वैदेही ने अपने सारे ज़ख्म, सारी शिकायतें एक पल में भुला दीं। उसने अपने नाज़ुक कंधों पर समृद्ध का भारी हाथ रखा और अपनी पूरी ताकत लगाकर उसे सहारा देते हुए अंदर कमरे तक ले आई। उसने तुरंत उसके गीले कपड़े बदले, तौलिए से उसके बाल और शरीर पोंछा और उसे रजाई ओढ़ा दी। बाहर तूफ़ान इतना भयानक था कि किसी डॉक्टर का इस वक्त पहाड़ी रास्तों से आना नामुमकिन था।
वैदेही ने घर में रखी बुखार की दवा उसे खिलाई और ठंडे पानी की पट्टियाँ लेकर उसके सिरहाने बैठ गई। रात के बारह बज चुके थे, फिर एक, दो, तीन…। पूरी रात वैदेही ने पलक तक नहीं झपकाई। वह लगातार समृद्ध के माथे पर पट्टियाँ रखती रही, उसके हाथ-पैर मलती रही।
बुखार की बेहोशी में समृद्ध बड़बड़ा रहा था, “मृणालिनी… मुझे माफ़ कर दो… मेरी वजह से… मैं खुश होने का हकदार नहीं हूँ… मैंने वैदेही के साथ बहुत अन्याय किया है… वह बहुत अच्छी है… मैं गुनहगार हूँ…”
शिमला की सर्द हवाओं में आज सुबह से ही एक अजीब सी सिहरन थी। देवदार के ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से छनकर आती सूरज की सुनहरी किरणें जब वैदेही के कमरे की खिड़की से टकराईं, तो उसने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। बिस्तर की दूसरी तरफ़ हाथ बढ़ाया, तो हमेशा की तरह चादर ठंडी और बिना किसी सिलवट के मिली। एक गहरी, ठंडी आह उसके सीने से निकली और कमरे के सन्नाटे में घुल गई। आज अठारह नवंबर था—वैदेही और समृद्ध की शादी की चौथी सालगिरह।
मोबाइल की स्क्रीन सुबह से ही चमक रही थी। व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर सैकड़ों संदेश आ चुके थे। “हैप्पी एनिवर्सरी मेड फॉर ईच अदर”, “भगवान आपकी जोड़ी सलामत रखे”, “शिमला के सबसे प्यारे कपल को सालगिरह मुबारक”—ऐसे न जाने कितने ही संदेश पढ़कर वैदेही के होंठों पर एक फीकी, दर्द भरी मुस्कान तैर गई। दुनिया की नज़रों में वह शहर के जाने-माने आर्किटेक्ट समृद्ध ठाकुर की पत्नी थी, एक ऐसी खुशकिस्मत औरत जिसके पास आलीशान बंगला, नौकर-चाकर, गाड़ियाँ और समाज में ऊँचा रुतबा था। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे छिपे उस रेगिस्तान को केवल वैदेही ही जानती थी, जहाँ पिछले चार सालों से प्यार की एक बूँद भी नहीं बरसी थी।
वह उठकर नहाई और अपनी अलमारी से वह गहरे लाल रंग की बनारसी साड़ी निकाली, जो उसकी सास गायत्री देवी ने उसे कल शाम ही देते हुए कहा था, “बहू, कल तुम्हारी सालगिरह है, इसे पहनना। लाल रंग तुझ पर बहुत खिलता है।” वैदेही ने आईने के सामने खड़े होकर खुद को निहारा। बड़ी-बड़ी आँखें, साँवला पर बेहद सलोना रंग, माथे पर लाल बिंदी और मांग में भरा सिंदूर। उसने खुद से सवाल किया—आख़िर कब तक? कब तक वह इस झूठी खुशी का लबादा ओढ़कर दुनिया के सामने मुस्कुराती रहेगी? कब तक अपने ही मन को यह दिलासा देती रहेगी कि पत्थर पिघलेगा?
तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और समृद्ध अंदर आया। वह अपनी घड़ी बाँध रहा था। कसी हुई कद-काठी, आँखों पर चश्मा और चेहरे पर वही चिर-परिचित गंभीरता। वैदेही की धड़कनें एक पल के लिए तेज़ हो गईं। शायद आज वह कुछ कहे, शायद आज वह मुस्कुरा दे। लेकिन समृद्ध ने एक सरसरी निगाह उस पर डाली—या शायद उसे अनदेखा करते हुए उसके पीछे रखी अलमारी को देखा—और अपनी कुछ ड्रॉइंग फाइलें समेटने लगा।
वैदेही ने हिम्मत जुटाकर कहा, “सुनिए… आज मैंने नाश्ते में आपके पसंद के आलू के पराठे और खीर बनाई है। माँ जी ने भी कहा है कि आज आप थोड़ा जल्दी घर आ जाइएगा।”
समृद्ध के हाथ एक पल के लिए रुके। उसने बिना वैदेही की तरफ़ देखे अपनी फाइल बगल में दबाई और सपाट स्वर में कहा, “वैदेही, मुझे आज एक ज़रूरी साइट विज़िट के लिए सोलन जाना है और शाम को क्लाइंट्स के साथ डिनर है। मुझे आने में देर हो जाएगी। मेरा इंतज़ार मत करना, और माँ को समझा देना कि काम ज़रूरी था।”
इतना कहकर वह तेज़ कदमों से कमरे से बाहर निकल गया। उसके जूतों की खट-खट की आवाज़ जैसे-जैसे दूर होती गई, वैदेही के भीतर कुछ टूटकर बिखरता चला गया। वह वहीं पलंग के कोने को पकड़कर बैठ गई। वह अच्छी तरह जानती थी कि आज न कोई साइट विज़िट है और न कोई क्लाइंट डिनर। आज अठारह नवंबर है, और आज की रात समृद्ध फिर से अपने फार्महाउस पर जाकर शराब के नशे में धुत रहेगा। वह अपने उस अतीत के ज़ख्मों को कुरेदेगा, जिसका इलाज वैदेही के पास नहीं था।
समृद्ध अपने अतीत में जीने वाला इंसान था। उसका अतीत थी ‘मृणालिनी’—उसकी कॉलेज के दिनों की प्रेमिका और उसकी पहली पत्नी। समृद्ध और मृणालिनी का प्रेम पूरे शिमला में मिसाल हुआ करता था। दोनों ने साथ मिलकर सपने बुने थे, अपना आर्किटेक्चर फर्म शुरू किया था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। शादी के महज़ डेढ़ साल बाद, एक कार दुर्घटना में मृणालिनी की मौके पर ही मौत हो गई। उस हादसे में कार समृद्ध ही चला रहा था। समृद्ध के शरीर के घाव तो भर गए, लेकिन उसकी आत्मा पर यह अपराध-बोध हमेशा के लिए छप गया कि उसकी वजह से उसकी मृणालिनी इस दुनिया में नहीं रही।
मृणालिनी के जाने के बाद समृद्ध ने खुद को एक खोल में बंद कर लिया था। वह न किसी से बात करता, न मुस्कुराता। तीन साल तक अपने इकलौते बेटे को इस तरह तिल-तिल कर मरते देख उसकी माँ, गायत्री देवी, टूट चुकी थीं। डॉक्टरों ने भी कह दिया था कि यदि समृद्ध के जीवन में कोई नया बदलाव नहीं आया, तो वह गहरे डिप्रेशन में चला जाएगा। तब गायत्री देवी ने अपनी ज़िद और अपनी सेहत की कसम देकर समृद्ध को दूसरी शादी के लिए मजबूर किया था।
और तभी इस कहानी में वैदेही का प्रवेश हुआ था। चंडीगढ़ के एक बेहद साधारण परिवार की सबसे बड़ी बेटी वैदेही। उसके पिता केदारनाथ जी एक प्राइवेट स्कूल में क्लर्क थे। रिटायरमेंट के ठीक पहले उन्हें लकवे का दौरा पड़ा और परिवार पर आर्थिक संकट का पहाड़ टूट पड़ा। घर में वैदेही के अलावा उसके दो छोटे भाई-बहन—रोहन और नेहा—भी थे, जिनकी पढ़ाई बीच में ही छूटने की नौबत आ गई थी।
