जीवन की दूसरी धूप

 जानकी जी ने भावुक होकर कहा, “बहू, अगर उस दिन तूने मुझे अपनी उस झूठी झिझक से बाहर न निकाला होता, तो मैं कभी जान ही नहीं पाती कि उमाकांत जी के जाने के बाद भी मेरे भीतर कोई जानकी बाकी है। तूने मुझे सिर्फ एक यात्रा पर नहीं भेजा, बल्कि मुझे खुद से दोबारा मिलवा दिया। तू बहू नहीं, मेरी ज़िंदगी की सबसे समझदार मार्गदर्शक है।”

राहुल भी वहीं खड़ा था। उसने जब अपनी माँ के चेहरे पर बरसों बाद वह सच्ची और खिली हुई मुस्कान देखी, तो उसका भी सिर शर्म से झुक गया। वह आगे बढ़ा और अपनी माँ के चरण छूते हुए अंजलि से बोला, “अंजलि, मुझे माफ कर देना। मैं समाज के खोखले नियमों में इतना उलझ गया था कि माँ की वास्तविक खुशियों को देख ही नहीं पा रहा था। आज मुझे समझ आया कि असली संस्कार केवल सेवा करने में नहीं, बल्कि अपने बड़ों को उनके अपने तरीके से जीने की आज़ादी देने में है।”

  करीब चार साल पहले जब उनके जीवनसाथी उमाकांत जी दिल का दौरा पड़ने से अचानक दुनिया छोड़कर चले गए, तो जानकी जी के जीवन की रफ़्तार जैसे पूरी तरह थम गई थी। पहले का समय कितना अलग था—उमाकांत जी के साथ हर साल किसी नई जगह जाना, सुंदर दृश्यों के आगे खड़े होकर हँसते हुए तस्वीरें खिंचवाना और फिर घर लौटकर उन पलों को याद करना। उमाकांत जी के जाने के बाद जानकी जी ने खुद को घर के एक छोटे से कोने, पूजा-पाठ और पुरानी यादों के संदूक तक ही सीमित कर लिया था।

तभी रसोई से स्टील की प्लेट में पोहा और बादाम लेकर उनकी बड़ी बहू अंजलि कमरे में आई। अंजलि स्वभाव से बेहद जिंदादिल, सुलझी हुई और संवेदनशील थी। उसने नाश्ते की प्लेट मेज़ पर रखी और मुस्कुराते हुए कहा, “माँ जी, आपने बताया नहीं कि आपके मॉर्निंग वॉक वाले सीनियर सिटीजन क्लब के सब लोग इस बार उज्जैन और ओंकारेश्वर के दर्शन करने और घूमने का कार्यक्रम बना रहे हैं! सोसायटी के ग्रुप पर अभी-अभी मिसेज माथुर का मैसेज आया कि टिकटें बुक हो रही हैं। मुझे पता चला तो मैंने सोचा कि पहले आपसे पूछ लूँ ताकि आपकी दवाइयाँ और कपड़े उसी हिसाब से व्यवस्थित कर सकूँ। सच कहूँ तो अगर चिंटू की बोर्ड परीक्षाएँ सिर पर न होतीं और राहुल का ऑफिस का ऑडिट न चल रहा होता, तो मैं भी आपके साथ जरूर चलती। हम जैसी घरेलू महिलाओं की ज़िंदगी तो पति के ऑफिस और बच्चों के बस्ते के बीच ही बँधकर रह जाती है। लेकिन उम्र के इस मोड़ पर आपको तो अब अपने लिए भी जीना शुरू करना चाहिए। बताइए, कब निकलना है?”

