चौखट का मोह

“मुझे माफ़ कर दो मेरे बच्चों…” गजेंद्र बाबू का गला रुंध गया। “मैं अपनी झूठी ठसक और इस मिट्टी के मोह में अंधा हो गया था। मैं भूल गया था कि ज़िंदगी का असली सुख चारदीवारी में नहीं, अपनों की बाहों के घेरे में होता है। आज इस मकान का मोह खत्म हुआ। अब हम दोनों वहीं रहेंगे, जहाँ तुम सब रहोगे।”

पूरे घर में खुशी की एक ऐसी लहर दौड़ गई मानो बरसों बाद उस आँगन में दीवाली उतरी हो।

अजमेर के शांत और पुराने सिविल लाइंस इलाके में खड़ा तीन मंजिला भव्य मकान ‘आशीर्वाद कुंज’ दूर से ही अपनी भव्यता की कहानी कहता था। इसके विशाल लॉन में मौसमी फूल खिले रहते थे, संगमरमर की सीढ़ियाँ चमकती रहती थीं और हर मंजिल पर बड़े-बड़े हवादार कमरे बने थे। यह तीन मंजिला घर बाहर से जितना भरा-पूरा और आलीशान दिखता था, भीतर से उतना ही गहरा सन्नाटा अपने सीने में समेटे हुए था। बारह कमरों की इस विशाल कोठी में रहने वाले केवल दो ही प्राणी थे—बचहत्तर वर्षीय रिटायर्ड प्राचार्य गजेंद्र बाबू और उनकी अड़सठ वर्षीय धर्मपत्नी मालती देवी।

मोहल्ले से गुजरने वाला हर अनजान व्यक्ति या कभी-कभार मिलने आने वाला कोई दूर का रिश्तेदार जब इन दो बूढ़े प्राणियों को उस विशाल मकान के बरामदे में अकेले चाय पीते देखता, तो उसके मुँह से अनायास ही निकल पड़ता—”हाय रे कलियुग! तीन-तीन काबिल बेटों के माता-पिता हैं, तीन बहुएँ हैं, पोते-पोतियों से भरा परिवार है, फिर भी इस उम्र में दोनों अकेले पड़े हैं। ज़रूर बेटों ने ही हाथ झटक लिया होगा, आजकल की औलादें अपनी पत्नियों के आगे माँ-बाप को कहाँ पूछती हैं!”

और सच कहें तो गजेंद्र बाबू भी लोगों की इस सहानुभूति का पूरा आनंद लेते थे। जब भी कोई पड़ोसी उनके पास बैठता, गजेंद्र बाबू एक लंबी और ठंडी आह भरकर कहते, “क्या करें भाई साहब, पेड़ लगाया था कि बुढ़ापे में छाँव देगा, पर फल लगते ही डालियाँ अपनी-अपनी दिशा में झुक गईं। तीन बेटे पैदा किए, पढ़ाया-लिखाया, काबिल बनाया, और आज आलम यह है कि दवाई देने वाला भी कोई पास नहीं है।”

प्रथम दृष्टया सुनने वाले को यही लगता कि गजेंद्र बाबू के तीनों बेटे—आदित्य, निखिल और वरुण—बेहद स्वार्थी और नालायक हैं। लेकिन ज़िंदगी की किताब के पन्ने जब पलटे जाते हैं, तो कई बार जो बाहर से दिखता है, असली सच उससे कोसों दूर होता है।

गजेंद्र बाबू स्वयं एक राजकीय महाविद्यालय में हिंदी साहित्य के वरिष्ठ प्रोफेसर और बाद में प्राचार्य रहे थे। घर में शुरू से ही शिक्षा, अनुशासन और किताबों का माहौल था। उन्होंने अपने तीनों बेटों को बचपन से ही ऊँचे सपने देखना सिखाया था। आदित्य, निखिल और वरुण—तीनों ही पढ़ाई में बेहद मेधावी निकले। अजमेर जैसे शांत और छोटे शहर में प्रारंभिक शिक्षा तो अच्छी मिल गई, लेकिन जब उच्च शिक्षा और करियर की बात आई, तो इस शहर के दायरे छोटे पड़ने लगे।

