“आईने में अपनी सूरत देखी है पल्लवी? यह थुलथुल पेट, आंखों के नीचे काले घेरे और भद्दा सा शरीर… मेरे बेटे सौम्य के अब तुम किसी लायक नहीं रहीं। हमें तो बस हमारे वंश का वारिस मिल गया, अब सौम्य अगर बाहर किसी और औरत की तरफ आंख उठाकर देख भी ले, तो मैं उसे कभी नहीं टोकूंगी, आखिर मर्द को भी तो सुंदरता चाहिए होती है!”
देहरादून की सर्द सुबह में सास निर्मला देवी के ये जहरीले शब्द कमरे की दीवारों से टकराकर पल्लवी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। अभी बारह दिन ही तो हुए थे उसकी सिजेरियन डिलीवरी को। पेट पर लगे कच्चे टांकों की टीस अभी भी उठती थी, रीढ़ की हड्डी में सुई का दर्द बैठा हुआ था, और ऊपर से रात-भर जागने की वजह से उसका सिर फटा जा रहा था। पल्लवी ने अपनी गोद में सो रहे नन्हे आरव को और कसकर सीने से लगा लिया। उसकी आंखों से गर्म आंसुओं की धार बहकर बच्चे के माथे पर गिरने लगी, लेकिन सामने खड़ी निर्मला देवी के चेहरे पर दया की एक लकीर तक नहीं थी। वह तो बस अपनी बहू को उसकी “औकात” दिखाने में व्यस्त थीं।
पल्लवी ने सूखे होंठों को कांपते हुए खोला और बेहद धीमी, टूटी हुई आवाज में कहा, “अम्मा जी… डॉक्टर ने कहा है कि अभी शरीर में खून की बहुत कमी है। मुझे बस कुछ दिनों के लिए थोड़ी शांति और आराम चाहिए… अगर मेरे कमरे का दरवाजा थोड़ी देर बंद रहे, तो मैं थोड़ी नींद ले पाऊंगी…”
“दरवाजा बंद रहे? वाह महारानी जी, वाह!” निर्मला देवी ने अपनी कमर पर हाथ रखकर ताली बजाते हुए ताना मारा। “एक बच्चा क्या पैदा कर दिया, तुम्हें तो अब इस घर में अलग से महल और एकांत चाहिए! अरे, हमने भी चार-चार बच्चे जने हैं, और तीसरे दिन ही चौके में जाकर बीस लोगों की रसोई संभाली है। आजकल की लड़कियों के नखरे तो देखो, इन्हें डिलीवरी के बाद प्राइवेसी चाहिए! कान खोलकर सुन लो पल्लवी, यह कोई धर्मशाला या तुम्हारे मायके का राजपाट नहीं है, संयुक्त परिवार है। यहां सबके बीच, सबके हिसाब से ही जीना पड़ेगा।”
पल्लवी ने अपनी आंखें मूंद लीं। बहस करने की ताकत न तो उसके शरीर में थी और न ही उसके संस्कारों में। शादी के इन तीन सालों में उसने खुद को मोम की तरह इस घर के सांचे में ढाल लिया था। सौम्य के परिवार की परंपराओं के नाम पर उसने अपनी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश का गला घोंटा था। सुबह पांच बजे उठकर पूरे घर की सफाई करना, ससुर कमलेश जी की दवाई और पूजा की तैयारी, सास के घुटनों की मालिश, और फिर सौम्य के बैंक जाने से पहले उसका टिफिन और कपड़े तैयार करना—पल्लवी ने कभी उफ तक नहीं की थी। उसे लगता था कि उसके इस समर्पण से एक दिन वह सबका दिल जीत लेगी। लेकिन आज, जब वह जिंदगी और मौत की जंग लड़कर इस घर को उसका पोता देकर लौटी थी, तो उसे समझ आ रहा था कि इस घर में उसकी हैसियत सिर्फ एक मशीन से ज्यादा कुछ नहीं थी।
