ज्वेलरी शोरूम के बिलिंग काउंटर पर अपनी सोने की चूड़ियों का पेमेंट करके जैसे ही मैं अपने पर्स में रसीद रखकर पीछे मुड़ी, सामने खड़ी महिला को देखकर मेरे कदम वहीं ठिठक गए। मेरे चेहरे पर अचानक एक बड़ी सी मुस्कान तैर गई और खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सिल्क की मैरून साड़ी में लिपटी, गले में मोतियों की माला पहने और आत्मविश्वास से लबरेज वह कोई और नहीं, मेरी बचपन की सबसे अजीज सहेली वैदेही थी। उसके चेहरे की दमक और आँखों की चमक चीख-चीखकर उसकी खुशहाल ज़िंदगी की गवाही दे रही थी। उसे इस तरह खिलखिलाते देख सहसा मेरी आँखों के सामने कई साल पुरानी वह सहमी-सहमी, बुझी-बुझी सी रहने वाली वैदेही की तस्वीर तैर गई, जिसके होंठों से हँसी जैसे रूठ ही गई थी।
“अरे सिया! ऐसे क्या टुकुर-टुकुर देख रही है? कहाँ खो गई?” वैदेही ने आगे बढ़कर मेरे कंधे को हिलाते हुए बड़ी आत्मीयता से पूछा।
“अरे, कहीं नहीं… बस तुझे देख रही हूँ। यकीन नहीं हो रहा कि तू इतने सालों बाद अचानक ऐसे मिल जाएगी!” कहकर मैंने कसकर उसका हाथ थाम लिया और हम दोनों वहीं शोरूम के बाहर बने छोटे से कैफे के एक कोने की टेबल पर जा बैठे।
दो कप कॉफी का ऑर्डर देने के बाद जब मैंने गौर से वैदेही का चेहरा देखा, तो अतीत के पन्ने हवा के झोंके की तरह फड़फड़ाकर खुलने लगे। नागपुर की उस पुरानी रेलवे कॉलोनी में हमारा बचपन बीता था। मेरे और वैदेही के घर की दीवारें आपस में सटी हुई थीं। सुबह स्कूल की घंटी बजने से लेकर शाम को आँगन में लूडो और स्टापू खेलने तक, हमारी हर सांस जैसे एक-दूसरे की साझेदारी में चलती थी। स्कूल की टिफिन में पराठे बदलना, गणित के होमवर्क के डर से साथ मिलकर बहाने बनाना और बारिश में कागज की कश्तियाँ चलाना—सब कुछ हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा था।
वैदेही की मम्मी, सुधा आंटी, बेहद कोमल हृदय और ममतामयी महिला थीं। उनके हाथ के बने बेसन के लड्डू आज भी मेरी जुबान पर अपना स्वाद छोड़ जाते हैं। वैदेही के पापा, श्रीकांत अंकल, कपड़ा मिल में सुपरवाइजर थे। उनकी ड्यूटी बड़ी सख्त थी। सुबह साढ़े छह बजे ही वे अपना टिफिन और साइकिल लेकर निकल जाते थे और शाम को सात बजे के बाद ही थके-हारे घर लौटते थे। मेरे पापा डाक विभाग में क्लर्क थे, तो हमारे घर का माहौल भी वैसा ही शांत और नियमबद्ध था। सुबह दस बजे तक जब हम बच्चे स्कूल चले जाते और दोनों घरों के पुरुष अपने-अपने काम पर निकल जाते, तो मेरी मम्मी और सुधा आंटी के पास दोपहर का एक लंबा वक्त अपना होता था।
दोनों घरों के बीच की नीची सी मुंडेर उनके सुख-दुख बांटने का अड्डा थी। आँगन में बड़ी सी दरी बिछ जाती थी। कभी गर्मियों की धूप में आम के अचार के लिए कैरियाँ काटी जातीं, तो कभी साबूदाने के पापड़ और कुम्हड़ौरी सुखाई जातीं। सर्दियों की गुनगुनी धूप में दोनों सहेलियाँ रंग-बिरंगे ऊन के गोले लिए स्वेटर बुनतीं और साथ ही साथ दुनिया भर की बातें चलती रहतीं। सुधा आंटी की खनकती हुई हँसी से पूरा आँगन गूँज उठता था। हमें लगता था कि हमारी यह छोटी सी, खुशहाल दुनिया हमेशा ऐसी ही रहेगी।
लेकिन वक्त की चाल को भला कौन भांप पाया है। जब हम नौवीं कक्षा में पहुँचे, तो एक मनहूस सुबह ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। दिसंबर की कड़ाके की ठंड थी। सुबह के करीब साढ़े पाँच बजे होंगे, जब वैदेही के घर से अचानक बर्तनों के गिरने और वैदेही के ज़ोर-ज़ोर से चीखने की आवाज़ आई। मेरी मम्मी और पापा घबराकर अपनी शॉल लपेटे तुरंत बाहर भागे, उनके पीछे-पीछे मैं भी दौड़ी।
