“ओंकार जी, ऐसे कब तक चलेगा? प्रणय की उम्र ही क्या है अभी, बत्तीस साल! कब तक इस वीरान घर में अकेले दिन काटेगा? और फिर हमारे छह साल के नन्हे कबीर का क्या? जब वह स्कूल से आकर पूछता है कि सबकी माँ आती हैं, मेरी माँ कब आएगी, तो मेरा कलेजा मुँह को आ जाता है। आज फिर हमारे पुराने परिचित विश्वनाथ जी का फोन आया था, अपनी बेटी का रिश्ता लेकर। लड़की संस्कारी है, पढ़ी-लिखी है। आप प्रणय से बात क्यों नहीं करते?”
ओंकारेश्वर जी ने हाथ हिलाकर मना किया, “दमयंती, तुम जानती हो कि प्रणय के मन पर रोहिणी के जाने का कितना गहरा घाव है। जब भी हम दूसरी शादी की बात छेड़ते हैं, वह खाना छोड़कर कमरे में बंद हो जाता है। उसके ज़ख्म अभी सूखे नहीं हैं, हम ज़बरदस्ती कैसे कर सकते हैं?”
“पर कबीर के लिए तो करना ही होगा! हमारी उम्र का क्या भरोसा, कल को हम आँखें मूँद लें तो इन दोनों का कौन सहारा होगा?” दमयंती देवी के स्वर में एक माँ और दादी की बेबसी साफ झलक रही थी।
उधर शहर के दूसरे कोने में बने सरकारी दफ़्तर में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत प्रणय फाइलों के पन्नों में उलझा हुआ था। लेकिन उसका ध्यान फाइलों में कम और घर के रोज़-रोज़ के तनाव में ज़्यादा था। हर सुबह जब माँ किसी नई लड़की की तस्वीर उसके नाश्ते की प्लेट के बगल में रख देती थीं, तो उसे लगता था जैसे कोई उसके दिल को नोंच रहा हो। रोहिणी सिर्फ उसकी पत्नी नहीं थी, उसके कॉलेज के दिनों की हमसफ़र थी। उसकी हँसी, उसका आँचल, उसका हर अंदाज़ आज भी घर के हर कोने में ज़िंदा था। किसी और को उस जगह बिठाना, किसी और को अपनी ज़िंदगी में रोहिणी का स्थान देना प्रणय के लिए जीते जी अपनी आत्मा का सौदा करने जैसा था। वह सिर पकड़कर अपनी कुर्सी पर पीछे की ओर झुक गया।
तभी उसकी मेज़ पर रखा फोन ज़ोर-ज़ोर से थरथराने लगा। स्क्रीन पर देखा तो ‘अन्विता’ का नाम चमक रहा था। अन्विता… रोहिणी की बचपन की सबसे पक्की सहेली और प्रणय के दिवंगत मित्र सिद्धांत की पत्नी। लगभग ढाई साल पहले सिद्धांत एक भीषण सड़क हादसे में इस दुनिया को अलविदा कह गए थे। उस हादसे ने अन्विता की पूरी दुनिया उजाड़ दी थी। तब से वह अपनी पाँच साल की नन्ही बेटी परी के साथ अपने मायके में रह रही थी। रोहिणी और सिद्धांत के जाने के बाद, दोनों परिवारों का दुख एक जैसा था, इसलिए प्रणय और अन्विता कभी-कभार बच्चों के सिलसिले में एक-दूसरे का हालचाल पूछ लिया करते थे। कबीर और परी भी एक ही स्कूल में पढ़ते थे और आपस में सगे भाई-बहन से भी ज्यादा घुलमिल गए थे।
प्रणय ने फोन उठाया, “हाँ अन्विता, सब ठीक तो है?”
दूसरी तरफ से आवाज़ नहीं आई, सिर्फ सिसकियों और घुटे हुए रुदन की आवाज़ गूँज उठी। प्रणय एकदम सीधा होकर बैठ गया, “अन्विता! क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो? परी ठीक तो है ना?”