अस्पताल से छुट्टी मिलते वक्त महिला डॉक्टर ने सौम्य और निर्मला देवी के सामने साफ शब्दों में कहा था, “पल्लवी का ऑपरेशन काफी जटिल था। कम से कम सवा महीने तक इन्हें सीढ़ियां नहीं चढ़नी हैं, कोई भारी काम नहीं करना है और सबसे जरूरी बात—इन्हें मानसिक रूप से खुश रखना है, वरना पोस्टपार्टम डिप्रेशन यानी प्रसव के बाद के अवसाद का खतरा हो सकता है।”
लेकिन घर की दहलीज लांघते ही डॉक्टर की सारी चेतावनियां कचरे के डिब्बे में फेंक दी गईं। चौथे दिन से ही निर्मला देवी ने पल्लवी के आराम को ‘कामचोरी’ का नाम दे दिया। “बच्चे के कपड़े मशीन में मत डालो, हाथ से धोने से कीटाणु निकलते हैं,” कहकर वह ठंडे पानी की बाल्टी पल्लवी के सामने रखवा देतीं। जब पल्लवी झुककर कपड़े निचोड़ती, तो उसके पेट के टांकों में ऐसी चुभन होती मानो कोई अंदर से मांस खींच रहा हो। वह दांत भींचकर अपनी सिसकियां रोकती, क्योंकि अगर वह दर्द की शिकायत करती, तो निर्मला देवी तुरंत पड़ोस की औरतों के सामने बैठकर उसकी बुराई शुरू कर देतीं— “क्या बताएं बहन जी, हमारी बहू तो छुईमुई है, जरा सा काम कर ले तो कमर पकड़कर बैठ जाती है।”
दिन का दर्द तो फिर भी वह किसी तरह सह लेती, लेकिन रातें उसके लिए किसी भयानक सजा से कम नहीं थीं। नन्हा आरव रात में हर घंटे पर भूख या गीलेपन की वजह से रोने लगता। पल्लवी के शरीर में कमजोरी की वजह से पर्याप्त दूध नहीं उतर रहा था, जिससे बच्चा भूखा रह जाता और बिलख-बिलख कर रोता। जैसे ही बच्चे की आवाज कमरे से बाहर जाती, निर्मला देवी धड़धड़ाती हुई कमरे में घुस आतीं और लाइट जलाकर चिल्लाना शुरू कर देतीं— “कैसी मां हो तुम पल्लवी? एक बच्चा चुप नहीं कराया जाता तुमसे? खुद का पेट तो भर-भर कर खाती हो, फिर बच्चे को दूध क्यों नहीं पिला पातीं? पूरे घर की नींद हराम कर रखी है तुमने! मां बनी हो या हमारे सिर पर कलंक?”
उनके ये कड़वे बोल पल्लवी के आत्मसम्मान को छलनी कर देते। वह अंधेरे में बच्चे को कंधे से लगाए कमरे में टहलती रहती, उसके पैर सूजकर कुप्पे जैसे हो गए थे, लेकिन वह बैठ नहीं सकती थी। उसके मन में बार-बार यह ख्याल आने लगा था कि शायद सच में उसमें ही कोई कमी है। वह आईने के सामने खड़ी होती, तो अपने बढ़े हुए पेट और उलझे हुए बालों को देखकर खुद से ही नफरत करने लगती। सास के शब्द—‘मेरा बेटा तुम पर थूकेगा भी नहीं’—उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बजते रहते।
इस पूरे नर्क के बीच उसकी एकमात्र उम्मीद उसका पति सौम्य था। सौम्य बुरा इंसान नहीं था, लेकिन वह उन बेटों में से था जो अपनी मां की हर सही-गलत बात को पत्थर की लकीर मानते थे। काम के बोझ और घर के क्लेश से बचने के लिए उसने डिलीवरी के बाद से ही दूसरे कमरे में सोना शुरू कर दिया था, यह कहकर कि उसे सुबह बैंक जाना होता है और बच्चे के रोने से उसकी नींद खराब होती है।
एक शाम, जब रसोई में खड़े-खड़े पल्लवी को अचानक चक्कर आया और उसके हाथ से दूध का पतीला गिरते-गिरते बचा, तो उसके सब्र का बांध टूट गया। रात को जब सौम्य अपने कमरे में लैपटॉप पर काम कर रहा था, पल्लवी लड़खड़ाते कदमों से वहां पहुंची। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था और आंखें भीतर धंस गई थीं।
