पराया, जो अपना सा लगे – मंजू ओमर

बाबूजी थोड़ा सा और पी लीजिए दो चम्मच कुछ खाएगें पियेंगे नहीं तो कैसे ठीक होंगे ।मनुहार और प्यार से अनंत राम जी को राधा सूप पिला रही थी। करीब 3 महीने से अनंत राम जी बीमार चल रहे थे और बिस्तर पर थे । राधा ही उनकी देखभाल करती थी । उनके चार बेटे थे और सब अच्छी-अच्छी पोस्ट पर तैनात थे ,

एक बेटा सिंगापुर में एक दुबई में एक हैदराबाद में और एक दिल्ली में था । यहाँ अपने गृह नगर में अनंत राम जी अपनी पत्नी शीला के साथ रहते थे सभी बेटों की शादी हो गई और सभी अपनी परिवार के साथ खुश है। शीला जी स्कूल में टीचर थी और अब रिटायर्ड थी,और अनंत राम जी का ट्रकों का बिजनेस था उम्र हो जाने के बाद भी वह अपना काम देखते रहते थे।

अपने बिजनेस रिटायर होने का कोई सवाल ही नहीं  होता। अनंत राम जी चाहते थे कि एक बेटा हमारे साथ  रहे और कम से कम मेरे काम में हाथ बटाए,और मेरी बिजनेस में साथ दें लेकिन बिजनेस में बहुत मेहनत थी, अनंत राम जी भी घर के लिए खुद को समय नहीं निकाल पाते थे बहुत ज्यादा काम था अच्छा खासा पैसा था खुद का बड़ा मकान था। 

              बड़े तीन बेटों ने पढ़ाई करके अच्छी नौकरी पा ली थी , लेकिन सबसे छोटा बेटा शुभम पढ़ाई में कमजोर था तो अपनी मेहनत से तो वह कुछ कर नहीं पाया । पिता कहते थे ठीक है बेटा तेरे तीनों भाई तो घर से दूर चले गए अब तो तुम हमारे पास रहो अपना बिजनेस उसे देखो, और फिर हम लोगों का भी बुढ़ापा आ रहा है

एक बेटा अपने पास रहे तो अच्छा है।लेकिन शुभम को बिजनेस में कोई भी रुचि नहीं थी वह तो अपने बड़े भाइयों की तरह घर से दूर रहकर अकेले मौज मस्ती करना चाहता था । उसे तो बाहर की लाइफ ज्यादा अच्छी लगती थी, बड़े भाई लोग कभी-कभी घर आते थे दो-चार दिन को फिर चले जाते थे खूब आव भगत होती थी उनकी , और इधर शुभम घर में हर काम के लिए बुलाया जाता था यह कर दो वह कर दो ।

यह सब देखकर शुभम को भी बहुत भी बाहर जाने का मन करता था   शुभम पढ़ाई में कमजोर था इसलिए वह अपनी मेहनत से तो कुछ कर नहीं पाया बड़े भाइयों को देखकर शुभम भी  बाहर पेमेंट सीट पर दाखिला लेकर पढ़ने की जिद करने लगा। मम्मी पापा के बहुत समझाने पर भी वह नहीं माना तो अनंत राम जी ने शुभम को भी दिल्ली में पेमेंट सीट पर इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला दिला दिया ।

अब  शुभम भी पढ़ने के बहाने घर से बाहर चला गया और पढ़ने लिखने में थोड़ा  मन लगने लगा क्योंकि उसे पता था पढ़ाई नहीं की तो वापस घर जाना पडेगा। 

                 अब मेहनत करके  किसी तरह शुभम ने भी इंजीनियरिंग कर ली , और वही दिल्ली में नौकरी करने लगा। कुछ समय बाद अनंत राम जी ने भी उसकी शादी कर दी और अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए। यहां घर पर अनंत राम जी और पति शीला अकेले रह गए।बिजनेस फैला हुआ था तो आनंद राम जी बिजनेस में काफी व्यस्त रहते थे ।

यहाँ शीला जी  दिनभर घर मे अकेली  रहती थी। शीला जी को कुछ दिनों से बड़ी बेचैनी सी महसूस हो रही थी। सीने मे हल्का हल्का सा दर्द हो रहा था। कई बार पति से उन्होंने कहने  की कोशिश की कि मेर मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है डॉक्टर को दिखादे ।

