अनकहे जज़्बात

 वह तुरंत बाबूजी के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गई और उनके काँपते हुए हाथों को अपने हाथों में लेकर रुँधे गले से बोली, “बाबूजी, आप मुझसे इतना क्यों काँप रहे हैं? मैं कोई पराई या आपकी दुश्मन तो नहीं हूँ। मुझे सच-सच बताइए, यह चश्मा कैसे टूटा और आप कल से यह खाली फ्रेम लगाकर क्यों घूम रहे हैं?”

बहू के स्वर में आज महीनों बाद वह पुरानी मिठास और अपनापन सुनकर माधव प्रसाद जी की आँखों से भी आँसू ढलक पड़े। उन्होंने लंबी साँस लेते हुए कल सुबह गिरने और चश्मा टूटने की सारी बात सच-सच बता दी। अपनी धोती को थोड़ा ऊपर खिसकाकर जब उन्होंने अपना छिला हुआ घुटना दिखाया, जिस पर उन्होंने चुपके से हल्दी थोप रखी थी, तो मृदुला तड़प उठी।

रसोई में चाय का पानी चढ़ाते हुए उनकी बहू मृदुला के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उसने सोचा कि शायद बाबूजी की तबीयत आज नासाज़ है। घर का सारा काम निपटाने की जल्दी में वह झाड़ू लेकर बाबूजी के कमरे में दाखिल हुई। माधव प्रसाद जी चादर ओढ़े करवट लेकर सो रहे थे। मृदुला ने दबे पाँव कमरे की सफाई शुरू की। तभी कोने में रखी पुरानी तिपाई को खिसकाते वक्त उसका हाथ वहाँ रखे बाबूजी के चश्मे से लग गया। चश्मा छन्न से आवाज़ करता हुआ पक्के फर्श पर जा गिरा।

मृदुला का दिल धक से रह गया। उसने तुरंत झुककर चश्मा उठाया ताकि देखे कि कहीं वह टूट तो नहीं गया। लेकिन जैसे ही उसने चश्मे को हाथ में लिया, उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं। चश्मे के काले फ्रेम में दोनों ही काँच गायब थे। उसने फर्श पर चारों तरफ नज़र दौड़ाई, पर वहाँ काँच का एक टुकड़ा भी नहीं था। मृदुला सोच में पड़ गई—’कल रात जब बाबूजी ने आँगन में बैठकर रोटी खाई थी, तब तो उनकी आँखों पर यही चश्मा चढ़ा हुआ था। फिर रातों-रात इसके काँच कहाँ गायब हो गए?’

यह खयाल आते ही कि अब फिर से नए काँच बनवाने में तीन-चार सौ रुपये लग जाएंगे, मृदुला के भीतर एक तेज़ झल्लाहट उठी। एक नए और अनचाहे खर्च की आहट ने उसके स्वभाव की कड़वाहट को फिर से जगा दिया। उसे अपने बूढ़े ससुर की इस लापरवाही पर बहुत गुस्सा आया, लेकिन सोते हुए बुजुर्ग को जगाकर सुबह-सुबह क्लेश करना उसे ठीक नहीं लगा। उसने एक गहरी साँस खींचकर अपने गुस्से को पी लिया और खाली फ्रेम को वापस तिपाई पर रखकर बाहर चली गई।

मृदुला ऐसी नहीं थी। आज से तीन साल पहले जब वह इस घर में ब्याह कर आई थी, तो उसकी हँसी से यह पुराना मकान चहक उठा करता था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। शादी के डेढ़ साल बाद ही उसके पति अनिरुद्ध को दफ्तर से लौटते वक्त अचानक दिल का दौरा पड़ा और वह बीच रास्ते में ही दम तोड़ गया। जवान बेटे की अर्थी का बोझ माधव प्रसाद जी के बूढ़े कंधों ने जैसे-तैसे उठाया, पर उनकी पत्नी गायत्री देवी इस सदमे को बर्दाश्त न कर सकीं। बेटे के जाने के गम में उन्हें गंभीर बीमारी ने घेर लिया।