“सौम्य…” उसने कांपती आवाज में पुकारा। “मुझे आपसे कुछ बात करनी है। मैं… मैं अब और नहीं सह पा रही हूं। अम्मा जी के ताने और यह काम का बोझ मुझे मार डालेगा। मेरे टांकों में से आज हल्का खून भी आया है। प्लीज सौम्य, कुछ दिनों के लिए या तो आप मेरे कमरे में शिफ्ट हो जाइए, या मुझे ऊपर वाले खाली कमरे में रहने दीजिए जहां कोई बार-बार मुझे टोकने न आए। मुझे बस थोड़ा सा मानसिक सुकून चाहिए, वरना मैं पागल हो जाऊंगी।”
सौम्य ने लैपटॉप की स्क्रीन से नजरें हटाईं। पल्लवी की उजड़ी हुई हालत देखकर एक पल के लिए तो उसका दिल पसीज गया। उसने पल्लवी का हाथ पकड़कर बिठाया और धीमे से कहा, “पल्लवी, मैं समझ रहा हूं तुम थक गई हो, लेकिन तुम तो जानती हो न अम्मा का स्वभाव कैसा है? वह थोड़ी पुराने ख्यालों की हैं, मुंह की कड़वी हैं पर दिल की बुरी नहीं हैं। तुम थोड़ा सा एडजस्ट कर लो न यार। अगर मैंने तुम्हें ऊपर वाले कमरे में भेज दिया या अम्मा को कुछ कहा, तो घर में महाभारत मच जाएगा। अम्मा बहुत नाराज हो जाएंगी और बीपी बढ़ा लेंगी।”
“अम्मा नाराज हो जाएंगी…” पल्लवी ने सौम्य के हाथ से अपना हाथ धीरे से छुड़ा लिया। उसकी आंखों के आंसू अचानक सूख गए। उसे महसूस हुआ कि जिस इंसान के वंश को आगे बढ़ाने के लिए उसने अपना शरीर चीरवाया, उस इंसान के लिए उसकी तकलीफ, उसके घाव और उसकी इज्जत का कोई मोल ही नहीं था। उसे डर अपनी मां की नाराजगी का था, अपनी पत्नी के टूटते हुए वजूद का नहीं।
बिना एक शब्द कहे पल्लवी अपने कमरे में वापस आ गई। उस रात से उसने बोलना पूरी तरह बंद कर दिया। वह एक जिंदा लाश की तरह काम करती। सास गालियां देती रहतीं, ताने मारतीं, उसके शरीर का मजाक उड़ातीं, लेकिन पल्लवी के चेहरे पर कोई भाव नहीं आता। वह धीरे-धीरे गहरे अवसाद की खाई में गिर रही थी। कई बार छत के पंखे को देखकर या बालकनी की रेलिंग के पास खड़े होकर उसके मन में भयानक ख्याल आते, लेकिन तभी पालने में लेटे आरव की किलकारी उसे रोक लेती।
बच्चे के जन्म का पैंतीसवां दिन था। घर में नामकरण संस्कार की तैयारियां चल रही थीं। निर्मला देवी ने रिश्तेदारों को बुलाया था। पल्लवी को सुबह से ही रसोई में झोंक दिया गया था। बुखार से उसका बदन तप रहा था, लेकिन सास ने उसे एक नई साड़ी पहनकर मेहमानों के सामने आने का हुक्म सुना दिया। जब पल्लवी भारी कदमों से चलकर हॉल में आई, तो साड़ी में से उसका बढ़ा हुआ पेट साफ दिख रहा था।
तभी निर्मला देवी ने अपनी बहन के सामने जोर से ठहाका लगाते हुए कहा, “देखो तो जरा हमारी बहू को, एक बच्चा होते ही कैसी भैंस जैसी हो गई है! सौम्य के साथ खड़ी होती है तो उसकी बड़ी बहन लगती है। मैंने तो सौम्य से कह दिया है, बेटा तू तो अभी जवान है, इस बेडौल औरत के चक्कर में अपनी जिंदगी मत खराब कर!”
