समय की कसौटी पर हर पवित्र रिश्ते को एक न एक दिन परखा जरूर जाता है। जब आरव अपनी उच्च शिक्षा पूरी करके एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में बहुत बड़े पद पर चयनित हुआ, तो समाज के कुछ तथाकथित शुभचिंतकों और रिश्तेदारों की आंखों में यह सुख खटकने लगा। एक पारिवारिक समारोह के दौरान, सिद्धार्थ की एक दूर की बुआ ने मृणालिनी के कान भरते हुए कहा, “मृणालिनी, तुम जिस लड़के पर अपनी जान छिड़क रही हो और जिसके नाम सिद्धार्थ अपनी सारी दौलत करने की सोच रहा है, आखिर वह तुम्हारा सगा खून तो नहीं है।
नियति के खेल भी बड़े निराले होते हैं, वह कब किससे क्या छीन ले और बदले में कौन सी अनमोल सौगात झोली में डाल दे, यह कोई नहीं जानता। देहरादून की शांत और हरी-भरी वादियों में बसा एक छोटा सा आशियाना उस दिन अचानक गहरे सन्नाटे में डूब गया, जब एक भीषण भूस्खलन ने ग्यारह वर्षीय आरव के सिर से उसके माता-पिता का साया हमेशा के लिए छीन लिया। चार धाम की यात्रा पर गए उसके माता-पिता की गाड़ी पहाड़ के मलबे के नीचे दब गई थी और उस भयानक हादसे के बाद आरव इस भरी दुनिया में बिल्कुल अकेला रह गया था। उसकी मासूम आंखों में भविष्य का डर और अपनों को खोने का अथाह दर्द साफ झलक रहा था।
अंतिम संस्कार की रस्में पूरी होने के बाद जब सभी रिश्तेदार अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का बहाना बनाकर कन्नी काटने लगे, तब दूर के रिश्ते में आरव के मौसेरे भाई लगने वाले सिद्धार्थ आगे आए। सिद्धार्थ शिमला में रहते थे और उनका सेब के बागानों तथा लकड़ी के निर्यात का बड़ा कारोबार था। उन्होंने बिना किसी संकोच के आरव का हाथ थामा और उसे अपने साथ शिमला ले जाने का फैसला किया। सिद्धार्थ के इस फैसले के पीछे परोपकार की भावना तो थी ही, साथ ही उनके अपने जीवन का एक गहरा सूनापन भी था।
सिद्धार्थ और उनकी पत्नी मृणालिनी की शादी को आठ वर्ष बीत चुके थे, लेकिन उनके आंगन में अब तक किसी किलकारी की गूंज नहीं सुनाई दी थी। सिद्धार्थ को अपने व्यापार के सिलसिले में अक्सर शिमला से बाहर, कभी दिल्ली तो कभी चंडीगढ़ के दौरे पर रहना पड़ता था। ऐसे में विशाल बंगले की चारदीवारी के भीतर मृणालिनी अकेलेपन के दंश को झेलती रहती थी। घर का हर कोना उसे काटने को दौड़ता था। जब सिद्धार्थ ने आरव को घर लाने की बात कही, तो मृणालिनी के मन में एक अजीब सी हलचल हुई। जब नन्हा आरव अपने छोटे से बैग के साथ घर की दहलीज पर खड़ा हुआ, तो उसकी सहमी हुई सूरत देखकर मृणालिनी का हृदय पसीज गया। आरव के उस घर में कदम रखते ही मानो वर्षों से जमी उदासी की बर्फ पिघलने लगी। मृणालिनी को अपने खाली समय को बिताने का एक सार्थक जरिया मिल गया और आरव को एक सुरक्षित छत। इस तरह परहित के इस कार्य ने अनजाने में ही उन दोनों के स्वहित को भी साध दिया।
समय के साथ आरव ने खुद को शिमला के उस नए माहौल में ढाल लिया। वह स्वभाव से ही अत्यंत शांत, आज्ञाकारी और कुशाग्र बुद्धि का बालक था। मृणालिनी उसकी छोटी से छोटी जरूरत का पूरा ध्यान रखती, उसके लिए तरह-तरह के पकवान बनाती और रात को उसके कमरे में जाकर यह सुनिश्चित करती कि उसने कंबल ठीक से ओढ़ा है या नहीं। फिर भी, उन दोनों के बीच एक अदृश्य सी झिझक की दीवार अभी भी बाकी थी। आरव उन्हें ‘भाभी मां’ कहकर पुकारता था, पर अपने मन की गहराइयों को खोलने से हिचकिचाता था।
