बेटियों का आँचल: अंतिम विदाई का मान

 जब सलोनी और पल्लवी ने अपनी माँ की अर्थी के आगे-आगे बांस की बल्ली को अपने कोमल कंधों पर उठाया, तो देखने वालों का कलेजा कांप गया। दोनों बहनों के चेहरे पर आंसुओं की धार थी, लेकिन कदम बिल्कुल नहीं डगमगा रहे थे। पूरा मोहल्ला उस अभूतपूर्व दृश्य को देख रहा था। श्मशान घाट तक के सफर में बेटियों ने न केवल माँ की अर्थी को कंधा दिया, बल्कि श्मशान में पहुंचकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच दोनों बहनों ने एक साथ अपनी ममतामयी माँ की चिता को मुखाग्नि दी।

जबलपुर के पुराने रेलवे क्वार्टर वाले इलाके में गुलमोहर के पेड़ों की कतार के बीच बसा वो सादा सा मकान केवल ईंट-गारे की इमारत नहीं, बल्कि आत्मीयता और संघर्ष की एक जीती-जागती मिसाल था। जब मेरी शादी उस मोहल्ले में हुई, तो मुझे अपने नए परिवार और नए परिवेश को समझने में बड़ी घबराहट होती थी। मेरी अपनी ननदें स्वभाव से इतनी औपचारिक और रूखी थीं कि कभी दिल की बात कहने का मौका ही नहीं मिला। लेकिन पड़ोस के उस घर में रहने वाली शारदा दीदी ने पहले ही हफ्ते में मुझे जिस तरह सीने से लगाया, मानो मैं उनकी अपनी सगी छोटी बहन होऊं। दोनों परिवारों के बीच का संबंध कब पानी में घुली शक्कर की तरह एक हो गया, हमें इसका अहसास ही नहीं हुआ।

हर तीज-त्यौहार, छठ-दीपावली और करवाचौथ की तैयारी शारदा दीदी के घर की रसोई में ही होती थी। जब मेरे दोनों बच्चों—तन्मय और रिया—का जन्म हुआ, तो अस्पताल की रातों से लेकर घर के पालने तक, शारदा दीदी ने मेरी सगी माँ बनकर सेवा की थी। जच्चा के खान-पान से लेकर नन्हे बच्चों के मालिश और उबटन तक, दीदी ने अपने हाथों से सब संभाला था। उनके पति, शैलेंद्र भैया, ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में क्लर्क थे। बड़े ही शांत, सरल और परिवार पर जान छिड़कने वाले इंसान थे। शारदा दीदी की दो बेटियां थीं—सलोनी और पल्लवी। दोनों बच्चियां हमारे बच्चों के साथ ऐसे पली-बढ़ीं जैसे एक ही आँगन के फूल हों। सब कुछ बहुत खुशहाल, शांत और संतोषजनक चल रहा था, तभी नियति ने एक ऐसा निर्मम मोड़ लिया जिसने सबकी दुनिया उजाड़ दी।

एक शाम शैलेंद्र भैया फैक्ट्री से स्कूटर पर घर लौट रहे थे कि एक अनियंत्रित ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी। अस्पताल पहुँचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया। वह खबर किसी वज्रपात की तरह गिरी। जिस घर में हर शाम हंसी के फव्वारे छूटते थे, वहां केवल चीत्कार और सन्नाटा पसर गया। शारदा दीदी का वह वैधव्य रूप देखकर मेरा कलेजा मुंह को आ जाता था। मांग का सिंदूर धुल चुका था, हरी चूड़ियों के टुकड़े आँगन में बिखरे थे और दीदी की पथराई आंखें अपनी दोनों मासूम बच्चियों—सलोनी और पल्लवी—को देखकर मानो भीतर ही भीतर टूटकर बिखर रही थीं। लेकिन एक माँ कभी पूरी तरह हार नहीं सकती। दीदी ने अपनी छाती पर पत्थर रखकर अपनी सिसकियों को घूंट लिया। शैलेंद्र भैया के दफ्तर के सहकर्मी भले इंसान थे; उन्होंने सभी जरूरी कागजी औपचारिकताएं तेजी से पूरी करवाईं और अनुकंपा के आधार पर शारदा दीदी को उसी दफ्तर में सहायक के पद पर नौकरी मिल गई।

