उजालों की वापसी

“मुझे माफ कर दीजिए…” रागिनी की आवाज आंसुओं में डूब गई। उसने विवेक की ओर देखा, “मैं भटक गई थी। मैंने सिर्फ अपने सुख को देखा, उस ममता को नहीं जो ईश्वर ने मुझे बिना मांगे एक झोली में भरकर दी थी। मैं भूल गई थी कि मां बनने का सुख दुनिया के किसी भी ऐशो-आराम से बड़ा होता है। आरव, मुझे माफ कर दे बेटा… तेरी मां अब कहीं नहीं जाएगी, और न ही तेरी गुड़िया को कोई तुझसे अलग करेगा।”

शाम ढलते ही जब जमशेदपुर की चौड़ी सड़कों पर स्ट्रीट लाइटें एक-एक कर जलने लगतीं, तब विवेक की कार अपनी कॉलोनी के मोड़ पर मुड़ती। यह वही वक्त था जब उसका मन घर लौटने की जल्दी में धड़कने लगता था। कुछ महीने पहले तक यह जल्दी अपने छह साल के बेटे आरव और गोद में किलकारी भरती नन्ही परी की सूरत देखने के लिए होती थी, लेकिन अब उस जल्दबाजी की वजह कुछ और थी। अब घर की दहलीज पार करते ही उसे चंदन और मोगरे की मिली-जुली महक अपनी ओर खींचती थी। ड्राइंग रूम के रेशमी परदों की सिलवटों को संवारती रागिनी, सलीके से सजा उसका रूप-रंग और चेहरे पर तैरती मीठी मुस्कान विवेक की सारी थकान एक पल में हर लेती थी।

रागिनी जब हाथ में चाय का प्याला थमाती और नजाकत से अपनी चूड़ियों को खनकाती, तो विवेक अपने आसपास की पूरी दुनिया भूल जाता था। वह भूल जाता था कि उसी हॉल के कोने में, दीवार की ओट से झांकती दो सहमी हुई आंखें उसे टकटकी लगाए देख रही हैं। छह साल का आरव, जो पहले पिता के आते ही उनके कंधे पर चढ़ जाता था और दिनभर के किस्से सुनाए बिना सांस नहीं लेता था, अब केवल दूर खड़ा होकर अपने पापा को अजनबियों की तरह निहारता रहता। उसकी हिम्मत नहीं पड़ती थी कि वह आगे बढ़कर पापा का हाथ थाम सके।

विवेक का जीवन हमेशा से ऐसा नहीं था। तीन साल पहले तक उसके घर में खुशियों की धूप खिली रहती थी। आरव के बाद जब छोटी बेटी का जन्म हुआ, तो मानो पूरे घर में उत्सव का माहौल था। मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। गंभीर प्रसवोपरांत जटिलताओं के कारण उसकी पहली पत्नी स्वाति अस्पताल के बिस्तर से कभी उठ न सकी। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उसने एक हफ्ते के भीतर दम तोड़ दिया। उस दिन विवेक की दुनिया मानो उजड़ गई थी। एक तरफ दूधमुंही बच्ची की भूख से बिलखती आवाजें थीं, तो दूसरी तरफ मां की तलाश में भटकता छोटा आरव। विवेक के माता-पिता का साया बहुत पहले ही उठ चुका था। रिश्तेदार आते, सांत्वना देते और अपने-अपने घरों को लौट जाते।

दिन-ब-दिन विवेक का हौसला टूटने लगा था। एक हाथ से ऑफिस की फाइलें संभालना और दूसरे हाथ से नन्ही परी का दूध का डिब्बा तैयार करना उसके लिए असंभव होता जा रहा था। पड़ोस के बुजुर्गों और शुभचिंतकों ने जब उसकी बदहाली देखी, तो एक स्वर में सलाह दी कि घर को संभालने और बच्चों को मां का साया देने के लिए उसे दोबारा घर बसा लेना चाहिए। विवेक का मन गवाही नहीं देता था, स्वाति की यादें अभी भी उसके जेहन में ताजा थीं। पर बच्चों के रोते चेहरे देखकर उसने घुटने टेक दिए। उसने केवल एक शर्त रखी थी कि जो भी घर में आए, वह इन दोनों मासूमों को अपना समझे।

