बिना धड़कन वाली बहू

  कैफे का दरवाजा खुला और घंटी की मधुर आवाज के साथ अंदर आई नेहा। नेहा को देखते ही पल्लवी अपनी कुर्सी से उछल पड़ी। आसमानी रंग के लंबे ओवरकोट और खुले बालों में नेहा पहले से कहीं ज्यादा चमक रही थी।

पल्लवी ने आगे बढ़कर उसे कसकर गले लगा लिया और शिकायत भरे लहजे में बोली, “अरे नेहा! तुम तो सच में गूलर का फूल हो गई हो यार। पूरे तीन साल बाद तुम्हारा चेहरा देखने को मिल रहा है। जब से तुम्हारी शादी हुई है, तुम तो अपनी इस बचपन की सहेली को जैसे भूल ही गई हो।”

नेहा ने मुस्कुराते हुए पल्लवी के गाल खींचे और कुर्सी पर बैठते हुए बोली, “भूलती तो तब न जब सांस लेने की भी फुर्सत मिलती। गृहस्थी की गाड़ी जब पटरी पर दौड़ती है न पल्लवी, तो वक्त कैसे पंख लगाकर उड़ जाता है, पता ही नहीं चलता। वैसे तुम्हें शायद पता नहीं, मैं और प्रतीक पिछले साल ही सिंगापुर शिफ्ट हो गए हैं।”

पल्लवी की आंखें आश्चर्य और खुशी से फैल गईं। उसने तुरंत वेटर को दो गरमागरम मसाला चाय और पकौड़े लाने का इशारा किया और उत्सुकता से मेज पर आगे झुकते हुए बोली, “अरे वाह! मेरी सहेली तो अब विदेश की मैडम बन गई है। लेकिन नेहा, एक बात समझ नहीं आई। प्रतीक के पिताजी, यानी हरिवंश अंकल का क्या हुआ? जब मैं पिछली बार तुम्हारे ससुराल आई थी, तब तो उन्हें लकवे का हल्का दौरा पड़ा था और डॉक्टर ने कहा था कि उन्हें चौबीसों घंटे देखभाल की जरूरत है। फिर वो यहां देहरादून में अकेले कैसे रहते होंगे?”

नेहा के चेहरे पर एक शांत और संतोषजनक मुस्कान तैर गई। उसने अपने पर्स से फोन निकालकर मेज पर रखा और बोली, “अकेले क्यों रहेंगे पल्लवी? जिन माता-पिता ने प्रतीक को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उन्हें हम इस हालत में अकेला छोड़कर विदेश में कैसे चैन की सांस ले सकते थे? हम बाबूजी को भी अपने साथ सिंगापुर ले गए हैं। और एक और खुशखबरी दूं तुम्हें? मैंने वहां एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर आर्किटेक्ट की जॉब भी जॉइन कर ली है। अभी बस कंपनी के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में तीन दिन के लिए इंडिया आई थी, तो सोचा तुझसे मिले बिना वापस नहीं जाऊंगी।”

पल्लवी का मुंह खुला का खुला रह गया। उसने अपने दोनों हाथ गालों पर टिका लिए और अचरज से नेहा को निहारते हुए बोली, “नेहा, सच बताना, क्या तुम्हारे पास कोई जादुई छड़ी है? मतलब, तुम्हारे पांच साल के जुड़वां बच्चे—आरव और अहाना, व्हीलचेयर पर निर्भर ससुरजी, प्रतीक का इतना बड़ा बिजनेस, ऊपर से परदेश का नया माहौल और अब तुम्हारी फुल-टाइम नौकरी! एक अकेली औरत इतने सारे मोर्चों पर एक साथ कैसे लड़ सकती है? हमारे यहां तो एक कामवाली बाई दो दिन छुट्टी मार ले, तो घर में भूचाल आ जाता है। तुम ये सब कैसे मैनेज कर लेती हो?”