सफेद सूती साड़ी लपेटे जब शारदा दीदी अपने आंसुओं को पल्लू में दबाकर पहली बार दफ्तर की सीढ़ियां चढ़ीं, तो समाज ने अपनी पुरानी आदत के अनुसार जहर उगलना शुरू कर दिया। उनके अपने ससुराल वाले—शैलेंद्र भैया के छोटे भाई और शादीशुदा ननद—जो दुर्घटना के बाद सांत्वना का एक लफ्ज कहने तक नहीं आए थे, रिश्तेदारों में बैठकर बातें बनाने लगे, “देखो तो सही, पति के जाने का दुख भी नहीं मनाया और नौकरी करने निकल पड़ी। कितनी जल्दी बाहर की हवा लग गई।” किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि दो छोटी बेटियों की स्कूल की फीस, घर का राशन और रसोई का खर्च कोई विधवा औरत बिना काम किए कैसे चलाएगी। हमारे समाज की विडंबना यही है कि जब कोई अकेली औरत संकट में होती है, तो मदद का हाथ बढ़ाने कोई नहीं आता, पर चरित्र पर कीचड़ उछालने और लांछन लगाने के लिए हर कोई कतार में खड़ा रहता है।

शारदा दीदी का स्वाभिमान पर्वत जैसा अडिग था। उन्होंने कभी किसी से एक पैसे की मदद नहीं मांगी। मेरे पति, मनीष, जो दीदी को अपनी सगी बड़ी बहन से बढ़कर मानते थे, कई बार चुपके से आर्थिक मदद करने की कोशिश करते, पर दीदी हाथ जोड़कर कहतीं, “मनीष, तेरा प्यार ही मेरी सबसे बड़ी दौलत है। मुझे अपने दम पर अपनी बेटियों को बड़ा करने दे, नहीं तो कल को लोग कहेंगे कि बेसहारा थी।” फिर भी, त्यौहारों के बहाने हम दोनों बच्चों के लिए कपड़े, किताबें और मिठाइयां जबरन पहुंचा ही देते थे।

साल दर साल बीतते गए। शारदा दीदी ने दिन-रात एक करके, पाई-पाई जोड़कर सलोनी को इंजीनियरिंग और पल्लवी को उच्च शिक्षा दिलवाई। दोनों बच्चियों ने भी अपनी माँ के संघर्ष को देखा था, इसलिए कभी कोई फिजूलखर्ची नहीं की। समय आया तो दीदी और मनीष ने मिलकर अच्छे, संस्कारी परिवारों में दोनों बेटियों का विवाह बड़े ही आदर और सम्मान के साथ संपन्न कराया। बेटियों के विदा होने के बाद हमने दीदी से कितनी ही बार विनती की, “दीदी, अब आप उस बड़े मकान में अकेले क्यों रहती हैं? हमारे साथ आकर रहिए। आपका अपना ही तो घर है।” लेकिन दीदी हर बार नम आंखों से मुस्कुरा देतीं और उस छोटे से घर की दीवारों को सहलाते हुए कहतीं, “नहीं रे नीतू… तेरे जीजाजी ने अपनी पाई-पाई जोड़कर, बड़े शौक से यह आशियाना बनवाया था। इस घर के हर कोने में उनकी सांसें बसती हैं। जब तक मेरी सांस चलेगी, मैं यह चौखट छोड़कर नहीं जा सकती।”

और आज… अचानक अस्पताल से आए फोन ने हमारे पैरों तले से जमीन खिसका दी। शारदा दीदी को दिल का गंभीर दौरा पड़ा था और अस्पताल ले जाते-जाते उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था। हमारी कार जब उनके घर के बाहर रुकी, तो वहां पड़ोसियों और दूर-दराज के रिश्तेदारों का जमघट लगा हुआ था। गाड़ी का दरवाजा खोलते ही मेरे भीतर का बांध टूट गया। घर के भीतर से सलोनी और पल्लवी के बिलखने की आवाजें आ रही थीं। जैसे ही मैं कमरे में दाखिल हुई, दोनों बहने मुझसे लिपटकर चीख पड़ीं, “मामी… हमारी माँ चली गई… हमें छोड़कर चली गई!” बर्फ की सिल्ली पर लेटे शारदा दीदी के शांत, सौम्य चेहरे को देखकर मेरी रुलाई फूट पड़ी। ऐसा लगा मानो आज ममता और सहनशीलता का एक पूरा युग समाप्त हो गया था।