राउरकेला के एक बहुत ही साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से रागिनी का रिश्ता आया। रागिनी सुंदर थी, कम उम्र थी और उसने अपने घर में अभावों को बहुत करीब से देखा था। जब शादी हुई, तो विवेक ने उसे हर सुख-साधन से नवाजा। विवेक एक प्रतिष्ठित स्टील कंपनी में सीनियर मैनेजर था, इसलिए घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। शुरुआती दो-तीन महीनों तक तो रागिनी ने घर और बच्चों को संभालने की पूरी कोशिश की। वह बच्चों के कपड़े धोती, उन्हें खाना खिलाती और विवेक की नजरों में एक आदर्श पत्नी और मां बनने का जतन करती।

मगर जैसे-जैसे दिन बीते, रागिनी के मन में दबे अरमान सिर उठाने लगे। उसने देखा कि इस घर में ऐशो-आराम के सारे साधन हैं, विवेक उस पर जान छिड़कता है, लेकिन उसकी पूरी दिनचर्या बच्चों के डायपर बदलने, दलिया पकाने और उन्हें सुलाने में ही खत्म हो जाती है। जब वह अपनी हमउम्र सहेलियों को सोशल मीडिया पर घूमते-फिरते, नए फैशन के कपड़े पहनकर रेस्टोरेंटों में तस्वीरें खिंचवाते देखती, तो उसका मन कड़वाहट से भर जाता।

आईने के सामने बैठकर जब वह अपनी मांग में सिंदूर भरती, तो खुद से ही बुदबुदाती, “माना कि विवेक की यह दूसरी शादी है, लेकिन मेरी तो पहली ही है न? मेरी उम्र ही क्या है अभी? क्या मैंने गरीबी से निकलकर इस बड़े घर में सिर्फ इसलिए कदम रखा था कि दूसरों के बच्चों की आया बनकर अपनी जवानी खपा दूं? मेरे भी कुछ सपने हैं, कुछ ख्वाहिशें हैं। मैं क्यों इन दो छोटे बच्चों की जिम्मेदारी तले अपनी जिंदगी को कुचल दूं?”

यह विचार धीरे-धीरे रागिनी के मन में जहर बनकर फैलने लगा। बच्चों के प्रति उसका बर्ताव बदलने लगा। आरव स्कूल से आता तो उसे खुद ही अपने जूते उतारने पड़ते और बैग फेंककर रसोई में रखे ठंडे पराठे खाने पड़ते। नन्ही परी पालने में रोती रहती, मगर रागिनी अपने फोन में मग्न रहती या फिर टीवी सीरियलों में खोई रहती।

एक दिन जब विवेक ऑफिस से जल्दी लौट आया, तो उसने देखा कि आरव फर्श पर बिखरे खिलौनों के बीच भूखा बैठा रो रहा था और नन्ही बच्ची के रोने से उसका गला सूख चुका था। रागिनी अपने कमरे में कान में ईयरफोन लगाए सोफे पर आराम कर रही थी। उस दिन विवेक का पारा चढ़ गया।

उसने रागिनी से तल्ख लहजे में कहा, “यह सब क्या है रागिनी? घर पूरी तरह बिखरा पड़ा है। बच्ची कब से रो रही है और तुम्हें परवाह तक नहीं? तुम्हारा ध्यान अब बच्चों से बिल्कुल हट चुका है। आरव दिन-ब-दिन गुमसुम होता जा रहा है। क्या इसी दिन के लिए मैंने तुमसे शादी की थी? मैंने तो सोचा था कि इन अनाथ बच्चों को एक मां मिल जाएगी।”

रागिनी ने पहले तो नजरें नीची रखीं, लेकिन फिर उसने झटके से ईयरफोन निकाला और विवेक की आंखों में आंखें डालकर बोली, “देखिए जी, रोज-रोज के ताने मुझसे बर्दाश्त नहीं होते। शादी करके मैं यहां आपकी पत्नी बनकर आई हूं, चौबीसों घंटे की नौकरानी बनकर नहीं। मुझसे इतना बड़ा बोझ नहीं संभलता। मेरा पूरा दिन इन बच्चों की गंदगी साफ करने में निकल जाता है। मेरे भी कुछ अरमान हैं, मेरी भी जिंदगी है। अगर यही सब करना था तो किसी अनाथालय की वार्डन को ब्याह लाते।”