एक दूर के रिश्तेदार के ज़रिए जब गायत्री देवी को वैदेही के परिवार के बारे में पता चला, तो वह खुद चंडीगढ़ आईं। वैदेही की सादगी, उसकी विनम्रता और अपने परिवार के प्रति उसके समर्पण ने गायत्री देवी का दिल जीत लिया। उन्होंने केदारनाथ जी के हाथ जोड़कर कहा, “भाई साहब, मुझे आपकी बेटी के रूप में अपने सूने घर की लक्ष्मी चाहिए। मुझे दहेज में एक सुई भी नहीं चाहिए, बस मेरी एक ही विनती है कि आपकी बेटी मेरे टूटे हुए बेटे को संभाल ले।”
एक गरीब पिता के लिए इससे बड़ा संबल और क्या हो सकता था? वैदेही ने अपने माता-पिता की आँखों में तैरती बेबसी और भाई-बहन के भविष्य को देखा, और बिना एक सवाल किए शादी के लिए हाँ कर दी।
लेकिन शादी की पहली ही रात, फूलों से सजे उस कमरे में जब समृद्ध अंदर आया, तो उसकी आँखों में किसी नई दुल्हन के लिए कोई चाव नहीं था, बल्कि एक गहरा खालीपन था। उसने कमरे के बीचों-बीच खड़े होकर बहुत ही शांत पर सख्त लहज़े में कहा था, “वैदेही, मैं तुम्हें किसी धोखे में नहीं रखना चाहता। यह शादी मैंने केवल अपनी माँ की ज़िद और उनकी गिरती सेहत की वजह से की है। इस घर में तुम्हें समृद्ध ठाकुर की पत्नी होने का हर सम्मान मिलेगा, समाज में पूरा रुतबा मिलेगा, और तुम्हें या तुम्हारे मायके वालों को कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होगी। लेकिन मेरे दिल में और मेरी रूह में केवल मृणालिनी बसती है। मैं चाहकर भी उसकी जगह किसी को नहीं दे सकता। बस मेरी तुमसे एक ही गुज़ारिश है—मेरी माँ को कभी यह एहसास मत होने देना कि हमारे बीच पति-पत्नी जैसा कोई संबंध नहीं है। वह यह सच बर्दाश्त नहीं कर पाएँगी।”
इतना कहकर समृद्ध ने तकिया और कंबल उठाया और कमरे के सोफे पर जाकर सो गया। सुहाग की उस सेज पर बैठी वैदेही की आँखों से आँसू की लड़ियाँ बह निकलीं। हर लड़की की तरह उसने भी अपने जीवनसाथी को लेकर हज़ारों ख्वाब देखे थे—कोई ऐसा जो उसका हाथ थामकर चले, उसकी छोटी-छोटी बातों पर मुस्कुराए, उसके रूठने पर उसे मनाए। लेकिन यहाँ तो पहली ही रात उसके सारे अरमान काँच के खिलौनों की तरह चकनाचूर हो गए थे।
फिर भी, वैदेही ने अपने आँसू पोंछे और इस सच्चाई को अपनी नियति मान लिया। क्यों न मानती? शादी के एक महीने के भीतर ही समृद्ध ने बिना वैदेही के कहे, चंडीगढ़ के सबसे बड़े अस्पताल में उसके पिता केदारनाथ जी का इलाज शुरू करवा दिया। रोहन का दाखिला एक बेहतरीन इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया और नेहा की पढ़ाई भी बिना किसी रुकावट के चलने लगी। हर महीने पहली तारीख को वैदेही के माता-पिता के खाते में एक मोटी रकम पहुँच जाती थी। जब समृद्ध ने उसके परिवार के कंधों से हर बोझ उतार दिया था, तो वैदेही ने भी तय कर लिया कि वह समृद्ध की इस शर्त को पूरी ईमानदारी से निभाएगी।
