स्वाभिमान की चमक

नलिनी को शायद उसी क्षण अपनी गलती का भान हुआ कि उनके मुंह से निकले तीखे तीरों ने मर्यादा की सीमा लांघ दी थी। वे झेंपते हुए आगे बढ़ीं और बात को संभालने की कोशिश करते हुए बोलीं, “अरे शारदा, तुम तो बात का बतंगड़ बना रही हो! मैंने तुम्हें थोड़े ही कुछ कहा है? तुम तो बुरा मान गईं। मैं तो बस इस लापरवाह नौकरानी को समझा रही थी कि इतना महंगा सामान है, कहीं इधर-उधर हो गया तो आफत आ जाएगी। तुम बैठो तो, चाय पीकर जाना…”

 आज तीन साल बाद वह अपने गृहनगर भोपाल लौट रहा था। कंधे पर लटके बैग के अलावा उसके पास दो बड़े-बड़े सूटकेस थे, जो उपहारों से ठसाठस भरे हुए थे। बहुराष्ट्रीय कंपनी में पहली नौकरी की पहली तनख्वाह और दीपावली का बोनस जब एक साथ उसके बैंक खाते में आया, तो उसने सबसे पहला काम यही किया था कि मॉल जाकर सबके लिए तोहफे खरीदे। छोटे भाई चिराग के लिए ब्रांडेड स्पोर्ट्स जूते और लैपटॉप बैग, छोटी बहन तान्या के लिए मनपसंद कलाई घड़ी और रेशमी अनारकली सूट, बाबूजी के लिए मेरिनो ऊन का खूबसूरत बंदगला सूट का कपड़ा। लेकिन इन सब उपहारों के बीच, उसके बैग की सबसे सुरक्षित और गहरी जेब में मखमल के एक लाल डिब्बे में बंद वह खास तोहफा था, जिसे छूते ही रोहन की उंगलियों में एक सिहरन दौड़ जाती थी। वह तोहफा उसने अपनी मां शारदा के लिए लिया था।

सीट पर पीछे टिककर बैठते ही रोहन की यादों का दायरा खुल गया। बचपन की एक-एक तस्वीर उसकी बंद आंखों के सामने सजीव होने लगी। वह दौर भी कितना खुशहाल और बेफिक्र था। बाबूजी की शहर के मुख्य बाजार में कपड़ों की एक अच्छी दुकान थी। परिवार सीमित था, जरूरतें समय पर पूरी होती थीं और किसी चीज की कोई कमी न थी। शाम को जब बाबूजी दुकान बढ़ाकर घर लौटते, तो बच्चों के लिए कभी गरम-गरम समोसे तो कभी जलेबियां जरूर लाते थे। मां पूरे घर को बड़े सलीके से संभालती थीं। उन्हीं दिनों की बात थी, मां की एक बेहद करीबी और बचपन की सहेली थीं—नलिनी मौसी। नलिनी मौसी का ब्याह शहर के एक बहुत बड़े उद्योगपति के घर हुआ था। उनका बंगला शहर के सबसे पॉश इलाके में था, जहां संगमरमर के फर्श, झूमर और दर्जनों नौकर-चाकर हमेशा मौजूद रहते थे।

अमीरी और गरीबी का फासला बहुत बड़ा था, मगर मां के दिल में कभी इस बात की कोई गांठ नहीं थी। वे मानती थीं कि दोस्ती दौलत देखकर नहीं, दिलों का मेल देखकर होती है। नलिनी मौसी भी जब कभी फोन करतीं, तो बड़े लाड़ से मां को अपने घर बुलातीं। रोहन तब बमुश्किल दस-ग्यारह साल का रहा होगा। वह अक्सर मां का हाथ पकड़कर उस आलीशान बंगले में जाता था। मां वहां घंटों बैठकर नलिनी मौसी के साथ अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों की बातें करतीं, दोनों खूब हंसतीं। नलिनी मौसी का रहन-सहन राजा-महाराजाओं जैसा था। वे जब भी चाय या पानी पीतीं, तो उनके लिए चांदी के नक्काशीदार बर्तनों में ही सब कुछ परोसा जाता था। खासतौर पर मेज पर रखी चांदी की एक खूबसूरत प्याली, जिस पर बारीक मोर और फूलों की नक्काशी उकेरी गई थी, मां को बेहद लुभाती थी। जब भी नलिनी मौसी उस प्याली में घूंट-घूंट पानी पीतीं, मां बड़े मुग्ध भाव से उसे देखा करती थीं। मां के लिए वह केवल चांदी की एक धातु नहीं थी, बल्कि उस पर की गई कारीगरी और उसकी चमक मां की सादगी भरी नजरों में किसी कलाकृति जैसी थी।

