मां को इस तरह फूट-फूटकर रोता देख आरव और मानसी दोनों सन्न रह गए। मानसी के हाथ से उसका डिजाइनर दुपट्टा छूटकर नीचे गिर गया। मां के एक-एक शब्द ने उन दोनों के दिल पर गहरी चोट की थी। जिस आधुनिकता और समय बचाने की दौड़ पर वे गर्व कर रहे थे, आज उसी ने उनकी मां को भरी महफिल में अपने ही मायके के आगे अनाथ जैसा महसूस करा दिया था।
आरव ने मानसी की तरफ देखा। दोनों भाई-बहन की आंखों में अपनी गलती का गहरा अहसास था। आरव ने तुरंत आगे बढ़कर मां के आंसू पोंछे और घुटनों के बल उनके सामने बैठ गया।
“मां, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैंने सुविधा को समझदारी समझ लिया था,” आरव ने मां के हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, “लेकिन अभी वक्त बीता नहीं है मां। बारात आने में अभी आठ घंटे बाकी हैं और सहारनपुर यहां से साढ़े तीन घंटे की दूरी पर है। मैं अभी अपनी गाड़ी लेकर सहारनपुर जा रहा हूं। मैं व्हाट्सएप से नहीं, मामा जी के पैरों में सिर रखकर उन्हें मनाकर लाऊंगा।”
सलीके से सजे मकान के आंगन में बैठी निर्मला देवी के हाथों में पीले चावल और हल्दी की एक छोटी सी कटोरी थी। सामने मेज पर चांदी की थाली में रखे गणेश जी के आगे वह अपनी बेटी मानसी के विवाह की पहली पत्रिका रखकर प्रणाम कर रही थीं। उनकी आंखों में एक मां का संतोष था और होंठों पर अनकही प्रार्थनाएं। तभी उनका बड़ा बेटा आरव हाथ में लैपटॉप और मोबाइल लिए तेजी से सीढ़ियां उतरता हुआ नीचे आया।
“मां, आप अभी तक इन कागज के कार्ड्स में उलझी हैं? मैंने और मानसी ने मिलकर इतना शानदार थ्री-डी कैरिकेचर वाला ई-इनवाइट बनवाया है कि जो देखेगा, बस देखता रह जाएगा। इसमें दूल्हा-दुल्हन की एनिमेटेड एंट्री भी है और बैकग्राउंड में मानसी का पसंदीदा गाना बज रहा है। मैंने आपके फोन से भी सारे रिश्तेदारों के ब्रॉडकास्ट ग्रुप में इसे फॉरवर्ड कर दिया है,” आरव ने सोफे पर बैठते हुए बड़ी उत्साह से कहा।
निर्मला जी ने पलटकर आरव को देखा, उनके माथे पर हल्की सी शिकन उभर आई। “आरव, ये फोन का संदेश अपनी जगह ठीक है बेटा, लेकिन शादी-ब्याह के न्योते ऐसे हवा में नहीं भेजे जाते। घर की इकलौती बेटी की शादी है। पहला कार्ड तो मानसी के ननिहाल यानी तेरे बड़े मामा जी के घर सहारनपुर जाकर, उनके हाथों में मिठाई के डिब्बे और पीले चावल के साथ देना होता है। इसे ‘भात न्योतना’ कहते हैं। जब तक बहन अपने भाई के द्वार पर जाकर गुड़ और चावल की पोटली नहीं रखती, तब तक शादी की रस्में शुरू भी नहीं मानी जातीं।”
आरव ने मोबाइल स्क्रीन से नजरें हटाए बिना ही जवाब दिया, “ओहो मां! आप भी किस सदी की बातें कर रही हैं। आज के जमाने में कौन सिर्फ एक कार्ड देने के लिए इतनी दूर का सफर करता है? फिर ऑफिस से छुट्टी लेना, आने-जाने की थकान। मैंने राजेंद्र मामा और सुरेंद्र मामा, दोनों को सबसे पहले व्हाट्सएप पर वीडियो इनवाइट भेजा था। राजेंद्र मामा का तो ‘थंब्स अप’ वाला इमोजी भी आ गया है। और रही बात शगुन की मिठाई की, तो मैंने सहारनपुर की सबसे मशहूर दुकान से ऑनलाइन काजू कतली और ड्राई फ्रूट्स का हैंपर उनके घर डिलीवर करवा दिया है। शाम तक पहुंच भी जाएगा।”
