वटवृक्ष की छाँव

 वंदना की बात सुनकर अभिषेक और सुमित की आँखें चमक उठीं। देवरानी नेहा ने दौड़कर वंदना को गले से लगा लिया और कहा, “दीदी, आपने हमारी आँखें खोल दीं। बाबूजी हमेशा कहते थे कि इस घर की असली ताकत तुम हो, और आज आपने यह साबित कर दिया।”

अगले दिन सुबह, पूरे घर में एक नई ऊर्जा का संचार था। कोई मातम नहीं था, बल्कि एक शांत और पवित्र श्रद्धा का भाव था। पूरा परिवार एक साथ उस अनाथालय पहुँचा जहाँ बाबूजी के कई पुराने शिष्य पहले से उनका इंतज़ार कर रहे थे। 

 वह पिछले दो घंटों से बालकनी में खड़ी चाय की भाप को उड़ते हुए देख रही थी। रात भर उसकी आँखों से नींद कोसों दूर रही थी। करवटें बदलते-बदलते सिर भारी हो चुका था। मन में बस एक ही ख्याल बार-बार गूँज रहा था कि कल पंद्रह नवंबर है—यानी उनके पूज्य बाबूजी का जन्मदिन।

यह केवल एक तारीख नहीं थी, बल्कि इस घर के अस्तित्व का सबसे बड़ा उत्सव हुआ करता था। लेकिन इस बार का जन्मदिन पिछले पच्चीस सालों के हर जन्मदिन से बिल्कुल अलग था। यह उनके बिना आने वाला पहला जन्मदिन था। छह महीने पहले जब बाबूजी इस नश्वर संसार को छोड़कर ईश्वर के चरणों में विलीन हुए थे, तब से घर का हर कोना जैसे अपनी आवाज़ खो चुका था। एक गहरा, असहनीय सन्नाटा दीवारों में समा गया था। वंदना सोच रही थी कि जिस दिन की शुरुआत हमेशा उनके हँसते हुए चेहरे, मंत्रोच्चार और पूरे घर में बटने वाली मिठाइयों से होती थी, कल उस दिन इस सूने घर में क्या होगा?

वंदना की आँखें नम हो उठीं और स्मृतियों का एक झरोखा खुल गया। आठ साल पहले जब वह इस घर में ब्याह कर आई थी, तो उसके मन में एक अनजाना सा भय था। ससुराल का माहौल, नए रिश्ते और सबसे बढ़कर ससुर की छवि, जिसे लेकर समाज में अक्सर एक दूरी और कड़े अनुशासन की धारणा बनी रहती है। लेकिन पहले ही दिन जब उसने बाबूजी यानी पंडित ओंकारनाथ शर्मा जी के चरण स्पर्श किए थे, तो उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखकर जो शब्द कहे थे, वे आज भी उसके कानों में अमृत की तरह गूंजते थे—”बेटी, इस घर में बहू बनकर नहीं, इस घर की लक्ष्मी और बेटी बनकर रहना। अगर हमसे कोई भूल हो तो टोकना, और अपनी हर खुशी-दुख को बिना झिझक हमसे कहना।”

बाबूजी का व्यक्तित्व ऐसा था कि जो भी उनसे एक बार मिलता, उनका मुरीद हो जाता। वे एक छोटे से सरकारी प्राथमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक के रूप में अपनी सेवा शुरू किए थे। अपनी निष्ठा, कड़े परिश्रम और बच्चों के प्रति असीम समर्पण के बल पर वे आगे चलकर जिले के सबसे प्रतिष्ठित राजकीय इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य बने और वहीं से सेवानिवृत्त हुए। वे केवल एक शिक्षक नहीं थे, बल्कि ज्ञान का एक विशाल सागर थे। हिंदी साहित्य पर उनकी पकड़ जितनी मजबूत थी, भौतिक विज्ञान और गणित के जटिल सूत्रों को वे उतनी ही सरलता से सुलझा दिया करते थे। उन्होंने सेवा में रहते हुए भी अपनी अध्ययन की भूख को शांत नहीं होने दिया था; एम.ए., बी.एड. और न जाने कितने डिप्लोमा उन्होंने अपनी लगन से हासिल किए थे।