पिछले चार सालों में वैदेही ने उस घर को अपने पसीने और प्यार से सींचा। उसने गायत्री देवी की सेवा एक सगी बेटी से बढ़कर की। उनकी दवाइयों का समय, उनका परहेज़, उनके मंदिर जाने की तैयारी—सब कुछ वैदेही की दिनचर्या का हिस्सा बन गया। समृद्ध के प्रति भी उसने अपने कर्तव्यों में कभी कोई कमी नहीं आने दी। समृद्ध सुबह उठे उससे पहले उसका गर्म पानी, उसकी बिना चीनी की ब्लैक कॉफी, उसके इस्त्री किए हुए कपड़े और पॉलिश किए हुए जूते तैयार रहते। रात को वह चाहे कितनी भी देर से आए, वैदेही जागती रहती और बिना कोई सवाल किए उसके आगे गर्म खाना परोस देती।
शादी के दो साल बाद, जब गायत्री देवी बार-बार घर में एक नन्हे मेहमान की किलकारी सुनने की ज़िद करने लगीं, तो घर का माहौल तनावपूर्ण होने लगा। वैदेही जानती थी कि जिस रिश्ते की कोई बुनियाद ही नहीं है, वहाँ संतान की उम्मीद कैसे की जा सकती है? एक रात उसने हिम्मत करके समृद्ध से बात की।
“सुनिए, माँ जी अब अपनी उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहाँ उन्हें एक पोते या पोती का साथ चाहिए। हमारे बीच जो है, वह तो शायद कभी न बदले, पर क्या हम किसी अनाथ बच्चे को गोद नहीं ले सकते? इससे माँ जी को जीने का एक नया सहारा मिल जाएगा और किसी बेसहारा बच्चे को छत मिल जाएगी।”
समृद्ध ने उस रात पहली बार वैदेही को बहुत गौर से देखा था। उसकी आँखों में वैदेही के लिए एक अनकहा सम्मान उभरा था। कुछ दिनों की कानूनी प्रक्रिया के बाद, वे दोनों डेढ़ साल के एक बेहद प्यारे से बच्चे ‘आरव’ को घर ले आए। शुरू में गायत्री देवी थोड़ी हिचकिचाईं, क्योंकि माँ की ममता और अनुभवी आँखों से यह छुप न सका कि उनके बेटे और बहू के बीच ज़रूर कोई ऐसी दीवार है, जिसे लाँघने के लिए उन्होंने यह रास्ता चुना है। गायत्री देवी ने एक दिन अकेले में वैदेही के सिर पर हाथ रखकर रोते हुए कहा था, “मेरी बच्ची, मैं सब समझती हूँ। मेरे बेटे के अतीत की सज़ा तू भुगत रही है। पर देखना, तेरा यह त्याग और तेरा यह निस्वार्थ प्रेम एक दिन उस पत्थर को ज़रूर पिघला देगा।”
नन्हे आरव के आने से घर में रौनक आ गई थी। आरव की तोतली आवाज़, उसकी शरारतें और उसकी मुस्कान ने उस सूने बंगले में जान फूँक दी थी। वैदेही तो उसकी यशोदा बन ही गई थी, पर धीरे-धीरे समृद्ध का सख्त दिल भी आरव की मासूमियत के आगे पिघलने लगा था। समृद्ध जब ऑफिस से लौटता और आरव “पापा… पापा…” कहकर उसके पैरों से लिपट जाता, तो समृद्ध अपने सारे ग़म भूलकर उसे सीने से लगा लेता। कई बार आरव को सुलाते समय जब वैदेही लोरी गाती, तो समृद्ध कमरे के दरवाज़े की ओट में खड़े होकर एकटक वैदेही को देखता रहता। लेकिन जैसे ही वैदेही की नज़र उस पर पड़ती, वह तुरंत अपनी नज़रें चुराकर चला जाता। उसके भीतर का अपराध-बोध उसे खुश होने की इजाज़त ही नहीं देता था। वह सोचता था कि अगर वह वैदेही के करीब गया, तो यह मृणालिनी के साथ बेवफाई होगी।