निर्मला जी के हाथ में पकड़ी पीली चिट्ठी मानो अचानक भारी हो गई। ‘थंब्स अप’ का एक छोटा सा नीला निशान! क्या भाई-बहन के इतने पवित्र रिश्ते और सदियों पुरानी परंपरा की कीमत अब बस एक अंगूठे के निशान जितनी रह गई है? वह चुपचाप आंगन के कोने में रखे तख्त पर जा बैठीं। उनकी आंखों के सामने करीब तीस साल पुराना वह दृश्य तैर गया, जब खुद उनका विवाह तय हुआ था।
उन्हें आज भी याद है कि कैसे उनके बाबूजी ने शादी की तारीख पक्की होते ही सबसे पहले चाचा जी को साथ लिया था और धोती-कुर्ता पहनकर, सिर पर पगड़ी बांधकर अपनी ससुराल यानी निर्मला जी के मामा के गांव गए थे। घर की औरतों ने तीन दिन तक बैठकर शुद्ध देसी घी के लड्डू और मठरियां बनाई थीं। जब बाबूजी मामा के घर पहुंचे, तो पूरे मोहल्ले में हलचल मच गई थी। मामा ने दरवाजे पर बाबूजी के पैर धोए थे, मामी ने चौका पूरकर आरती उतारी थी और जब बाबूजी ने पीले चावल मामा की हथेली पर रखे थे, तो मामा की आंखें भर आई थीं कि उनकी भांजी अब पराई होने जा रही है। उस एक न्योते में कितना सम्मान, कितनी मिठास और कितना गहरा अपनापन छिपा था। वह कार्ड बांटना कोई काम या बोझ नहीं, बल्कि खुशियों को दोगुना करने का एक उत्सव था।
“मां! कहां खो गईं आप?” मानसी की आवाज ने निर्मला जी की तंद्रा तोड़ी। मानसी अपने हाथ में तरह-तरह के कपड़ों के कैटलॉग और मोबाइल लिए खड़ी थी। “मां, जल्दी से बताइए न, संगीत की रात के लिए हम सबने ‘इंडो-वेस्टर्न ग्लैम’ थीम रखी है। आपके लिए भी मैंने एक सीक्विन वाली साड़ी सिलेक्ट की है। और हां, आज शाम से इवेंट कंपनी वाले लड़के और कोरियोग्राफर आ रहे हैं। आपको और पापा को भी एक रेट्रो मैशअप पर दो मिनट की परफॉर्मेंस देनी है।”
निर्मला जी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, तेरे पापा और मैं भला इन लड़कों के सामने क्या नाचेंगे? हमारे जमाने में तो शादी से पंद्रह दिन पहले ही मोहल्ले की चाचियां, ताई और भाभियां रात को आंगन में इकट्ठी हो जाती थीं। एक ढोलक और चम्मच की थाप पर पूरी रात बन्ना-बन्नी के गीत चलते थे। किसी को नाचना सिखाना नहीं पड़ता था, खुशी अपने आप पैरों में थिरकन ले आती थी। न कोई स्टेज होता था, न कोई कैमरा, बस हंसी-ठहाकों से घर की दीवारें गूंज उठती थीं।”
“उफ मां! वो ढोलक वाले गाने अब किसी को समझ नहीं आते,” मानसी ने थोड़ा तुनकते हुए कहा, “आजकल वेडिंग रील और सिनेमैटिक वीडियो का जमाना है। अगर प्रोफेशनल लाइटिंग और सिंक्रोनाइज्ड डांस नहीं होगा, तो वीडियो कितना बोरिंग बनेगा। मेरे सारे दोस्त और ससुराल वाले क्या कहेंगे? आप प्लीज थोड़ा कोऑपरेट करो न!”