नेहा ने चाय की चुस्की लेते हुए बड़े ही सहज भाव से कहा, “अरे यार, मैं कोई सुपरवूमन नहीं हूं। यह सब तो हमारी ‘तारा’ की वजह से संभव हो पाया है। जब से तारा हमारे घर में आई है, मेरी तो जैसे सारी चिंताएं ही खत्म हो गई हैं। वह हर काम में इतनी निपुण और मुस्तैद है कि मुझे घर की तरफ से रत्ती भर भी फिक्र नहीं होती।”

पल्लवी ने अपनी भौंहे सिकोड़ते हुए अंदाजा लगाया, “अच्छा, तो तुमने वहां कोई फुल-टाइम हाउसमेड रख ली है? पर नेहा, विदेशों में तो मेड का खर्चा बहुत ज्यादा होता है। चलो, मान लिया कि वो झाड़ू-पोंछा और रसोई संभाल लेती होगी, लेकिन हरिवंश अंकल की देखभाल के लिए तो तुम्हें अलग से कोई ट्रेंड मेल नर्स रखनी पड़ी होगी न? बीमार बुजुर्ग को समय पर दवाइयां देना, उनका ब्लड प्रेशर और शुगर चेक करना, उन्हें नहलाना और बार-बार वॉशरूम ले जाना कोई हंसी-खेल तो है नहीं। और बुजुर्गों का स्वभाव भी तो बीमारी में थोड़ा चिड़चिड़ा हो जाता है, हर कोई उनके नखरे नहीं झेल सकता।”

नेहा हंस पड़ी और बोली, “पल्लवी, यही तो सबसे बड़ी बात है! हमने कोई नर्स नहीं रखी है। बाबूजी का सारा काम भी तारा ही करती है। सुबह ठीक छह बजे वह बाबूजी के कमरे में पहुंच जाती है। उन्हें सहारा देकर बिस्तर से उठाना, व्हीलचेयर पर बिठाकर वॉशरूम ले जाना, उन्हें स्पंज बाथ देना और फिर उनकी पसंद के भजन लगाकर उन्हें बालकनी की धूप में बिठाना—यह सब तारा की दिनचर्या का हिस्सा है। बाबूजी को दिन में छह तरह की दवाइयां देनी होती हैं, तारा के सिस्टम में हर दवाई का सटीक समय फीड है, इसलिए एक सेकंड की भी देरी नहीं होती। बाबूजी कभी-कभी रात को दो बजे भी पानी मांगते हैं या कहते हैं कि मेरे पैरों में दर्द हो रहा है, तो तारा बिना माथे पर एक भी शिकन लाए, बिना झुंझलाए मुस्कुराते हुए उनकी सेवा में हाजिर रहती है।”

पल्लवी की दिलचस्पी अब इस रहस्यमयी ‘तारा’ में और गहरी होती जा रही थी। उसने पकौड़े की प्लेट नेहा की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “भाई वाह! फिर तो तुम सच में बहुत किस्मत वाली हो जो तुम्हें परदेश में इतनी संस्कारी और भरोसेमंद सहायिका मिल गई। लेकिन अगर उसका पूरा वक्त अंकल की सेवा में ही निकल जाता है, तो फिर आरव और अहाना को कौन संभालता है? जुड़वां बच्चों को संभालना तो अपने आप में एक महाभारत है।”