तभी बाहर बरामदे से फुसफुसाहटों की आवाजें आने लगीं। मेरे पति मनीष कमरे में आए और उनका चेहरा गुस्से तथा बेबसी से तमतमा रहा था। उन्होंने मेरे कान में धीरे से कहा, “सुनो नीतू, बाहर सब रिश्तेदार जमा हो गए हैं और इस बात पर पंचायत बैठ गई है कि दीदी को मुखाग्नि कौन देगा। दीदी का कोई बेटा तो है नहीं, इसलिए लोग दूर के चचेरे-ममेरे भाइयों की तलाश कर रहे हैं।”

मेरी आंखें हैरानी से फैल गईं। जिस औरत ने जीवन भर अकेले संघर्ष किया, जिसकी स्वाभिमानी छाती ने बेटियों को समाज के थपेड़ों से बचाकर बड़ा किया, आज उसके अंतिम संस्कार के लिए केवल पुरुष होने का ठप्पा ढूंढा जा रहा था। यह बात सलोनी और पल्लवी के कानों में भी पड़ गई। दोनों बहनों ने अपने बहते आंसुओं को पोंछा, एक-दूसरे का हाथ कसकर थामा और उठ खड़ी हुईं।

सलोनी ने लड़खड़ाते लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “मामा जी, हम किसी पराए या दिखावटी रिश्तेदार को हाथ नहीं लगाने देंगे। हमारी माँ को मुखाग्नि हम दोनों बहने देंगी।”

मनीष ने भावुक होकर कहा, “बेटा, मैं तुम्हारा मामा हूँ, दीदी का भाई हूँ। अगर समाज को ऐतराज है तो यह फर्ज मैं निभाऊंगा, तुम दोनों खुद को संभालो।”

लेकिन तभी कमरे में शारदा दीदी की ननद और उनके देवर प्रवेश कर गए। दीदी की ननद ने माथे पर हाथ मारते हुए ऊंचे स्वर में कहा, “अरे राम-राम! ये क्या अनर्थ होने जा रहा है? लड़कियां कब से श्मशान जाने लगीं और कब से अर्थी को कंधा देने लगीं? हमारे कुल में यह कभी नहीं हुआ। अगर बेटा नहीं है तो क्या हुआ, मेरा बेटा है, इसका चाचा का लड़का है… कोई भी लड़का मुखाग्नि दे देगा। खानदान की नाक मत कटवाओ!”

देवर ने भी अपनी रौबदार आवाज में कहा, “हाँ, शास्त्रों में लिखा है कि बिना पुत्र के मोक्ष नहीं मिलता। भतीजा मुखाग्नि देगा, तभी भाभी की आत्मा को शांति मिलेगी।”

सलोनी और पल्लवी की आंखों में आंसुओं की जगह एक दहकता हुआ स्वाभिमान चमक उठा। सलोनी आगे बढ़ी और सीधे अपनी बुआ और चाचा की आंखों में आंखें डालकर बोली, “शांति? किस शांति की बात कर रहे हैं आप चाचा जी? जब पंद्रह साल पहले पापा का देहांत हुआ था, तब आपने ही उन्हें मुखाग्नि दी थी ना? और उसके बाद पूरे समाज के सामने आपने और बुआ ने मिलकर मेरी माँ पर ताने कसे थे कि इसके तो बेटा ही नहीं है, अब यह कैसे जिएगी! संपत्ति के बंटवारे के लिए आपने मेरी रोती हुई माँ को कचहरी के चक्कर कटवाए थे। उस दिन कहाँ गई थी आपके कुल की मर्यादा?”

पल्लवी ने भी सलोनी का हाथ थामते हुए तीखे स्वर में कहा, “जब मेरी माँ ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में क्लर्क की नौकरी करते हुए धूप और बारिश में साइकिल चलाकर आती थीं, जब हम दोनों बहने रात-रात भर बीमार होकर तड़पती थीं, तब तो आप में से किसी ने कभी आकर यह नहीं पूछा कि भाभी, तुम्हें या बच्चियों को किसी सहारे की जरूरत है क्या? तब तो आपने कह दिया था कि विधवा के घर जाने से अपशगुन होता है! आज जब मेरी माँ चली गईं, तो आप मुखाग्नि देकर स्वर्ग का टिकट बांटने आ गए?”

