आँगन के चार धाम

 केशव जी पास के ही एक सरकारी डाकघर में बड़े बाबू के पद पर कार्यरत थे। सीमित वेतन और ईमानदारी की कमाई से घर का चूल्हा तो सम्मान से जल जाता था, लेकिन विलासिता या अतिरिक्त खर्चों की कोई गुंजाइश नहीं थी।

शारदा जी बेहद शांत, संतोषी और धर्मपरायण महिला थीं। मोहल्ले के किसी भी धार्मिक आयोजन में वह सबसे आगे बढ़कर हाथ बंटाती थीं। प्रसाद बनाने से लेकर मंदिर की साफ-सफाई तक, हर काम में उनकी निष्ठा देखते ही बनती थी। कॉलोनी के लोग हर साल गर्मियों की छुट्टियों में चंदा इकट्ठा करके एक बड़ी बस किराए पर लेते और किसी न किसी बड़े तीर्थ की यात्रा पर निकल जाते। कभी बद्रीनाथ-केदारनाथ, कभी जगन्नाथ पुरी, तो कभी रामेश्वरम। जब यात्रा की तैयारियाँ शुरू होतीं, तो पूरे मोहल्ले में एक अलग ही उत्साह होता।

हर बार की तरह इस बार भी जब मोहल्ले की महिलाओं की मंडली मंदिर के प्रांगण में बैठी यात्रा की चर्चा कर रही थी, तो पड़ोस की कमला बहन ने शारदा जी से पूछ ही लिया, “क्यों शारदा बहन, इस बार तो तुम और भाईसाहब हमारे साथ द्वारकाधीश के दर्शन करने चल रहे हो न? हर बार तुम कोई न कोई बहाना बना देती हो। उम्र निकली जा रही है, फिर हाथ-पैर साथ नहीं देंगे तो कैसे करोगी चारों धाम?”

कमला बहन की बात सुनकर शारदा जी के चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपने आँचल के कोने से माथे का पसीना पोंछते हुए कहा, “बहन, मन तो बहुत करता है कि द्वारकाधीश के चरणों में माथा टेक आऊँ, पर अभी मेरे अपने घर के चारों धाम अधूरे हैं। जब तक ये चारों धाम अपने-अपने मुकाम पर नहीं पहुँच जाते, तब तक मेरी कोई भी तीर्थ यात्रा अधूरी ही रहेगी।”

शारदा जी की बात सुनकर कुछ महिलाओं ने हामी भरी, तो कुछ ने दबी जुबान में ताना भी मारा कि बेटियों के बोझ ने शारदा के पैर बांध रखे हैं। उस वक्त शारदा जी की आँखों के कोरों पर एक बारीक सी नमी चमक उठी थी, जिसे उन्होंने बड़ी कुशलता से पलकें झपकाकर भीतर ही सोख लिया। उनके दिल की उस कचोट और विवशता को समझना हर किसी के बस की बात नहीं थी।

शारदा जी और केशव जी की चार बेटियाँ थीं—गौरी, वाणी, सिद्धि और नंदिनी। जब चौथी बेटी नंदिनी का जन्म हुआ था, तब रिश्तेदारों और अड़ोस-पड़ोस के लोगों ने खूब सहानुभूति दिखाई थी। कई लोगों ने कहा था कि केशव बाबू के तो पिछले जन्म के कोई कर्ज बाकी हैं, जो भगवान ने एक भी बेटा न देकर चार-चार बेटियों का बोझ सिर पर डाल दिया। लेकिन केशव जी और शारदा जी ने कभी अपनी बेटियों को बोझ नहीं समझा। केशव जी हमेशा गर्व से कहते, “मेरे घर में साक्षात चारों वेद और चारों धाम मेरी बेटियों के रूप में पधारे हैं। मुझे किसी बेटे की चाहत नहीं, बस ईश्वर मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं अपनी इन चारों फूलों को अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कार दे सकूँ।”

एक डाकघर के बाबू की तनख्वाह में छह प्राणियों का भरण-पोषण और चारों बेटियों की स्कूल-कॉलेज की फीस भरना किसी तपस्या से कम नहीं था। शारदा जी ने वर्षों से अपने लिए कोई नई साड़ी नहीं खरीदी थी। त्योहारों पर भी वह अपनी पुरानी साड़ियों में गोटा-पट्टी लगाकर उन्हें नया जैसा बना लेतीं। केशव जी भी अपने फटे जूते की मरम्मत कराकर महीनों काम चला लेते, लेकिन बेटियों की किताबों, कॉपियों या स्कूल की फीस में कभी एक दिन की भी देरी नहीं होने देते।