आज चौथी सालगिरह के दिन, शाम ढलते-ढलते शिमला का मौसम अचानक बिगड़ गया। काले बादलों ने आसमान को घेर लिया और देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बर्फीली हवाओं के थपेड़ों से खिड़कियों के शीशे खड़कने लगे। रात के नौ बज गए, फिर दस, और फिर ग्यारह। गायत्री देवी और आरव सो चुके थे, लेकिन वैदेही ड्राइंग रूम की खिड़की के पास खड़ी बाहर अंधेरे में टकटकी लगाए देख रही थी।
तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर समृद्ध के ऑफिस के असिस्टेंट विकास का नाम चमक रहा था। वैदेही ने घबराकर फोन उठाया।
“भाभी जी, मैं विकास बोल रहा हूँ। दरअसल सर आज सोलन नहीं गए थे, वह सुबह से ही अपने पुराने स्टूडियो में थे। अभी आधे घंटे पहले जब मैं वहाँ गया, तो देखा कि सर को बहुत तेज़ बुखार है, वह ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे। मैंने उन्हें अस्पताल चलने को कहा, पर उन्होंने मुझे डाँट कर भगा दिया और खुद ही कार चलाकर घर के लिए निकल गए हैं। बाहर बहुत तेज़ तूफ़ान है और सर की हालत ठीक नहीं है, प्लीज़ आप ध्यान रखिएगा।”
वैदेही के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। उसका दिल किसी अनहोनी की आशंका से काँप उठा। उसने तुरंत शॉल ओढ़ा, छाता लिया और मुख्य द्वार की तरफ़ भागी।
ठीक पंद्रह मिनट बाद, बंगले के गेट पर कार की हेडलाइट्स चमकीं। कार बहुत अनियंत्रित तरीके से आकर पोर्टिको में रुकी। वैदेही बारिश में भीगती हुई कार की तरफ़ दौड़ी। उसने ड्राइविंग सीट का दरवाज़ा खोला, तो देखा समृद्ध स्टेयरिंग पर सिर टिकाए अचेत-सा पड़ा था। उसने शराब नहीं पी थी, बल्कि उसका पूरा शरीर बुखार से भट्टी की तरह तप रहा था और वह बारिश में पूरी तरह भीग चुका था।
“सुनिए… सुनिए! आँखें खोलिए!” वैदेही ने घबराकर उसके गाल थपथपाए।
समृद्ध ने अधखुली आँखों से वैदेही को देखा और लड़खड़ाती ज़ुबान में बड़बड़ाया, “वैदेही… मुझे ठंड लग रही है…”
वैदेही ने अपने सारे ज़ख्म, सारी शिकायतें एक पल में भुला दीं। उसने अपने नाज़ुक कंधों पर समृद्ध का भारी हाथ रखा और अपनी पूरी ताकत लगाकर उसे सहारा देते हुए अंदर कमरे तक ले आई। उसने तुरंत उसके गीले कपड़े बदले, तौलिए से उसके बाल और शरीर पोंछा और उसे रजाई ओढ़ा दी। बाहर तूफ़ान इतना भयानक था कि किसी डॉक्टर का इस वक्त पहाड़ी रास्तों से आना नामुमकिन था।
वैदेही ने घर में रखी बुखार की दवा उसे खिलाई और ठंडे पानी की पट्टियाँ लेकर उसके सिरहाने बैठ गई। रात के बारह बज चुके थे, फिर एक, दो, तीन…। पूरी रात वैदेही ने पलक तक नहीं झपकाई। वह लगातार समृद्ध के माथे पर पट्टियाँ रखती रही, उसके हाथ-पैर मलती रही।
बुखार की बेहोशी में समृद्ध बड़बड़ा रहा था, “मृणालिनी… मुझे माफ़ कर दो… मेरी वजह से… मैं खुश होने का हकदार नहीं हूँ… मैंने वैदेही के साथ बहुत अन्याय किया है… वह बहुत अच्छी है… मैं गुनहगार हूँ…”