हॉल में बैठी कुछ औरतें दबी जुबान में हंसने लगीं। पल्लवी ने देखा कि सौम्य वहीं कोने में खड़ा अपने दोस्तों से बात कर रहा था। उसने अपनी मां की यह घिनौनी बात सुनी, पल्लवी की तरफ एक नजर देखा, और फिर शर्मिंदगी से अपनी नजरें झुकाकर दूसरी तरफ मुड़ गया। उसने आज भी अपनी पत्नी के सम्मान में एक शब्द नहीं बोला।
बस! यही वह पल था जब पल्लवी के अंदर की डरी-सहमी बहू मर गई और एक स्वाभिमानी मां व औरत का जन्म हुआ।
तभी तेज चक्कर आने की वजह से पल्लवी लड़खड़ाई और जमीन पर गिरकर बेहोश हो गई। घर में हड़कंप मच गया। सौम्य के पिता कमलेश जी, जो अब तक घर के मामलों से दूर अपने कमरे में ही रहते थे, भागकर बाहर आए। उन्होंने तुरंत सौम्य को डांटते हुए गाड़ी निकालने को कहा और पल्लवी को अस्पताल ले जाया गया।
अस्पताल के केबिन में जब डॉक्टर ने पल्लवी की जांच की, तो वह गुस्से से कांप उठीं। उन्होंने बाहर आकर सौम्य, कमलेश जी और निर्मला देवी को अपने केबिन में बुलाया।
“आप लोग इंसान हैं या कसाई?” डॉक्टर ने मेज पर फाइल पटकते हुए कहा। “इस लड़की के अंदरूनी टांके पक चुके हैं, शरीर में हीमोग्लोबिन सात पर आ गया है, और यह गंभीर पोस्टपार्टम डिप्रेशन की शिकार है! मैंने साफ कहा था कि इसे आराम और प्यार की जरूरत है, और आप लोगों ने इसे इस हालत में पहुंचा दिया? अगर इसे आज अस्पताल नहीं लाया जाता, तो शायद सेप्टीसीमिया की वजह से हम इसे बचा भी नहीं पाते! मिस्टर सौम्य, आप पढ़े-लिखे होकर अपनी पत्नी की यह हालत देख रहे थे?”
सौम्य का सिर शर्म से जमीन में गड़ गया। वहीं कमलेश जी ने जब यह सुना, तो उन्होंने हैरानी और गुस्से से अपनी पत्नी निर्मला की तरफ देखा। अस्पताल के गलियारे में ही कमलेश जी को अपने पड़ोसी से पता चला कि आज नामकरण के फंक्शन में निर्मला ने पल्लवी के शरीर को लेकर क्या भद्दी टिप्पणी की थी।
दो दिन बाद जब पल्लवी को होश आया और उसकी तबीयत थोड़ी स्थिर हुई, तो घर लौटने की बात चली। निर्मला देवी ने फिर से मुंह बनाते हुए कहा, “चलो अब घर, वहां मेहमानों के सामने जो तमाशा होना था सो हो गया।”
तभी पल्लवी ने बेहद शांत लेकिन चट्टान जैसी मजबूत आवाज में कहा, “मैं उस घर में वापस नहीं जाऊंगी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सौम्य ने घबराकर कहा, “यह क्या कह रही हो पल्लवी? गुस्सा थूक दो, मैं वादा करता हूं अब तुम्हें कोई काम नहीं करना पड़ेगा।”
पल्लवी ने सौम्य की आंखों में सीधे देखते हुए कहा, “बात काम की नहीं है सौम्य, बात मेरी इज्जत और मेरे वजूद की है। जिस शरीर ने आपके बच्चे को नौ महीने कोख में सींचा, अपनी हड्डियां गलाकर उसे जन्म दिया, उसी शरीर के बदलने पर आपकी मां ने मुझे भरी सभा में जलील किया। कहा कि आप मुझ पर थूकेंगे भी नहीं और आपका अफेयर भी हो जाए तो उन्हें फर्क नहीं पड़ेगा। और आप? आप वहां खड़े होकर सुनते रहे! जो पति भरी महफिल में अपनी पत्नी के चरित्र और शरीर की धज्जियां उड़ते हुए चुपचाप देख सकता है, वह जीवन में कभी मेरी या मेरे बच्चे की ढाल नहीं बन सकता।”