घर में जब भी तीर्थ यात्रा की बात चलती, बड़ी बेटी गौरी अपनी माँ की आँखों में छिपी उस उदासी को पढ़ लेती थी। वह देखती थी कि जब मोहल्ले की बस जयकारे लगाती हुई रवाना होती, तो माँ छत की मुंडेर पर खड़े होकर तब तक उस बस को देखती रहतीं, जब तक वह आँखों से ओझल न हो जाए। उस वक्त माँ के चेहरे पर जो भाव होते, वे गौरी के कोमल हृदय पर एक अमिट छाप छोड़ जाते।

बेटियाँ जैसे-जैसे बड़ी हो रही थीं, माता-पिता के त्याग और संघर्ष को और गहराई से समझ रही थीं। उन चारों बहनों ने आपस में मानो एक अनकहा संकल्प ले लिया था कि वे अपने माता-पिता के इस त्याग को कभी व्यर्थ नहीं जाने देंगी। घर में पैसों की तंगी जरूर थी, लेकिन संस्कारों और प्रेम की कोई कमी नहीं थी। चारों बहनें पढ़ाई में अव्वल थीं और घर के कामकाज में भी माँ का पूरा हाथ बंटाती थीं। मोहल्ले का हर व्यक्ति उनकी शालीनता और मेधा की तारीफ करता। लोग अपने बच्चों को उदाहरण देते कि “सीखो कुछ केशव बाबू की बेटियों से, कैसी गुणी और संस्कारी हैं।”

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। बड़ी बेटी गौरी ने गणित विषय से स्नातकोत्तर किया और दिन-रात एक करके सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गई। उसके पास कोचिंग जाने के पैसे नहीं थे, इसलिए उसने पुरानी किताबों और पुस्तकालय के सहारे अपनी तैयारी की। उसकी मेहनत रंग लाई और उसका चयन राज्य के कोषागार विभाग में लेखाधिकारी के पद पर हो गया। जिस दिन गौरी के हाथ में नियुक्ति पत्र आया, उस दिन केशव जी की आँखों से खुशी के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। गौरी ने अपनी पहली तनख्वाह लाकर माँ के चरणों में रख दी और पिता के लिए नए कपड़े और जूते खरीदे।

गौरी के पैरों पर खड़े होते ही उसके लिए अच्छे रिश्तों की लाइन लग गई। केशव जी ने बहुत सोच-समझकर अजमेर के एक प्रतिष्ठित और सुलझे हुए परिवार में गौरी का रिश्ता तय किया। गौरी के होने वाले पति माधव एक बड़े सरकारी अस्पताल में फार्मासिस्ट थे। माधव के माता-पिता बहुत ही खुले विचारों के और नेकदिल इंसान थे। उन्होंने सगाई में ही साफ कह दिया था, “केशव भाईसाहब, हमें दहेज में एक रुपया भी नहीं चाहिए। आपने अपनी बेटी को इतना पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाया है, यही हमारे लिए सबसे बड़ा दहेज है। हमें तो बस आपके घर के संस्कार चाहिए।”

विवाह के बाद गौरी ने अपने ससुराल को भी अपने मीठे व्यवहार और सेवाभाव से जीत लिया। वह नौकरी के साथ-साथ सास-ससुर की दवाई, उनके खान-पान और घर की हर छोटी-बड़ी जरूरत का पूरा ध्यान रखती। उसके सास-ससुर भी उसे बेटी की तरह ही प्यार करते और गर्व से समाज में कहते कि उन्हें बहू के रूप में साक्षात लक्ष्मी मिली है।

उधर, मंझली बेटियों—वाणी और सिद्धि ने भी अपनी बड़ी बहन के नक्शेकदम पर चलते हुए अपनी पढ़ाई पूरी की। वाणी की रुचि शुरू से ही साहित्य और शिक्षण में थी, इसलिए उसने बी.एड. करने के बाद एक प्रतिष्ठित विद्यालय में शिक्षिका के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया। वहीं सिद्धि ने कंप्यूटर विज्ञान में डिप्लोमा किया और घर पर ही आसपास के बच्चों को कंप्यूटर और अंग्रेजी सिखाने का एक छोटा सा केंद्र खोल लिया। दोनों बहनों ने मिलकर घर की आर्थिक स्थिति को काफी सहारा दिया और सबसे छोटी बहन नंदिनी की पढ़ाई का पूरा खर्च अपने कंधों पर ले लिया।