वहाँ का मंजर देखकर हमारे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। रसोई के दरवाजे के पास सुधा आंटी बेसुध ज़मीन पर पड़ी थीं। उनके हाथ से चाय का पतीला छूटकर दूर जा गिरा था। वैदेही पागलों की तरह अपनी माँ के चेहरे पर पानी के छींटे मार रही थी और श्रीकांत अंकल के हाथ इतने काँप रहे थे कि उनसे लैंडलाइन फोन के बटन तक नहीं दब पा रहे थे। मेरे पापा ने तुरंत फोन छीनकर एम्बुलेंस को कॉल किया और पड़ोसियों की मदद से आंटी को उठाकर बाहर लाए।
अस्पताल के रास्ते भर वैदेही अपनी माँ का ठंडा पड़ता हाथ रगड़ती रही, “मम्मी आँखें खोलो ना, देखो मैंने अपना स्वेटर पहन लिया है, अब तुम गुस्सा मत करो…” उसकी वह सिसकियाँ किसी का भी कलेजा चीरने के लिए काफी थीं। मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। अस्पताल की चौखट पर पहुँचने से पहले ही सुधा आंटी ने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें बहुत तगड़ा ब्रेन स्ट्रोक आया था, जिसने उन्हें संभलने का एक पल भी नहीं दिया।
सुधा आंटी के जाने के बाद तो जैसे उस घर की दीवारों से हँसी और रोशनी हमेशा के लिए रुखसत हो गई। महज चौदह साल की वैदेही रातों-रात बड़ी हो गई। जिस उम्र में लड़कियाँ अपनी सहेलियों के साथ रिबन और क्लिप के रंग चुनती हैं, उस उम्र में वैदेही रसोई के धुएँ और घर की जिम्मेदारियों में उलझकर रह गई। श्रीकांत अंकल एकदम गुमसुम हो गए थे। वे मिल से लौटते, तो आँगन की खाली कुर्सी को घंटों निहारते रहते।
सुबह पाँच बजे उठकर अंकल के लिए टिफिन बनाना, घर की झाड़ू-पोंछा करना, कपड़े धोना और फिर भागते हुए स्कूल पहुँचना—वैदेही की दिनचर्या किसी मशीन जैसी हो गई थी। स्कूल में भी वह आधी छुट्टी के वक्त चुपचाप बेंच पर सिर रखकर सो जाती थी। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे। हमारी बातें कम हो गईं, खेलकूद छूट गया। उधर दसवीं के बोर्ड इम्तिहान सिर पर थे। मेरे पापा चाहते थे कि मैं ग्यारहवीं में साइंस लूँ, इसलिए मुझे कोचिंग क्लासेस में डाल दिया गया। अपनी पढ़ाई के दबाव में मैं चाहकर भी वैदेही को वह वक्त नहीं दे पा रही थी, जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी।
दसवीं के बोर्ड इम्तिहान खत्म हुए ही थे कि श्रीकांत अंकल ने अपने पुश्तैनी गाँव, जो कि अमरावती के पास था, जाने का फैसला किया। सुधा आंटी की बरसी के कुछ रीति-रिवाज भी पूरे करने थे। जब वे लोग स्टेशन के लिए रिक्शे में बैठ रहे थे, तब वैदेही ने उदास आँखों से मुझे हाथ हिलाया था। उस वक्त वे बाप-बेटी अकेले गए थे, लेकिन जब डेढ़ महीने बाद वे वापस लौटे, तो रिक्शे से दो नहीं, बल्कि तीन लोग उतरे।
श्रीकांत अंकल के पीछे-पीछे एक महिला अपने सिर पर पल्लू ढके, हाथ में छोटा सा सूटकेस लिए खड़ी थी। बाद में पता चला कि गाँव के बड़े-बुजुर्गों और रिश्तेदारों ने श्रीकांत अंकल पर बहुत दबाव डाला था कि जवान होती बेटी को अकेले कैसे संभालोगे, घर गृहस्थी बिना औरत के नहीं चलती। इसी चिंता और समाज के समझाने पर अंकल ने एक विधवा महिला, जिनका नाम मालती था, से बेहद सादे समारोह में दूसरी शादी कर ली थी।
कॉलोनी की औरतों में कानाफूसी शुरू हो गई। मेरी मम्मी भी थोड़ी चिंतित थीं। “पता नहीं नई औरत हमारी वैदेही के साथ कैसा बर्ताव करेगी, सौतेली माँ तो आखिर सौतेली ही होती है,” ऐसी बातें हर घर में होने लगी थीं। और हुआ भी कुछ वैसा ही, जैसा वैदेही ने डर के मारे सोच रखा था। वैदेही ने मालती आंटी को अपने घर और अपनी माँ की जगह पर कभी स्वीकार ही नहीं किया।
जब भी मैं उनके घर जाती, एक अजीब सा सन्नाटा और तनाव महसूस होता। मालती आंटी जब भी रसोई में कुछ बनाने जातीं, वैदेही मुँह फुलाकर अपने कमरे में बंद हो जाती। अगर वे प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरने की कोशिश करतीं, तो वह झटक कर दूर हट जाती और तपाक से कहती, “आप मेरी मम्मी बनने की कोशिश मत कीजिए, मेरी मम्मी मर चुकी हैं!”