वंदना को अच्छी तरह याद था, जब शादी के तीन साल बाद उसका बेटा आरव थोड़ा बड़ा हुआ, तो उसने अपनी अधूरी छूटी पढ़ाई को फिर से शुरू करने की इच्छा जताई थी। घर के अन्य सदस्यों को लगा था कि बच्चे और गृहस्थी के बीच यह कैसे संभव होगा। लेकिन उस समय बाबूजी ही उसकी ढाल बनकर खड़े हुए थे। उन्होंने कहा था, “ज्ञान कभी व्यर्थ नहीं जाता और न ही सीखने की कोई उम्र होती है। वंदना अगर उच्च शिक्षा पाना चाहती है, तो यह हमारे परिवार के लिए गौरव की बात है।” बाबूजी ने खुद उसका फॉर्म भरवाया था। जब वंदना देर रात तक पढ़ाई करती, तो बाबूजी खुद उठकर उसके लिए गर्म दूध या चाय रख जाते और कहते, “हिम्मत मत हारना बेटी, तुम्हारी मेहनत ज़रूर रंग लाएगी।”

और जब एम.ए. की परीक्षा का परिणाम आया और वंदना पूरे विश्वविद्यालय में प्रथम श्रेणी के साथ गोल्ड मेडलिस्ट बनी, तो उस दिन बाबूजी के चेहरे पर जो गौरव और चमक थी, वह शायद वंदना के अपने माता-पिता के चेहरे पर भी नहीं रही होगी। उन्होंने पूरे मोहल्ले में अपने हाथों से रसगुल्ले बांटे थे और गर्व से हर किसी से कह रहे थे, “यह मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है जिसने हमारे कुल का मान बढ़ाया है!”

उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि रिटायरमेंट के सात साल बीत जाने के बाद भी, हर रविवार को उनके पुराने शिष्य, जो आज कोई प्रशासनिक अधिकारी बन चुका था, कोई डॉक्टर था तो कोई बड़ा व्यापारी, उनसे आशीर्वाद लेने और अपने जीवन की उलझनों को सुलझाने घर आते थे। बाबूजी के लिए कोई छोटा या बड़ा नहीं था। वे एक साधारण किसान के बेटे को भी उसी स्नेह से अपने पास बिठाते थे, जैसे किसी जिले के कलेक्टर को। उनका एक सीधा सा नियम था—साफ़ दिल, स्पष्ट बात और चेहरे पर सदा मुस्कान। उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी की पीठ पीछे निंदा नहीं की और न ही कभी अपने पद या ज्ञान का अहंकार किया।

उनका आशीर्वाद देने का तरीका भी कितना अनूठा था। वे जब भी किसी के सिर पर हाथ रखते, कभी यह नहीं कहते कि तुम धनवान बनो या बड़े बंगले बनाओ; वे हमेशा एक ही बात कहते—”सदा प्रसन्न रहो और दूसरों को प्रसन्न रखो।” वे समझाया करते थे कि यदि तुम्हारे भीतर स्वयं आनंद का दीपक नहीं जल रहा, तो तुम संसार में किसी दूसरे के मार्ग का अंधकार कभी नहीं मिटा सकते।

उनकी एक और विलक्षण प्रतिभा थी जो हर किसी को चकित कर देती थी। उस उम्र में भी उन्हें परिवार के हर सदस्य, रिश्तेदार, पुराने सहकर्मियों और यहाँ तक कि अपने अनगिनत विद्यार्थियों के फोन नंबर और उनके जन्मदिन मुँहजुबानी याद रहते थे। उम्र के अंतिम पड़ाव में जब उनके घुटनों ने जवाब दे दिया था और वे दूर-दराज़ के रिश्तेदारों के सुख-दुख में स्वयं उपस्थित नहीं हो पाते थे, तब भी उनका एक स्नेह भरा फोन या उनके हाथ से लिखा पोस्टकार्ड समय पर पहुँच जाता था। उनके उस एक पत्र में ऐसी आत्मीयता होती थी जो मीलों की दूरी को एक क्षण में पाट देती थी। उन्होंने सिखाया था कि रिश्तों को धन से नहीं, बल्कि समय और सच्चे मन से सींचा जाता है।

वंदना जब भी किसी नए काम की शुरुआत करती, चाहे वह कॉलेज में व्याख्याता के रूप में उसका पहला दिन हो या रसोई में कोई नया प्रयोग, बाबूजी हमेशा अपनी गंभीर और आश्वस्त करने वाली आवाज़ में कहते—”बेस्ट ऑफ लक बेटा, आगे बढ़ो, विजय तुम्हारी होगी।” ये चंद शब्द वंदना के भीतर इतनी असीम ऊर्जा भर देते थे कि किसी भी कठिनाई से टकराने का हौसला दोगुना हो जाता था।

