दो पिताओं का एक आंगन

जीवन जब किसी भरे-पूरे परिवार से उसकी धुरी यानी मां को छीन लेता है, तो उस घर की दीवारें भी अनाथ सी लगने लगती हैं। मेरे जीवन में भी यह पतझड़ तब आया जब मैं अपने कॉलेज के अंतिम वर्ष में थी। मां को अचानक लीवर सिरोसिस का पता चला और देखते ही देखते तीन महीनों के भीतर वे हम सबको बिलखता छोड़कर इस संसार से विदा हो गईं। मां के जाने के बाद घर में केवल मेरे पापा हरीश जी, मैं और मेरा छोटा भाई रोहन रह गए थे। रोहन उस समय इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में था। मां के जाने का सबसे गहरा आघात मेरे पापा पर पड़ा था। वे पूरी तरह टूट चुके थे। चालीस साल का साथ जब एकाएक छूट जाता है, तो इंसान अंदर से खाली हो जाता है।

मैंने एमबीए पूरा कर लिया था और कैंपस प्लेसमेंट में मुझे एक नामी बैंक में अच्छी नौकरी का ऑफर भी मिला था। लेकिन जब मैंने घर के सन्नाटे में पापा को सूनी आंखों से मां की तस्वीर को निहारते और अपनी चाय तक खुद न बना पाने की बेबसी में देखा, तो मेरा कलेजा कांप गया। रिश्तेदार और पड़ोसी कहने लगे कि लड़की को नौकरी करनी चाहिए, लेकिन मैंने तय कर लिया कि इस समय मेरे करियर से ज्यादा जरूरी मेरे पिता की बिखरती हुई जिंदगी को संभालना है। मैंने नौकरी का प्रस्ताव ठुकरा दिया और पूरी तरह से घर, रसोई और पापा की देखभाल में खुद को समर्पित कर दिया।

चार साल कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। रोहन की पढ़ाई पूरी हुई और उसे पुणे की एक प्रतिष्ठित सॉफ्टवेयर कंपनी में बहुत अच्छा पैकेज मिल गया। उसकी नौकरी लगते ही पापा के चेहरे पर बरसों बाद एक संतोष भरी मुस्कान आई। उन्होंने एक दिन शाम को चाय की मेज पर मुझसे कहा, “अदिति बेटा, तुमने अपनी जवानी, अपने सपने और अपना करियर सब कुछ मेरे और इस घर के नाम कर दिया। अब रोहन अपने पैरों पर खड़ा हो गया है। अब मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी तुम्हें एक अच्छे घर में विदा करने की है। मैं तुम्हारे लिए योग्य वर ढूंढना चाहता हूँ।”

मैंने हंसते हुए पापा के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “पापा, इतनी भी क्या जल्दी है? पहले रोहन की शादी कर देते हैं। घर में एक बहू आ जाएगी, तो इस घर को एक नई गृहिणी मिल जाएगी। आपकी देखभाल करने वाला कोई होगा, फिर मैं निश्चिंत होकर अपनी गृहस्थी बसाने के बारे में सोचूंगी।”

पापा मेरी समझदारी पर भावुक हो गए। कुछ ही महीनों में रोहन के लिए एक सुसंस्कृत परिवार की लड़की मानसी से रिश्ता तय हुआ और धूमधाम से शादी संपन्न हो गई। मुझे लगा कि अब मेरा कर्तव्य पूरा हुआ। घर में नई बहू आ गई थी, चूल्हा फिर से महकने लगा था। लेकिन भाग्य ने कुछ और ही लिखा था। शादी के मुश्किल से दो महीने ही बीते थे कि रोहन की कंपनी ने उसे अपनी अंतरराष्ट्रीय शाखा में जर्मनी भेजने का फैसला कर लिया। कंपनी की नीति के अनुसार वह पत्नी को साथ ले जा सकता था। मानसी के लिए यह विदेश जाने का सुनहरा मौका था। वे दोनों अपने पासपोर्ट और वीजा की तैयारियों में जुट गए।

एक बार फिर घर में वही सवाल मुंह बाए खड़ा हो गया। रोहन और मानसी के चले जाने के बाद पापा फिर से उसी खाली और वीरान मकान में अकेले रह जाने वाले थे। मेरी शादी की बातचीत कई अच्छे परिवारों में चल रही थी। लेकिन मेरी एक ही जिद थी कि जो लड़का शादी के बाद मेरे पिता को साथ रखने या उनके करीब रहने की इजाजत देगा, मैं शादी वहीं करूंगी। मेरी यह अनोखी शर्त सुनकर कई अच्छे और खाते-पीते घरों के रिश्ते पीछे हट गए। कुछ लोगों ने तो पीठ पीछे यह भी ताना मारा कि “लड़की के साथ ससुर का बोझ कौन अपने सिर लेगा?”