बड़े बेटे आदित्य ने आईआईटी की परीक्षा पास की और इंजीनियरिंग के बाद उसे बेंगलुरु की एक शीर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनी में बड़ा पद मिल गया। मंझले बेटे निखिल ने मेडिकल की राह चुनी और दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल में एक प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) बन गया। समय के साथ दोनों बेटों की शादियाँ हुईं। उनकी पत्नियाँ भी उच्च शिक्षित और अपने-अपने क्षेत्रों में कार्यरत थीं। बच्चों की पढ़ाई, मरीजों की जिम्मेदारी और कॉर्पोरेट जगत की व्यस्तताओं के चलते आदित्य और निखिल का बेंगलुरु और दिल्ली छोड़कर वापस अजमेर में बसना व्यावहारिक रूप से असंभव था।

अब बचे सबसे छोटे बेटे वरुण। वरुण जब बैंक में अधिकारी बना, तो गजेंद्र बाबू ने अपनी ज़िद और अपने पुराने संपर्कों का इस्तेमाल करके उसका ट्रांसफर अजमेर ही करवा लिया। उन्होंने सोचा कि चलो, दो बेटे बाहर गए तो क्या, सबसे छोटा बेटा तो हमारी आँखों के सामने रहेगा। वरुण ने भी पिता की आज्ञा का मान रखा। दो साल बाद वरुण का विवाह ऋचा से हुआ। ऋचा ने फाइनेंस में एमबीए किया था और शादी से पहले वह मुंबई की एक बड़ी फर्म में काम करती थी।

शादी के बाद ऋचा ने अजमेर में ढलने की पूरी कोशिश की। वह सुबह उठकर सास-ससुर की सेवा करती, घर संभालती, लेकिन उसके भीतर का पढ़ा-लिखा हुनर इस छोटे शहर में अवसरों की कमी के कारण घुटने लगा था। यहाँ उसके स्तर की कोई नौकरी ही नहीं थी। उधर वरुण भी महसूस कर रहा था कि छोटे शहर की शाखा में रहने से उसकी अपनी तरक्की रुक गई थी। फिर भी माता-पिता के मोह में वह चुप रहा। लेकिन वरुण के भीतर प्रशासनिक सेवा में जाने का एक सपना था। उसने चुपचाप तैयारी जारी रखी और दो साल बाद उसने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा शानदार रैंक के साथ उत्तीर्ण कर ली। उसका चयन भारतीय राजस्व सेवा में हुआ और पहली ही पोस्टिंग मुंबई में मिली।

मुंबई जाते ही ऋचा को भी एक बड़ी वित्तीय कंपनी में बेहतरीन पद मिल गया। अब स्थिति यह थी कि तीनों बेटे अपने-अपने कार्यक्षेत्र के शिखर पर थे, पर तीनों ही माता-पिता के शहर से दूर थे।

ऐसा बिल्कुल नहीं था कि तीनों बेटे अपने माता-पिता से प्यार नहीं करते थे या अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे थे। इसके ठीक उलट, तीनों भाइयों की रातों की नींद अपने बूढ़े माँ-बाप की चिंता में उड़ी रहती थी।

बड़े बेटे आदित्य ने बेंगलुरु में अपने ऑफिस के पास ही एक बहुत बड़ा चार बेडरूम का फ्लैट सिर्फ इसलिए खरीदा था ताकि उसके माता-पिता उसके साथ आराम से रह सकें। निखिल हर हफ्ते दिल्ली से फोन करके मिन्नतें करता, “पापा, मेरी अस्पताल के पास ही इतनी अच्छी सोसाइटी है, यहाँ चौबीसों घंटे मेडिकल सुविधा है, आप और माँ मेरे पास आ जाइए। आपकी उम्र अब अकेले रहने की नहीं है।” वरुण और ऋचा तो हर दूसरे महीने मुंबई से दौड़े चले आते और हाथ जोड़कर कहते कि हमारे साथ चलिए।

लेकिन गजेंद्र बाबू ने अपने चारों तरफ एक ऐसी अदृश्य और अड़ियल लक्ष्मण रेखा खींच रखी थी, जिसे वे खुद भी पार नहीं करना चाहते थे और मालती देवी को भी पार नहीं करने देते थे।

गजेंद्र बाबू का एक ही तर्क होता था—”यह घर मैंने अपने खून-पसीने की कमाई से, एक-एक ईंट जोड़कर बनवाया है। यहाँ के पड़ोसी मुझे जानते हैं, पार्क के दोस्त मेरे साथ बैठते हैं, सब्ज़ी वाला भी मुझे ‘प्रिंसिपल साहब’ कहकर सलाम करता है। मैं तुम लोगों के उन कंक्रीट के जंगलों में जाकर क्या करूँगा? वहाँ मुझे कौन जानता है? अगर तुम लोगों को हमसे प्यार है, तो अपनी-अपनी नौकरियाँ छोड़ो और यहाँ अजमेर आकर हमारे साथ रहो!”