वाणी और सिद्धि के गुणों की चर्चा दूर-दूर तक थी। रिश्तेदारों के माध्यम से दो सगे भाइयों का रिश्ता उन दोनों के लिए आया, जो अपना खुद का व्यवसाय करते थे और एक संयुक्त परिवार में रहते थे। परिवार बहुत ही संस्कारी और संपन्न था। केशव जी और शारदा जी ने शुभ मुहूर्त देखकर दोनों बेटियों को एक ही मंडप से खुशी-खुशी विदा किया। वाणी और सिद्धि ने देवरानी-जेठानी बनकर नहीं, बल्कि सगी बहनों की तरह ही अपने ससुराल को स्वर्ग बना दिया।

अब घर में सबसे छोटी बेटी नंदिनी रह गई थी। नंदिनी बचपन से ही बहुत निर्भीक और न्यायप्रिय थी। उसका सपना था कि वह प्रशासनिक सेवा या न्यायिक क्षेत्र में जाकर समाज के लिए कुछ करे। उसने विधि विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और पाँच वर्षों तक कठोर परिश्रम किया। अपनी तीनों बड़ी बहनों के मार्गदर्शन और माता-पिता के आशीर्वाद से उसने न केवल वकालत की डिग्री प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की, बल्कि कुछ ही समय बाद न्यायिक सेवा की परीक्षा पास करके कनिष्ठ न्यायाधीश बनने का गौरव भी प्राप्त किया।

जिस दिन नंदिनी ने अपनी काली कोट पहनकर माता-पिता के पैर छुए, उस दिन पूरे ‘माधव कुंज’ मोहल्ले में मिठाइयाँ बांटी गईं। जिन लोगों ने कभी चार बेटियों के जन्म पर केशव जी पर तरस खाया था, आज वही लोग उनके घर के बाहर खड़े होकर अपनी किस्मत को कोस रहे थे कि काश, उनके बेटों में भी इन बेटियों के बराबर काबिलियत और संस्कार होते।

कुछ समय बाद नंदिनी का विवाह भी एक उच्च शिक्षित और संस्कारी युवक से हो गया, जो स्वयं एक महाविद्यालय में प्राध्यापक थे। चारों बेटियाँ अपने-अपने घरों में बेहद सुखी और संपन्न थीं। लेकिन ससुराल जाने के बाद भी वे अपने माता-पिता को एक पल के लिए भी नहीं भूलीं। हर तीज-त्योहार पर चारों बहनें और दामाद घर आते, जिससे केशव जी और शारदा जी का सूना आँगन फिर से चहक उठता।

अब केशव जी डाकघर की नौकरी से सेवानिवृत्त हो चुके थे। घर की सारी जिम्मेदारियाँ पूरी हो चुकी थीं, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आकर उन दोनों के शरीर में अब पहले जैसी फुर्ती नहीं रही थी। शारदा जी के घुटनों में अक्सर दर्द रहता और केशव जी को भी थोड़ी दूर चलने में ही हाँफनी आ जाती थी।

एक शाम, गौरी के ससुराल में रात्रि भोज के बाद पूरा परिवार आँगन में बैठा बात कर रहा था। तभी गौरी के ससुर जी ने अपनी पत्नी की ओर देखते हुए कहा, “माधव, अब तो उम्र का कोई भरोसा नहीं रहा। हमारी इच्छा है कि जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं, एक बार चारों धाम की यात्रा कर आएं। बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी और रामेश्वरम के दर्शन हो जाएं तो जीवन सफल हो जाए।”

यह सुनते ही गौरी के कान खड़े हो गए। उसे तुरंत अपनी माँ का वह उदास चेहरा और आँखों की वह तरलता याद आ गई, जो उसने बचपन से लेकर अपनी शादी तक हर साल मोहल्ले की बस छूटते वक्त देखी थी। उसकी आँखों के सामने माँ की पुरानी रफू की हुई साड़ियाँ और पिता के घिसे हुए जूते घूम गए। गौरी का गला भर आया।

रात को जब वह अपने कमरे में गई, तो वह गुमसुम सी खिड़की के पास खड़ी थी। पति माधव ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा, “क्या बात है गौरी? बाबूजी ने जब से तीर्थ यात्रा की बात छेड़ी है, मैं देख रहा हूँ तुम कुछ खोई-खोई सी हो। क्या तुम्हें हमारे साथ चलने में कोई परेशानी है?”