महीने बीते और वार्षिक परीक्षाओं का परिणाम आने का दिन आ गया। आरव ने अपनी मेहनत और लगन से पूरे विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। जब उसके हाथ में उसकी अंकतालिका और स्वर्ण पदक आया, तो स्कूल के सारे शिक्षक और छात्र उसकी प्रशंसा कर रहे थे। लेकिन घर लौटते समय आरव के कदम भारी हो गए। देवदार के ऊंचे पेड़ों के बीच से गुजरते हुए वह अतीत की उन मीठी यादों में खो गया, जब वह देहरादून में अपने माता-पिता के साथ था। उसे याद आया कि कैसे हर साल प्रथम आने पर वह स्कूल की बस से उतरते ही दौड़ता हुआ घर जाता था। उसकी मम्मी दरवाजे पर ही बाहें फैलाए उसका इंतजार करती थीं। वह दौड़कर उनकी गोद में समा जाता था और मम्मी खुशी के आंसुओं के साथ उसका माथा चूमकर उसकी नजर उतारती थीं। पापा शाम को उसके लिए उसकी पसंदीदा मिठाई और नए खिलौने लाते थे।
आज उसके हाथ में वही प्रथम आने का प्रमाण पत्र था, पर न तो दरवाजे पर बाहें फैलाए खड़ी उसकी मम्मी थीं और न ही पीठ थपथपाने वाले पापा। घर पहुंचकर वह चुपचाप अपने कमरे में गया और बिस्तर पर बैठकर अपनी पुरानी पारिवारिक तस्वीर को सीने से लगाकर सिसक-सिसक कर रोने लगा। उसकी आंखों से बहते गर्म आंसू उस तस्वीर के कांच को भिगो रहे थे।
तभी मृणालिनी उसके लिए गर्म दूध और बादाम लेकर कमरे में आई। दरवाजे के पास ठिठक कर जब उसने आरव को इस तरह बिलखते और उसके पास पड़ी प्रथम श्रेणी की ट्रॉफी को देखा, तो उसे सारा माजरा समझते देर न लगी। एक अनाथ बच्चे के भीतर छिपा अपनी मां को पुकारने का दर्द देखकर मृणालिनी की आत्मा कांप उठी। उसके भीतर वर्षों से दबी मातृत्व की धारा अचानक बांध तोड़कर उमड़ पड़ी। उसने दूध का गिलास मेज पर रखा और आरव के पास बैठकर बेहद कोमलता से उसके कांपते कंधों को छुआ।
अपने पल्लू से आरव के भीगे गालों को पोंछते हुए मृणालिनी ने रुंधे गले से पूछा, “आरव, आज इतनी बड़ी सफलता मिलने पर अपनी मम्मी की बहुत याद आ रही है न तुम्हें?”
आरव कुछ बोल पाता, उससे पहले ही मृणालिनी ने उसे खींचकर अपने सीने से लगा लिया और उसके बालों में उंगलियां फिराते हुए बोली, “मत रो मेरे बच्चे। मैं भगवान तो नहीं जो तुम्हारी सगी मां को आसमान से वापस ले आऊं, लेकिन आज से तुम मुझे अपनी भाभी नहीं, अपनी सगी मां समझो। मेरे आंचल में तुम्हारे लिए उतनी ही ममता है जितनी तुम्हारी मां के पास थी।”
मृणालिनी के उन शब्दों में न जाने कौन सा जादू था कि आरव के मन की सारी झिझक, सारा परायापन एक ही पल में धुल गया। उसे लगा जैसे उसकी स्वर्गीय मां की आत्मा ही मृणालिनी के भीतर उतर आई है। उसने तुरंत मृणालिनी से अलग होकर उनके चरण स्पर्श किए और अपनी ट्रॉफी उनके कदमों में रखते हुए कहा, “मां, मैं अपनी कक्षा में प्रथम आया हूं।” मृणालिनी ने फौरन उसे ऊपर उठाया, अपनी बाहों में कसकर भर लिया और उसके माथे को चूमते हुए उस पर अपने वात्सल्य की वर्षा कर दी। उस दिन के बाद से उस घर की हवा ही बदल गई। आरव को अपनी खोई हुई मां दोबारा मिल गई थी और मृणालिनी को अपनी सूनी गोद का असली वारिस।