नेहा की आंखों में चमक आ गई। वह कहने लगी, “पल्लवी, तारा किसी एक इंसान के बराबर नहीं, बल्कि अकेले दस लोगों के बराबर है। वह सुबह पांच बजे से एक्टिव हो जाती है। पूरे घर की साफ़-सफ़ाई, सबके लिए उनकी सेहत के हिसाब से नाश्ता बनाना, और फिर आरव और अहाना को जगाकर स्कूल के लिए तैयार करना—सब उसके बाएं हाथ का खेल है। शाम को वह बच्चों को सोसाइटी के पार्क में घुमाने ले जाती है। जब बच्चे होमवर्क करने में आनाकानी करते हैं, तो वह अपनी आवाज बदल-बदलकर उन्हें पंचतंत्र की कहानियां सुनाती है, उनके साथ पहेलियां बुझाती है और खेल-खेल में उनका सारा होमवर्क करवा देती है। वह बच्चों के चेहरे के हाव-भाव देखकर ही समझ जाती है कि आज स्कूल में किसी ने उन्हें डांटा है या वो किसी बात से उदास हैं। और इतना ही नहीं, प्रतीक की जितनी भी इंटरनेशनल क्लाइंट्स के साथ ऑनलाइन मीटिंग्स होती हैं, उनका शेड्यूल बनाना, प्रेजेंटेशन के मुख्य पॉइंट्स तैयार करना और यहां तक कि चीनी और जापानी भाषा के मेल्स को ट्रांसलेट करके प्रतीक को सुनाना भी तारा ही करती है।”

अब पल्लवी से रहा नहीं गया। उसने अपना चाय का कप मेज पर रखा और नेहा का हाथ पकड़कर बोली, “बस कर नेहा! अब तू मुझे बेवकूफ बना रही है। भला एक इंसान में इतनी सारी खूबियां कैसे हो सकती हैं? जो रसोइया भी हो, नर्स भी हो, बच्चों की टीचर भी हो, और कॉर्पोरेट सेक्रेटरी भी हो! और ऊपर से चौबीसों घंटे काम करे और थके भी नहीं? यह कोई अलादीन के चिराग का जिन्न है क्या? सच-सच बता, माजरा क्या है?”

नेहा ने चारों तरफ देखा और फिर धीरे से मुस्कुराते हुए बोली, “तूने बिल्कुल सही पकड़ा पल्लवी। वह कोई इंसान नहीं है, इसीलिए तो वह न कभी थकती है, न कभी छुट्टी मांगती है और न ही कभी गुस्सा करती है। तारा असल में एक एडवांस ह्यूमनॉइड रोबोट है। रात को जब हम सब सो जाते हैं, तो वह खुद को तीन घंटे के लिए चार्जिंग डॉक से कनेक्ट कर लेती है और सुबह फिर से पूरे दिन काम करने के लिए तैयार हो जाती है।”

पल्लवी के मुंह से एक दबी हुई चीख निकली, “क्या? रोबोट! अरे बाप रे! मैंने फिल्मों में तो देखा था, पर असल जिंदगी में रोबोट इतने समझदार हो गए हैं कि घर-परिवार संभाल लें, यह तो मैं सोच भी नहीं सकती थी।”

“हां पल्लवी,” नेहा ने गंभीर होते हुए कहा, “आजकल की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स इतनी आगे बढ़ चुकी है कि इनमें ‘इमोशनल सेंसर्स’ भी अपलोड कर दिए गए हैं। तारा हमारे चेहरे की झुर्रियों, आवाज के कंपन और आंखों की पुतलियों को स्कैन करके तुरंत समझ जाती है कि सामने वाला इंसान खुश है, तनाव में है या किसी दर्द में है। और पता है, वह कितनी भरोसेमंद है? पिछले महीने की ही बात है, मैं और प्रतीक एक बिजनेस डिनर पर गए थे। पीछे से बाबूजी का ब्लड प्रेशर अचानक बहुत लो हो गया और वे व्हीलचेयर से फिसलकर नीचे गिर गए। तारा ने तुरंत अपनी इमरजेंसी प्रोटोकॉल ऑन की। उसने एक सेकंड भी गंवाए बिना नजदीकी अस्पताल की एंबुलेंस को कॉल किया, बाबूजी की पूरी मेडिकल हिस्ट्री डॉक्टर के सर्वर पर भेजी, उन्हें प्राथमिक उपचार दिया और साथ ही मुझे और प्रतीक को लाइव वीडियो लोकेशन भेज दी। जब तक हम घबराते हुए अस्पताल पहुंचे, बाबूजी का इलाज शुरू हो चुका था और वे खतरे से बाहर थे। डॉक्टर ने साफ कहा कि अगर दस मिनट की भी देरी हो जाती, तो अनर्थ हो सकता था। आज तारा की वजह से ही बाबूजी हमारे बीच सुरक्षित हैं। हम कहीं बाहर घूमने भी जाते हैं, तो तारा को कॉम्पैक्ट मोड में करके कार की डिक्की में रख लेते हैं।”