माधव प्रसाद जी ने पत्नी को बचाने के लिए अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी, यहाँ तक कि पुश्तैनी गहने भी गिरवी रख दिए। लगभग एक साल तक अस्पताल के चक्कर काटने के बाद गायत्री देवी भी उन्हें छोड़कर परलोक सिधार गईं। पीछे रह गया तो बस कर्ज, गरीबी और दो टूटे हुए इंसान—एक जवानी में विधवा हुई बहू और दूसरे बेबस, बीमार ससुर।

भरी जवानी में मांग का सिंदूर उजड़ जाने और आर्थिक तंगी के थपेड़ों ने मृदुला के कोमल स्वभाव को पत्थर जैसा कठोर और बेहद चिड़चिड़ा बना दिया था। उसके चेहरे की मुस्कान कहीं खो गई थी और बात-बात पर झल्लाना उसकी आदत बन चुकी थी। दूसरी तरफ, माधव प्रसाद जी को दमे और जोड़ों के दर्द ने इस कदर जकड़ रखा था कि वे कोई भी मेहनत का काम करने में असमर्थ थे। सरकारी सहायता के नाम पर उन्हें महीने के चार सौ रुपये वृद्धावस्था पेंशन मिलती थी, जो उनकी सांस की दवाइयों और दर्द के बाम में ही खत्म हो जाती थी।

घर का चूल्हा जलाने के लिए मृदुला ने घर के ही एक कोने में पापड़ और मसाले कूटने का काम शुरू किया था। वह दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करती, मसालों की तीखी धमक से उसकी आँखें जलतीं, हाथ में छाले पड़ जाते, तब जाकर महीने के अंत में इतने पैसे जुड़ पाते कि दोनों का पेट भर सके। यही वजह थी कि एक-एक पैसे का हिसाब रखते-रखते उसका स्वभाव बेहद सख्त हो गया था।

असल में हुआ यह था कि कल सुबह जब माधव प्रसाद जी बगीचे से टहलकर लौट रहे थे, तो गली के मोड़ पर एक आवारा मवेशी से बचने के चक्कर में उनका पैर असंतुलित हो गया। वे मुंह के बल कच्ची सड़क पर जा गिरे। उनके घुटने छिल गए और चेहरे से चश्मा उछलकर पास पड़े एक नुकीले पत्थर से जा टकराया। जब उन्होंने काँपते हाथों से चश्मा उठाया, तो देखा कि दोनों काँच चकनाचूर हो चुके थे।

उस वक्त उन्हें अपने घुटने के दर्द से ज़्यादा अपनी बहू के गुस्से का खौफ सताने लगा। उन्हें याद आया कि अभी पिछले ही हफ्ते जब उनके काँपते हाथों से चीनी मिट्टी की एक प्याली छूटकर टूट गई थी, तो मृदुला ने कितनी खरी-खोटी सुनाई थी। उसने रोते हुए कहा था कि यहाँ एक-एक पैसा जोड़ने में मेरी जान निकलती है और आपसे छोटी सी चीज़ भी नहीं संभलती।

इसी डर से माधव प्रसाद जी की रूह काँप गई। उन्होंने सड़क के किनारे ही चश्मे के टूटे काँचों को झड़काया और खाली फ्रेम को अपनी आँखों पर चढ़ा लिया। धुंधली आँखों से किसी तरह टटोलते हुए वे घर पहुँचे। उन्होंने मन ही मन हिसाब लगाया कि परसों तो महीने की दस तारीख है, जब डाकिया उनकी पेंशन के पैसे लेकर आएगा। वे इस बार अपनी दमे की आधी दवाई ही खरीदेंगे और बचे हुए पैसों से चुपचाप बाज़ार जाकर चश्मे में सस्ते वाले काँच लगवा लेंगे। इस तरह बहू को कानों-कान खबर भी नहीं होगी और घर में शांति बनी रहेगी। इसी उधेड़बुन में वे कल पूरे दिन और रात के खाने के वक्त भी वह बिना काँच का फ्रेम पहने रहे। कम रोशनी और काम की थकान के कारण कल मृदुला का ध्यान उस तरफ गया ही नहीं था।