अन्विता ने कांपती आवाज़ में किसी तरह अपने आँसू रोकते हुए कहा, “प्रणय जी… क्या आप आधे घंटे के लिए पास वाले पार्क में आ सकते हैं? मुझे आपसे बहुत ज़रूरी बात करनी है… अगर आज मुझे कोई रास्ता नहीं मिला, तो शायद मैं जी नहीं पाऊँगी।”
प्रणय ने एक पल की भी देर नहीं की। उसने अपनी फाइलें समेटीं, दफ़्तर से आधे दिन की छुट्टी की अर्ज़ी दी और अपनी बाइक उठाकर सीधे फूलबाग के शांत कोने में बने उस पार्क की तरफ चल पड़ा।
पार्क के एक पुराने नीम के पेड़ के नीचे बने सीमेंट के बेंच पर अन्विता बैठी थी। उसका चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था, आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं और हाथ में पकड़ा रुमाल पसीने और आँसुओं से तर-बतर था। प्रणय तेज़ी से चलकर उसके सामने पहुँचा और पास ही बैठ गया।
“अन्विता, खुद को संभालो। बताओ क्या बात है? मायके में सब खैरियत तो है ना?”
अन्विता ने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और फूट-फूट कर रोने लगी, “प्रणय जी, मेरे मायके वाले मेरी जान के पीछे पड़ गए हैं। भैया-भाभी और मम्मी-पापा मुझ पर दूसरी शादी का भयानक दबाव बना रहे हैं। उन्होंने सागर शहर के एक व्यापारी के यहाँ मेरा रिश्ता लगभग पक्का कर दिया है। वह आदमी विधुर है, पैसे वाला है… लेकिन…” अन्विता की आवाज़ गले में ही अटक गई।
“लेकिन क्या अन्विता? खुलकर बताओ।” प्रणय ने धीरज बँधाते हुए पूछा।
“लेकिन वे लोग मेरी पाँच साल की परी को अपनाने को तैयार नहीं हैं!” अन्विता की सिसकियाँ और तेज़ हो गईं, “वे कह रहे हैं कि लड़की को उसके दादा-दादी के पास छोड़ दिया जाए या फिर मेरे मायके में ही पलने दिया जाए। वे अपनी गृहस्थी में किसी और की औलाद का साया भी नहीं चाहते। मेरे भाई-भाभी कहते हैं कि लड़की कब तक मायके पर बोझ बनेगी, तुम शादी करके जाओ और परी को यहीं छोड़ जाओ। प्रणय जी, आप तो जानते हैं, सिद्धांत के जाने के बाद अगर मैं आज तक ज़िंदा हूँ, तो सिर्फ अपनी परी का मुँह देखकर! मैं अपनी बच्ची के बिना एक पल भी साँस नहीं ले सकती। कोई माँ अपनी कलेजे के टुकड़े को बेसहारा कैसे छोड़ सकती है? और दूसरी बात… मैं सिद्धांत को अपने दिल से कैसे निकाल दूँ? मेरी रग-रग में सिद्धांत का प्यार बसा है। मैं किसी और पुरुष को अपने पति के रूप में स्वीकार करने की कल्पना भी नहीं कर सकती। प्लीज प्रणय जी, आप तो पढ़े-लिखे हैं, समाज में आपकी पहचान है… मुझे कोई भी छोटी-मोटी नौकरी दिलवा दीजिए। मैं सिलाई कर लूँगी, बच्चों को ट्यूशन पढ़ा लूँगी, अपनी बेटी को लेकर किसी किराए के कमरे में रह लूँगी, पर मैं शादी नहीं करूँगी। मुझे मेरी बेटी से कोई अलग न करे बस!”