बेटी की खुशी के आगे निर्मला जी ने सिर झुका लिया। धीरे-धीरे शादी के दिन करीब आ गए। घर को फूलों के बजाय रंग-बिरंगे कृत्रिम कपड़ों, एलईडी लाइटों और बड़े-बड़े फ्लेक्स बोर्ड से सजाया गया था, जिन पर हैशटैग लिखा था— #MansiKiShaadi।
हल्दी की रस्म वाले दिन सुबह से ही घर में कैमरामैन और इवेंट मैनेजरों का जमावड़ा लग गया। शर्त यह थी कि घर का हर सदस्य और हर मेहमान केवल सूरजमुखी के पीले रंग के कपड़े ही पहनेगा। इसी बीच इलाहाबाद से निर्मला जी की बड़ी बहन वंदना मौसी अपनी बेटी के साथ पहुंचीं। वंदना जी अपने साथ सिलबट्टे पर पिसी हुई कच्ची हल्दी, चंदन, केसर और घर की मलाई का उबटन बनाकर लाई थीं।
जैसे ही मानसी को फूलों से सजे टबनुमा मंच पर बैठाया गया, वंदना मौसी कटोरा लेकर आगे बढ़ीं, “लाओ भाई, अपनी लाड़ो को सबसे पहले मैं उबटन लगाऊं। देखना, कल तक सोने जैसा रूप निखर आएगा।”
तभी मानसी के पीछे खड़ी उसकी मेकअप आर्टिस्ट ने हाथ आगे कर दिया, “एक्सक्यूज मी आंटी! प्लीज यह घर की हल्दी मत लगाइए। मैम का कल ब्राइडल एचडी मेकअप होना है, कच्ची हल्दी से स्किन पर पीला स्टेन रह जाएगा और पोर्स ब्लॉक हो जाएंगे। हमने इनके लिए ऑर्गेनिक व्हाइट टर्मरिक और एलोवेरा का जेल मंगवाया है, आप बस गुलाब की पंखुड़ी से इनके गालों को टच कर दीजिए, हमें बस बूमरैंग वीडियो के लिए एक शॉट चाहिए।”
वंदना मौसी ठिठक कर रह गईं। उन्होंने हैरानी से निर्मला जी की तरफ देखा और धीरे से बोलीं, “छोटी, ये कैसी हल्दी की रस्म है जहां दुल्हन को हल्दी से ही परहेज है? हमारे वक्त में तो जब तक सहेलियां और भाभियां सिर से पांव तक हल्दी से पीला न कर दें, तब तक लगता ही नहीं था कि घर में ब्याह है।” निर्मला जी बस एक फीकी मुस्कान देकर रह गईं।
शाम को मेहंदी की रस्म में भी यही आलम रहा। आंगन में हरी पत्तियों को पीसकर मेहंदी घोलने की सुगंध के बजाय केमिकल वाले कोन की तेज गंध थी, जो महज आधे घंटे में गहरे काले और मरून रंग की छाप छोड़ देती थी। पीछे डीजे पर तेज आवाज में पंजाबी और अंग्रेजी रीमिक्स गाने बज रहे थे, शोर इतना था कि पास बैठे दो लोग आपस में बात भी नहीं कर पा रहे थे। रिश्तेदार एक-दूसरे का हालचाल पूछने के बजाय अपने-अपने फोन में सेल्फी लेने और रील बनाने में व्यस्त थे।
अगले दिन शादी थी। सुबह से ही निर्मला जी की नजरें मुख्य द्वार पर टिकी थीं। परंपरा के अनुसार दोपहर में ‘मायरा’ यानी भात भरने की रस्म होनी थी, जिसमें लड़की के मामा आकर अपनी बहन को कपड़े, गहने और भांजी के लिए फेरों की पीली साड़ी, चांदी के बिछिए और सोने की नथ भेंट करते हैं।
दोपहर के बारह बज गए, लेकिन सहारनपुर से न तो बड़े भाई राजेंद्र आए और न ही छोटे भाई सुरेंद्र। निर्मला जी की बेचैनी बढ़ने लगी। उन्होंने मानसी के कमरे में झांका, जहां वह अपने लहंगे की फिटिंग देख रही थी।
“मानसी बेटा, जरा आरव से कहकर मामा जी को फोन तो लगवा, पूछ कि कहां तक पहुंचे? पंडित जी दो बजे भात की रस्म और मंडप पूजन के लिए बोल रहे हैं। मामा के हाथ की पीली साड़ी और नथ पहने बिना तू मंडप में कैसे बैठेगी?”