फिर एक दिन वह मनहूस दोपहर आई, जिसने सब कुछ हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।

उस दिन इतवार था। नलिनी मौसी ने मां को बहुत जिद करके मिलने बुलाया था। रोहन भी मां के साथ चला गया। जब वे बंगले पर पहुंचे, तो मुख्य द्वार खुला था। बैठक में कोई नहीं था, केवल घर की पुरानी नौकरानी तुलसी झाड़-पोछ कर रही थी। उसने मां को देखा तो हाथ जोड़कर बोली, “शारदा जी, आप बैठिए। मेमसाब जरा पास के ब्यूटी पार्लर तक गई हैं, बस दस मिनट में आती ही होंगी।” इतना कहकर तुलसी अंदर रसोई की तरफ कुछ काम से चली गई।

मां और रोहन बैठक के बड़े से सोफे पर बैठ गए। तभी मां की नजर सामने शीशे की टी-पॉय पर पड़ी। वही चांदी की नक्काशीदार प्याली वहां सजी रखी थी। दोपहर की धूप जब खिड़की से छनकर उस पर पड़ रही थी, तो उसकी कारीगरी और भी खिल उठी थी। मां का मन किसी बच्चे की तरह मचल उठा। उन्होंने बड़े कौतूहल और आदर से उस प्याली को अपने दोनों हाथों में धीरे से उठाया।

“देख रोहन,” मां ने बड़े गर्व और खुशी से प्याली को रोहन के करीब लाते हुए कहा था, “जरा ध्यान से देख बेटा, इस पर बने मोर के पंखों को देख। कितनी बारीक नक्काशी है! कारीगर ने इसे बनाने में अपना कितना हुनर और दिल लगाया होगा न? ऐसी चीजें सिर्फ पैसों से नहीं बनतीं, मेहनत से बनती हैं।”

रोहन अभी उस प्याली को देख ही रहा था कि अचानक बैठक का भारी दरवाजा खुला। नलिनी मौसी अंदर दाखिल हुईं। उनके हाथ में पर्स था और चेहरे पर थकान। जैसे ही उनकी नजर शारदा के हाथों में थमी उस चांदी की प्याली पर पड़ी, उनके चेहरे के भाव पलक झपकते ही बदल गए। एक पल के लिए उनकी आंखों में जो अविश्वास और तल्खी उभरी, उसने उस पूरे कमरे की हवा को भारी कर दिया।

बिना एक पल गंवाए, उन्होंने शारदा को अनदेखा करते हुए अंदर की तरफ मुंह करके जोर से आवाज लगाई, “तुलसी! ओ तुलसी! अक्ल घास चरने गई है क्या तुम्हारी? तुमसे हजार बार कहा है कि यह चांदी की प्याली और कीमती सामान यूं बैठक में लावारिस मत छोड़ा करो! घर में किसका कब आना-जाना हो जाए, कौन क्या उठा ले, कुछ भरोसा नहीं रहता। समझ में नहीं आता कि तुम लोगों को कोई बात एक बार में क्यों नहीं समझ आती!”

वे शब्द… वे केवल शब्द नहीं थे, पिघले हुए सीसे की तरह थे, जो सीधे मां के स्वाभिमान के सीने में उतर गए।

शारदा के हाथ जैसे कांप गए। उन्होंने बिना कुछ कहे, बेहद नजाकत और खामोशी से उस प्याली को वापस मेज पर रख दिया। उनके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ चुका था, और आंखों के कोरों में आंसुओं की एक पतली सी लकीर चमकने लगी थी। कमरे में ऐसा सन्नाटा पसर गया मानो किसी ने सांस लेना भी बंद कर दिया हो।