पिछले वर्ष जब अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें लगभग एक महीने तक अस्पताल में आईसीयू और फिर स्पेशल वार्ड में रहना पड़ा था, तो पूरा परिवार स्तब्ध रह गया था। वंदना ने उस दौरान घर और अस्पताल के बीच संतुलन साधते हुए दिन-रात उनकी सेवा की थी। वह अपने हाथों से उन्हें दलिया खिलाती, ताज़े फलों का रस निकाल कर ले जाती और रोज़ सुबह उन्हें देश-दुनिया की ताज़ा खबरें पढ़कर सुनाती थी। कभी-कभी बीमारी की चिड़चिड़ाहट में जब वे दवा लेने से मना करते या हल्का सा डांट देते, तो वंदना को कभी बुरा नहीं लगता था। उसे उनमें हमेशा अपने स्वर्गीय दादाजी का अक्स दिखाई देता था, जिनकी गोद में उसका बचपन बीता था। उस निस्वार्थ सेवा के बदले जब बाबूजी का कांपता हुआ हाथ उसके सिर पर पड़ता था, तो ऐसा लगता था मानो संसार के सारे तीर्थों का फल मिल गया हो।

बाबूजी ने अपने जीवन में भौतिक संपत्ति से कहीं अधिक भावनात्मक पूँजी कमाई थी। उन्होंने अपने दोनों बेटों—अभिषेक और सुमित—को हर परिस्थिति में सिर उठाकर जीना सिखाया था। वे हमेशा कहते थे कि जीवन में चाहे जितना बड़ा संकट आ जाए, कभी अपने सिद्धांतों और सत्य का दामन मत छोड़ना। वे परिवार के उस विशाल, घने वटवृक्ष की तरह थे जिसकी शाखाओं के नीचे हर कोई सुरक्षित और शांत महसूस करता था।

हर साल उनके जन्मदिन की परंपरा तय थी। सुबह उठते ही वंदना उनके लिए उनके पसंदीदा गरमा-गरम मूंग के दाल का हलवा बनाती थी। पूरा परिवार एक साथ बैठकर हवन करता था और शाम को घर के सभी सदस्य, बच्चे-बड़े मिलकर बाबूजी की सबसे प्रिय मटका कुल्फी खाने शहर की पुरानी चौक पर जाते थे। वे बच्चों की तरह कुल्फी का आनंद लेते और उनकी आँखों में बच्चों जैसी मासूम खुशी चमक उठती थी।

लेकिन आज… आज का दिन कितना रिक्त था। वंदना की आँखों से आँसू छलककर गालों पर बह निकले। घर का आँगन वही था, तुलसी का बिरवा वही था, बैठक में रखी उनकी आरामकुर्शी भी वैसी ही थी, पर उस कुर्सी पर बैठने वाला वह देवतुल्य इंसान अब नहीं था।

“भगवान भी कितने निष्ठुर हैं,” वंदना ने अपने मन में सोचा, “जो लोग दुनिया में सिर्फ प्रेम और प्रकाश बांटते हैं, उन्हें अपने पास इतनी जल्दी क्यों बुला लेते हैं?” उनके जाने के बाद घर में एक ऐसा खालीपन आ गया था जिसे दुनिया की कोई दौलत या खुशियाँ भर नहीं सकती थीं।

और सबसे बड़ा डर जो पिछले कुछ महीनों से वंदना के दिल को कचोट रहा था, वह था रिश्तों की डोर का कमज़ोर पड़ना। बाबूजी वह अटूट धागा थे जिसमें अभिषेक, सुमित, उनकी बहुएँ और बच्चे सब मोतियों की तरह पिरोए हुए थे। उनके रहते कभी किसी मनमुटाव की हिम्मत नहीं होती थी। अगर भाइयों में ज़रा सा भी मतभेद होता, तो बाबूजी के बैठक में आते ही सब कुछ शांत हो जाता था। लेकिन अब, जब वह मजबूत आधार ही नहीं रहा, तो परिवार के अलग-अलग कोनों में हल्की-हल्की दूरियों की आहट महसूस होने लगी थी। दोनों भाई अपने-अपने काम में इतने व्यस्त हो गए थे कि एक साथ बैठकर भोजन किए हुए भी हफ़्तों बीत जाते थे। क्या बाबूजी के जाने के बाद यह सुंदर परिवार बिखर जाएगा? यह सोचकर वंदना का कलेजा कांप उठता था।

“नहीं, ऐसा नहीं हो सकता,” वंदना ने अचानक अपने आँसू पोंछे और एक गहरा संकल्प लिया। “बाबूजी ने हमें सिर्फ जीवन जीना नहीं सिखाया, उन्होंने हमें एक दूसरे का हाथ थामकर चलना सिखाया है। अगर उनके जाने के बाद हम बिखर गए, तो यह उनके आदर्शों की हार होगी। हम उनके विचारों को मरने नहीं दे सकते।”