समृद्ध के मुँह से निकले ये शब्द वैदेही के कानों में पड़े, तो उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। आज उसे समझ आया कि समृद्ध उससे नफ़रत नहीं करता, बल्कि वह खुद से नफ़रत करता है। वह खुद को अपने अतीत की जेल में कैद करके सज़ा दे रहा था।
सुबह के करीब पाँच बजे जब बारिश थमी, तो समृद्ध का बुखार उतर चुका था। जब उसने धीरे से अपनी आँखें खोलीं, तो कमरे में मद्धम रोशनी थी। उसने महसूस किया कि उसका एक हाथ किसी की बेहद नर्म और गर्म हथेलियों के बीच दबा हुआ है। उसने करवट लेकर देखा—वैदेही फर्श पर घुटनों के बल बैठी थी और उसका सिर बिस्तर के किनारे टिका हुआ था। थकान के मारे उसकी आँखें लग गई थीं, लेकिन फिर भी उसकी उँगलियाँ समृद्ध की हथेली को कसकर थामे हुए थीं। वैदेही के चेहरे पर सूखे हुए आँसुओं के निशान थे, आँखों के नीचे काले घेरे थे, और पास ही टेबल पर ठंडे पानी का कटोरा और दर्जनों गीली पट्टियाँ रखी थीं।
समृद्ध एकटक वैदेही के उस शांत और थके हुए चेहरे को देखता रहा। अचानक उसके भीतर चार सालों से जमी बर्फ़ पिघलने लगी। उसे याद आया कि कैसे इस लड़की ने बिना किसी शिकायत के उसके घर को संभाला, उसकी माँ को नया जीवन दिया, एक अनाथ बच्चे को अपना कलेजा चीरकर प्यार दिया, और आज जब वह खुद मौत के करीब महसूस कर रहा था, तो यही औरत सावित्री बनकर रात भर उसके सिरहाने बैठी रही। और बदले में उसने इसे क्या दिया? सिर्फ़ उपेक्षा, सन्नाटा और तन्हाई!
मृणालिनी की तस्वीर जो सामने दीवार पर लगी थी, समृद्ध ने उसकी तरफ़ देखा। आज पहली बार उसे ऐसा लगा जैसे मृणालिनी की तस्वीर उससे कह रही हो—”समृद्ध, मुझे जाने दो। जो तुम्हारे पास है, उसकी कद्र करो, वरना तुम जीते-जी एक और ज़िंदगी तबाह कर दोगे।”
समृद्ध की आँखों से गर्म आँसू बहे और वैदेही के हाथ पर जा गिरे। उस गर्म छुअन से वैदेही चौंककर जाग गई। उसने तुरंत अपना हाथ खींचना चाहा और हड़बड़ाकर बोली, “अरे, आप जाग गए? अब कैसा लग रहा है? मैं अभी आपके लिए गर्म सूप और चाय लेकर आती हूँ…”
वह उठने ही वाली थी कि समृद्ध ने अपनी पूरी ताकत से उसकी कलाई पकड़ ली। वैदेही के कदम वहीं थम गए। उसने पलटकर देखा, तो समृद्ध अपने बिस्तर से उठकर उसके सामने घुटनों के बल फर्श पर बैठ गया।
“आप… आप यह क्या कर रहे हैं? उठिए, आपकी तबीयत ठीक नहीं है!” वैदेही घबरा गई।
समृद्ध ने वैदेही के दोनों हाथों को अपने हाथों में लिया और उन्हें अपने माथे से लगा लिया। वह फूट-फूट कर रो पड़ा—बिल्कुल एक छोटे बच्चे की तरह। चार सालों का दबा हुआ गुबार आज आँसुओं के रास्ते बाहर आ रहा था।
“मुझे माफ़ कर दो वैदेही… मुझे माफ़ कर दो!” समृद्ध की आवाज़ भर्राई हुई थी। “मैं कितना अंधा और स्वार्थी हो गया था अपने दुख में कि मुझे तुम्हारा दर्द, तुम्हारा त्याग कभी दिखाई ही नहीं दिया। तुमने मेरे खंडहर जैसे जीवन को मंदिर बना दिया, और मैं तुम्हें ही पत्थर की मूरत समझता रहा। मैंने तुम्हारे चार साल छीन लिए वैदेही… तुम्हारे सपने रौंद दिए…”