अनंतरामजी टाल रहे  थे ठीक है चलेंगे जरा काम से फुर्सत हो जाए आजकल बड़ा काम है। और फिर एक दिन शीला जी  घर में थी और तेज सीने मे दर्द उठा और शीला जी दुनिया छोड गई।जब रात को अनंत राम जी घर आए शीला को औधें मुंह बिस्तर पर पड़ा देखा , आवाज दी जब नहीं उठी तो सीधा किया, उनको उठाने की कोशिश की लेकिन शीला जी तो दुनिया छोड़ चली  थी। 

               बच्चों को खबर की गई सब आए घर और फिर तीन दिन मे ही सारे कार्यक्रम निपटा कर जाने की तैयारी करने लगे। अब चारों बेटे आपस में खुसर पुसर करने लगे कि अब पापा का क्या करे।

लेकिन अपने साथ ले जाने को कोई तैयार नहीं था। बेटे बहुएं इतने समय से अकेले रह रहे है अब पापा को ले जाकर मुसीबत कौन मोल ले। पापा भी बेटो के साथ ंंनहीं जाना चाहते थे। घर मे राधा नाम की एक महिला घर का काम करती थी उसी को अनंत राम जी की देखभाल की जिम्मेदारी सौप दी गई और सभी लडके वापस चले गए। 

               अब अनन्त राम जी का बिजनेस से मन उचाट होने लगा। अकेले मन नहीं लगता था। धीरे धीरे बिजनेस को समेटने का मन बनाने लगे। बच्चे सब अपना अपना कमा रहे है अब किसके लिए इतनी मेहनत करी जाए। कुछ समय बाद अनंतराम जी ने अपना पूरा बिजनेस अपने मैनेजर के हाथों मे बेच दिया और अब घर पर ही रहने लगे।

अब उम्र भी हो रही थी। और कोई अपना आसपास नहीं था। कभी कभी लडके फोन पर ही हाल चाल ले लेते थे। उम्र के साथ साथ और कोई काम धाम न रहने पर अनन्त राम जी बीमार रहने लगे। और फिर एक दिन उनका वी पी बढ़ा और अटैक मार गया लकवा मार गया।

घर मे काम करने वाली राधा ने बड़े बेटे के पास खबर करी। लेकिन कोई भी आया नहीं समय का बहाना बना दिया। वही से बैठे बैठे सलाह देते रहे। अडोसी पडोसी उन्हें डाक्टर के पास ले गए। सबसे छोटा बेटा शुभम दिल्ली मे था वो ही आ गया चार पांच दिन को। यहाँ राधा ही सेवा करती रही। डाक्टर को दिखा कर  घर ले आए अनन्त राम जी को। 

             राधा ने सूप बना कर शुभम को दिया कि लो पापा को पिला दो, शुभम सूप का गिलास ले जाकर पापा को पकडाने लगा, लेकिन उनके हाथ की पकड कमजोर थी तो गिलास नीचे गिर गया।

क्या पापा आप गिलास भी ठीक से नहीं पकड पा रहे है सब गिरा दिया। राधा आई जल्दी से अरे भइया बाबू जी के हाथ की पकड कमजोर है अभी अपने हाथ से पिलाना पडेगा खुद नही पी पाएगें। तो लो राधा  तुम्ही पिलाओ हमसे नहीं होगा। अब राधा दूसरा जूस बना कर ले आई और अंनत राम 

 जी को तकिया के सहारे पर बैठाकर धीरे चम्मच से सूप पिलाने लगी। राधा का अपना पन देखकर अंनत राम जी के आखं से आंसू बह‌ निकले। अरे रोएं न बाबूजी जल्दी ठीक हो जाऐगे आप। 

             शुभम ने भी किसी तरह चार दिन निकाले और आज जाने की तैयारी करने लगा। और राधा को सहेजने लगा कि पापा का अच्छे से ध्यान रखना। राधा ने कहा पर भइया रात को तो बाबूजी अकेले रहेगे कोई जरूरत लगी तो कौन देखेगा। हाँ ये तो है, फिर शुभम ने बड़े भाइयों से बात की तो उन लोगों ने कहा राधा से कहो रात को भी यही रहे जो पैसे कहैगी वो हम दे देगें। हम लोग तो आ नहीं सकते इतनी दूर से नौकरी छोडकर। 