पल्लवी ने अपने बिस्तर के पास रखे बैग की तरफ इशारा किया। “शादी से पहले मैं एक स्कूल में गणित की शिक्षिका थी। मैंने अपनी प्रिंसिपल मैडम से बात कर ली है। स्कूल के परिसर में शिक्षिकाओं के लिए जो क्वार्टर बने हैं, उन्होंने मुझे वहां एक कमरा दे दिया है और साथ में बच्चे की देखभाल के लिए एक आया का इंतजाम भी कर दिया है। मैं आज सीधा वहीं जा रही हूं।”
“तुम हमारे पोते को हमसे छीनकर नहीं ले जा सकतीं!” निर्मला देवी चिल्लाईं।
“पोता?” पल्लवी के चेहरे पर एक तल्ख मुस्कान आ गई। “जब इस पोते की मां रात-भर दर्द से तड़पती थी, तब आप कहां थीं अम्मा जी? एक औरत होकर आपने दूसरी औरत के मातृत्व का जो अपमान किया है, उसके बाद आप इस बच्चे पर अपना हक जताने का नैतिक अधिकार खो चुकी हैं। यह बच्चा मेरी कोख से जन्मा है, और मैं इसे एक ऐसे माहौल में बड़ा नहीं करूंगी जहां औरतों को सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन और काम करने वाली नौकरानी समझा जाता हो।”
तभी ससुर कमलेश जी आगे आए। उन्होंने हाथ जोड़कर पल्लवी के सिर पर हाथ रखा और भर्राई आवाज में बोले, “बेटी, मैं तेरा गुनहगार हूं जो अपने ही घर में होते हुए भी अंधा बना रहा। तेरा फैसला बिल्कुल सही है। निर्मला के घमंड और सौम्य की कायरता की सजा तुझे नहीं मिलनी चाहिए। तू जा बेटी, और अपने पैरों पर खड़ी हो। तेरा यह पिता हमेशा तेरे साथ रहेगा।” फिर उन्होंने सौम्य और निर्मला की तरफ मुड़कर सख्त लहजे में कहा, “और तुम दोनों कान खोलकर सुन लो, जब तक पल्लवी खुद तुम्हें माफ न कर दे, तुम में से कोई भी उसके रास्ते में नहीं आएगा।”
पल्लवी अपने बेटे आरव को सीने से लगाकर अस्पताल से सीधे अपने नए आशियाने में चली गई। शुरुआत के कुछ महीने आसान नहीं थे, लेकिन मानसिक शांति और आत्मसम्मान ने उसके घावों को तेजी से भर दिया। उसने दोबारा पढ़ाना शुरू किया, ट्यूशन की क्लासेज लीं और अपने बेटे की परवरिश एक शेरनी की तरह करने लगी।
उधर सौम्य के घर में पल्लवी के जाने के बाद जैसे ग्रहण लग गया था। कमलेश जी ने निर्मला देवी से बात करना पूरी तरह बंद कर दिया था। घर का सारा काम जब निर्मला देवी के सिर पर आ पड़ा और घुटनों के दर्द ने उन्हें बिस्तर पकड़वा दिया, तब उन्हें पल्लवी की कीमत समझ में आई। और सौम्य? वह तो हर पल अपराधबोध की आग में जल रहा था। खाली कमरा, बच्चे की किलकारियों की कमी और पल्लवी का वह आखिरी सवाल उसे रातों को सोने नहीं देता था।
छह महीने बीत गए। इस बीच सौम्य हर रोज पल्लवी के स्कूल के बाहर घंटों खड़ा रहता, सिर्फ अपनी पत्नी और बेटे की एक झलक पाने के लिए। उसने अपनी मां को साफ शब्दों में कह दिया था कि अब वह उनकी किसी भी गलत बात का हिस्सा नहीं बनेगा। उसने खुद खाना बनाना सीखा, घर की जिम्मेदारी संभाली और सबसे बढ़कर—अपनी मां की गलत सोच के खिलाफ आवाज उठाना सीखा। जब भी निर्मला देवी कुछ बोलने की कोशिश करतीं, सौम्य उन्हें टोक देता— “अम्मा, आपकी इसी जहरीली सोच ने मेरा बसा-बसाया घर उजाड़ दिया। अब कृपा करके चुप रहिए।”