विवेक स्तब्ध रह गया। उसने कभी रागिनी का यह रूप नहीं देखा था। उसने समझाने की कोशिश की, “रागिनी, ये मासूम बच्चे हैं। इनका कोई दोष नहीं है…”

“दोष मेरा भी नहीं है!” रागिनी ने बीच में ही बात काट दी। “अगर आप सच में चाहते हैं कि हमारा रिश्ता ठीक चले और घर में शांति रहे, तो कोई दूसरा रास्ता निकालिए। इस दूधमुंही बच्ची को किसी अच्छी बेबी-केयर संस्था या हॉस्टल में डाल दीजिए जहां उसकी पूरी देखभाल हो सके। जब यह बड़ी हो जाएगी, तब घर ले आइएगा। और आरव को किसी अच्छे बोर्डिंग स्कूल भेज दीजिए। तभी मैं खुलकर सांस ले पाऊंगी, वरना इस घुटन में मैं घुट-घुटकर मर जाऊंगी।”

रागिनी की बातें सुनकर कमरे में सन्नाटा छा गया। विवेक की बुद्धि मानो कुंद हो गई थी। एक तरफ उसका वैवाहिक सुख और रागिनी का रूप था, जिसने उसे पिछले कुछ महीनों में पूरी तरह अपने वश में कर लिया था, और दूसरी तरफ उसके अपने खून की पुकार थी। रागिनी के आंसू और उसकी नाराजगी के आगे विवेक का मन डोल गया। उसने थोड़ी देर की चुप्पी के बाद एक भारी सांस ली और रागिनी के प्रस्ताव पर अपनी मौन सहमति दे दी।

उस रात आरव कमरे के बाहर दरवाजे की दरार से यह सब सुन रहा था। छह साल का वह अबोध बालक पूरी बात भले न समझ पाया हो, लेकिन इतना जरूर जान गया था कि उसकी छोटी बहन को कहीं दूर भेजा जा रहा है और शायद उसे भी पापा से अलग कर दिया जाएगा। उसके नन्हे दिल पर जो गुजरी, वह आंसुओं के रूप में उसके गालों पर बह निकली। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह वही पापा हैं जो कभी उसे अपनी जान से ज्यादा प्यार करते थे।

अगले कुछ दिनों तक घर में एक अजीब-सी बेचैनी छाई रही। संस्था से बात हो चुकी थी। शनिवार की सुबह नन्ही बच्ची को ले जाने के लिए लोग आने वाले थे। रागिनी के चेहरे पर एक राहत भरी चमक थी, जबकि विवेक का अंतर्मन अंदर ही अंदर अपराधबोध की आग में जल रहा था। वह चाहकर भी बच्चों से आंखें नहीं मिला पा रहा था।

शुक्रवार की रात अचानक मौसम ने करवट ली। तेज आंधी के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली की चमक से खिड़कियां थरथरा रही थीं। आधी रात के करीब अचानक बिजली गुल हो गई। पूरा घर घने अंधेरे में डूब गया। विवेक की नींद एक अजीब-सी बेचैनी के कारण टूट गई। उसे लगा जैसे हवा के शोर के बीच कोई सिसक रहा हो।

उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई। रागिनी गहरी नींद में सो रही थी। विवेक दबे पांव कमरे से बाहर निकला। वह बच्चों के कमरे की तरफ बढ़ा। वहां पालना खाली पड़ा था। विवेक का दिल जोर से धड़का। उसने टॉर्च की रोशनी चारों तरफ घुमाई। कमरे के एक कोने में, दीवान के पीछे का दृश्य देखकर उसके कदम वहीं जम गए और उसकी सांसें अटक गईं।

