शायद रक्त के रिश्तों से भी गहरा कोई आत्मिक खिंचाव था। वंदना भाभी की पलकों में हल्की सी हलचल हुई। उन्होंने बहुत धीरे से, बहुत प्रयास करके अपनी भारी आँखें खोलीं। जैसे ही उनकी दृष्टि नीरजा के आंसुओं से भीगे चेहरे पर पड़ी, उनके सूखे होंठों के कोनों पर वही जानी-पहचानी, ममतामयी निश्चल मुस्कान तैर गई। भाभी ने अपनी कमजोर उंगलियों से नीरजा की हथेली को हल्का सा दबाया।

ऑक्सीजन मास्क के भीतर से उनकी बहुत धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज़ निकली, “पगली… तू रो क्यों रही है? देख, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। जब तक तेरी यह भाभी है, तुझे किसी बात से डरने की ज़रूरत नहीं है। मैंने कहा था ना कि मैं हर मुश्किल में तेरे साथ हूँ।”

भाभी के वे शब्द नीरजा के कानों में किसी अमृत की तरह घुल गए। यह वही आवाज़ थी, वही शब्द थे जो सात साल पहले माँ के गुजरने के बाद भाभी ने उसके आँसू पोंछते हुए कहे थे। आज इतनी बड़ी दुर्घटना और असहनीय दर्द के बीच भी उस स्त्री को अपने दर्द की नहीं, अपनी ननद के आंसुओं की फिक्र थी।

नीरजा ने झुककर भाभी के माथे को चूम लिया और अपने दोनों हाथों में उनका हाथ थामकर अपने गाल से लगा लिया। इस बार जो आँसू नीरजा की आँखों से बहे, वे किसी खौफ या पीड़ा के नहीं थे, बल्कि उस असीम कृतज्ञता, श्रद्धा और आनंद के थे जो इंसान को ईश्वर के साक्षात दर्शन के बाद महसूस होते हैं।

बाहर आकर जब नीरजा ने मयंक भैया और आलोक को यह बात बताई, तो मयंक की आँखों से भी खुशी के आँसू बह निकले। आलोक ने मुस्कुराते हुए कहा, “जिस घर में भाभी के रूप में ऐसी ममतामयी माँ की छाँव हो, उस परिवार पर कोई भी संकट कभी टिक नहीं सकता।”

अस्पताल के उस गलियारे में अब कोई खौफ नहीं था। ग्वालियर की धूप से लेकर जबलपुर के उस अस्पताल तक, नीरजा के दिल में सिर्फ एक ही बात गूँज रही थी कि दुनिया में रिश्ते चाहे कितने भी अनमोल हों, पर जब एक भाभी अपनी ननद के लिए माँ का आँचल पसार देती है, तो वह मायके की सबसे बड़ी खुशहाली और सुरक्षा की चाबी बन जाती है।

एक भरे-पूरे परिवार में जब माँ का साया सिर से उठ जाता है, तो उस खालीपन को अपनी निस्वार्थ ममता और सेवा से भरना किसी भी नई बहू के लिए बहुत बड़ी परीक्षा होती है। क्या आपकी नज़रों में भी भाभी का दर्जा सिर्फ एक रिश्तेदार तक सीमित न होकर माँ की उस ममतामयी छाँव जैसा हो सकता है जो पूरे मायके को एक सूत्र में पिरोकर रखती है? अपने जीवन के इस तरह के आत्मीय अनुभवों और विचारों को नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर साझा करें।

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मूल लेखिका : उषा विजय शिशिर 

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