मालती आंटी चुपचाप अपना अपमान घूँट कर रह जातीं। उनके चेहरे पर कभी गुस्सा नहीं आता, बस एक गहरी उदासी छा जाती। इसी बीच मेरे पापा का तबादला पुणे हो गया। हमें पंद्रह दिनों के भीतर नागपुर का वह घर छोड़ना पड़ा। जाते वक्त मैं वैदेही से गले लगकर खूब रोई थी। उस वक्त मोबाइल फोन का इतना चलन नहीं था और धीरे-धीरे नई जगह, नए कॉलेज और फिर मेरी शादी की व्यस्तताओं में वैदेही से मेरा संपर्क पूरी तरह टूट गया। मेरे मन में हमेशा यही टीस रहती थी कि मेरी सहेली सौतेली माँ के साये में न जाने कैसे घुट-घुट कर जी रही होगी।
“कॉफी ठंडी हो रही है सिया, फिर से अपने खयालों में डूब गई?” वैदेही की आवाज़ ने मुझे वर्तमान में वापस खींचा।
मैंने गहरी सांस ली और हिचकिचाते हुए उससे पूछ ही लिया, “वैदेही, मुझे सच बता… तू खुश तो है ना? मतलब, जब मैं नागपुर से गई थी, तब तेरे घर के हालात… वो मालती आंटी… उनके साथ तेरा रिश्ता कैसा रहा? तुझे देखकर लग तो रहा है कि तू बहुत खुश है, पर मेरे मन में आज भी वो पुरानी वाली डरी-सहमी वैदेही की फिक्र है।”
मेरी बात सुनकर वैदेही के चेहरे पर एक बेहद शांत और पवित्र मुस्कान फैल गई। उसकी आँखों के कोने हल्के से नम हो गए। उसने अपने कप से कॉफी का एक घूँट लिया और मेरी आँखों में देखते हुए बोली, “सिया, आज मैं जो कुछ भी हूँ, जिस मुकाम पर हूँ और मेरे चेहरे पर जो यह रौनक तुझे दिख रही है ना, यह सब उसी औरत की देन है, जिसे मैं सालों तक अपना दुश्मन समझती रही।”
मैं हैरानी से उसे देखने लगी। वैदेही ने आगे कहना शुरू किया, “तेरे पुणे जाने के बाद मेरा गुस्सा और ज़िद और भी बढ़ गई थी। मैं ग्यारहवीं में आ गई थी। मैंने ठान लिया था कि मैं मालती आंटी का जीना मुहाल कर दूँगी ताकि वो खुद घर छोड़कर चली जाएँ। मैं जानबूझकर खाने में नमक तेज होने का बहाना बनाकर थाली खिसका देती, कभी अपनी माँ की साड़ियाँ उन्हें छूने तक नहीं देती। पापा मुझे डांटते, तो मैं रो-रोकर घर सिर पर उठा लेती कि पापा तो अब बदल गए हैं, उन्हें मेरी परवाह नहीं है।
लेकिन सिया, मालती आंटी मिट्टी की नहीं, शायद किसी और ही धातु की बनी थीं। मैंने उन्हें जितने काँटे चुभोए, उन्होंने बदले में उतने ही फूल मेरी राह में बिछाए। मुझे याद है, बारहवीं के प्री-बोर्ड एग्जाम चल रहे थे। मुझे अचानक बहुत तेज टाइफाइड हो गया। बुखार 104 डिग्री तक पहुँच गया था। पापा तो मिल की नाइट शिफ्ट में फंसे थे। उस पूरी रात, कड़ाके की ठंड में, मालती आंटी ने एक पल के लिए भी अपनी पलकें नहीं झपकाईं। वो सारी रात मेरे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखती रहीं।
मैं बुखार की बेहोशी में भी बड़बड़ा रही थी—’मम्मी मुझे मत छोड़ो…’ और वो मेरा हाथ पकड़कर रोते हुए कह रही थीं—’मैं कहीं नहीं जाऊँगी मेरी बच्ची, तुझे कुछ नहीं होने दूँगी।’ जब तीन दिन बाद मेरा बुखार उतरा और मैंने सुबह आँखें खोलीं, तो देखा वो मेरे पलंग के नीचे ज़मीन पर ही बैठे-बैठे सिर टिकाकर सो गई थीं। उनके हाथ में तब भी पानी में भीगी हुई पट्टी थी। उस दिन पहली बार मेरे अहंकार की बर्फ पिघली थी।”