मेरी उम्र सत्ताईस पार कर चुकी थी। पापा को मेरी शादी की चिंता खाए जा रही थी। वे दिन-रात यही सोचते कि उनके कारण उनकी होनहार बेटी का घर नहीं बस पा रहा है। एक दिन पापा ने हाथ जोड़कर मुझसे कहा, “अदिति, मेरी खातिर अपनी यह जिद छोड़ दे बेटा। तू पराया धन है, तुझे एक दिन अपने घर जाना ही है। तू मेरी फिक्र मत कर, मैं अपनी बाकी जिंदगी किसी तरह काट लूंगा।”

पापा की भीगी आंखें और उनका गिरता स्वास्थ्य देखकर मैं टूट गई। मैंने अपनी शर्त वापस ले ली। संयोग से तभी वडोदरा के एक बेहद संभ्रांत और सुशिक्षित परिवार से मेरे लिए रिश्ता आया। लड़के का नाम मलय था, जो लंदन की एक प्रतिष्ठित कंपनी में सीनियर डेटा साइंटिस्ट के पद पर कार्यरत था। मलय के पिता जनार्दन जी सरकारी कॉलेज के रिटायर्ड प्रोफेसर थे और मां शारदा जी एक कुशल गृहिणी थीं। परिवार बहुत ही सुलझा हुआ था। मलय जब मुझसे मिलने आया, तो उसने मेरी सादगी और विचारों का पूरा सम्मान किया। मैंने भी पापा के लिए पूरे दिन की एक घरेलू सहायिका का प्रबंध किया और अपने आंसू छिपाकर शादी के लिए हामी भर दी।

शादी बहुत सुंदर तरीके से संपन्न हुई। लेकिन विदाई के समय जब पापा मुझे गले लगाकर बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोने लगे, तो मेरा कलेजा छलनी हो गया। जिस पिता ने मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिन्होंने मेरी खुशी के लिए अपनी पूरी जिंदगी न्योछावर कर दी, उन्हें उस सूने मकान में अकेले छोड़कर जाना मेरे जीवन की सबसे कठिन परीक्षा थी। रोहन ने जाते-जाते कहा था कि वह साल में एक बार पापा के पास चक्कर लगाता रहेगा और जरूरत पड़ने पर उन्हें अपने पास बुला लेगा, पर मैं जानती थी कि परदेस की भागदौड़ में यह सब कितना औपचारिक हो जाता है।

शादी के बाद मलय मुझे अपने साथ लंदन ले गया। लंदन की चमक-दमक, साफ-सुथरी चौड़ी सड़कें और मलय का बेपनाह प्यार… सब कुछ बहुत खूबसूरत था, लेकिन मेरा मन हर पल भारत में अपने पापा के उसी सूने कमरे में अटका रहता था। मैं रोज दिन में तीन बार पापा को फोन करती। उनकी आवाज में छिपा अकेलापन और उदासी हजारों मील दूर बैठी मुझे साफ महसूस होती थी। वे फोन पर तो कहते कि वे बिल्कुल ठीक हैं, लेकिन एक बेटी अपने पिता के मौन को भी पढ़ लेती है।

अभी हमारी शादी को केवल छह महीने ही बीते थे कि अचानक वडोदरा से एक मनहूस खबर आई। मेरी सासू मां शारदा जी को रात को सोते समय दिल का भीषण दौरा पड़ा और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनका देहांत हो गया। यह खबर सुनते ही हमारे पैरों तले से जमीन खिसक गई। मलय और मैं तुरंत पहली फ्लाइट पकड़कर भारत पहुंचे।

घर में मातम छाया हुआ था। ससुर जनार्दन जी किसी पत्थर की मूरत की तरह एक कोने में बैठे थे। जिस पत्नी के साथ उन्होंने जीवन के पैंतालीस वर्ष गुजारे थे, उसका अचानक यूं चले जाना उनके लिए असहनीय था। मेरी ननद चारु, जो पास के ही एक शहर में ब्याही थी, वह भी आई हुई थी। क्रिया-कर्म के सारे रीति-रिवाज पूरे होने के बाद जब हमारे वापस लौटने का समय आया, तो घर में वही यक्ष प्रश्न फिर खड़ा हो गया कि अब बाबूजी का क्या होगा?