इसी बीच, सिद्धार्थ और मृणालिनी ने दिल्ली के बड़े विशेषज्ञों से अपनी डॉक्टरी जांच करवाई थी, जिसकी रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया था कि कुछ जटिल शारीरिक कारणों से मृणालिनी कभी भी अपनी संतान को जन्म नहीं दे पाएगी। इस कड़वे सच को जानने के बाद सिद्धार्थ ने निश्चय किया कि वे आरव को कानूनी रूप से गोद ले लेंगे ताकि भविष्य में उसे उनके नाम और संपत्ति पर पूरा अधिकार मिल सके। जब उन्होंने अपने पारिवारिक वकील से इस विषय में मशविरा किया, तो कानूनी पेचीदगियां सामने आ गईं। गोद लेने के सरकारी नियमों और आयु संबंधी कुछ विशेष शर्तों के कारण आरव को कागजों पर दत्तक पुत्र बनाना संभव नहीं हो पा रहा था। सिद्धार्थ इस बात से थोड़े निराश हुए, लेकिन मृणालिनी के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं आई। उसने सिद्धार्थ का हाथ थामकर कहा, “कागज के टुकड़े यह तय नहीं करेंगे कि आरव मेरा बेटा है या नहीं। यशोदा ने भी तो कान्हा को जन्म नहीं दिया था, फिर भी दुनिया उन्हें कान्हा की मैया ही कहती है।”
उस दिन के बाद मृणालिनी और आरव का रिश्ता और भी गहरा हो गया। जब भी सिद्धार्थ व्यापार के काम से बाहर जाते, मृणालिनी आरव को अपने ही कमरे में सुलाती, उसे लोरी सुनाती और जब तक वह सो न जाता, उसके सिरहाने बैठकर उसका माथा सहलाती रहती। कहा जाता है कि जिस प्रेम और अधिकार की हमें सहज अपेक्षा होती है, उसके मिलने पर उतनी खुशी नहीं होती, जितनी तब होती है जब हमें वहां से अथाह प्रेम मिल जाए जहां हमारा कोई जन्मजात अधिकार ही न हो। अपनी मानस मां से सगी मां से भी बढ़कर स्नेह पाकर आरव का व्यक्तित्व किसी हीरे की तरह तराशा जाने लगा।
ममता की उस शीतल छांव ने आरव के भीतर अद्भुत आत्मविश्वास भर दिया। वह केवल किताबी पढ़ाई तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने बांसुरी वादन, शतरंज और हिंदी साहित्य लेखन में भी अपनी विलक्षण प्रतिभा का लोहा मनवाया। राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में जब उसका नाम पुकारा जाता, तो दर्शक दीर्घा में बैठी मृणालिनी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता। बारहवीं की परीक्षा में पूरे हिमाचल प्रदेश में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने के बाद, उसने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली संघ लोक सेवा आयोग और राष्ट्रीय स्तर की इंजीनियरिंग परीक्षा में भी शीर्ष पचास छात्रों में अपना स्थान पक्का किया।
जैसे-जैसे आरव युवावस्था की दहलीज पर कदम रख रहा था, उसका शारीरिक और मानसिक व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक होता जा रहा था। छह फीट लंबा कद, कसरती और सुडौल शरीर, माथे पर गिरती घनी काली जुल्फें, झील सी गहरी और शांत आंखें, तीखे नैन-नक्श और चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान—वह जहां भी जाता, लोगों की निगाहें उसी पर टिक जातीं। उसकी वाणी में ऐसी मधुरता और विचारों में ऐसी परिपक्वता थी कि बड़े-बड़े विद्वान भी उसके कायल हो जाते थे। महाविद्यालय के गलियारों में तो उसकी लोकप्रियता चरम पर थी। शहर के रईस और प्रतिष्ठित परिवारों की एक से बढ़कर एक खूबसूरत और आधुनिक लड़कियां उसकी एक झलक पाने और उससे दोस्ती करने के लिए बेताब रहती थीं। कई लड़कियों ने तो सीधे तौर पर उसके सामने अपने प्रेम का इजहार भी किया, किंतु आरव इन सारे बाहरी आकर्षणों से पूरी तरह निर्लिप्त और अछूता रहा। उसके लिए दुनिया का सबसे बड़ा सुख अपनी मां मृणालिनी के चरणों की धूल और उनके हाथ के बने खाने में ही था।