अन्विता की बेबसी और उसकी मातृत्व की तड़प देखकर प्रणय का दिल पसीज गया। उसने पानी की बोतल निकालकर अन्विता की तरफ बढ़ाई और बहुत ही संजीदगी से कहा, “अन्विता, पहले पानी पियो और शांत हो जाओ। जब तक तुम्हारा यह भाई जैसा दोस्त ज़िंदा है, तुम्हें और परी को कोई अलग नहीं कर सकता। तुम आज घर जाओ, किसी से कोई झगड़ा मत करना। मैं कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकालूँगा। मुझ पर भरोसा रखो।”
अन्विता ने आँसू पोंछे और भारी मन से सिर हिलाकर घर लौट गई।
प्रणय उस शाम पार्क में घंटों अकेला बैठा रहा। सूरज ढल गया, परिंदे अपने घोंसलों की तरफ लौट गए, शहर की बत्तियाँ एक-एक करके जल उठीं, लेकिन प्रणय के दिमाग में विचारों का एक भयानक बवंडर चल रहा था। वह सोच रहा था कि समाज का यह कैसा क्रूर दस्तूर है! एक तरफ उसके अपने माता-पिता हैं, जो कबीर के भविष्य और अकेलेपन की दुहाई देकर उस पर शादी का दबाव बना रहे हैं। कल को अगर वह किसी अनजान लड़की से ब्याह कर भी ले, तो क्या वह सौतेली माँ कबीर को वही प्यार दे पाएगी जो रोहिणी देती थी? क्या वह उसके बच्चे को अपने दिल से लगा पाएगी? और दूसरी तरफ अन्विता है, जिसकी ममता का ही सौदा किया जा रहा है।
अचानक प्रणय के दिमाग में बिजली की कौंध की तरह एक विचार आया। एक ऐसा विचार, जिसने पहले तो उसके दिल को हिला दिया, लेकिन जैसे-जैसे उसने ठंडे दिमाग से सोचा, उसे लगा कि उन दोनों की उजड़ी हुई ज़िंदगी के रेगिस्तान में यही एक मात्र अमृत की बूँद हो सकती है।
पूरी रात प्रणय सो नहीं सका। वह करवटें बदलता रहा। सुबह होते ही उसने अन्विता को फोन किया और शहर के एक शांत पारिवारिक रेस्टोरेंट में मिलने को कहा।
जब अन्विता रेस्टोरेंट के एक कोने वाले केबिन में आकर बैठी, तो उसके चेहरे पर रात भर के आँसुओं की सूजन साफ दिखाई दे रही थी। प्रणय ने वेटर से दो कप ग्रीन टी मँगवाई और फिर दोनों हाथ जोड़कर बहुत ही आदर और शालीनता से अन्विता की आँखों में देखा।
“अन्विता, आज मैं तुमसे जो कहने जा रहा हूँ, उसे पहले पूरा सुनना। बीच में गलत मत समझना और न ही यह सोचना कि मैं तुम्हारी मजबूरी का कोई फायदा उठा रहा हूँ। अगर तुम्हें मेरी बात ज़रा भी गलत या अनुचित लगे, तो तुम सीधे ना कह देना, हमारी दोस्ती पर कभी कोई आंच नहीं आएगी।” प्रणय की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और पवित्रता थी।
अन्विता ने अचरज से देखा, “कहिए प्रणय जी, आप जो भी कहेंगे, मेरे भले के लिए ही होगा।”
प्रणय ने एक गहरी साँस ली और बोलना शुरू किया, “अन्विता, कल रात भर मैंने सिर्फ तुम्हारे और अपने बारे में सोचा। हकीकत यह है कि न तुम कभी सिद्धांत को अपने दिल से भुला सकती हो, और न ही मैं कभी रोहिणी की जगह किसी और को दे सकता हूँ। हम दोनों अपने सच्चे जीवनसाथी खो चुके हैं और किसी अनजान इंसान के साथ दांपत्य का झूठा ढोंग करना हम दोनों के लिए ही जीते जी घुटने जैसा होगा। लेकिन दूसरी हकीकत हमारे बच्चे हैं। कबीर को एक माँ की ममता चाहिए और परी को एक पिता की छत्रछाया। समाज और हमारे परिवार हमें अकेला जीने नहीं देंगे। रोज़ के तानों और दबाव से या तो हम टूट जाएंगे, या हमारे बच्चे उपेक्षा का शिकार हो जाएंगे।”
प्रणय थोड़ा रुका, फिर उसने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए, “अन्विता, क्यों न हम दोनों आपस में विवाह कर लें?”
