अब दादी की बारी सुख पाने की… – संध्या त्रिपाठी

..दादी, मैं जब बड़ी हो जाऊंगी ना, तो बड़े शहर में जाऊंगी… वो भी हवाई जहाज से…! तब आपको हवाई जहाज में बिठाकर अपने साथ ले जाऊंगी….!

​बचपन में ऐसे हसीन ख्वाब देखने वाली हिमांशी कब बड़ी हो गई… समय को जैसे पंख लग गए थे..।

 अपनी कड़ी मेहनत, लगन और मंजिल तक पहुँचने के अटूट हौसले ने उसे आखिरकार मेट्रो सिटी की एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी दिलवा ही दी…!

धीरे-धीरे वो शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में व्यवस्थित होने लगी…।

​एक बार छुट्टियों में जब हिमांशी घर आई… तो उसने ऐलान कर दिया, “दादी… इस बार आपको तैयार रहना है…. मम्मी-पापा को बाद में, सबसे पहले मैं आपको अपने साथ ले जाऊँगी…।

​दादी और पोती का रिश्ता बिल्कुल दोस्ताना था… दोनों की आपस में खूब पटरी बैठती थी । 

आखिरकार, पूरी प्लानिंग के साथ दमयंती जी (दादी) अपनी पोती के साथ मुंबई के लिए हवाई जहाज में सवार हुईं।

​आसमान की सैर और सत्तर वर्षीय दादी की मासूम खुशी…

​पहली बार हवाई जहाज में बैठीं सत्तर वर्षीय दमयंती जी किसी छोटे बच्चे की तरह चहक रही थीं। एयरपोर्ट की हर एक चीज को वो बड़ी उत्सुकता और हैरानी से देख रही थीं। दादी के चेहरे की इस खुशी को देखकर हिमांशी का दिल भी आनंद से भर गया…!

​मुंबई एयरपोर्ट पर लैंड करते ही हिमांशी ने प्यार से पूछा, “कैसा अनुभव रहा दादी, हवाई जहाज में यात्रा का….?

​दादी ने गदगद होकर कहा,

 “का कहें  बिट्टी….! जो काम हमरे बेटा-पोतवा ना कर पइले, ऊ हमार पोतीया कर देले..। (जो काम मेरे बेटा और पोता नहीं कर पाए वो मेरी पोटी कर दी)

​घर पहुँचते ही सफर की थकान के कारण दादी बोलीं, “तनिक सिर पीरा थ हमार…” (थोड़ा सिर दर्द हो रहा है मेरा)।

​हिमांशी तुरंत बोल पड़ी… सिर दबा दूँ ?

अरे नाही बिट्टी….

अरे दादी…! मैं कल ही आपका हेड मसाज करवा दूँगी… खूब मजा आएगा, बड़ा सुकून मिलता है! चलिए-चलती, मैं आपको शहर के सारे सुख यहीं दिलाऊँगी….

​दादी ने बिना कुछ कहे बस एक प्यार भरी मुस्कान दे दी।

​अगले दिन अप्वाइंटमेंट लेकर हिमांशी अपनी दादी को एक प्रतिष्ठित और आधुनिक पार्लर ले गई…। 

अपनी बारी आने पर दमयंती जी को एक आरामदायक कुर्सी पर बिठाया गया। हिमांशी पास ही खड़ी थी ताकि दादी को किसी भी तरह की असहजता महसूस न हो।

​एक युवा मेल ब्यूटीशियन व्हीलचेयर से उन्हें अंदर लाया। उसने बहुत करीने से दादी के बाल धुलाए और हेयर ड्रायर से सुखाए। 

शुरुआत में दमयंती जी को थोड़ी असुविधा और झिझक जरूर हुई, लेकिन हिमांशी ने उन्हें शांत रहने का संकेत दिया और प्यार से उनका गाल सहलाते हुए बोली, “देखना दादी, अभी सिर में मसाज होगी, आपको बहुत अच्छा लगेगा…!

​थोड़ी देर बाद, ब्यूटीशियन कई तरह की खुशबूदार क्रीम और तेल सिर में लगाने लगा..।

 एक लंबा-चौड़ा, आकर्षक नौजवान युवक बुजुर्ग दादी की ये सब सेवा कर रहा था। कुछ देर तक तो दमयंती जी चुपचाप सब देखती रहीं, क्योंकि हिमांशी पहले ही उन्हें समझा-बुझाकर लाई थीं।

​पर भला दादी का धैर्य कब तक बंधा रहता…? 

जैसे ही मौका मिला, दमयंती जी ने बिना झिझक के अपना पहला सवाल दाग दिया—

​”का हो बचवा… एकरे अलावा तोहार काम का ह…?”

(इसके अलावा तुम्हारा काम क्या है)

​शायद ब्यूटीशियन दादी की भाषा समझ गया था। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “माताजी, यही मेरा काम है।

​दादी ने अगला तीर छोड़ा, “नहीं, हमारा मतलब… 

कोनो नौकरी-वोकरी…”

​”अरे दादी! अब चुप भी करो ना!” हिमांशी ने झेंपते हुए उन्हें तुरंत रोक दिया। ब्यूटीशियन भी मंद-मंद मुस्कुरा कर रह गया।

​धीरे-धीरे सिर की मालिश जारी रही.. मन में चल रहे कुतूहल को शांत किए बिना दादी से कहाँ रहा जाता..? उन्होंने तुरंत दूसरा सवाल पूछ लिया—

​”ई बतावा, अपने माई के कबहु मालिश कइले हउआ…?

(ये बताओ अपनी मां का कभी मालिश किया हो)

​इस बार हिमांशी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने गुस्से से दादी की तरफ देखा और बोली.. बस भी करिए दादी..! 

सॉरी  भैया … हिमांशी ने ब्यूटीशियन से कहा..!

​ब्यूटीशियन कुछ पल के लिए शांत रहा। फिर उसने बड़े ही अदब और भावुक होकर कहा—

​”कोई बात नहीं मैडम, माता जी को बोलने दीजिए। वो बिल्कुल सही तो पूछ रही हैं..!

 हजारों-लाखों लोगों को अपनी सेवा देकर खुश करने के बाद भी, मैंने कभी अपनी माँ के बारे में ऐसा सोचा ही नहीं…”

​”यदि उन्हें भी कभी ऐसी मसाज मिल जाती, तो सिर्फ उनका मन ही नहीं, दिल भी खुश हो जाता। 

मैडम, जो बात आपने अपनी दादी के लिए सोची, वर मैं अपनी माँ के लिए क्यों नहीं सोच पाया…?

​पार्लर से बाहर निकलते वक्त, दमयंती जी अपने हल्के-फुल्के और रिलैक्स्ड बालों को सहलाते हुए बड़े भोलेपन से बोलीं—

​”बिट्टी, ई बतावा… एकरा में केतना पईसा लागल…?”

​हिमांशी ने मन ही मन सोचा—

 अगर मैंने अभी दादी को बता दिया कि पूरे ₹6000 लगे हैं.. तो इन्हें सचमुच हार्ट अटैक आ जाएगा..!

 ये तो यही सोच-सोच कर बीमार हो जाएँगी कि हमारे गाँव में तो धनेश्वरी मौसी मात्र ₹50 में ही पूरा सिर दबा देती है…

​और यह सोचकर हिमांशी जोर से हंस पड़ी…जबकि दादी असमंजस में अपनी पोती का चेहरा देखने लगीं..।

​(स्वरचित मौलिक सर्वाधिकार सुरक्षित रचना )

   ✍️ संध्या त्रिपाठी

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