आदित्य उन्हें समझाने की कोशिश करता, “पापा, आप खुद सोचिए, हमारे बच्चे वहाँ दसवीं और बारहवीं में पढ़ रहे हैं। हमारा पूरा करियर, हमारी जिम्मेदारियाँ वहाँ हैं। हम अचानक सब कुछ छोड़कर अजमेर में आकर क्या करेंगे? यहाँ हमारे काम का कोई स्कोप ही नहीं है। लेकिन आप तो रिटायर हो चुके हैं न पापा! आपके ऊपर अब कोई बंदिश नहीं है। आप हमारे साथ चार महीने बेंगलुरु रहिए, चार महीने दिल्ली और चार महीने मुंबई। हम तीनों भाई आपकी सेवा के लिए तरस रहे हैं।”

पर गजेंद्र बाबू अपनी मूँछों पर ताव देते हुए कड़क आवाज़ में कह देते, “बस! मुझे ज्ञान मत दो। मुझे किसी के टुकड़ों पर या किसी के पराये शहर में कैदी बनकर नहीं रहना। मैं अपने घर का राजा हूँ और इसी चौखट पर मेरी अर्थी उठेगी।”

सबसे ज़्यादा पिस रही थीं मालती देवी। एक माँ का दिल अपने पोते-पोतियों की किलकारियाँ सुनने के लिए, अपनी बहुओं के हाथ से बनी चाय पीने के लिए और अपने बेटों के सिर पर हाथ फेरने के लिए तड़पता रहता था। जब भी वीडियो कॉल पर उनका छोटा पोता कहता, “दादी, आप हमारे घर कब आओगी? मेरे सारे दोस्तों की दादी उनके साथ रहती हैं,” तो मालती देवी बाथरूम में जाकर चुपके से रो लेती थीं। वे गजेंद्र बाबू से कहतीं, “सुनिए जी, एकाध महीने के लिए ही सही, बच्चों के पास हो आते हैं न। मेरा मन बहुत करता है उनसे मिलने का।”

गजेंद्र बाबू तुरंत भड़क जाते, “तुम्हें भी बुढ़ापे में भटकने का शौक चढ़ा है क्या? तुम चली जाओगी तो मेरे खाने-पीने और दवाइयों का क्या होगा? और इस इतने बड़े मकान को किसके भरोसे छोड़कर जाएँगे? चोर-उचक्कों का राज हो जाएगा! कोई ज़रूरत नहीं है कहीं जाने की, जिन्हें गरज होगी वो खुद यहाँ चलकर आएँगे।”

पति के इस तानाशाही रवैये के आगे मालती देवी बेबस होकर चुप रह जातीं। समाज के सामने गजेंद्र बाबू खुद को एक ‘पीड़ित पिता’ के रूप में पेश करते रहे, और उनके तीनों श्रवण कुमार जैसे बेटे दुनिया की नज़रों में ‘कलयुगी और खुदगर्ज’ कहलाते रहे।

वक्त का पहिया घूमता रहा। देखते ही देखते सर्दियाँ आ गईं। दिसंबर की एक कड़ाके की ठंडी रात थी। बाहर तेज़ हवा चल रही थी। रात के करीब एक बजे मालती देवी को अचानक तेज़ कंपकंपी के साथ बुखार चढ़ आया और सांस लेने में तकलीफ होने लगी। उन्होंने कांपते हाथों से बगल में सो रहे गजेंद्र बाबू को जगाया।

गजेंद्र बाबू हड़बड़ा कर उठे। जब उन्होंने पत्नी का माथा छुआ, तो वह भट्टी की तरह तप रहा था। गजेंद्र बाबू घबराकर पानी लेने के लिए सीढ़ियों की तरफ भागे, लेकिन घबराहट और बढ़ती उम्र की कमजोरी के कारण उनका अपना पैर फिसल गया और वे सीढ़ियों के निचले पायदान पर गिर पड़े। उनके बाएँ टखने में भयानक मोच आ गई।