मानसी ने आईने में देखते हुए सहजता से कहा, “मां, आप क्यों टेंशन ले रही हो? फेरों के लिए मैंने पहले ही डिजाइनर पेस्टल पिंक और गोल्डन साड़ी ले ली है। वो पारंपरिक पीली सूती साड़ी मेरे लहंगे के ऊपर बिल्कुल मैच नहीं करेगी। और नथ भी मैंने अपने कुंदन सेट के हिसाब से ओवरसाइज्ड वाली खरीदी है। मामा जी जो लाएंगे, मैं उसे रख लूंगी, पहनना थोड़ी जरूरी है। और हां, मां प्लीज कल सुबह विदाई के वक्त जोर-जोर से गले लगकर मत रोना। मेरी वॉटरप्रूफ लैशेज और फाउंडेशन खराब हो जाएगा, फिर फोटोग्राफर के कैंडिड शॉट्स अच्छे नहीं आएंगे।”
निर्मला जी के सब्र का बांध अब टूटने लगा था। उनकी आवाज में पहली बार कठोरता और दर्द एक साथ छलक आया, “मानसी! क्या शादी सिर्फ कैमरे के शॉट्स और मैचिंग कपड़ों का खेल बनकर रह गई है? जिन मामा ने तुझे गोद में खिलाया, जिनके कंधे पर बैठकर तूने बचपन में मेले देखे, आज उनके लाए शगुन के कपड़े तुझे अपने स्टेटस के हिसाब से हल्के लग रहे हैं? और एक मां अपनी कलेजे के टुकड़े को विदा करते वक्त आंसू भी कैमरे से पूछकर बहाएगी?”
मां की डांट सुनकर मानसी सकपका गई। तभी आरव कमरे में दाखिल हुआ। उसके हाथ में एक बड़ा सा कोरियर का डिब्बा था और चेहरे पर गहरी मायूसी।
“मां…” आरव ने दबी आवाज में कहा, “अभी-अभी सुरेंद्र मामा का फोन आया था।”
निर्मला जी की आंखों में उम्मीद की किरण जागी, “कहां हैं वे लोग? स्टेशन पहुंच गए क्या? तू गाड़ी लेकर जा न बेटा!”