जानकी जी ने गहरी साँस भरी और अपनी सूती साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए बुझे मन से बोलीं, “अरे बहू, मैं कहाँ जाऊँगी उन लोगों के साथ! उस ग्रुप में लगभग पंद्रह-बीस लोग जा रहे हैं। कुछ तो अपनी पत्नियों के साथ हैं, कुछ अकेले बुजुर्ग पुरुष भी हैं। मैं वहाँ अकेली विधवा जाकर क्या करूँगी? जब तेरे बाबूजी थे, तब की बात और थी। वो साथ होते थे तो दुनिया के किसी भी कोने में चले जाओ, हिम्मत बनी रहती थी। अब उनके बिना किसी तीर्थ या सैर-सपाटे में मेरा मन नहीं लगता। जो शौक उनके साथ थे, वो उन्हीं की चिता के साथ भस्म हो गए। अब तो बस यही चारदीवारी मेरी दुनिया है।”

अंजलि ने जानकी जी के झुर्रियों भरे ठंडे हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और बहुत ही कोमलता से बोली, “माँ जी, किसी अपने के चले जाने से ज़िंदगी कभी रुकती नहीं है। बाबूजी आपके सिर्फ पति ही नहीं थे, वे आपके सबसे अच्छे दोस्त भी थे। आप दोनों को हँसते-बतियाते देखकर मुझे हमेशा लगता था कि दांपत्य जीवन ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन मुझे एक बात बताइए, अगर भगवान ने ऐसी कोई व्यवस्था बनाई होती कि उस पार जाने के बाद भी इंसान बात कर सके, तो क्या बाबूजी आपको यूँ तिल-तिल कर घुटते देखकर खुश होते? वे स्वर्ग से चिल्लाकर यही कहते—’जानकी, अपनी इस बची हुई ज़िंदगी को खुलकर जी लो, बाहर निकलो और नए दोस्त बनाओ!’ माँ जी, रोने और यादों के बोझ तले दबने का नाम ज़िंदगी नहीं है। पुराने आंसुओं को पोंछकर नए सिरे से मुस्कुराना ही असली हिम्मत है।”

अंजलि की यह बात सुनकर जानकी जी के उदास चेहरे पर बरबस ही एक हल्की सी मुस्कान तैर गई।

अंजलि फिर बोली, “देखा माँ जी, आप हँसते हुए कितनी भली लगती हैं! हमेशा ऐसे ही मुस्कुराती रहा कीजिए। घर का पुराना और बड़ा पेड़ जब हरा-भरा और खुशहाल रहता है, तभी तो उसकी छाँव में नन्हें पौधे भी महफूज़ रहते हैं। किसने कह दिया कि साठ या सत्तर की उम्र में नए दोस्त नहीं बनाए जा सकते या ज़िंदगी की शुरुआत नहीं हो सकती? इंसान को हर मोड़ पर, चाहे उम्र पचपन की हो या पचहत्तर की, किसी हमउम्र के साथ की, एक आत्मीय दोस्त की ज़रूरत तो हमेशा रहती है।”

इतना कहकर अंजलि बच्चों के टिफिन तैयार करने के लिए रसोई की तरफ बढ़ गई, लेकिन जानकी जी के मन में विचारों का एक नया बवंडर उठ खड़ा हुआ। क्या सचमुच इस उम्र में भी अपने लिए कुछ सोचा जा सकता है? क्या समाज ऐसी औरतों को जीने देता है जो सफेद बालों में भी हँसना चाहती हैं?

अगले दिन सुबह जब जानकी जी कॉलोनी के पार्क में हमउम्र साथियों के साथ बेंच पर बैठी थीं, तो उनके ग्रुप के रिटायर्ड बैंक मैनेजर 70 वर्षीय सतीश चंद्र जी अपने चश्मे को ठीक करते हुए बोले, “जानकी बहन, हमने सुना कि आपका नाम लिस्ट में नहीं है? आप भी हमारे साथ महाकाल के दर्शन करने चलतीं तो ग्रुप में बहुत अच्छा लगता। देखिए, मेरी पत्नी को गुजरे भी छह साल हो गए। जीवनसाथी का साथ छूटना बहुत बड़ा दुख होता है, पर मैंने ज़िंदगी से मुँह नहीं मोड़ा। जब तक साँसें चल रही हैं, संगी-साथियों के साथ थोड़ा हँस-बोल लें, यही सोचकर जीने की कोशिश करता हूँ। आप भी चलिए, मन हल्का होगा।”