वहां फर्श पर, तेज ठंड के बीच, छह साल का आरव दीवार से पीठ टिकाए बैठा था। उसने अपनी नन्ही बहन को अपनी छाती से कसकर चिपका रखा था। बच्ची ठंड से कांप रही थी, इसलिए आरव ने अपनी गर्म चादर उस पर लपेट रखी थी और खुद सिर्फ एक पतली टी-शर्ट में ठंड से ठिठुर रहा था। जब भी बिजली कड़कती, आरव डर के मारे अपनी आंखें बंद कर लेता, लेकिन अपने नन्हे हाथों से बहन के कान ढक देता ताकि वह डरकर रो न पड़े। उसके सूखे होंठ लगातार कांप रहे थे और वह धीरे-धीरे अपनी तोतली आवाज में कह रहा था, “मत रो गुड़िया… भैया यहीं है… मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूंगा… मैं अपनी सारी चॉकलेट छोड़ दूंगा… मैं खाना भी कम खाऊंगा… पर तुझे किसी को ले जाने नहीं दूंगा…”

विवेक के हाथ से मोबाइल छूटते-छूटते बचा। उस दृश्य ने उसके सीने पर जैसे हजारों खंजर एक साथ घोंप दिए हों। वह विवेक, जो समाज में एक सफल इंसान कहलाता था, इस छह साल के बच्चे के सामने कितना बौना और गिरा हुआ साबित हो चुका था! जिस ममता और सुरक्षा की उम्मीद उसने एक अनजान औरत से की थी, वह निस्वार्थ प्रेम उसका छोटा-सा बेटा अपनी बहन पर लुटा रहा था। आरव खुद ठंड में कांप रहा था, पर बहन को आंच नहीं आने दे रहा था, और वह खुद एक पिता होकर अपने सुख के लिए अपने ही बच्चों को अनाथालय की दहलीज पर धकेलने जा रहा था।

स्वाति का चेहरा विवेक की आंखों के सामने कौंध गया—अस्पताल के उस बिस्तर पर दम तोड़ने से पहले उसने विवेक का हाथ पकड़कर कहा था, “विवेक, मेरे बच्चों को कभी बेसहारा मत होने देना…”

विवेक की आंखों से पश्चाताप के आंसू सैलाब बनकर बह निकले। उसके घुटने टिक गए। वह दौड़कर आगे बढ़ा और उन दोनों मासूमों को अपने मजबूत आलिंगन में भर लिया।

“पापा… प्लीज गुड़िया को मत भेजो… मैं बहुत अच्छा बच्चा बनूंगा… कभी जिद नहीं करूंगा…” आरव डरते हुए रोने लगा।

“नहीं मेरे बच्चे, नहीं! मुझे माफ कर दे बेटा… तेरा पापी बाप अंधा हो गया था!” विवेक की चीख निकल गई। उसने आरव और नन्ही बच्ची को अपने सीने से ऐसा चिपकाया मानो वह दुनिया की हर बुरी नजर से उन्हें छुपा लेना चाहता हो। उसका रोना सुनकर रागिनी भी जाग गई और टॉर्च लेकर कमरे में आ पहुंची।

दरवाजे पर खड़ी रागिनी ने जब फर्श पर बैठे अपने पति को बच्चों से लिपटकर बिलखते देखा, तो वह सन्न रह गई। विवेक ने मुड़कर रागिनी की ओर देखा। उसकी आंखों में अब मोह या आकर्षण नहीं था, बल्कि एक पिता का अडिग संकल्प था।

विवेक ने बेहद शांत लेकिन सख्त आवाज में कहा, “रागिनी, कल कोई संस्था की गाड़ी यहां नहीं आएगी। ये मेरे बच्चे हैं, मेरी स्वाति की अंतिम निशानी हैं। अगर इस घर में रहने की शर्त यह है कि मुझे अपने कलेजे के टुकड़ों को बेदखल करना पड़े, तो मुझे यह रिश्ता और यह दिखावटी सुख एक पल के लिए भी मंजूर नहीं है। तुम आज़ाद हो रागिनी। अगर तुम इन बच्चों को अपना नहीं मान सकतीं, तो तुम कल ही अपने मायके लौट सकती हो। मैं अपनी पूरी जिंदगी अकेले रहकर इन बच्चों को पाल लूंगा, लेकिन अपनी आत्मा का सौदा अब कभी नहीं करूंगा।”