शारदा ने अपने कंपकपाते होंठों को संभाला, नजरें उठाईं और बेहद धीमे मगर दृढ़ स्वर में बोलीं, “मुझे माफ करना नलिनी। मैं तो बस रोहन को इस पर उकेरी गई नक्काशी दिखा रही थी। मुझे अंदाजा नहीं था कि मेरी छुअन से तुम्हारी इस कीमती चीज की हिफाजत खतरे में पड़ जाएगी। अगर मुझसे कोई गलती हुई हो, तो मैं हाथ जोड़कर माफी मांगती हूं।”

इतना कहते ही शारदा ने रोहन की कलाई पकड़ी और दरवाजे की तरफ मुड़ गईं।

नलिनी को शायद उसी क्षण अपनी गलती का भान हुआ कि उनके मुंह से निकले तीखे तीरों ने मर्यादा की सीमा लांघ दी थी। वे झेंपते हुए आगे बढ़ीं और बात को संभालने की कोशिश करते हुए बोलीं, “अरे शारदा, तुम तो बात का बतंगड़ बना रही हो! मैंने तुम्हें थोड़े ही कुछ कहा है? तुम तो बुरा मान गईं। मैं तो बस इस लापरवाह नौकरानी को समझा रही थी कि इतना महंगा सामान है, कहीं इधर-उधर हो गया तो आफत आ जाएगी। तुम बैठो तो, चाय पीकर जाना…”

मगर शारदा के कदम नहीं थमे। उन्होंने मुड़कर भी नहीं देखा। वे तेजी से बंगले की सीढ़ियां उतरती चली गईं। उस दिन रास्ते भर मां ने एक शब्द नहीं बोला, बस उनकी आंखों से लगातार आंसू बहते रहे। उन्होंने रोहन की उंगलियों को इतनी मजबूती से पकड़ रखा था कि रोहन को दर्द होने लगा था, लेकिन रोहन ने कुछ नहीं कहा। वह बच्चा था, मगर इतना समझ चुका था कि उसकी मां की आत्मा पर कोई बहुत गहरा घाव लगा है। एक गरीब या मध्यमवर्गीय इंसान अपनी जरूरतों से समझौता कर सकता है, फटे कपड़े पहन सकता है, रूखी-सूखी रोटी खा सकता है, लेकिन जब उसके चरित्र और आत्मसम्मान पर शक की उंगली उठती है, तो वह बर्दाश्त के बाहर हो जाता है।

उस दिन के बाद नलिनी मौसी ने कई बार फोन किया, कभी किसी त्योहार पर संदेश भिजवाया, तो कभी किसी परिचित के जरिए अपनी गलती सुधारने की कोशिश की। लेकिन शारदा ने कभी मुड़कर उस बंगले की तरफ नहीं देखा। उनके लिए वह रिश्ता उसी दोपहर उस शीशे की मेज पर चांदी की प्याली के साथ ही टूटकर बिखर चुका था।

उस घटना के कुछ ही महीनों बाद रोहन के परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। बाबूजी की दुकान में शॉर्ट सर्किट की वजह से भीषण आग लग गई। दुकान में रखा लाखों का माल जलकर राख हो गया। बीमा के पैसे नाममात्र के मिले और बाबूजी पूरी तरह कर्ज में डूब गए। घर की माली हालत इतनी बिगड़ गई कि बच्चों की स्कूल की फीस भरना भी दूभर होने लगा। रिश्तेदारों ने धीरे-धीरे किनारा कर लिया।

लेकिन उस कठिन दौर में भी शारदा कभी नहीं टूटीं। उन्होंने अपनी मां से मिले सोने के कंगन और कान की बालियां बिना एक शिकन के बेच दीं ताकि बाबूजी का कर्ज उतर सके और रोहन की पढ़ाई न रुके। वे दिन-रात सिलाई-कढ़ाई करतीं, मोहल्ले के बच्चों को ट्यूशन पढ़ातीं और पाई-पाई जोड़तीं। कितनी ही रातें ऐसी बीतीं जब मां ने खुद आधा पेट खाया, ताकि बच्चे भूखे न सोएं। कई बार मां के फटे हुए पल्लू और घिसी हुई चप्पलों को देखकर रोहन की छाती फट जाती थी। वह जब भी मां को पसीने से तर-बतर सिलाई मशीन चलाते देखता, तो उसके जेहन में नलिनी मौसी के वे कड़वे बोल गूंज उठते—”घर में किसका कब आना-जाना हो जाए, कौन क्या उठा ले…”