यह सुनते ही अन्विता की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह सन्न रह गई। उसकी ज़ुबान पर शब्द जम गए।
प्रणय ने तुरंत बात को संभालते हुए आगे कहा, “मेरी बात पूरी सुनो अन्विता। यह विवाह किसी शारीरिक आकर्षण या दुनियावी पति-पत्नी के रिश्ते की तरह नहीं होगा। यह दो टूटे हुए दोस्तों का एक पवित्र समझौता होगा। हम दोनों एक ही छत के नीचे रहेंगे, अच्छे और सच्चे दोस्त बनकर। मैं तुमसे कभी पत्नी के उस पारंपरिक अधिकार की माँग नहीं करूँगा जो केवल सिद्धांत का था, और तुम भी मुझसे वह उम्मीद मत रखना जो केवल रोहिणी की थी। लेकिन दुनिया की नज़रों में हम एक परिवार होंगे। सबसे बड़ा फायदा हमारे बच्चों का होगा। परी और कबीर एक-दूसरे को सगे भाई-बहन की तरह चाहते हैं। परी को कोई सौतेला बाप नहीं मिलेगा, उसे प्रणय अंकल मिलेंगे जो उसे अपनी सगी बेटी से बढ़कर रखेंगे। और कबीर को कोई सौतेली माँ नहीं मिलेगी, उसे उसकी प्यारी मौसी मिलेगी जो पहले से ही उसे अपनी जान से ज्यादा प्यार करती है। न बच्चों को अपनी पहचान खोनी पड़ेगी, और न ही हमारे माता-पिता का कोई दबाव हम पर रहेगा। हम दोनों मिलकर अपने बच्चों का भविष्य संवारेंगे। अगर तुम्हें मेरी यह सोच सही लगे तो बताओ, वरना मैं हाथ जोड़कर माफी माँगता हूँ।”
अन्विता अवाक होकर प्रणय को देखती रही। उसके अंतर्मन में मानो सैकड़ों घंटियाँ एक साथ बज उठीं। उसने प्रणय के चेहरे पर देखा—वहाँ रत्ती भर भी वासना या स्वार्थ नहीं था। वहाँ सिर्फ और सिर्फ एक पिता की तड़प, एक सच्चे दोस्त का समर्पण और दो मासूम जिंदगियों को बचाने का दृढ़ संकल्प था। जिस समाज में लोग विधवा को लाचार देखकर उसका फायदा उठाने की ताक में रहते हैं, वहाँ यह इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी उसके सम्मान और उसकी बेटी के भविष्य के नाम करने का प्रस्ताव रख रहा था।
अन्विता की आँखों से आँसू छलक पड़े, लेकिन इस बार ये आँसू बेबसी के नहीं, बल्कि कृतज्ञता और राहत के थे। उसने अपने कांपते हाथों से अपनी आँखें पोंछीं और धीरे से अपना सिर सहमति में झुका दिया।
“प्रणय जी… एक औरत और एक माँ के लिए इससे बड़ा सम्मान और सुरक्षा का आशियाना कोई दूसरा नहीं हो सकता। मुझे आपका यह फैसला मंजूर है।”
जब यह बात दोनों परिवारों के सामने रखी गई, तो पहले तो सब चौंक गए। लेकिन जब ओंकारेश्वर जी और दमयंती देवी ने ठंडे दिमाग से सोचा, तो उनकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। वे जानते थे कि अन्विता से बेहतर माँ कबीर को कोई नहीं मिल सकती थी, क्योंकि वह रोहिणी की सबसे अच्छी सहेली थी। उधर अन्विता के माता-पिता ने भी चैन की साँस ली कि उनकी बेटी और नातिन एक ऐसे घर में जा रही हैं जहाँ उनका मान-सम्मान हमेशा सुरक्षित रहेगा।