विवेक के शब्दों में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक गहरी पीड़ा और अंतिम फैसला था। रागिनी ने चौंककर उस नन्हे आरव को देखा, जो अभी भी अपनी बहन को सीने से लगाए, बड़ी-बड़ी डरी हुई आंखों से उसे देख रहा था। उस बच्चे की नजरों में रागिनी के लिए कोई नफरत नहीं थी, केवल एक याचना थी कि उसकी बहन को उससे न छीना जाए।

उस भयानक अंधेरी रात में, आरव के उस अबोध त्याग और विवेक की टूटी हुई आवाज ने रागिनी के भीतर की सारी स्वार्थपरता की दीवारों को हिलाकर रख दिया। उसने अपने जीवन में हमेशा अपने हक की बात सोची थी, कभी फर्ज की गहराई को नहीं समझा था। उसे अचानक अपनी ही सोच पर घिन आने लगी। वह सोचने लगी कि जिस ममता के लिए दुनिया तरसती है, वह उसी ममता को पैरों तले कुचलने जा रही थी। अगर आज विवेक ने अपने बच्चों को छोड़ दिया होता, तो कल वह उसे भी किसी मोड़ पर छोड़ सकता था। जो इंसान अपने बच्चों का सगा नहीं हो सकता, वह उसका क्या होता? लेकिन विवेक ने अंततः अपने बच्चों को चुना था, और आरव ने अपनी बहन को।

रागिनी के पैर कांपने लगे। उसका अहम्, उसका बनावटी गुस्सा सब कुछ एक पल में बह गया। उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू छलक पड़े।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी और फर्श पर ही उन तीनों के सामने बैठ गई। उसने कांपते हाथों से आरव के सिर पर हाथ रखा। आरव पहले थोड़ा सहमा, लेकिन रागिनी के स्पर्श में इस बार कोई परायापन नहीं था। रागिनी ने झुककर नन्ही बच्ची को आरव की गोद से उठाया और अपने सीने से लगा लिया। बच्ची ने रोना बंद कर दिया और अपनी नन्ही उंगलियों से रागिनी के पल्लू को पकड़ लिया।

“मुझे माफ कर दीजिए…” रागिनी की आवाज आंसुओं में डूब गई। उसने विवेक की ओर देखा, “मैं भटक गई थी। मैंने सिर्फ अपने सुख को देखा, उस ममता को नहीं जो ईश्वर ने मुझे बिना मांगे एक झोली में भरकर दी थी। मैं भूल गई थी कि मां बनने का सुख दुनिया के किसी भी ऐशो-आराम से बड़ा होता है। आरव, मुझे माफ कर दे बेटा… तेरी मां अब कहीं नहीं जाएगी, और न ही तेरी गुड़िया को कोई तुझसे अलग करेगा।”

उस रात जमशेदपुर के उस घर में सिर्फ एक तूफान ही शांत नहीं हुआ था, बल्कि एक नए और सच्चे परिवार का जन्म हुआ था। रागिनी ने उस नन्ही बच्ची को अपने सीने से लगाकर दूध पिलाया और आरव को अपने पास सुलाकर उसकी पीठ थपथपाई।

सुबह जब सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की से छनकर कमरे में आईं, तो पूरा घर रोशनी से नहाया हुआ था। रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी, लेकिन इस बार हॉल में कोई सन्नाटा नहीं था। आरव अपने खिलौने लेकर रागिनी के इर्द-गिर्द घूम रहा था और उसे ‘मां’ कहकर पुकार रहा था। रागिनी के चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह किसी सजने-संवरने की मोहताज नहीं थी, वह एक संतुष्ट और सच्ची मां के चेहरे का तेज था। विवेक दरवाजे पर खड़ा होकर इस दृश्य को देख रहा था, और पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसके घर में उजालों की सच्ची वापसी हो चुकी थी।

एक परिवार केवल खून के रिश्तों से नहीं, बल्कि त्याग, समझ और निस्वार्थ प्रेम से बनता है। जब मन का स्वार्थ खत्म होता है, तभी रिश्तों की असली सुंदरता खिलती है।

आपके विचार से, क्या रागिनी का हृदय परिवर्तन एक सच्ची मां की जीत है? क्या विवेक का अपने बच्चों के लिए खड़ा होना सही था? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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