एक दिन बैठक में बैठकर चर्चा हो रही थी। ननद चारु ने कहा, “भैया, आप तो लंदन में रहते हैं और आपकी नौकरी ऐसी है कि आप यहाँ बार-बार आ नहीं सकते। मेरा मानना है कि बाबूजी के लिए चौबीस घंटे का एक फुल-टाइम केयरटेकर और खाना बनाने वाला रख देते हैं। मैं हर रविवार को आकर देख जाया करूंगी कि सब ठीक-ठाक है या नहीं। आज के जमाने में बुजुर्गों के लिए यही सबसे व्यावहारिक रास्ता है।”

चारु की बात सुनकर मेरे भीतर का स्वाभिमान और एक बेटी का दर्द जाग उठा। मैंने देखा कि पास के कमरे में बैठे ससुर जी का सिर झुक गया था और उनकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक कर उनकी सफेद दाढ़ी में समा गए थे।

मैंने बिना एक पल गंवाए बेहद स्पष्ट और दृढ़ स्वर में कहा, “नहीं दीदी, माफ कीजिएगा लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगी। किसी अनजान नौकर या केयरटेकर के सहारे इस उम्र में बाबूजी को इस खाली घर में अकेले घुटने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। नौकर शरीर की देखभाल कर सकता है, लेकिन मन के अकेलेपन को नहीं भर सकता। या तो मलय अकेले लंदन जाएं और मैं यहीं रहकर बाबूजी की सेवा करूंगी, या फिर बाबूजी हमारे साथ लंदन चलेंगे।”

मेरी बात सुनकर कमरे में सन्नाटा छा गया। मलय ने हैरानी और कृतज्ञता से मेरी ओर देखा। ननद चारु कुछ झेंप सी गईं। लेकिन ससुर जी ने बाहर आकर कांपती आवाज में कहा, “बहू, तुम्हारा यह भाव मेरे लिए भगवान के दर्शन जैसा है। लेकिन बेटा, मैं उस अजनबी मुल्क में जाकर क्या करूंगा? न कोई अपनी भाषा बोलने वाला, न कोई जान-पहचान। वहां मलय दिन भर दफ्तर में रहेगा, तुम घर संभालोगी और मैं उस बंद फ्लैट में अकेले दीवारें तकता रहूंगा। वहां भी मैं अकेला ही पड़ जाऊंगा बेटी।”

ससुर जी की यह बात सुनकर हम सब सोच में पड़ गए। वे सच कह रहे थे। बुजुर्गों के लिए परदेस में एकाकीपन और भी भयानक हो जाता है। उस रात मलय ने मुझे बालकनी में उदास खड़े देखा। वह मेरे पास आया और उसने मेरे कंधे पर हाथ रखकर बड़े आत्मीय स्वर में कहा, “अदिति, मैं पिछले कई दिनों से एक बात सोच रहा था। अगर तुम्हारी इजाजत हो तो कहूं?”

मैंने मुड़कर पूछा, “क्या बात है मलय?”

मलय ने मुस्कुराते हुए कहा, “अदिति, तुम्हारे पापा भी तो पिछले एक साल से पूरी तरह अकेले हैं। रोहन जर्मनी में अपनी गृहस्थी में व्यस्त है। तुम्हारे पापा भी डिप्रेशन और अकेलेपन से जूझ रहे हैं और यहां मेरे बाबूजी भी मां के जाने के बाद तन्हा हो गए हैं। क्यों न हम इन दोनों को अपने साथ लंदन ले चलें?”

मलय की बात सुनकर मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। मैंने कांपते होंठों से पूछा, “मलय… क्या ऐसा सच में हो सकता है? क्या समाज… क्या लोग… और क्या दोनों पापा मानेंगे?”