           राधा के पति और दो बच्चे थे एक आठ साल की बेटी और ग्यारह साल का बेटा। उनको स्कूल भेजना पति को काम पर जाना, खाना पीना घर की सारी व्यवस्था देखना कैसे होगा। बड़े असमंजस मे थी राधा।

अब अनंत राम जी के बेटो ने निश्चित किया की क्यों न राधा और उसके पूरे परिवार को ही घर मे रख लिया जाए। राधा का पति भी पापा की देखभाल कर देगा। फिजियोथेरेपिस्ट को ले जाना या डाक्टर को दिखाना व़ सब कर देगा। अनंत राम जी का घर बड़ा था घर मे कोई रहने वाला था नहीं।

जब यै प्रस्ताव राधा के सामने रखा गया तो उसने अपने पति घनश्याम से बात कराई, उसके पास कोई ढगं का काम था नहीं ये काम सही लगा तो उसने हां कर दी। पीछे के दो कमरे राधा को दे दिए गए और राधा ने उसमें अपनी पूरी गृहस्थी बसा ली। 

              घर का बना खाना, राधा और घनश्याम की नि:स्वार्थ सेवा से अनन्त राम जी ठीक होने लगे। वाकर के सहारे धीरे धीरे चलने लगे। राधा के बच्चों और उसके परिवार के साथ खूब खुश रहने लगे। बैठे बैठे अनन्त राम जी राधा के बच्चों की पढाई मे भी मदद कर देते थे।

अब अनन्त राम के बच्चे निश्चित हो गए कोई आने को सोचता ही नहीं था। अपनो के द्वारा मिली उपेक्षा से निराश होकर अनंत राम जी राधा और उसके परिवार को ही अपना मानने लगे थे। कभी सोचते अपनो से तो पराए ही अच्छे। 

            धीरे धीरे समक्ष बीतता गया और राधा को और उसके परिवार को रहते हुए आठ साल है गए। बिलकुल घर जैसा माहौल हो गया था। अच्छा खाना पीना और देखभाल से अनन्त राम जी बहुत खुश थे। इस बीच किसी भी लडके ने आने  की जरूरत नहीं समझी।

ऐसे मे सोच विचार करते हुए अनंन्त राम जी ने एक दिन घनश्याम के सहारे से स्टैपं पेपर मंगा कर वकील के सामने घर राधा के नाम कर दिया। सोचने लगे जिन बच्चों ने इतने सालों मे मेरी खबर नही ली उनके लिए प्रापर्टी छोडकर क्या जाना। जिसने मेरे बुरे वक्त मे साथ दिया उसे क्यों न दे दिया जाए।

बस ऐसे ही एक दिन अनन्त राम जी दुनिया छोड गए। फिर लडको को खबर की गई तब सब आए और औपचारिक ता पूरी करके मकान के बारे मे सोचने लगे। बेटो को कोई दुख नही था सबसे ज्यादा तो राधा और उसका परिवार ही आंसू बहा रहा था। 

        अंतिम संस्कार हुआ सारे क्रिया करम निपट गए। अनन्त राम जी का कमरा साफ किया गया तो गद्दे के नीचे से एक फाइल मिली। राधा ने लाकर बच्चों को दे दिया। खोलकर पढा तो लिखा था कि मे अपनी खुशी  ये मकान राधा के नाम कर रहा हूँ। इसमें मेरे बेटो का कोई हक नहीं है।

इसमें राधा और उसके पति का कोई हाथ नहीं है यै मै अपनी मर्जी से कर रहा हूँ। क्या समय आ गया है अपनों से ज्यादा तो गैरों ने मेरा साथ दिया। राधा का परिवार ही आखिरी समय मज मेरा परिवार था। पढकर लडको को एक धक्का तो लगा, लेकिन स्टाम्प पेपर पर पक्की लिखा पढी थी

तो कोई कुछ कर नहीं सकता था। फिर घर राधा को सौप कर लडके अपने अपने ठिकाने पर लौट गए। ऐ होता है कभी कभी दिल दिमाग ऐसा कुछ कर जाता है कि समझना मुश्किल हो जाता है। ऐसे ही पराए भी अपने बनकर दिल जीत लेते हैं। 

मंजू ओमर

झांसी उत्तर प्रदेश

27 अक्टूबर ओवैसी

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