लेकिन समय की कसौटी पर हर पवित्र रिश्ते को एक न एक दिन परखा जरूर जाता है। जब आरव अपनी उच्च शिक्षा पूरी करके एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में बहुत बड़े पद पर चयनित हुआ, तो समाज के कुछ तथाकथित शुभचिंतकों और रिश्तेदारों की आंखों में यह सुख खटकने लगा। एक पारिवारिक समारोह के दौरान, सिद्धार्थ की एक दूर की बुआ ने मृणालिनी के कान भरते हुए कहा, “मृणालिनी, तुम जिस लड़के पर अपनी जान छिड़क रही हो और जिसके नाम सिद्धार्थ अपनी सारी दौलत करने की सोच रहा है, आखिर वह तुम्हारा सगा खून तो नहीं है। आज वह कामयाब हो गया है, कल को कोई सुंदर सी लड़की देखकर शादी कर लेगा और तुम दोनों को इस बुढ़ापे में अकेला छोड़कर अपनी दुनिया बसा लेगा। पराये को कभी अपना मत समझो।”
मृणालिनी ने उस वक्त तो बुआ को डांटकर चुप करा दिया, पर किसी के द्वारा बोया गया संदेह का छोटा सा बीज कभी-कभी अनजाने में ही मन के किसी कोने में डर पैदा कर देता है। उसी शाम आरव के मोबाइल पर उसकी कंपनी की तरफ से लंदन जाकर काम करने का एक बेहद आकर्षक प्रस्ताव आया, जिसमें करोड़ों का पैकेज और वहां स्थायी रूप से बसने की सुविधा थी। साथ ही, उसके कॉलेज की सबसे अमीर और खूबसूरत लड़की के पिता ने सिद्धार्थ को फोन करके अपनी बेटी का रिश्ता आरव के लिए भेजा और शर्त रखी कि शादी के बाद आरव लंदन में ही रहेगा।
सिद्धार्थ ने रात के खाने की मेज पर यह दोनों बातें आरव और मृणालिनी के सामने रखीं। मृणालिनी के हाथ से परोसते हुए चम्मच कांप गया। उसका चेहरा पीला पड़ गया, लेकिन उसने अपने आंसुओं को पीते हुए जबरन मुस्कुराकर कहा, “आरव, यह तेरे भविष्य का सवाल है बेटा। लंदन का ऑफर बहुत बड़ा है, तुझे जरूर जाना चाहिए।”
आरव ने अपनी मां की आंखों में छिपे उस अनकहे डर और दर्द को तुरंत पढ़ लिया। उसने खाना बीच में ही छोड़ा, अपनी जेब से वह नियुक्ति पत्र निकाला और मृणालिनी के सामने ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। सिद्धार्थ और मृणालिनी दोनों स्तब्ध रह गए।
आरव ने घुटनों के बल बैठकर मृणालिनी के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और दृढ़ स्वर में कहा, “मां, क्या आपने मुझे इतना स्वार्थी समझ लिया है? जब मैं ग्यारह साल का एक टूटा हुआ अनाथ बच्चा था, तब आपने अपनी नींदें कुर्बान करके मुझे संभाला। आज मैं जो कुछ भी हूं, आपकी ममता के अमृत को पीकर ही बना हूं। जिस सफलता और जिस रिश्ते की कीमत मेरी मां से मेरी दूरी हो, मैं ऐसी हजार सफलताओं और रिश्तों को ठोकर मारता हूं। मैं इसी देश में रहूंगा और उसी लड़की से विवाह करूंगा जो आपको अपनी सगी मां मानकर इस घर की सेवा करेगी। मेरा स्वर्ग लंदन में नहीं, आपके चरणों में है।”
आरव के ये शब्द सुनकर मृणालिनी अपने आंसू नहीं रोक पाई। उसने आरव को अपने गले से लगा लिया और सिद्धार्थ की आंखें भी गर्व और भावुकता से भर आईं। कुछ ही महीनों बाद आरव ने अपने ही शहर में एक बड़ी कंपनी की शाखा का कार्यभार संभाला और अपनी पहली तनख्वाह से शिमला की सबसे खूबसूरत पहाड़ी पर एक भव्य घर खरीदकर उसकी रजिस्ट्री मृणालिनी के नाम कर दी। घर के मुख्य द्वार पर संगमरमर की पट्टिका पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था— ‘मां का आंचल’।
आरव और मृणालिनी की इस कहानी ने पूरे शहर के सामने यह मिसाल पेश की कि रिश्ते केवल रक्त या कानून के कागजों से नहीं बनते, बल्कि वे समर्पण, निस्वार्थ प्रेम और कृतज्ञता की नींव पर टिके होते हैं। जहां ममता सच्ची हो, वहां परायी कोख से जन्मा बच्चा भी श्रवण कुमार बनकर दिखा सकता है।
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