एक महीने बाद, ग्वालियर के एक प्राचीन मंदिर के प्रांगण में बहुत ही सादे और पवित्र समारोह में प्रणय और अन्विता का विवाह संपन्न हुआ। कोई ढोल-धमाका नहीं था, कोई दिखावा नहीं था। सिर्फ वैदिक मंत्रों की गूँज और अग्नि के सात फेरे थे। जब फेरे पूरे हुए, तो कबीर और परी दोनों दौड़कर आए और दोनों ने एक साथ अपने नए माता-पिता के पैर छुए। प्रणय ने एक हाथ से कबीर को उठाया और दूसरे हाथ से परी को अपनी गोद में समेट लिया। अन्विता ने उन दोनों बच्चों के सिर पर हाथ फेरा।
विवाह के बाद ज़िंदगी एक नए और बहुत ही खूबसूरत मोड़ पर आ गई। घर में अब वह मनहूस सन्नाटा नहीं था। सुबह-सुबह रसोई से अन्विता के हाथों की कड़क चाय की खुशबू आती, तो आँगन में कबीर और परी की खिलखिलाहट गूँज उठती। प्रणय रोज़ शाम को दफ़्तर से लौटते वक्त दोनों बच्चों के लिए एक जैसे खिलौने और किताबें लेकर आता। अन्विता ने कबीर को कभी यह अहसास ही नहीं होने दिया कि वह उसकी कोख से नहीं जन्मा है। वह रात को दोनों बच्चों को अपनी दोनों बाहों में सुलाती, उन्हें परियों की कहानियाँ सुनाती और उनके माथे को चूमती।
प्रणय और अन्विता के बीच का रिश्ता किसी दिखावटी रोमांस पर नहीं, बल्कि गहरे आदर, अटूट विश्वास और निस्वार्थ मित्रता की नींव पर टिका था। वे दोनों अक्सर बालकनी में बैठकर चाय पीते हुए रोहिणी और सिद्धांत की पुरानी यादों को बड़े आदर के साथ साझा करते। किसी के मन में कोई अपराधबोध नहीं था, कोई पर्दा नहीं था। दोनों को पता था कि उनके जीवनसाथी जहाँ भी होंगे, अपने बच्चों को इस तरह खिलखिलाते और सुखी देखकर उन पर अपनी दुआओं की बारिश कर रहे होंगे।
समय बीतता गया और वह घर जो कभी दो टूटी हुई आत्माओं का मातम मना रहा था, आज प्रेम, त्याग और सकारात्मकता की एक अनोखी मिसाल बन चुका था। मोहल्ले और समाज के जो लोग पहले तरह-तरह की बातें बना रहे थे, आज वही लोग इस आदर्श परिवार की तारीफ करते नहीं थकते थे। ओंकारेश्वर जी और दमयंती देवी के चेहरों पर बरसों बाद वह निश्चिंत संतोष लौट आया था जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा दरकार थी।
ज़िंदगी वास्तव में कभी किसी के चले जाने से रुकती नहीं है। वह तो निरंतर बहती हुई एक ऐसी नदी है जो हर चट्टान से टकराकर अपना नया रास्ता बना ही लेती है। कभी-कभी नियति हमें ऐसे दोराहे पर ला खड़ा करती है जहाँ हमें अपने व्यक्तिगत सुख-दुख और अहसासों को परे रखकर अपनों की भलाई के लिए साहसिक कदम उठाने पड़ते हैं। जब नीयत में खोट न हो और दिल में अपनों के लिए निस्वार्थ समर्पण हो, तो दो अधूरे तिनके मिलकर भी एक ऐसा मज़बूत और खूबसूरत आशियाना बना सकते हैं जो ज़िंदगी के हर तूफ़ान को मात देने का हौसला रखता है।
जब ज़िंदगी में ऐसे नाज़ुक मोड़ आ जाएँ जहाँ बच्चों का भविष्य और अपनी मर्यादा दांव पर लगी हो, तो क्या समाज की पुरानी और संकीर्ण रूढ़ियों को तोड़कर बच्चों की खुशहाली के लिए ऐसा व्यावहारिक और पवित्र फैसला लेना सही कदम नहीं है? आपकी इस प्रेरणादायक कहानी पर क्या राय है, नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार ज़रूर साझा करें।
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