थोड़ी देर बाद माधव प्रसाद जी उठे और हाथ-मुंह धोकर आँगन की चारपाई पर आकर बैठ गए। उनकी आदत के मुताबिक उन्होंने तिपाई से अपना वही खाली फ्रेम उठाया और आँखों पर लगा लिया। उन्हें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि सुबह सफाई करते वक्त उनका यह राज़ बहू के सामने खुल चुका है।

मृदुला रसोई से चाय का गिलास लेकर आई और चारपाई के पास रखे स्टूल पर रख दिया। वह कुछ पल चुपचाप खड़ी होकर अपने ससुर के झुर्रियों भरे चेहरे को देखती रही। सूनी आँखों के आगे टिका वह खाली फ्रेम आज उसे बहुत कुछ कह रहा था। उसने अपनी आवाज़ को सामान्य रखने की कोशिश करते हुए पूछा, “बाबूजी, यह आपने अपनी आँखों पर बिना शीशे का खाली फ्रेम क्यों पहन रखा है?”

अचानक हुए इस सवाल से माधव प्रसाद जी जैसे नींद से चौंक पड़े। उनके हाथ में पकड़ा चाय का गिलास छलकते-छलकते बचा। वे बुरी तरह हड़बड़ा गए। उन्होंने झट से अपने चेहरे को दूसरी तरफ मोड़ लिया और फ्रेम को उतारकर अपनी धोती के कोने में छिपाने की नाकाम कोशिश करने लगे। उनके होंठ काँप रहे थे, पर गले से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी। किसी चोरी पकड़े गए मासूम बच्चे की तरह वे हकलाने लगे, “वो… वो बहू… मैं तो बस…”

अपने पिता समान ससुर को अपने सामने इस कदर डरा और सहमा हुआ देखकर मृदुला का कलेजा मुँह को आ गया। उसके भीतर का सारा गुस्सा, सारी कड़वाहट पल भर में मोम की तरह पिघल गई। उसे खुद पर घिन आने लगी कि उसने अपने ही घर के बड़े-बुजुर्ग के मन में अपना कितना खौफ पैदा कर दिया है। उसकी आँखें डबडबा आईं।

वह तुरंत बाबूजी के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गई और उनके काँपते हुए हाथों को अपने हाथों में लेकर रुँधे गले से बोली, “बाबूजी, आप मुझसे इतना क्यों काँप रहे हैं? मैं कोई पराई या आपकी दुश्मन तो नहीं हूँ। मुझे सच-सच बताइए, यह चश्मा कैसे टूटा और आप कल से यह खाली फ्रेम लगाकर क्यों घूम रहे हैं?”

बहू के स्वर में आज महीनों बाद वह पुरानी मिठास और अपनापन सुनकर माधव प्रसाद जी की आँखों से भी आँसू ढलक पड़े। उन्होंने लंबी साँस लेते हुए कल सुबह गिरने और चश्मा टूटने की सारी बात सच-सच बता दी। अपनी धोती को थोड़ा ऊपर खिसकाकर जब उन्होंने अपना छिला हुआ घुटना दिखाया, जिस पर उन्होंने चुपके से हल्दी थोप रखी थी, तो मृदुला तड़प उठी।

उसने रोते हुए पूछा, “बाबूजी, आपको इतनी चोट लगी, चश्मा टूट गया, फिर भी आपने मुझे बताया क्यों नहीं? और बिना काँच के इस फ्रेम को आँखों पर टांगने का क्या मतलब था?”