पल्लवी कुछ देर तक बिल्कुल खामोश रही। बाहर बारिश तेज हो चुकी थी। कैफे की मद्धम रोशनी में पल्लवी के चेहरे पर प्रशंसा के साथ-साथ एक गहरी चिंता की लकीरें उभर आई थीं। उसने एक लंबी सांस ली और बहुत ही संजीदा स्वर में बोली, “नेहा, इंसान के दिमाग की जितनी तारीफ की जाए कम है। उसने अपने ही जैसी, बल्कि खुद से भी ज्यादा काबिल मशीन बना ली है। तुम्हारी सुविधा के हिसाब से यह सब सुनने में किसी परीकथा जैसा लगता है। लेकिन एक सहेली होने के नाते मेरे मन में एक अजीब सा डर बैठ रहा है। क्या तुम्हें नहीं लगता कि तारा पर इतनी ज्यादा निर्भरता तुम्हारे परिवार की आत्मा को खोखला कर देगी? हम परिवार क्यों बनाते हैं? इसीलिए न कि जब हम बीमार हों तो कोई अपना हमारे माथे पर हाथ रखे, जब बच्चे जिद करें तो मां उन्हें अपने सीने से लगाकर मनाए, जब बुजुर्ग अकेले हों तो बेटा-बहू उनके पास बैठकर दो घड़ी अपनेपन की बात करें। आज के दौर में रिश्तों में पहले ही इतना तनाव और क्लेश बढ़ गया है कि लोग एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पाते। ऐसे में अगर चंद पैसे खर्च करके मशीनें हमें बिना किसी शिकायत के यह सारा सुख देने लगेंगी, तो फिर इंसान को इंसान की जरूरत ही कहां रह जाएगी? जिस दिन हमें इंसानों से ज्यादा मशीनों का साथ पसंद आने लगेगा, उस दिन परिवार नाम की संस्था ही खत्म हो जाएगी नेहा।”

पल्लवी की बात सुनकर नेहा के चेहरे पर कोई घबराहट नहीं आई, बल्कि उसकी आंखों में एक नमी और गहरी समझदारी चमक उठी। उसने आगे बढ़कर पल्लवी के दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और बोली, “पल्लवी, जो डर आज तुम्हारे मन में आया है न, ठीक यही सवाल और यही खौफ आज से चार महीने पहले मेरे और प्रतीक के सामने भी खड़ा हुआ था। बल्कि हम तो उस मोड़ पर पहुंच चुके थे जहां हमारा परिवार बिखरने ही वाला था।”

पल्लवी ने चौंककर पूछा, “क्या मतलब? क्या हुआ था?”