जानकी जी संकोच से कुछ बोल पातीं, उससे पहले ही उनकी पुरानी सहेली नर्मदा जी धीरे से उनके कान में फुसफुसाईं, “जानकी, सच-सच बताना, कहीं तुम्हारी बहू या बेटे ने जाने से मना तो नहीं कर दिया? आजकल के बच्चे तो चाहते ही हैं कि सास घर की पहरेदारी करे।”

जानकी जी ने तुरंत सिर हिलाते हुए कहा, “अरे नहीं नर्मदा बहन, तुम तो मेरी बहू अंजलि को जानती ही नहीं। वो तो कल से मेरे पीछे पड़ी है कि माँ जी आप घूम कर आइए, मन बहलेगा। पर मुझे खुद ही बहुत अजीब लग रहा है। सब अपने-अपने जोड़ीदारों के साथ होंगे, हँसी-मज़ाक करेंगे। मैं वहाँ अकेले क्या करूँगी? अजीब सी बेगानी लगूँगी।”

नर्मदा जी खिलखिलाकर हँस पड़ीं और मज़ाकिया लहजे में बोलीं, “अरे जानकी, तू भी गजब करती है! चल तो सही, क्या पता रास्ते में कोई अच्छा साथी, कोई नया दोस्त मिल जाए जिसके साथ बची हुई ज़िंदगी की बातें साझा की जा सकें!”

जानकी जी ने घबराकर चारों तरफ देखा और झिड़कते हुए बोलीं, “राम-राम नर्मदा! इस उम्र में तुझे ऐसी दिल्लगी सूझ रही है? कोई राह चलता सुन लेगा तो क्या कहेगा कि बुढ़ापे में मति मारी गई है!”

नर्मदा जी का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया, उन्होंने जानकी जी का कंधा थपथपाते हुए कहा, “कहने वालों का क्या है जानकी, दुनिया तो हर हाल में कुछ न कुछ कहेगी ही। जब तुम घर में अकेले बैठकर रोती हो, तब क्या कोई हाल पूछने आता है? हम औरतें ज़िंदगी भर दूसरों के लिए घुटती रहती हैं। अब जो चंद साल बचे हैं, उन्हें अपने मन से जी लो। सबने बहुत ज़ोर दिया है, मना मत करना।” जानकी जी ने ‘सोचकर बताऊँगी’ कहकर बात को टाल दिया और घर लौट आईं।

दो दिन बाद शाम को अंजलि बाज़ार जाने की तैयारी कर रही थी। उसने जानकी जी के कमरे में आकर कहा, “माँ जी, चलिए तैयार हो जाइए, आपके सफर के लिए कुछ ज़रूरी हल्के कपड़े, एक नया शॉल और सफर के लिए एक छोटा सूटकेस खरीदने चलना है।”

उसी समय हॉल में सोफे पर बैठे उसके पति राहुल ने लैपटॉप से नज़रें हटाईं और भौहें सिकोड़ते हुए पूछा, “अंजलि, किस चीज़ की शॉपिंग की बात हो रही है? माँ कहाँ जा रही हैं?”

अंजलि ने बड़े उत्साह से बताया, “राहुल, माँ जी के सीनियर सिटीजन क्लब के लोग चार दिन के लिए उज्जैन, ओंकारेश्वर और मांडू जा रहे हैं। माँ जी का मन बहुत उदास रहता है, इसलिए मैंने ही इनसे कहा है कि ये भी सबके साथ घूम आएं।”