आरव ने नजरें झुका लीं, “नहीं मां, वे लोग नहीं आ रहे हैं। राजेंद्र मामा कह रहे थे कि उनके बेटे की कंपनी में कोई जरूरी ऑडिट है और सुरेंद्र मामा की पत्नी यानी छोटी मामी को किसी रिश्तेदार की रिसेप्शन पार्टी में दिल्ली जाना था। उन्होंने यह पार्सल भिजवाया है। इसमें कुछ कपड़े हैं और उन्होंने आपके बैंक अकाउंट में भात के शगुन के एक लाख रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर कर दिए हैं। राजेंद्र मामा ने कहा है कि जैसे आपने डिजिटल कार्ड और ऑनलाइन मिठाई भेजकर नई परंपरा शुरू की है, वैसे ही उन्होंने भी डिजिटल शगुन भेजकर अपना फर्ज निभा दिया है। वे लोग सीधे रात को बारात के समय एक घंटे के लिए आएंगे और खाना खाकर वापस निकल जाएंगे।”
यह सुनते ही निर्मला जी जैसे पत्थर की हो गईं। उनके पैरों से जमीन खिसक गई और वह पास रखी कुर्सी पर धम्म से बैठ गईं। उनकी आंखों से आंसू बह निकले, जिन्हें वह पिछले कई दिनों से रोके हुए थीं।
“कहां गया वो खून का रिश्ता?” निर्मला जी सिसकते हुए बोलीं, “जब हमने ही उन्हें घर बुलाकर आदर देने के बजाय एक व्हाट्सएप के संदेश से निपटा दिया, तो उन्होंने भी एक बैंक ट्रांसफर से बहन का मायरा निपटा दिया! अरे, मुझे उनके एक लाख रुपये नहीं चाहिए थे आरव! मुझे तो बस मंडप के नीचे अपने भाइयों का वो हाथ चाहिए था, जो मेरे सिर पर रखकर कहते कि— ‘बहन, चिंता मत कर, तेरे मायके वाले तेरे साथ खड़े हैं।’ आज सब कुछ कितना आसान और सुविधाजनक हो गया है न, पर इस सुविधा ने हमारे रिश्तों की आत्मा ही मार डाली।”
मां को इस तरह फूट-फूटकर रोता देख आरव और मानसी दोनों सन्न रह गए। मानसी के हाथ से उसका डिजाइनर दुपट्टा छूटकर नीचे गिर गया। मां के एक-एक शब्द ने उन दोनों के दिल पर गहरी चोट की थी। जिस आधुनिकता और समय बचाने की दौड़ पर वे गर्व कर रहे थे, आज उसी ने उनकी मां को भरी महफिल में अपने ही मायके के आगे अनाथ जैसा महसूस करा दिया था।
आरव ने मानसी की तरफ देखा। दोनों भाई-बहन की आंखों में अपनी गलती का गहरा अहसास था। आरव ने तुरंत आगे बढ़कर मां के आंसू पोंछे और घुटनों के बल उनके सामने बैठ गया।
“मां, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैंने सुविधा को समझदारी समझ लिया था,” आरव ने मां के हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, “लेकिन अभी वक्त बीता नहीं है मां। बारात आने में अभी आठ घंटे बाकी हैं और सहारनपुर यहां से साढ़े तीन घंटे की दूरी पर है। मैं अभी अपनी गाड़ी लेकर सहारनपुर जा रहा हूं। मैं व्हाट्सएप से नहीं, मामा जी के पैरों में सिर रखकर उन्हें मनाकर लाऊंगा।”
निर्मला जी ने चौंककर कहा, “पर बेटा, घर में इतना काम है, फिर रास्ते में…”
तभी मानसी ने अपने फोन का वीडियो कॉल ऑन किया और सीधे बड़े मामा राजेंद्र जी को कॉल लगाया। स्क्रीन पर जैसे ही मामा और दोनों मामियों का चेहरा दिखा, मानसी की आंखें छलक पड़ीं।
“मामा जी, क्या अपनी गुड़िया से इतने नाराज हैं कि उसकी शादी में सिर पर हाथ रखने भी नहीं आएंगे?” मानसी ने रुंधे गले से कहा, “मामा जी, आरव भैया और मुझसे नादानी हो गई। हम आज के दिखावे में इतने अंधे हो गए थे कि हमें पता ही नहीं चला कि कब हमने अपनों को ही पराया कर दिया। भैया अभी वो शादी का पहला पीला कार्ड और मां के हाथ के बने लड्डू लेकर सहारनपुर के लिए निकल रहे हैं। और सुनिए मामी जी, मैंने अपना वो डिजाइनर लहंगा और नथ पैक करके रख दी है। आज शाम को मंडप में मैं वही पीली साड़ी और वही नथ पहनकर बैठूंगी जो आप लोग मेरे लिए अपने हाथों से लेकर आएंगे। अगर आप लोग भात लेकर नहीं आए, तो आपकी यह भांजी फेरों के मंडप में कदम नहीं रखेगी।”
दूसरी तरफ स्क्रीन पर सन्नाटा छा गया। राजेंद्र मामा की आंखों के कोने भीग गए। असल में वे भी काम की व्यस्तता से ज्यादा इस बात से आहत थे कि बहन के बच्चों ने उन्हें एक आम मेहमान की तरह बस फोन पर एक संदेश भेजकर इतिश्री कर ली थी। भांजी के आंसुओं और उसके शब्दों के सच्चेपन ने सालों के अभिमान और शिकायत को एक पल में पिघला दिया।
“अरे पगली, चुप हो जा!” राजेंद्र मामा की आवाज भर्रा गई, “भला मामा अपनी भांजी की शादी में न आए, ऐसा कभी हो सकता है क्या? आरव को मत भेज, रास्ते में वक्त बर्बाद होगा। हम सब अभी आधे घंटे में ही गाड़ी निकाल रहे हैं। सुरेंद्र, जल्दी से वो सहारनपुर वाली बनारसी पीली साड़ी और नथ का डिब्बा निकाल, आज मेरी भांजी दुनिया की सबसे सुंदर दुल्हन लगेगी!”