रोहन ने उसी दिन अपने मन में एक मूक प्रतिज्ञा ले ली थी। उसने पढ़ाई को ही अपनी तपस्या बना लिया। उसने दिन देखा न रात, सिर्फ मेहनत की। छात्रवृत्तियां हासिल कीं, इंजीनियरिंग के कॉलेज में दाखिला लिया और आखिरकार अपनी मेहनत के दम पर देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी में एक शानदार पैकेज पर नौकरी हासिल कर ली। ट्रेनिंग पूरी हुई, पहली तनख्वाह मिली, और आज वह उसी स्वाभिमान को सर आंखों पर बिठाने अपने घर जा रहा था।

ट्रेन स्टेशन पर रुकी। रोहन ने एक ऑटो लिया और सीधे अपने मोहल्ले की ओर चल पड़ा। पुरानी गलियां, वही नीम का पेड़ और सामने अपना छोटा सा घर। घर के बाहर तुलसी के चौरे के पास मां खड़ी थीं, शायद वे सुबह से ही दरवाजे पर टकटकी लगाए अपने बेटे की राह देख रही थीं।

जैसे ही रोहन ने आंगन में कदम रखा, मां की आंखें छलक पड़ीं। रोहन ने दोनों सूटकेस जमीन पर रखे और झुककर मां के पैर छुए। मां ने उसे सीने से भींच लिया। उस आलिंगन में बरसों की तपस्या, संघर्ष और ममता का असीम सागर समाया हुआ था। बाबूजी, चिराग और तान्या भी बाहर आ गए। पूरा घर खुशियों के कहकहों से गूंज उठा।

शाम को जब सब लोग बैठक में बैठे, तो रोहन ने अपने सूटकेस खोले। उसने सबको उनके मनपसंद तोहफे दिए। बाबूजी कपड़े को हाथ में लेकर भावुक हो गए, भाई-बहन अपने-अपने उपहार देखकर खुशी से झूमने लगे। मां एक कोने में बैठी बस मुस्कुराती हुई अपने पूरे परिवार को देख रही थीं। उनके चेहरे पर यह संतोष था कि उनके बच्चों के दिन फिर गए थे।

तभी रोहन उठा और अपने कंधे वाले बैग से वह लाल मखमली डिब्बा निकाल लाया। वह मां के कदमों के पास घुटनों के बल बैठ गया।

“मां, यह तुम्हारे लिए है,” रोहन ने डिब्बा मां के हाथों में थमाते हुए कहा।

“मेरे लिए? अरे बेटा, मुझे इस उम्र में क्या चाहिए? तू पढ़-लिखकर काबिल बन गया, अपने पैरों पर खड़ा हो गया, मेरे लिए इससे बड़ा कोई गहना नहीं है,” मां ने डिब्बे को टटोलते हुए कहा।

“खोलकर तो देखो मां,” रोहन ने आग्रह किया।

मां ने कांपते हाथों से उस डिब्बे का सुनहरा फीता खोला और ढक्कन हटाया। डिब्बे के भीतर मखमल की गद्दी पर एक बेहद खूबसूरत, ठोस चांदी की नक्काशीदार प्याली रखी हुई थी। उस पर वही मोर, वही पंख और वही फूलों की बारीक कारीगरी जगमगा रही थी, जो बरसों पहले मां ने देखी थी। बल्कि यह उससे भी कहीं अधिक सुंदर, शुद्ध और भव्य थी।

प्याली को देखते ही मां का हाथ वहीं ठहर गया। उनके चेहरे के भाव एकदम से बदल गए। यादों का एक बवंडर उठा और बरसों पुराना वह अपमान, वह आंसुओं से भरी दोपहर मां की आंखों के सामने तैर गई। कमरे में बैठे बाबूजी भी सब समझ गए और उनका सिर गर्व से ऊंचा हो गया।