माधव प्रसाद जी ने नज़रें झुकाए हुए बेहद धीमी आवाज़ में कहा, “बेटी, पिछले हफ्ते प्याली टूटने पर तुम बहुत दुखी हो गई थीं। मैं जानता हूँ तुम कितनी मेहनत से घर चलाती हो। मुझे डर था कि चश्मा टूटने की बात सुनकर तुम फिर से गुस्सा करोगी और तुम्हारा दिल दुखेगा। इसलिए सोचा कि खाली फ्रेम पहने रहूँगा तो तुम्हें पता नहीं चलेगा।”

“लेकिन बाबूजी, आप कब तक अंधेरे में टटोलते हुए चलते? एक न एक दिन तो मुझे यह दिख ही जाता न?” मृदुला ने आँसू पोंछते हुए पूछा।

माधव प्रसाद जी ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, “बस दो दिन की तो बात थी बहू। परसों डाकिया पेंशन के पैसे दे जाता, तो मैं इस महीने अपनी दमे की आधी गोलियाँ ही लेता। उन बचे हुए पैसों से चश्मे के नए काँच डलवा लेता। तुम्हें पता भी नहीं चलता और तुम पर कोई अतिरिक्त बोझ भी नहीं पड़ता।”

ससुर के मुँह से ‘दमे की आधी दवाई’ वाली बात सुनकर मृदुला के सब्र का बाँध टूट गया। वह फूट-फूटकर रोती हुई बाबूजी के घुटनों से लिपट गई। “मुझे माफ कर दीजिए बाबूजी! मैं बहुत बुरी हूँ, बहुत पापी हूँ!” वह सिसकते हुए बोली, “अपने दुख में मैं इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे आपकी तकलीफ, आपकी लाचारी दिखाई ही नहीं दी। आपने मेरे डर से अपनी जान की परवाह भी नहीं की और दवाई छोड़ने की सोच ली? बाबूजी, मेरे सिर से तो मेरे जन्मदाता का साया बचपन में ही उठ गया था, और अनिरुद्ध के जाने के बाद तो मेरी दुनिया ही उजड़ गई। अब इस दुनिया में मेरे माता-पिता, मेरे सब कुछ आप ही तो हैं। अगर आप ही अपनी सेहत के साथ ऐसा करेंगे, तो मैं किसके सहारे जियूँगी? इस छत के नीचे हम दो ही तो अभागे प्राणी बचे हैं, अगर हम ही एक-दूसरे से डरकर अपने दुख छिपाने लगेंगे, तो यह पहाड़ जैसी ज़िंदगी कैसे कटेगी?”

मृदुला के इन शब्दों ने घर के माहौल में जमी महीनों पुरानी बर्फ को पूरी तरह पिघला दिया। माधव प्रसाद जी ने बड़े स्नेह से अपनी बहू के सिर पर हाथ फेरा और उसे उठाकर अपने पास चारपाई पर बिठाया। अपनी धोती के पल्लू से उसके आँसू पोंछते हुए वे बोले, “रो मत मेरी बच्ची। तेरा गुस्सा करना गलत नहीं था, हालात ही ऐसे हैं। पर आज तूने मुझे अपने पिता का दर्जा दिया है, तो मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं एक पिता की तरह अपनी इस बेटी के आने वाले कल की चिंता करूँ।”

मृदुला ने भीगी पलकों से अपने ससुर की तरफ देखा। माधव प्रसाद जी ने गंभीर होते हुए कहा, “मृदुला बेटी, मेरी उम्र अब ढल चुकी है। यह शरीर बीमारियों का घर बन चुका है, पता नहीं कब मेरी सांसों की डोर टूट जाए। मुझे दिन-रात बस यही चिंता खाए जाती है कि मेरे आँख मूँद लेने के बाद इस बड़ी और बेरहम दुनिया में तू अकेली कैसे रहेगी? इसलिए, आज एक बाप होने के नाते मैं तुझसे हाथ जोड़कर कहता हूँ कि तू अपनी ज़िंदगी को एक नया मौका दे और दूसरा विवाह कर ले।”

यह सुनते ही मृदुला के चेहरे पर प्यार भरा गुस्सा उतर आया। उसने बाबूजी के जुड़े हुए हाथों को पकड़कर नीचे किया और बोली, “बाबूजी! आपने ऐसा सोच भी कैसे लिया? क्या मैं आपको इतनी मतलबी लगती हूँ कि अपने सुख और अपने भविष्य के लिए अपने इस बूढ़े और बीमार पिता को इस हाल में अकेला छोड़कर किसी और के घर चली जाऊँ? अनिरुद्ध की यादें और आपकी सेवा, यही अब मेरी ज़िंदगी है।”

माधव प्रसाद जी के चेहरे पर एक हल्की और शांत मुस्कान तैर गई। वे बोले, “इसका मतलब तो यही हुआ न कि अगर तुझे शादी के बाद मुझे अकेला न छोड़ना पड़े, और हम सब साथ रह सकें, तब तो तुझे अपनी ज़िंदगी दोबारा शुरू करने में कोई आपत्ति नहीं होगी?”