गौरी की आँखों से टप-टप आँसू बह निकले। उसने अपनी भीगी पलकों को उठाते हुए माधव से कहा, “नहीं जी, मम्मी-पापा की सेवा करने और उनके साथ तीर्थ पर जाने से बड़ा सौभाग्य मेरे लिए और क्या होगा। हम जरूर चलेंगे, इस उम्र में उन्हें अकेले भेजना ठीक भी नहीं है। पर… मेरे मन में एक बात बहुत दिनों से कसक रही है।”

“कैसी बात गौरी? मुझसे खुलकर कहो,” माधव ने स्नेह से उसकी हथेली अपने हाथों में लेते हुए कहा।

गौरी ने सिसकते हुए कहा, “माधव, मेरी माँ ने अपनी पूरी जिंदगी हम चार बहनों को पढ़ाने-लिखाने और काबिल बनाने में खपा दी। हमारे मोहल्ले से हर साल तीर्थ यात्रा की बस जाती थी। माँ का बहुत मन होता था जाने का, पर पापा की सीमित आमदनी में हमारी पढ़ाई और घर का खर्च ही बड़ी मुश्किल से निकलता था। माँ हमेशा सबसे कहती थीं कि मेरी चारों बेटियाँ ही मेरे चारों धाम हैं। उन्होंने अपनी हर इच्छा का गला घोंट दिया ताकि हमारे सपनों को पंख मिल सकें। आज जब हम चारों बहनें अपने-अपने घरों में सुखी हैं, तो माँ-पापा इतने बूढ़े हो चुके हैं कि वे अकेले कहीं जा नहीं सकते। उनका कोई बेटा तो है नहीं जो उन्हें हाथ पकड़कर तीर्थ करा लाए। क्या… क्या हम अपने मम्मी-पापा के साथ मेरे माँ-बाबूजी को भी इस यात्रा पर ले चल सकते हैं? अगर आप उनसे कहेंगे, तो वे मना नहीं कर पाएंगे।”

पत्नी की बात सुनकर माधव का हृदय गदगद हो गया। उसने गौरी के आँसू पोंछते हुए गर्व से कहा, “अरे पगली, इतनी सी बात के लिए तुम रो रही हो? किसने कहा कि उनका कोई बेटा नहीं है? मैं हूँ न उनका बेटा! और फिर वाणी, सिद्धि और नंदिनी के पति भी तो उनके बेटे ही हैं। तुमने बहुत नेक बात सोची है गौरी। हमारे माता-पिता को भी यात्रा में अपने हमउम्र समधी-समधन का साथ मिल जाएगा तो उनका सफर और भी आनंददायक हो जाएगा। तुम कल ही अपनी तीनों बहनों से बात करो, और मैं कल सुबह ही दफ्तर में लंबी छुट्टी की अर्जी देता हूँ।”

अगले दिन गौरी ने जब अपनी तीनों बहनों—वाणी, सिद्धि और नंदिनी को फोन करके यह बात बताई, तो तीनों खुशी से उछल पड़ीं। नंदिनी ने तो तुरंत कहा, “दीदी, यात्रा की सारी टिकटों और होटल के रुकने का प्रबंध मैं और आपके जीजाजी मिलकर करेंगे। वाणी और सिद्धि दीदी रास्ते के खान-पान और दवाइयों की व्यवस्था देख लेंगी।” चारों बहनों और चारों दामादों ने मिलकर गुपचुप तरीके से पूरी योजना बना ली। यहाँ तक कि गौरी के सास-ससुर को जब यह पता चला, तो वे भी बेहद खुश हुए और बोले कि समधी जी और समधन जी साथ चलेंगे तो यात्रा का आनंद दोगुना हो जाएगा।

रविवार की सुबह थी। केशव जी आँगन में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे और शारदा जी तुलसी के चौरे में जल चढ़ा रही थीं। तभी घर के बाहर दो गाड़ियाँ आकर रुकीं। देखते ही देखते चारों बेटियाँ, चारों दामाद और गौरी के सास-ससुर मुस्कुराते हुए घर के भीतर दाखिल हुए। अचानक एक साथ पूरे परिवार को देखकर केशव जी और शारदा जी की खुशी का ठिकाना न रहा। घर में एक उत्सव जैसा माहौल बन गया।

चाय-नाश्ते के बाद जब सब बैठक में इकट्ठे हुए, तो माधव ने आगे बढ़कर केशव जी के चरण स्पर्श किए और अपनी जेब से एक लंबा लिफाफा निकालकर उनके हाथों में थमा दिया।

केशव जी ने हैरानी से पूछा, “यह क्या है बेटा?”