राहुल ने फौरन विरोध जताते हुए कहा, “अंजलि, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? माँ सही कह रही हैं, इस उम्र में अकेले इतने सारे अनजान लोगों के साथ जाने की क्या तुक है? अगर रास्ते में इनकी तबीयत खराब हो गई, बीपी बढ़ गया या कोई ऊँच-नीच हो गई, तो रिश्तेदार और समाज के लोग क्या कहेंगे? सब यही कहेंगे कि बेटा-बहू ने बूढ़ी माँ को अकेले धक्के खाने के लिए छोड़ दिया। घर पर आराम से रहें, पूजा-पाठ करें। अकेले जाकर तमाशा बनाने की ज़रूरत नहीं है।”

अंजलि ने राहुल की आँखों में देखते हुए बहुत ही सधे हुए और दृढ़ लहजे में कहा, “राहुल, लोगों का काम ही कहना है। जब माँ जी डिप्रेशन में जाकर दिन-रात रोती थीं, तब कोई रिश्तेदार इनकी हिम्मत बढ़ाने नहीं आया था। और माँ जी कोई लावारिस या अकेली नहीं जा रही हैं, उनके साथ उनकी उम्र के पंद्रह-बीस संभ्रांत और समझदार लोग हैं जो एक-दूसरे का ख्याल रखना जानते हैं। और अगर आपको समाज की और माँ जी के स्वास्थ्य की इतनी ही फिक्र है, तो आप अपनी ऑफिस की एक हफ्ते की छुट्टी ले लीजिए और माँ जी के साथ आप चले जाइए! या फिर मैं चिंटू की पढ़ाई की परवाह किए बिना इनके साथ चलती हूँ। लेकिन समाज के डर से माँ जी को इस चारदीवारी में तिल-तिल कर घुटने के लिए मैं नहीं छोड़ सकती। इन्हें भी खुली हवा में साँस लेने का पूरा हक है।”

राहुल अपनी पत्नी की यह स्पष्ट और संवेदनशील दलील सुनकर निरुत्तर हो गया। उसके पास अंजलि के तर्कों का कोई जवाब नहीं था। कमरे के दरवाज़े की ओट में खड़ी जानकी जी अपनी बहू के शब्द सुनकर स्तब्ध रह गईं। जिस समाज के डर से वे आज तक अपनी हर इच्छा को दबाती आई थीं, उनकी बहू ने एक ही झटके में उस डर के पर्दे को तार-तार कर दिया था।

अगले ही दिन अंजलि अपनी सास को बाज़ार ले गई। उसने जानकी जी के लिए उनकी पसंद की सुंदर सूती साड़ियाँ, आरामदायक जूते और सफर के लिए ज़रूरी दवाइयों का एक अलग किट तैयार किया। पैकिंग करते समय अंजलि ने जानकी जी के हाथ में एक नया स्मार्टफोन देते हुए कहा, “माँ जी, इसमें मैंने वीडियो कॉल चलाना सिखा दिया है। जहाँ भी जाइएगा, वहाँ के खूबसूरत नज़ारे मुझे दिखाइएगा और खूब सारी तस्वीरें खिंचवाइएगा।”

यात्रा का दिन आ गया। राहुल और अंजलि दोनों जानकी जी को स्टेशन छोड़ने गए। स्टेशन पर जब जानकी जी ने अपने सभी साथियों को हँसते-खिलखिलाते देखा, तो उनकी सारी झिझक धीरे-धीरे पिघलने लगी। ट्रेन में बैठते समय जानकी जी ने अंजलि के सिर पर हाथ रखा और उनकी आँखों से कृतज्ञता के दो बूँद आँसू गिर पड़े।