मलय ने बड़े प्यार से मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “समाज क्या कहेगा, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता अदिति। रिश्ते कागजों और पुरानी रूढ़ियों से नहीं, इंसानियत और प्यार से चलते हैं। जैसे मेरे बाबूजी मेरे पिता हैं, वैसे ही तुम्हारे पापा भी तो मेरे पिता समान हैं। जब दो बुजुर्ग एक साथ रहेंगे, तो उन्हें किसी तीसरे की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। वे आपस में सुख-दुख बांटेंगे, अपनी पुरानी यादें ताजा करेंगे, ताश खेलेंगे, सैर करेंगे और इन दोनों के साथ रहने से हमारा परदेस का घर सचमुच एक भरा-पूरा परिवार बन जाएगा। और सबसे बड़ी बात, तुम वहां चैन से जी सकोगी। वरना तुम शरीर से लंदन में रहती हो, पर तुम्हारी आत्मा हमेशा भारत में अपने पापा की फिक्र में तड़पती रहती है।”

मलय के इन शब्दों ने मेरे दिल को छू लिया। एक दामाद का अपनी पत्नी के पिता के प्रति ऐसा निस्वार्थ प्रेम देखकर मेरी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। मैंने दोनों हाथ जोड़कर ईश्वर का धन्यवाद किया कि मुझे ऐसा जीवनसाथी मिला।

अगले दिन जब हमने यह बात दोनों पिताओं के सामने रखी, तो पहले तो वे दोनों हिचकिचाए। मेरे पापा हरीश जी ने कहा, “दामाद के घर रहना हमारे समाज में ठीक नहीं माना जाता।”

तब मलय ने आगे बढ़कर मेरे पापा के पैर छुए और कहा, “पापा जी, यह दामाद का घर नहीं, आपके बेटे और आपकी बेटी का घर है। अगर एक बेटा अपने मां-बाप को साथ रख सकता है, तो क्या एक बेटी को अपने पिता की सेवा करने का हक नहीं है? और फिर आप अकेले कहाँ जा रहे हैं, आपके साथ समधी जी भी तो हैं। आप दोनों एक-दूसरे का संबल बनिए।”

ससुर जनार्दन जी ने भी मेरे पापा का हाथ पकड़ लिया और कहा, “हरीश भाई, चलिए। जिंदगी के इस आखिरी पड़ाव पर बच्चों के प्यार को ठुकराते नहीं हैं। अकेले-अकेले घुटने से अच्छा है कि हम दोनों मिलकर इन बच्चों की छत को एक छांव बना दें।”

दोनों तैयार हो गए। मलय ने दोनों के वीजा और टिकट का प्रबंध किया और एक महीने के भीतर हम चारों लंदन के लिए रवाना हो गए।

लंदन आकर जैसे एक नया इतिहास रचा जाने लगा। हमारे चार कमरों के उस प्यारे से घर में दो ऐसे बुजुर्ग रह रहे थे, जिन्हें देखने वाले कभी समधी नहीं, बल्कि सगे सगे भाई समझते थे। सुबह की पहली धूप के साथ दोनों पार्कों में सैर करने निकल जाते। पापा हरीश जी को बागवानी का शौक था, तो उन्होंने घर के पीछे के छोटे से बगीचे में मेथी, धनिया और गेंदे के फूल लगा दिए। ससुर जनार्दन जी किताबों के शौकीन थे, तो वे शाम को पापा को गीता और कबीर के दोहों का अर्थ समझाते। दोनों साथ बैठकर चाय पीते, पुराने जमाने के गाने सुनते और घंटों तक देश-दुनिया की राजनीति पर गरमा-गरम बहस करते।

उन दोनों के चेहरे पर जो उदासी और डिप्रेशन का साया था, वह कुछ ही महीनों में पूरी तरह गायब हो गया। दोनों का स्वास्थ्य पहले से कहीं बेहतर हो गया था। अब मुझे किसी बात की चिंता नहीं रहती थी। घर में हर पल एक सुकून और आशीर्वाद का पहरा रहता था।

दो साल बाद हमारे जीवन में एक और खूबसूरत मोड़ आया। मेरे बेटे विवान का जन्म हुआ। बच्चे के आने के बाद तो घर में खुशियों का जैसे मेला लग गया। आमतौर पर विदेश में रहने वाले कामकाजी माता-पिता को बच्चों की परवरिश के लिए नैनी या डे-केयर का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन हमारे घर में तो दो-दो परदादा-दादा जैसे ममतामयी रक्षक मौजूद थे। विवान कब बड़ा हुआ, कब उसने चलना सीखा और कब तुतलाकर बोलना शुरू किया, मुझे और मलय को पता ही नहीं चला।

दोनों पिताओं में होड़ लगी रहती थी कि विवान को कौन घुमाने ले जाएगा, कौन उसे नहलाएगा और कौन उसे लोरी सुनाकर सुलाएगा। एक दिन तो मलय ने हंसते हुए कहा, “अदिति, मुझे लगता है कि विवान हमारा बेटा कम और इन दोनों मास्टरों का खिलौना ज्यादा है!” पूरा घर इस बात पर ठहाकों से गूंज उठा था।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। विवान अब चार साल का हो गया था और पास के एक प्री-स्कूल में जाने लगा था। एक रविवार की सुबह जब मैं सबके लिए नाश्ता बना रही थी, तब दोनों पिता एक साथ रसोई के पास आए।