मृदुला चौंककर उन्हें देखने लगी, वह कुछ समझ नहीं पाई। तब माधव प्रसाद जी ने स्नेह से उसका हाथ थामते हुए कहा, “बेटी, हमारे मोहल्ले के नुक्कड़ पर जो किराने की दुकान चलाता है न—आलोक… वह बहुत ही नेक और सुलझा हुआ इंसान है। पिछले साल कुंभ के मेले से लौटते वक्त एक बस हादसे में उसके माता-पिता और उसकी पत्नी, तीनों ही चल बसे। उस भयानक दुर्घटना में बस आलोक और उसकी छः महीने की एक नन्ही सी बच्ची ही ज़िंदा बच पाए। आज वह बेचारा अपनी दुकान भी संभालता है और बिन माँ की उस डेढ़ साल की मासूम बच्ची को भी पाल रहा है।”

बाबूजी ने थोड़ी सांस ली और आगे कहा, “पिछले महीने जब मैं उसकी दुकान पर सामान लेने गया था, तो उसने खुद मुझसे अपनी पीड़ा कही थी। उसने कहा था कि बाबूजी, मेरी बच्ची को एक माँ की ज़रूरत है और मुझे एक जीवनसाथी की, और आपको एक बेटे के सहारे की। अगर आप मृदुला जी से बात करें और वह राज़ी हों, तो मैं अपना मकान किराए पर उठाकर आप दोनों के साथ इसी घर में आकर रहने को तैयार हूँ। मैं आपको अपने पिता की तरह रखूँगा। बेटी, वह कई दिनों से मुझसे पूछ रहा था, पर तेरे गुस्से के डर से मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कि तुझसे यह बात छेड़ूँ। आज जब तूने मुझे पिता माना है, तो बता, क्या अपने इस पिता की इतनी सी बात मानेगी? उस बिन माँ की बच्ची को अपनी ममता की छाँव देगी?”

मृदुला अवाक रह गई। जिस ससुर को वह अपने ऊपर बोझ समझकर झल्लाती रहती थी, वे चुपचाप अपने टूटे चश्मे के पीछे से उसके सूने जीवन में फिर से रंग भरने के सपने बुन रहे थे। अपनी दवाई छोड़कर चश्मा बनवाने की सोचने वाले बाबूजी के दिल में अपनी बहू के लिए कितना अथाह सागर जैसा प्यार छिपा था, यह जानकर मृदुला का रोम-रोम कृतज्ञता से भर उठा। उसने शर्म और सम्मान से अपनी पलकें झुका लीं और फिर एक बार अपने बाबूजी के सीने से लगकर रो पड़ी—पर इस बार के आँसू दुख या गुस्से के नहीं, बल्कि एक बेटी को अपने पिता के मिलने की खुशी के थे।

कुछ ही हफ्तों बाद, एक सादे समारोह में मंदिर के भीतर आलोक और मृदुला ने एक-दूसरे को अपना लिया। आलोक अपनी नन्ही परी को लेकर माधव प्रसाद जी के उसी पुराने घर में आ गया। आज उस घर की सीलन और खामोशी दोनों गायब हो चुकी थीं। आँगन में नन्ही बच्ची की किलकारियाँ गूँजती थीं, रसोई से पकवानों की खुशबू आती थी, और आँगन की चारपाई पर बैठे माधव प्रसाद जी की आँखों पर अब एक नया, चमकदार काँच वाला चश्मा चढ़ा रहता था—जिससे उन्हें अपने भरे-पूरे परिवार का हर चेहरा बिल्कुल साफ और उजला दिखाई देता था।

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