उस रात बारह कमरों की वह तीन मंजिला कोठी गजेंद्र बाबू को किसी डरावनी गुफा जैसी लगी। पत्नी ऊपर कमरे में बुखार और अस्थमा के दौरे से तड़प रही थी, और वे खुद नीचे सीढ़ियों पर दर्द से कराह रहे थे। उन पत्थरों की दीवारों में से कोई भी आगे बढ़कर उन्हें पानी का एक गिलास पकड़ाने नहीं आया। वह झूठा रुतबा, वह मकान का मोह उस रात के सन्नाटे में मुँह चिढ़ा रहा था।

बड़ी मुश्किल से रेंगते हुए गजेंद्र बाबू ने मेज पर रखा फोन उठाया और अपने पड़ोसी को कॉल किया। पड़ोसी ने आकर दोनों को अस्पताल पहुँचाया और तुरंत तीनों बेटों को खबर दी।

अगले ही दिन सुबह की पहली फ्लाइट पकड़कर तीनों बेटे—आदित्य, निखिल और वरुण—अपनी पत्नियों के साथ अजमेर के अस्पताल में खड़े थे।

निखिल ने खुद एक डॉक्टर होने के नाते अपनी माँ के इलाज की कमान संभाली। तीन दिनों तक तीनों बेटों और तीनों बहुओं ने अस्पताल में दिन-रात एक कर दिया। बड़ी बहू सूप बनाकर लाती, मंझली बहू मालती देवी के बाल संवारती और छोटी बहू ऋचा गजेंद्र बाबू के सूजे हुए पैर पर गर्म पट्टी बाँधती। किसी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, कोई उलाहना नहीं था; बस अपने माता-पिता को ठीक करने की एक निस्वार्थ तड़प थी।

चौथे दिन जब दोनों को अस्पताल से छुट्टी मिली और वे वापस अपने उसी ‘आशीर्वाद कुंज’ में लाए गए, तो शाम को घर के बैठक में एक अजीब सी खामोशी थी।

मालती देवी बिस्तर पर अधलेटी थीं और गजेंद्र बाबू कुर्सी पर पैर लटकाए बैठे थे। तभी मालती देवी ने अपने आँसू पोंछते हुए, अपने जीवन में पहली बार, अपने पति के सामने दृढ़ स्वर में बोलना शुरू किया।

“सुनिए जी,” मालती देवी की आवाज़ कांप रही थी, पर उसमें एक अटल फैसला था। “आज उस काली रात ने मेरी आँखें खोल दी हैं। पैंतालीस साल से मैं आपकी हर ज़िद के आगे सिर झुकाती आई हूँ। आपने कहा यह शहर मत छोड़ो, मैंने नहीं छोड़ा। आपने कहा मकान सूना हो जाएगा, मैं अपने बच्चों से दूर हो गई। लेकिन उस रात जब मैं सांस के लिए तड़प रही थी और आप सीढ़ियों पर पड़े कराह रहे थे, तब आपकी इस कोठी की किसी ईंट ने आकर हमें नहीं बचाया! अगर दस मिनट और देर हो जाती, तो आज हमारे बेटे हमारी तस्वीरों पर माला चढ़ाने आते!”

गजेंद्र बाबू सन्न रह गए। उन्होंने कभी अपनी शांत पत्नी का यह रूप नहीं देखा था।

मालती देवी ने अपने तीनों बेटों की तरफ देखा, जो सिर झुकाए खड़े थे। “मैं आज साफ कह रही हूँ। मुझे इस तीन मंजिला पत्थर के ताबूत में घुट-घुट कर नहीं मरना है। मेरे बेटे नालायक नहीं हैं, उन्होंने अपने भविष्य और हमारे पोते-पोतियों की अच्छी शिक्षा के लिए बड़े शहरों को चुना है, जो कि प्रकृति का नियम है। चिड़िया के बच्चे भी जब बड़े होते हैं तो खुले आसमान में उड़ते हैं, घोंसले में चिपक कर नहीं बैठते। हम ही स्वार्थी हो गए थे जो चाहते थे कि वे अपने पंख काटकर हमारे पास बैठ जाएँ। अगर आपको अपनी इस झूठी शान और इस मकान से इतना ही प्यार है, तो आप रहिए यहाँ अकेले। मैं कल ही अपने बेटों और बहुओं के साथ जा रही हूँ। मुझे अपने आखिरी साल अपने पोते-पोतियों की गोद में बिताने हैं, इस वीरान हवेली में नहीं!”