फोन कटते ही निर्मला जी के चेहरे पर जो रौनक लौटी, वह करोड़ों की एलईडी लाइटों से भी कहीं ज्यादा चमकदार थी। मानसी ने आगे बढ़कर मां को गले लगा लिया और बोली, “मां, अब कोई नकली रस्म नहीं होगी। वंदना मौसी! अपनी वो सिलबट्टे वाली हल्दी का कटोरा लाइए, मुझे कोई एचडी मेकअप की परवाह नहीं है, मुझे आपकी हल्दी की खुशबू चाहिए।”
शाम पांच बजते-बजते जब सहारनपुर से दोनों मामा अपने पूरे परिवार के साथ ढोल-नगाड़ों के साथ द्वार पर पहुंचे, तो आरव ने आगे बढ़कर सबसे पहले उनके चरणों में वह छपा हुआ शादी का कार्ड और गुड़ की डली रखी। मामा ने भांजे को सीने से लगा लिया।
आंगन के बीचों-बीच जब दोनों भाइयों ने अपनी बहन निर्मला को चुनरी ओढ़ाई और पारंपरिक तरीके से मायरा भरा, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। डीजे का कानफोडू संगीत बंद करवा दिया गया था और उसकी जगह वंदना मौसी व मोहल्ले की महिलाओं की ढोलक की थाप पर गाए जा रहे पारंपरिक ‘भात के गीतों’ ने ले ली थी।
रात को जब मानसी अपने मामा की दी हुई पीली बनारसी साड़ी और पारंपरिक नथ पहनकर मंडप में उतरी, तो उसके चेहरे पर किसी केमिकल मेकअप की नहीं, बल्कि अपने परिवार के आशीर्वाद और संस्कारों की आभा दमक रही थी। कैमरामैन भी इस सजीव और भावनाओं से भरे दृश्य को अपने कैमरे में कैद करते हुए मुस्कुरा रहा था, क्योंकि आज उसे ‘कैंडिड’ शॉट्स के लिए किसी को पोज देने के लिए नहीं कहना पड़ रहा था; आज हर मुस्कान और हर आंसू सौ फीसदी सच्चा था। आधुनिकता और परंपरा के इस खूबसूरत संगम ने साबित कर दिया था कि तकनीक चाहे कितनी भी आगे बढ़ जाए, रिश्तों की गर्माहट तो अपनों के स्पर्श और सम्मान से ही आती है।
आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आज के डिजिटल दौर में हम वाकई अपनी जड़ों, रीति-रिवाजों और रिश्तों की मिठास को पीछे छोड़ते जा रहे हैं? आपके घर में शादी-ब्याह की कौन सी ऐसी पुरानी परंपरा है जो आपको सबसे ज्यादा पसंद है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद
मूल लेखिका : रश्मि सिंह