नेहा ने अपनी नजरें चाय के प्याले पर टिका दीं और अतीत के पन्नों को पलटते हुए बोली, “शुरुआती छह महीनों में जब तारा घर आई, तो मैं और प्रतीक इतने बेफिक्र हो गए कि हमने घर के हर काम, हर जिम्मेदारी से अपना हाथ खींच लिया। हमें लगा कि तारा तो सब कर ही रही है, तो हम अपने करियर पर पूरा फोकस करते हैं। मैं देर रात तक ऑफिस में रुकने लगी, प्रतीक अपने बिजनेस टूर बढ़ाने लगा। घर आते भी थे तो अपने-अपने लैपटॉप और फोन में घुस जाते थे। हमें लगता था कि बाबूजी को समय पर दवाई मिल रही है, बच्चों को अच्छा खाना और पढ़ाई मिल रही है, तो सब परफेक्ट है। लेकिन हमारी आंखें तब खुलीं जब उस घटना के बाद बाबूजी अस्पताल से घर लौटे।

उस रविवार की शाम को बाबूजी अपने कमरे में बैठे अपनी पुरानी एल्बम देख रहे थे और उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। तारा ने तुरंत उनके आंसू पोंछे और अपने प्रोग्राम्ड तरीके से पूछा— ‘दादाजी, क्या आपको कहीं शारीरिक पीड़ा हो रही है? क्या मैं डॉक्टर को कॉल करूं?’ तब बाबूजी ने तारा के उस ठंडे, धातु के हाथ को अपने गाल से हटाते हुए बड़ी बेबसी से कहा था— ‘नहीं बेटी, मुझे शरीर में कोई दर्द नहीं है। तेरी सेवा में कोई कमी नहीं है, पर तेरे इन हाथों में मेरे बेटे प्रतीक के हाथों की वो गर्माहट नहीं है। तू मेरे लिए भजन तो बजा देती है, पर मेरी बहू नेहा की तरह मेरे पास बैठकर अपने मायके के किस्से नहीं सुनाती। मेरे पोता-पोती अब मेरे कमरे में आकर शोर नहीं मचाते, वो भी तुझसे ही कहानियां सुनते हैं। इस बड़े से घर में सारी सुविधाएं हैं, पर मेरा परिवार कहीं खो गया है।’

मैं और प्रतीक दरवाजे के बाहर खड़े थे। बाबूजी का एक-एक शब्द हमारे सीने में तीर की तरह चुभ रहा था। और तभी हमने देखा कि दूसरे कमरे में हमारे बच्चे आरव और अहाना एक पेंटिंग बना रहे थे। जब मैंने पास जाकर देखा तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने ‘माई फैमिली’ की ड्राइंग बनाई थी, जिसमें बीच में बच्चों के साथ तारा खड़ी थी, और कोने में बहुत छोटे से आकार में मैं और प्रतीक हाथ में लैपटॉप लिए खड़े थे। एक पांच साल के बच्चे के मन में उसकी मां की जगह एक रोबोट ले रहा था!”

नेहा की आवाज भर्रा गई। उसने अपने आंसू पोंछते हुए आगे कहा, “उस रात मैं और प्रतीक पूरी रात सो नहीं पाए। हम दोनों बहुत रोए। हमें समझ में आ गया कि गलती तारा की या विज्ञान की नहीं थी, गलती हमारी सोच की थी। हमने मशीन को अपनी ‘सहायिका’ बनाने के बजाय अपना ‘विकल्प’ (रिप्लेसमेंट) बना लिया था। विज्ञान ने रोबोट इसलिए बनाया था ताकि इंसान के पास जो वक्त झाड़ू-पोंछे, बर्तन और भागदौड़ में बर्बाद होता है, वह वक्त बच सके और इंसान उस बचे हुए वक्त को अपने परिवार के साथ बिता सके। लेकिन हमने उस बचे हुए वक्त को भी पैसे कमाने की मशीन में झोंक दिया।”

पल्लवी सांस रोके नेहा की बात सुन रही थी। उसने धीरे से पूछा, “फिर? फिर तुम लोगों ने क्या किया? क्या तुमने तारा को वापस कर दिया?”