माधव ने मुस्कुराते हुए कहा, “बाबूजी, यह आप दोनों के और मेरे माता-पिता के चारों धाम की यात्रा के प्रथम श्रेणी के वातानुकूलित डिब्बे के टिकट हैं। अगले महीने की दस तारीख को हम सब एक महीने की यात्रा पर निकल रहे हैं—जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, द्वारका और बद्रीनाथ!”

यह सुनते ही केशव जी और शारदा जी अवाक रह गए। शारदा जी ने घबराते हुए कहा, “अरे नहीं बेटा, इस उम्र में अब हम कहाँ जाएंगे? और फिर इसमें तो बहुत खर्च होगा। तुम लोगों ने क्यों इतना कष्ट उठाया?”

तभी गौरी ने माँ के पास बैठकर उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और रुँधे गले से बोली, “माँ, बचपन से लेकर आज तक जब भी मोहल्ले से तीर्थ की बस जाती थी, तुम हमेशा कहती थीं कि पहले मेरे घर के चारों धाम पूरे हो जाएं, फिर मैं जाऊँगी। माँ, आज तुम्हारे चारों धाम अपने-अपने घरों में बहुत सुखी हैं। और देखो, आज तुम्हारे वही चारों धाम अपने साथ तुम्हारे चारों बेटों को लेकर खुद तुम्हें तीर्थ कराने आए हैं। अब तो तुम्हें कोई बहाना नहीं बनाने देंगे हम!”

वाणी, सिद्धि और नंदिनी भी माँ के गले लग गईं। चारों दामादों ने एक स्वर में कहा, “हाँ माँ जी, अगर आप बेटियों को मना कर सकती हैं तो कर दीजिए, लेकिन अपने इन चार बेटों का आदेश तो आपको मानना ही पड़ेगा।”

गौरी के ससुर जी ने भी केशव जी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “चलिए समधी जी, अब ना-नुकुर मत कीजिए। बच्चों की खुशी इसी में है और हमारे लिए भी इससे अच्छा सत्संग और क्या होगा।”

उस पल शारदा जी की आँखों से जो आँसू बहे, उनमें वर्षों की दबी हुई कसक नहीं, बल्कि एक असीम तृप्ति और गर्व की चमक थी। केशव जी अपने चश्मे के पीछे से बार-बार अपनी भीगी आँखें पोंछ रहे थे। उन्हें आज महसूस हो रहा था कि उनका जीवन वास्तव में धन्य हो गया। जिन बेटियों को समाज कभी बोझ समझता था, आज उन्हीं बेटियों और उनके संस्कारों ने उन्हें दुनिया का सबसे अमीर और सौभाग्यशाली माता-पिता बना दिया था।

निर्धारित दिन पर जब केशव जी और शारदा जी अपने समधी-समधन, बेटियों और दामादों के साथ यात्रा के लिए घर से निकले, तो पूरा ‘माधव कुंज’ मोहल्ला उन्हें विदा करने के लिए दरवाजे पर खड़ा था। वही कमला बहन, जो कभी शारदा जी को टोका करती थीं, आज हाथ जोड़कर बोलीं, “शारदा बहन, सच में तुम्हारे पुण्य बहुत बड़े हैं। भगवान बेटे दे या न दे, पर बेटियाँ और दामाद हर किसी को तुम्हारे जैसे ही दे।”

एक महीने की उस पावन यात्रा में माधव और गौरी ने साये की तरह दोनों बुजुर्ग दंपतियों की सेवा की। हर स्टेशन पर बाकी तीनों दामादों के फोन आते और वे हर सुविधा का जायजा लेते। द्वारकाधीश के मंदिर में जब शारदा जी ने भगवान श्रीकृष्ण की भव्य प्रतिमा के सामने हाथ जोड़े, तो उनके मुँह से अपने लिए कोई मन्नत नहीं निकली, बस यही प्रार्थना निकली कि “हे प्रभु! जैसा सुख और सम्मान तूने मुझे मेरी बेटियों से दिलाया है, वैसा ही हर माता-पिता को नसीब हो। किसी भी आँगन में बेटियों को कभी बोझ न समझा जाए।”

यह कहानी हमें यही सिखाती है कि बेटियाँ किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं होतीं। यदि उन्हें सही शिक्षा, अच्छे संस्कार और आगे बढ़ने के समान अवसर दिए जाएं, तो वे न केवल दो कुलों का नाम रोशन करती हैं, बल्कि माता-पिता के बुढ़ापे की सबसे मजबूत लाठी भी बनती हैं।

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मूल लेखिका : पुष्पा जोशी

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