एक शाम, जब निर्मला देवी सीढ़ियों से उतरते वक्त फिसल गईं और उनके पैर में फ्रैक्चर हो गया, तो किसी भी रिश्तेदार ने आकर झांका तक नहीं। जिन लोगों के सामने वह पल्लवी का मजाक उड़ाती थीं, वे सब आज बहाने बना रहे थे। जब यह खबर कमलेश जी के जरिए पल्लवी तक पहुंची, तो उसके दिल में कड़वाहट के बावजूद इंसानियत जाग उठी।
अगले दिन पल्लवी आरव को लेकर अपने ससुराल पहुंची। दरवाजे पर पल्लवी को खड़ा देख सौम्य की आंखों से आंसू छलक पड़े। पल्लवी का चेहरा अब पहले जैसा मुरझाया हुआ नहीं था, बल्कि उस पर आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की एक अलग ही चमक थी। वह अंदर गई और निर्मला देवी के कमरे में पहुंची।
पल्लवी को देखते ही निर्मला देवी शर्म से पानी-पानी हो गईं। जिस बहू को उन्होंने बेकार और बोझ कहा था, आज वही उनके बुरे वक्त में उनके सामने खड़ी थी। पल्लवी ने बिना कुछ कहे रसोई में जाकर उनके लिए दलिया बनाया और उन्हें दवा दी।
दवा खाते वक्त निर्मला देवी का सब्र टूट गया। उन्होंने पल्लवी के दोनों हाथ पकड़ लिए और फूट-फूटकर रोने लगीं। “मुझे माफ कर दे पल्लवी… मैं अपनी झूठी शान और अहंकार में अंधी हो गई थी। मैं भूल गई थी कि मैं भी एक औरत हूं, एक मां हूं। मैंने तेरे जख्मों पर नमक छिड़का, तेरे मातृत्व का अपमान किया… मुझे नरक में भी जगह नहीं मिलेगी बेटी! मुझे माफ कर दे…”
तभी सौम्य भी वहां आया और घुटनों के बल बैठकर पल्लवी के सामने रो पड़ा। “पल्लवी, मैं एक कायर पति था जो अपनी पत्नी की रक्षा नहीं कर सका। इन छह महीनों में मैंने हर पल अपनी गलती की सजा काटी है। मैंने घर के पास ही एक अलग फ्लैट ले लिया है। मैं तुमसे भीख मांगता हूं, मुझे एक आखिरी मौका दे दो। मैं वादा करता हूं, आज के बाद तुम्हारे आत्मसम्मान से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं होगा, मेरी मां भी नहीं।”
पल्लवी ने सौम्य और अपनी सास की आंखों में सच्चा पछतावा देखा। उसने उन्हें माफ कर दिया, लेकिन इस बार अपनी शर्तों पर। उसने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी और सौम्य को भी घर और बच्चे की बराबर की जिम्मेदारी उठाने का पाठ पढ़ाया। आज पल्लवी सिर्फ एक बहू या पत्नी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी सशक्त महिला थी जिसने अपने सम्मान की लड़ाई खुद लड़ी और अपने टूटे हुए परिवार को सही रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया।
आपकी क्या राय है?
क्या डिलीवरी के बाद एक महिला के बदलते शरीर का मजाक उड़ाना और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करना हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई नहीं है? पल्लवी ने अपने आत्मसम्मान के लिए जो कदम उठाया, क्या वह सही था? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपकी एक राय समाज की सोच बदल सकती है।
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लेखिका : सीमा श्रीवास्तव