नेहा ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “नहीं पल्लवी, हमने तारा को वापस नहीं किया, बल्कि हमने खुद को बदला। अगले ही दिन हमने अपने घर के और तारा के नियम बदल दिए। हमने तय किया कि तारा सिर्फ घर के बोझिल और शारीरिक काम करेगी—जैसे सफ़ाई करना, कपड़े धोना, भारी सामान उठाना, ऑफिस का डेटा अरेंज करना और जब हम ऑफिस में हों तब बाबूजी और बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखना। लेकिन जहां ‘भावनाओं’ और ‘रिश्तों’ की बात आएगी, वहां तारा का प्रवेश वर्जित होगा।

अब नियम यह है कि शाम को सात बजे के बाद मेरे और प्रतीक के फोन और लैपटॉप एक दराज में बंद हो जाते हैं। तारा रसोई में सब्जियां काट देती है, लेकिन बाबूजी के लिए उनकी पसंद की बिना चीनी वाली खीर और बच्चों के लिए आलू के पराठे मैं खुद अपने हाथों से बनाती हूं। रात को तारा बच्चों को कहानियां नहीं सुनाती, बल्कि आरव और अहाना अपने दादाजी के बिस्तर पर लेटकर उनसे रामायण और महाभारत के किस्से सुनते हैं। बाबूजी की दवाइयां तारा निकालकर ट्रे में रख देती है, लेकिन उन्हें अपने हाथों से पानी के साथ दवाई प्रतीक खुद खिलाता है और आधे घंटे तक उनके पैरों में तेल की मालिश करते हुए उनसे अपने बिजनेस की सलाह लेता है। वीकेंड पर जब हम पार्क जाते हैं, तो तारा हमारा सामान उठाती है, लेकिन बच्चों के साथ घास पर नंगे पैर दौड़ने और तितलियां पकड़ने का काम हम खुद करते हैं।”

नेहा के चेहरे पर एक दिव्य संतोष था। उसने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, “पल्लवी, अब हमारे घर में न तो काम के बोझ से होने वाली झिक-झिक होती है, और न ही रिश्तों में दूरियां हैं। तारा हमारे शरीर की थकान मिटाती है, जिससे हम पूरी ऊर्जा और खुशी के साथ अपने परिवार को प्यार दे पाते हैं। मशीन कभी इंसान की जगह नहीं ले सकती, बशर्ते इंसान खुद अपनी जिम्मेदारियों से न भागे। अगर हम तकनीक को अपना गुलाम बनाकर रखेंगे, तो वह हमारे परिवार को जोड़ने का सबसे बड़ा वरदान साबित होगी, और अगर हम खुद तकनीक के गुलाम बन गए, तो फिर भरे-पूरे घर को भी अनाथालय बनने में देर नहीं लगेगी।”

पल्लवी की आंखें छलक आईं। उसने अपनी कुर्सी से उठकर नेहा को एक बार फिर गले से लगा लिया। कैफे के बाहर बारिश थम चुकी थी और बादलों को चीरकर शाम के सूरज की सुनहरी किरणें देहरादून की वादियों में फैल रही थीं। पल्लवी के मन का सारा अंधकार और डर छंट चुका था। उसे समझ आ गया था कि भविष्य चाहे कितना भी आधुनिक क्यों न हो जाए, जब तक इंसान के सीने में अपनों के लिए धड़कने वाला दिल जिंदा है, तब तक कोई भी मशीन परिवार की डोर को कमजोर नहीं कर सकती।

दोस्तों, नेहा और पल्लवी की इस बातचीत ने आज के दौर का एक बहुत बड़ा सच हमारे सामने रखा है। रोबोट तो भविष्य की बात है, लेकिन आज भी हमारे घरों में स्मार्टफोन और टीवी जैसी मशीनों ने हमें अपनों के पास बैठकर भी उनसे दूर कर दिया है। इस बारे में आपकी क्या राय है? क्या तकनीक हमारे रिश्तों को आसान बना रही है या हमें अपनों से दूर कर रही है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपके एक कमेंट से किसी को अपने परिवार के लिए वक्त निकालने की प्रेरणा मिल सकती है।

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