बुआ ने तिनक कर कहा, “अरे कुल-रीति भी कोई चीज होती है! लड़कियां श्मशान नहीं जातीं।”

सलोनी ने दो टूक शब्दों में जवाब दिया, “जब एक अकेली माँ बेटों से बढ़कर अपनी दोनों बेटियों को अपने पैरों पर खड़ा कर सकती है, एक आदर्श नागरिक बना सकती है, तो उसकी बेटियां उसे अंतिम विदाई क्यों नहीं दे सकतीं? जिस देह ने हमें नौ महीने अपनी कोख में रखा, जिस माँ ने हमें अपनी उंगलियां पकड़कर चलना सिखाया, उसे परायों के हवाले हम कभी नहीं करेंगे। हम इन खोखली और कुंठित कुरीतियों को नहीं मानते। अगर आपको यह तमाशा देखना है तो चुप रहिए, वरना बाहर का रास्ता खुला है। हमारी माँ का अंतिम संस्कार हम दोनों बहने ही करेंगी और हमारे मामा-मामी हमारे साथ हैं।”

दोनों बहनों के इस अदम्य साहस, तार्किक आक्रोश और चट्टान जैसे इरादे के आगे बुआ और चाचा के पास कोई जवाब नहीं था। वहां खड़े पड़ोसियों ने भी दबी जुबान में बेटियों का समर्थन करना शुरू कर दिया। अपनी दाल गलती न देख, बुआ और चाचा ने वहां से चुपचाप खिसकने में ही अपनी भलाई समझी।

कुछ ही देर में घर के बाहर अर्थी सजी। जब सलोनी और पल्लवी ने अपनी माँ की अर्थी के आगे-आगे बांस की बल्ली को अपने कोमल कंधों पर उठाया, तो देखने वालों का कलेजा कांप गया। दोनों बहनों के चेहरे पर आंसुओं की धार थी, लेकिन कदम बिल्कुल नहीं डगमगा रहे थे। पूरा मोहल्ला उस अभूतपूर्व दृश्य को देख रहा था। श्मशान घाट तक के सफर में बेटियों ने न केवल माँ की अर्थी को कंधा दिया, बल्कि श्मशान में पहुंचकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच दोनों बहनों ने एक साथ अपनी ममतामयी माँ की चिता को मुखाग्नि दी।

लपटें जब आसमान छूने लगीं, तो ऐसा लगा मानो शारदा दीदी का जीवन अपनी बेटियों के रूप में एक नई चेतना, एक नए आत्मसम्मान की मशाल जलाकर विदा ले रहा था। श्मशान में मौजूद कुछ पुराने खयालात के लोग भले ही कानाफूसी कर रहे थे, लेकिन अधिकांश लोगों की आंखें नम थीं और वे बेटियों के इस पवित्र कर्तव्य की सराहना कर रहे थे। सलोनी और पल्लवी ने सदियों पुरानी उस रूढ़िवादिता की बेड़ियों को तोड़ दिया था, जो बेटियों को केवल पराए धन की उपाधि देकर उनके सबसे बुनियादी और पवित्र अधिकार से वंचित रखती थी।

लौटते समय जब दोनों बच्चियां मेरे सीने से लगीं, तो मैंने महसूस किया कि शारदा दीदी सचमुच अमर हो गई थीं—अपनी बेटियों के साहस में, उनके संस्कारों में और समाज को दी गई उस नई रोशनी में, जो यह संदेश देती है कि औलाद सिर्फ बेटा या बेटी नहीं होती, औलाद तो माँ-बाप के प्रेम और तपस्या का सच्चा प्रतिरूप होती है।

जन्म से लेकर विदाई तक समाज बेटियों पर पराए होने का ठप्पा लगाता है, लेकिन क्या माता-पिता के अंतिम सफर में बेटियों का यह हक छीनना न्यायसंगत है? जब एक माँ बेटे और बेटी के पालन-पोषण में कोई फर्क नहीं करती, तो अंतिम विदाई में यह भेदभाव क्यों? इस सामाजिक कुरीति और बेटियों के इस साहसिक कदम पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

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