“रोहन… यह?” मां की आवाज भर्रा गई।

“हां मां, यह वही चांदी की प्याली है,” रोहन ने अपनी आंखों में तैर आए आंसुओं को रोकते हुए कहा। उसकी आवाज में एक बेटे का अगाध संकल्प गूंज रहा था। “उस दिन उस बंगले में जो कुछ हुआ था, मैं छोटा जरूर था मां, मगर भूला कुछ नहीं था। मैं भूला नहीं था कि कैसे किसी ने तुम्हारे निश्छल प्रेम और कला की कद्र करने वाली मासूमियत को शक की नजरों से तौला था। उस दिन मैं बहुत छोटा था, बेबस था, कुछ कर नहीं सकता था। लेकिन उस दिन मैंने खुद से वादा किया था कि मैं अपनी पहली कमाई से, अपनी मेहनत के पसीने से तुम्हारे लिए वह चीज खरीदूंगा, ताकि तुम्हें किसी की चौखट पर जाकर किसी चीज को ललचाई नजरों से न देखना पड़े।”

रोहन ने मां के दोनों हाथों को, जिनमें वह चांदी की प्याली थी, अपने हाथों में थाम लिया और कहा, “मां, यह केवल चांदी का एक बर्तन नहीं है। यह तुम्हारे उस स्वाभिमान का प्रतीक है, जिसे तुमने गरीबी की सबसे अंधेरी रातों में भी कभी झुकने नहीं दिया। यह तुम्हारे उन आंसुओं का जवाब है जो तुमने उस दोपहर रास्ते भर बहाए थे। यह तुम्हारी उस ममता का कर्ज है जो कभी चुकाया तो नहीं जा सकता, पर यह बेटा आज गर्व से कह सकता है कि उसकी मां का स्वाभिमान दुनिया की किसी भी दौलत से कहीं ज्यादा अनमोल है।”

मां की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली, मगर आज उन आंसुओं में कोई दर्द, कोई अपमान या कोई टीस नहीं थी। आज वे आंसू एक मां के परम संतोष और गर्व के आंसू थे। उन्होंने उस चांदी की प्याली को अपनी छाती से लगा लिया, जैसे वह कोई धातु न होकर उनके बेटे की तपस्या का जीता-जागता स्वरूप हो।

उन्होंने रोहन के माथे को चूमा और बेहद भावुक होकर बोलीं, “बेटा, उस दिन जो कुछ हुआ, उसने मुझे अंदर तक तोड़ दिया था। लेकिन आज मुझे समझ आया कि ईश्वर ने वह अपमान मेरे हिस्से में इसलिए लिखा था ताकि मेरा बेटा स्वाभिमान और आत्मसम्मान की असली कीमत समझ सके। तूने आज सिर्फ यह प्याली नहीं दी है, तूने मेरी उस बरसों पुरानी खरोंच पर हमेशा के लिए मरहम लगा दिया है। आज मेरी कोख धन्य हो गई।”

बाबूजी ने आगे बढ़कर रोहन की पीठ थपथपाई। उस छोटे से घर की साधारण सी बैठक में उस पल जो गरिमा और उजाला फैला हुआ था, वह शहर के किसी भी बड़े उद्योगपति के आलीशान बंगले के झूमरों में भी नहीं हो सकता था।

स्वाभिमान कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे बाजार से खरीदा जा सके, यह तो संस्कारों की वह आंच है जो इंसान को विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी टूटने नहीं देती। रोहन ने अपनी मां को उनका खोया हुआ सम्मान लौटा दिया था, और उस शाम उस घर में बनी सादी चाय जब उस चांदी की प्याली में मां के होठों से लगी, तो उसका स्वाद दुनिया के किसी भी अमृत से कहीं ज्यादा मीठा था।

जीवन में कई बार परिस्थितियां हमें कमजोर कर देती हैं और अपने ही लोग अनजाने में हमारे आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंचा जाते हैं। मगर उस अपमान को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय यदि सकारात्मक ऊर्जा और संकल्प में बदल लिया जाए, तो इंसान अपनी तकदीर खुद लिख सकता है। क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा कोई पल आया है जब किसी के कड़वे बोल ने आपको जिंदगी में कुछ बड़ा करने का हौसला दिया हो? अपनी राय और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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