कमरे में पिन ड्रॉप साइलेंस छा गया। तभी मंझला बेटा निखिल आगे आया और उसने अपने पिता के घुटनों पर सिर रख दिया। वह एक बच्चे की तरह सिसक पड़ा, “पापा, माँ बिल्कुल सच कह रही हैं। आप लोगों को यहाँ अकेला छोड़कर हम वहाँ चैन की रोटी नहीं खा पाते। हर बार जब फोन की घंटी बजती है, तो हमारा कलेजा मुँह को आ जाता है कि कहीं कोई बुरी खबर न हो। पापा, समाज में लोग हमें ताने मारते हैं कि हमने आपको छोड़ दिया, हम वो ज़हर भी पी लेते हैं, पर आपकी यह तन्हाई अब हमसे नहीं देखी जाती। क्या आपका यह मकान हम तीनों भाइयों की खुशियों से ज़्यादा कीमती है?”

छोटी बहू ऋचा ने आगे बढ़कर गजेंद्र बाबू के हाथ थाम लिए, “पापा जी, घर ईंट-पत्थरों से नहीं, इंसानों की साँसों से बनता है। जहाँ आप और मम्मी जी हमारे साथ रहेंगे, वही हमारा असली ‘आशीर्वाद कुंज’ होगा। कृपया अपनी इस ज़िद को छोड़ दीजिए।”

गजेंद्र बाबू ने चारों तरफ देखा। एक तरफ उनकी पत्नी की भीगी आँखें थीं, दूसरी तरफ उनके तीनों काबिल बेटे और संस्कारी बहुएँ हाथ जोड़े खड़ी थीं। आज अचानक उनके भीतर का वह अहंकारी प्रोफेसर हार गया और एक पिता जीत गया। उन्हें अहसास हुआ कि वे अपनी पुरानी जड़ों से चिपके रहने के मोह में अपने ही उगाए हुए फलों की मिठास से खुद को वंचित कर रहे थे। वे अपनी तन्हाई के खुद ही जिम्मेदार थे और दोष अपने निर्दोष बच्चों को दे रहे थे।

गजेंद्र बाबू की आँखों से पश्चाताप के गर्म आँसू छलक पड़े। उन्होंने कांपते हाथों से निखिल को उठाया और अपने तीनों बेटों को एक साथ अपनी बाँहों में भर लिया।

“मुझे माफ़ कर दो मेरे बच्चों…” गजेंद्र बाबू का गला रुंध गया। “मैं अपनी झूठी ठसक और इस मिट्टी के मोह में अंधा हो गया था। मैं भूल गया था कि ज़िंदगी का असली सुख चारदीवारी में नहीं, अपनों की बाहों के घेरे में होता है। आज इस मकान का मोह खत्म हुआ। अब हम दोनों वहीं रहेंगे, जहाँ तुम सब रहोगे।”

पूरे घर में खुशी की एक ऐसी लहर दौड़ गई मानो बरसों बाद उस आँगन में दीवाली उतरी हो।

अगले ही महीने गजेंद्र बाबू ने उस बड़े मकान को एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्था को पुस्तकालय और अध्ययन केंद्र चलाने के लिए किराए पर दे दिया, ताकि मकान की देखभाल भी होती रहे और वह किसी नेक काम में भी आए।

आज गजेंद्र बाबू और मालती देवी कभी बेंगलुरु की सुहानी हवा में अपने बड़े पोते के साथ शतरंज खेलते नज़र आते हैं, तो कभी दिल्ली में निखिल के घर की बालकनी में बैठकर धूप सेंकते हैं, और कभी मुंबई के समंदर किनारे वरुण और ऋचा के साथ शाम की सैर करते हैं। अब उनके चेहरे पर तन्हाई की झुर्रियाँ नहीं, बल्कि संतोष और अपनत्व की चमक होती है।

उन्होंने समझ लिया था कि बदलते वक्त के साथ कदम मिलाकर चलना और अपने बच्चों की गृहस्थी में घुल-मिल जाना ही बुढ़ापे को सार्थक और खुशहाल बनाने का सबसे सुंदर मंत्र है।

प्रिय पाठकों,

क्या आपने भी अपने आसपास ऐसे बुजुर्ग माता-पिता देखे हैं जो अपने पुश्तैनी घर या शहर के मोह में बच्चों के साथ जाने से इनकार कर देते हैं, और बाद में अकेलेपन का शिकार होते हैं? क्या जीवन के अंतिम पड़ाव में मकान के मोह से ज़्यादा ज़रूरी अपनों का साथ नहीं होना चाहिए? इस संवेदनशील और व्यावहारिक विषय पर आपकी क्या राय है, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखकर बताएँ।

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