वैदेही की आवाज़ भर्रा गई थी, और मेरी आँखों से भी आँसू बह निकले थे। उसने टिश्यू पेपर से अपनी आँखें पोंछी और मुस्कुराते हुए आगे बताया, “बस, उस दिन के बाद मैंने उन्हें समझना शुरू किया। मुझे पता चला कि उनके पहले पति की मृत्यु शादी के दो साल बाद ही एक दुर्घटना में हो गई थी और उनकी कोई संतान नहीं थी। ससुराल वालों ने उन्हें बोझ समझकर मायके भेज दिया था। वो खुद प्यार और अपनेपन की भूखी थीं। उन्होंने मुझमें अपनी कोख की कमी पूरी करनी चाही थी, और मैं नादान उन्हें सौतेली माँ के तराजू में तौल रही थी।
जब बारहवीं में मेरे अच्छे नंबर आए और मैंने इंजीनियरिंग करने की इच्छा जताई, तो पापा के पास उतने पैसे नहीं थे। पापा ने कहा कि बीए कर लो, फिर शादी कर देंगे। तब मालती आंटी ही ढाल बनकर मेरे लिए पापा से लड़ीं। उन्होंने अपनी शादी में मायके से मिले सारे गहने चुपचाप गिरवी रख दिए और मेरे कॉलेज की पहली साल की फीस भरी। उन्होंने मुझसे कहा—’वैदेही, सुधा दीदी ने तुझे जन्म दिया, पर तेरे सपनों को उड़ान देना मेरा फर्ज है। तू पढ़ और इतनी कामयाब बन कि दुनिया देखती रह जाए।’
सिया, उस दिन मैं उनके पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोई थी। मैंने उन्हें गले लगाकर पहली बार ‘माँ’ कहा था। आज मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ। मेरी शादी एक बहुत ही सुलझे हुए लड़के से हुई है, और शर्त यही थी कि मेरे मम्मी-पापा मेरे घर के पास ही रहेंगे। आज मैं जो यह सोने की चूड़ियाँ खरीदने आई हूँ ना, वो मैं अपनी उसी मालती माँ के लिए बनवाने आई हूँ, जिन्होंने कभी मेरे भविष्य के लिए अपनी चूड़ियाँ उतार दी थीं।”
तभी शोरूम के अंदर से एक सौम्य सी महिला हाथ में पानी की बोतल लिए हमारी तरफ आती दिखीं। वैदेही ने तुरंत खड़े होकर उनके हाथ से बोतल ली और मुझसे कहा, “सिया, मिल मेरी माँ से… इन्होंने मुझे जन्म तो नहीं दिया, पर मुझे एक नई ज़िंदगी जरूर दी है।”
मैंने आगे बढ़कर मालती आंटी के पैर छुए। उनके चेहरे पर वही शांत, स्नेहिल मुस्कान थी, जो कभी सुधा आंटी के चेहरे पर हुआ करती थी। उन्होंने बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा। सच ही तो है, रिश्ते खून से नहीं, बल्कि एहसास, त्याग और निस्वार्थ समर्पण से बनते हैं। मालती आंटी ने समाज के बनाए ‘सौतेली माँ’ के हर मिथक को अपनी ममता की छाँव से धो डाला था।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि हर दूसरी माँ ‘सौतेली’ या बुरी नहीं होती? रिश्तों को निभाने के लिए खून के रिश्ते से ज्यादा दिल के रिश्ते की जरूरत होती है—इस बारे में आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर साझा करें!
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