आज निवेदिता अकेले कमरे में बैठी हुई सोच रही थी कि मेरे 10 साल यूं ही बर्बाद हो गए हैं शादी इतने अच्छे सम्भ्रान्त परिवार में हुई थी ससुर अनुराग रिटायर्ड गवर्नमेंट ऑफिसर थे सास स्मिता हाउसवाइफ थीं और पति ऋषि इंजीनियर था निवेदिता भी एक कंपनी में मैनेजर थी लेकिन देखते ही देखते कंपनी वाले उसे विदेश भेज देते हैं
और उसका हौसला इतना बढ़ जाता है कि वह अपने पति से बोलने लगती है तुम नौकरी छोड़ दो पर पति स्वाभिमानी था और वैसे भी कोई लड़का अपनी नौकरी कैसे छोड़ सकता है
उसने कहा देखो या तो तुम विदेश का मोह छोड़ दो और अपन एक साथ अपने परिवार में रहेंगे सुख शांति से दोनों नौकरी करेंगे तुम भी इंडिया में नौकरी कर सकती हो पर निवेदिता का विदेश के प्रति मोह बढ़ता गया और वह देश-विदेश की सैर करने लगी देखते-देखते पति-पत्नी के रिश्तों में दूरियां बढ़ने लगीं।
जब भी निवेदिता को टाइम मिलता वह दोड़कर अपने मायके इंडिया पहुंच जाती क्योंकि उसका मायका बहुत अमीर था निवेदिता के पापा रघुनंदन रिटायर्ड गवर्नमेंट ऑफिसर थे और मां उमा हाउसवाइफ थीं निवेदिता को भी अपने पैसे का घमंड आने लगा था मायके में उसके पापा मम्मी और दो भाई थे और काफी मालदार थे
खेती-बाड़ी थी उसको लगता था कि मेरा मायका ही सब कुछ है धीरे-धीरे निवेदिता को घमंड आने लगा और उसके भाइयों की भी शादी हो गई अब जब भी वह अपने मायके जाती उसकी मम्मी उसको बस यही कहतीं बेटा मायका ही तुम्हारा सब कुछ है और उसके मन में खुशी होती कभी उसको यह संस्कार नहीं सिखातीं की सास ससुर का भी ध्यान रखना चाहिए सास स्मिता बहू की मां उमाजी से बोलतीं भी………..
अरे अपनी लड़की को समझाओ कि “मायके का मोह” छोड़े और अपने परिवार में सुख शांति से रहे ताकि परिवार भी आगे बढ़े और घर में बहू के रहने से रौनक रहे खुशी आएं लेकिन निवेदिता की मां उल्टा ही निवेदिता की सास को समझा देतीं
कि हम क्या करें……. हमारी लड़की को मायका ही अच्छा लगता है कभी उसे यह नहीं समझातीं कि अपने ससुराल में भी रहना चाहिए सास से अच्छा व्यवहार करना चाहिए।
देखते देखते 10 साल निकल गए और निवेदिता अपने पति को भी कुछ नहीं समझती थी अपने घमंड में और अपने स्वाभिमान में जी रही थी जब उसके दोनों छोटे भाइयों की शादी हो जाती है और उनके भी बच्चे हो जाते हैं तब वह जब भी मायके जाती है तो……………
दोनों भाभियों का मुंह बन जाता है और वह कहती हैं फिर से आ गईं तुम्हारी निवेदिता दीदी उन्हें अपने घर से तो कोई मतलब नहीं रहा निवेदिता की मां निवेदिता का ही साथ देतीं और कभी यह नहीं समझातीं कि तुम्हें अपने घर में रहना चाहिए।
देखते-देखते उसके भाइयों ने भी निवेदिता के बार-बार आने पर विरोध करना शुरू कर दिया अपने भाइयों का ऐसा व्यवहार देखकर उसको झटका लगा और उसे तब महसूस हुआ कि मैंने अपना 10 साल का कीमती समय ऐसे ही निकाल दिया मैं भी अपना घर बसा सकती थी, अपने परिवार में घुल मिलकर रह सकती थी,
लेकिन उसने अपनी सास का महत्व नहीं समझा, पति का महत्व नहीं समझा ना कोई ससुराल की रीति रिवाज पूजा पाठ से उसे कोई मतलब रहा और अपने मायके के ही पूजा पाठ करती रही आज उसे अकेलापन लगने लगा अब सबका साथ छूट चुका था ना तो उसकी सास को कोई उससे मतलब था
ससुर भी अपने बेटे ऋषि की शादी के 1 साल बाद ही बीमारी से गुजर गए थे। अब निवेदिता जब भी अपने ससुराल आती है तो देखती है कोई भी उससे बात नहीं करता आखिर शादी के 10 साल गुजर गए थे तब उसे “पश्चाताप” होता है कि मैंने अपना सारा कीमती समय “मायके के मोह” में गुजार दिया! अब “पश्चाताप” के आंसू बहाने के सिवा कुछ नहीं रहा था!
दोस्तों मेरी कहानी कैसी लगी पढ़कर कमेंट और प्रतिक्रिया अवश्य दें इसमें लड़की से ज्यादा उसके मायके वालों की गलती थी जब मां बच्चे को लड़कियों को अच्छे संस्कार देती हैं और शादी के बाद उन्हें समझाती हैं कि तुम्हारा घर परिवार ससुराल है अपनी सास ससुर की अपने पति की इज्जत करो तो घर स्वर्ग बन जाता है।
सुनीता माथुर
मौलिक रचना
पुणे महाराष्ट्र
#मायके का मोह