चार दिनों की वह यात्रा जानकी जी के जीवन का एक नया अध्याय साबित हुई। उज्जैन के महाकाल मंदिर की भस्म आरती के दर्शन करते हुए जब उन्होंने ओंकारेश्वर में नर्मदा नदी के शांत जल को निहारा, तो उन्हें महसूस हुआ कि कुदरत ने इस दुनिया में कितना सुकून बिखेर रखा है। ग्रुप के सभी साथी बहुत ही सहयोगी और आत्मीय थे। सतीश चंद्र जी ने पूरे रास्ते सबका ध्यान रखा, किसी को दवा की ज़रूरत होती तो वे आगे बढ़कर मदद करते। शाम को जब सब लोग एक साथ बैठकर पुराने गाने गाते, तो जानकी जी भी अपने संकोच को भूलकर उनके साथ गुनगुनाने लगतीं। नर्मदा जी की चुहलबाज़ियों ने पूरे सफर को जीवंत बनाए रखा था। जानकी जी को लगा जैसे उनके सीने पर रखा बरसों पुराना भारी पत्थर अब उतर चुका है। उन्होंने महसूस किया कि अकेलापन सिर्फ मन का एक वहम होता है; अगर दिल के दरवाज़े खोल दिए जाएँ, तो ज़िंदगी में कभी भी नए और खूबसूरत रिश्ते दस्तक दे सकते हैं।

जब चार दिन बाद जानकी जी यात्रा से वापस लौटीं, तो उनके चेहरे पर एक अद्भूत तेज और चमक थी। उनका मुरझाया हुआ चेहरा अब गुलाब की तरह खिल रहा था।

घर के दरवाज़े पर अंजलि ने आरती की थाली सजाकर अपनी सास का स्वागत किया। जानकी जी ने अंदर आते ही सबसे पहले अपनी बहू को कसकर गले लगा लिया। उनके हाथ में उज्जैन का प्रसाद, मांडू की मशहूर नमकीन और अंजलि के लिए लाई गई एक खूबसूरत चंदेरी साड़ी थी।

जानकी जी ने भावुक होकर कहा, “बहू, अगर उस दिन तूने मुझे अपनी उस झूठी झिझक से बाहर न निकाला होता, तो मैं कभी जान ही नहीं पाती कि उमाकांत जी के जाने के बाद भी मेरे भीतर कोई जानकी बाकी है। तूने मुझे सिर्फ एक यात्रा पर नहीं भेजा, बल्कि मुझे खुद से दोबारा मिलवा दिया। तू बहू नहीं, मेरी ज़िंदगी की सबसे समझदार मार्गदर्शक है।”

राहुल भी वहीं खड़ा था। उसने जब अपनी माँ के चेहरे पर बरसों बाद वह सच्ची और खिली हुई मुस्कान देखी, तो उसका भी सिर शर्म से झुक गया। वह आगे बढ़ा और अपनी माँ के चरण छूते हुए अंजलि से बोला, “अंजलि, मुझे माफ कर देना। मैं समाज के खोखले नियमों में इतना उलझ गया था कि माँ की वास्तविक खुशियों को देख ही नहीं पा रहा था। आज मुझे समझ आया कि असली संस्कार केवल सेवा करने में नहीं, बल्कि अपने बड़ों को उनके अपने तरीके से जीने की आज़ादी देने में है।”

उस दिन के बाद ‘सद्भावना अपार्टमेंट’ के उस घर की फिज़ा हमेशा के लिए बदल गई। जानकी जी अब रोज़ शाम को पार्क में अपने साथियों के साथ जातीं, हँसतीं, अपने विचार साझा करतीं और कभी-कभी समाज सेवा के छोटे-मोटे कामों में भी हाथ बँटातीं। घर का वह पुराना पेड़ अब सूखा नहीं था, बल्कि अपनी बहू के प्यार और समझदारी की खाद पाकर फिर से हरा-भरा हो चुका था, जिसकी शीतल छाँव में पूरा परिवार मुस्कुरा रहा था।

जीवनसाथी के बिछड़ जाने के बाद अक्सर हमारे समाज में बुजुर्गों को केवल घर की चारदीवारी और जिम्मेदारियों तक सीमित मान लिया जाता है। क्या एक उम्र बीत जाने के बाद भी बुजुर्गों को अपनी पसंद से जीने, नए दोस्त बनाने और बाहर घूमने जाने का पूरा हक नहीं होना चाहिए? आपकी इस विषय पर क्या राय है, नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार ज़रूर साझा करें।

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