ससुर जनार्दन जी ने बड़े लाड़ से मेरे सिर पर हाथ फेरा और पापा हरीश जी की तरफ देखकर मुस्कुराए। फिर पापा हरीश जी ने कहा, “अदिति बेटा, आज हम दोनों तुमसे कुछ मांगने आए हैं।”

मैंने चौंककर हाथ पोंछते हुए कहा, “पापा, आप दोनों मुझसे मांगेंगे? आप बस हुक्म कीजिए, क्या बात है?”

ससुर जनार्दन जी बोले, “बहू, तुमने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद कभी अपने करियर को समय नहीं दिया। पहले अपने पिता के लिए, फिर हमारी खातिर, और फिर विवान की परवरिश में तुमने अपनी पूरी जिंदगी हमारे नाम कर दी। लेकिन अब विवान स्कूल जाने लगा है। घर की सारी जिम्मेदारियों के लिए हम दोनों रिटायर सिपाही पूरी तरह तंदुरुस्त और मुस्तैद हैं। मलय बता रहा था कि पास की ही एक फर्म में तुम्हारे लिए एक बहुत अच्छा प्रोजेक्ट मैनेजर का पद खाली है। हम दोनों चाहते हैं कि तुम अब अपने सपनों को पंख दो और वह नौकरी जॉइन करो।”

मैंने अचरज से दोनों की ओर देखा और कहा, “लेकिन पापा जी, आप दोनों घर में अकेले…”

पापा हरीश जी ने मेरी बात बीच में ही काट दी और हंसते हुए बोले, “अरे पगली! हम अकेले कहाँ हैं? हम दोनों तो एक और एक ग्यारह हैं! तू निश्चिंत होकर जा। विवान को स्कूल से लाना, उसका खाना और घर की छोटी-मोटी व्यवस्था संभालना हमारे बाएं हाथ का खेल है। तूने हमें जिंदगी के सबसे अंधेरे मोड़ पर सहारा देकर नई जिंदगी दी है, क्या अब हम अपनी बेटी को उसके सपनों की उड़ान भरने के लिए दो घंटे का वक्त भी नहीं दे सकते?”

उस पल मुझे महसूस हुआ कि भगवान हर किसी को ऐसा परिवार नहीं देता, लेकिन जब नीयत में सच्चाई, रिश्तों में सम्मान और दिलों में निःस्वार्थ प्रेम हो, तो ससुराल और मायके की दूरियां मिट जाती हैं। दो अलग-अलग किनारों से आए दो पिताओं ने मिलकर मेरे जीवन की नैया को एक ऐसा किनारा दे दिया था, जहाँ सिर्फ और सिर्फ खुशहाली की लहरें थीं।

मैंने झुककर दोनों पिताओं के चरण छुए और उनकी आंखों में झांककर देखा, जहाँ मेरे लिए सिर्फ आशीर्वाद ही नहीं, बल्कि एक गहरी निष्ठा और गर्व का भाव तैर रहा था। उस शाम जब मलय घर लौटा, तो हमारे घर का हर कोना एक नई उमंग और विजय के उल्लास से जगमगा रहा था।

एक विचार आपके लिए:

अक्सर हमारे समाज में यह धारणा बना दी गई है कि शादी के बाद लड़की के माता-पिता की जिम्मेदारी सिर्फ बेटे की होती है और बेटी का उन पर कोई सीधा अधिकार नहीं रह जाता। लेकिन क्या एक बेटी का अपने बुजुर्ग पिता के प्रति वही कर्तव्य नहीं होना चाहिए जो एक बेटे का होता है? और क्या एक दामाद अपने ससुर को अपने ही पिता की तरह मान-सम्मान देकर अपने परिवार का हिस्सा नहीं बना सकता? अगर हर परिवार में मलय जैसा समझदार जीवनसाथी और जनार्दन जी जैसा विशाल हृदय वाला ससुर हो, तो शायद किसी भी वृद्ध पिता को वृद्धाश्रम या अकेलेपन के आंसुओं में अपनी अंतिम सांसें नहीं गिननी पड़ेंगी। इस बारे में आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपने अनमोल विचार जरूर साझा करें।

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