वंदना तुरंत कमरे में आई। उसने अपने पति अभिषेक और देवर सुमित तथा देवरानी नेहा को बैठक में बुलाया। सुबह के समय सभी के चेहरों पर उदासी और बाबूजी के जन्मदिन की तारीख याद आने का गम साफ़ झलक रहा था।

अभिषेक ने भारी मन से कहा, “वंदना, कल बाबूजी का जन्मदिन है… समझ नहीं आ रहा कि क्या करें। हर साल कितना उल्लास होता था, पर अब तो घर में कदम रखने का भी मन नहीं करता।”

वंदना ने आगे बढ़कर सबके हाथ थामे और बेहद सधे हुए, भावुक स्वर में कहा, “सुनिए, बाबूजी सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन क्या उनके संस्कार भी हमारे बीच से चले गए? क्या वे यही चाहते थे कि उनके जाने के बाद हम सब अपने-अपने कोनों में सिमटकर केवल शोक मनाएँ और इस घर को वीरान कर दें? बाबूजी ने पूरी ज़िंदगी क्या सिखाया? खुश रहो और खुश रखो! उन्होंने दूसरों के चेहरों पर मुस्कान लाने में अपनी ज़िंदगी बिता दी। कल उनका जन्मदिन है, और हम इसे रोकर या मायूस होकर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को जीवित करके मनाएंगे।”

सुमित ने नम आँखों से पूछा, “भाभी, हम क्या कर सकते हैं?”

वंदना ने अपनी योजना साझा की। उसने कहा, “बाबूजी जिस अनाथ आश्रम और वृद्धाश्रम में हर महीने गुप्त रूप से सहायता भेजते थे, कल सुबह हम सब पूरा परिवार एक साथ वहाँ चलेंगे। हम वहाँ के बच्चों और बुजुर्गों के साथ समय बिताएंगे, उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाएंगे, और बाबूजी के नाम पर एक स्थायी पुस्तकालय की स्थापना करेंगे ताकि जरूरतमंद बच्चे वहाँ बैठकर मुफ्त में पढ़ सकें। और शाम को, हम सब मिलकर इसी घर के आँगन में बैठेंगे, वही मूंग का हलवा बनाएंगे और बाबूजी के जीवन की उन खूबसूरत बातों को याद करेंगे जिन्होंने हमें इंसान बनाया है।”

वंदना की बात सुनकर अभिषेक और सुमित की आँखें चमक उठीं। देवरानी नेहा ने दौड़कर वंदना को गले से लगा लिया और कहा, “दीदी, आपने हमारी आँखें खोल दीं। बाबूजी हमेशा कहते थे कि इस घर की असली ताकत तुम हो, और आज आपने यह साबित कर दिया।”

अगले दिन सुबह, पूरे घर में एक नई ऊर्जा का संचार था। कोई मातम नहीं था, बल्कि एक शांत और पवित्र श्रद्धा का भाव था। पूरा परिवार एक साथ उस अनाथालय पहुँचा जहाँ बाबूजी के कई पुराने शिष्य पहले से उनका इंतज़ार कर रहे थे। वंदना ने जब देखा कि बाबूजी के पढ़ाए हुए अनगिनत लोग अपने-अपने परिवारों के साथ वहाँ पहुँचे हैं और बाबूजी की तस्वीर पर पुष्प अर्पित करते हुए उनकी दी हुई सीखों को याद कर रहे हैं, तो उसका सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

शाम को जब घर के आँगन में दीये जलाए गए, तो ऐसा लगा मानो बाबूजी कहीं आसपास ही खड़े होकर अपनी वही चिर-परिचित मुस्कान के साथ कह रहे हों—”बेस्ट ऑफ लक बेटा, मुझे तुम सब पर गर्व है।”

वंदना ने हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा, “बाबूजी, हम शायद आपके जितने महान और आदर्श व्यक्तित्व वाले कभी न बन पाएँ, लेकिन अगर हम आपके दिखाए रास्ते पर एक कदम भी चल सके और आपके इस परिवार को ताउम्र एक धागे में पिरोकर रख सके, तो हमारा जीवन धन्य हो जाएगा। आप जहाँ भी हैं, बस अपना आशीर्वाद हम पर यूँ ही बनाए रखिएगा।”

घर के आँगन में जलता हुआ दीपक हवा के झोंकों के बावजूद अडिग होकर रोशनी फैला रहा था, ठीक उसी तरह जैसे बाबूजी के संस्कार उस परिवार के जीवन में हमेशा के लिए अमर हो चुके थे।

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