वैदेही स्तब्ध रह गई। जिस इंसान की एक नज़र के लिए वह चार सालों से तरस रही थी, आज वह उसके कदमों में बैठा अपने आँसुओं से उसके हाथ भिगो रहा था। वैदेही भी खुद को रोक न सकी। वह फर्श पर समृद्ध के सामने बैठ गई और उसने आगे बढ़कर समृद्ध के सिर को अपने सीने से लगा लिया।
“बस कीजिए… प्लीज़ मत रोइए। मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है,” वैदेही ने उसके बालों में उँगलियाँ फिराते हुए रोते हुए कहा।
समृद्ध ने अपना सिर उठाया और वैदेही की आँखों में झाँकते हुए कहा, “मृणालिनी मेरा बीता हुआ कल थी वैदेही, एक खूबसूरत अध्याय जो समाप्त हो चुका है। मैं उसे कभी अपमानित नहीं करूँगा, लेकिन आज मैं उस अतीत की कैद से खुद को आज़ाद करता हूँ। मेरी आज, मेरा कल और मेरी हर साँस पर अब सिर्फ़ तुम्हारा हक है। क्या तुम इस टूटे हुए इंसान को एक नई शुरुआत करने का मौका दोगी? क्या तुम सच में मेरी पत्नी बनोगी वैदेही?”
वैदेही के होंठ काँप उठे। उसके भीतर हज़ारों दीये एक साथ जल उठे। उसने आँसुओं के बीच मुस्कुराते हुए बस अपनी गर्दन हाँ में हिला दी। समृद्ध ने आगे बढ़कर वैदेही के माथे को चूम लिया और उसे अपनी बाहों में भर लिया। दरवाज़े की ओट में खड़ी गायत्री देवी अपनी गोद में नन्हे आरव को लिए यह दृश्य देख रही थीं और अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी खुशी के आँसू पोंछते हुए भगवान का शुक्रिया अदा कर रही थीं।
उसी शाम, जब मौसम पूरी तरह साफ़ हो गया और आसमान में इंद्रधनुष खिल उठा, तो समृद्ध वैदेही को लेकर शिमला की एक शांत झील के किनारे गया। वहाँ देवदार के पेड़ों की छाँव में, लकड़ी की एक बेंच पर वे दोनों बैठे थे। नन्हा आरव पास ही घास पर तितलियों के पीछे भाग रहा था। समृद्ध ने अपनी जेब से एक छोटी सी मखमली डिब्बी निकाली, जिसमें एक बेहद खूबसूरत हीरे की अंगूठी थी। उसने वैदेही की उँगली में वह अंगूठी पहनाई और उसका हाथ अपने हाथों में थामकर अपने कंधे पर उसका सिर टिका लिया।
वैदेही ने आँखें मूँद लीं। ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी, और उसके हाथ में उसके पति के हाथ की गर्माहट थी। चार साल का लंबा बनवास आज समाप्त हो चुका था। उसने मन ही मन सोचा—सच्चा प्रेम और निस्वार्थ समर्पण कभी व्यर्थ नहीं जाता; सब्र का फल भले ही देर से मिले, पर जब मिलता है तो ज़िंदगी के सारे अधूरे अरमान पूरे हो जाते हैं।
आपकी राय:
दोस्तों, वैदेही के चार सालों के मौन त्याग और सब्र ने आख़िरकार समृद्ध के पत्थर हो चुके दिल को पिघला ही दिया। आपके हिसाब से क्या किसी रिश्ते में अतीत की यादों को भुलाकर आगे बढ़ना आसान होता है? अगर आप वैदेही की जगह होते, तो क्या इतना सब्र रख पाते? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ, आपके कमेंट्स का हमें बेसब्री से इंतज़ार रहेगा!
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मूल लेखिका : बेला पूनीवाला